जब भरोसा परमेश्वर पर टिका हो
भरोसा और शान्ति
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए यशायाह 26:3, याकूब 4:14, यिर्मयाह 17:5-6 and भजन संहिता 4:1.
☀ सुबह का पल
जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए हैं, उसकी तू पूर्ण शान्ति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है। (फिलि. 4:7)
यशायाह 26:3
क्या आज का दिन भी कल जैसा ही थका देने वाला होगा? यह सवाल अक्सर आँख खुलते ही मन में आ जाता है, बिस्तर से उठने से पहले ही थकान का एहसास होने लगता है। काम का बोझ, अनसुलझी बातें, वही चिंताएँ जो रात को भी पीछा नहीं छोड़ती थीं, सब वापस लौट आती हैं।
यशायाह की यह बात किसी झूठे दिलासे जैसी नहीं है। यह कोई वादा नहीं है कि दिन आसान होगा या समस्याएँ गायब हो जाएँगी। यह एक शर्त के साथ आया वादा है, जिसका मन परमेश्वर पर स्थिर रहता है, उसे वह पूरी शांति में रखता है। मन का भटकना स्वाभाविक है, पर उसे लौटाना भी हमारे हाथ में है।
पूरी शांति का मतलब यह नहीं कि सब कुछ शांत दिखे। इसका मतलब है कि भीतर एक स्थिरता बनी रहे, चाहे बाहर जो भी चल रहा हो। यह विश्वास है, यह भरोसा है कि परमेश्वर आज के हर घंटे में मौजूद रहेगा, जैसे वह कल भी था।
आज
आज का दिन शुरू करने से पहले, एक गहरी सांस लें और मन में केवल एक वाक्य दोहराएँ, मेरा मन आज आप पर स्थिर है। इसे तीन बार, धीरे-धीरे, ज़ोर से बोलें, इससे पहले कि आप फोन उठाएँ या कमरे से बाहर निकलें।
✦ दोपहर का पल
और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो मानो धुंध के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है। (नीति. 27:1)
याकूब 4:14
याकूब उन व्यापारियों की बात करता है जो अगले साल के लाभ की योजना पूरे भरोसे से बना रहे थे, जैसे कल उनकी अपनी मुट्ठी में हो। उनकी डायरी भरी हुई थी, उनका हिसाब पक्का था, बस एक बात भूल गए थे, कि जीवन उनके हाथ में नहीं है।
दोपहर के इस पल में तेरी मेज़ पर भी शायद कोई सूची पड़ी है, आज का टारगेट, कल की मीटिंग, अगले महीने की योजना। सब जरूरी लगता है, और है भी। पर याकूब बीच में आकर एक सवाल टांक देता है, तुम्हारा जीवन क्या है?
भाप। हवा में उठी और गायब हुई। यह सुनकर घबराने की बात नहीं, यह सुनकर रुकने की बात है। जो कुछ आज तेरे सामने है, उसमें ही परमेश्वर मौजूद है, कल की चिंता में नहीं।
यह पल छोटा है, तेरा भोजन भी छोटा है, तेरा जीवन भी। इसी छोटेपन में परमेश्वर का हाथ देखना सीख।
आज
अभी, इस समय, अपनी योजनाओं की सूची में सबसे ऊपर एक पंक्ति लिख, यदि प्रभु की इच्छा हो। इसे मन में नहीं, कागज़ या फोन में शब्दों में लिख दे, और आगे बढ़ने से पहले एक सांस लेकर इसे धीरे से बोल भी दे।
◐ दोपहर का पल
यहोवा यह कहता है, “श्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और उसका सहारा लेता है, जिसका मन यहोवा से भटक जाता है। वह निर्जल देश के अधमरे पेड़ के समान होगा और कभी भलाई न देखेगा। वह निर्जल और निर्जन तथा लोनछाई भूमि पर बसेगा।
यिर्मयाह 17:5-6
झाड़ी की जड़ें दरकी हुई ज़मीन में फैली हैं। ऊपर की मिट्टी नमकीन और सफेद है, नीचे कहीं पानी नहीं। पत्ते मुड़े हुए, धूसर, धूप में झुलसते हुए। यह झाड़ी बढ़ती नहीं, बस बची रहती है, दिन दर दिन।
यहोवा यही तस्वीर चुनते हैं उस आदमी के लिए जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, जो अपनी ही ताकत को अपना सहारा बना लेता है। कठोर शब्द है, पर सच है। दोपहर के समय, जब दिन की ताकत ढल चुकी हो और अभी काम बाकी हो, हम अक्सर अपनी ही योजना, अपने ही हाथ पर टिक जाते हैं। और वह हाथ थक जाता है।
सवाल यह नहीं है कि हम आलसी हैं या नहीं। सवाल यह है कि दिन के बीच में, जब थकान भारी हो, हमारा हृदय किस ओर मुड़ता है। क्या हम अपनी शक्ति को अपना देवता बना लेते हैं, बिना जाने?
यह वचन आराम नहीं देता, यह चुभता है। पर चुभन ही जगाती है। यहोवा से दूर हृदय, यही असली रेगिस्तान है, बाहर की गर्मी नहीं।
आज
एक कागज़ का टुकड़ा लो। उस पर वह एक काम लिखो जिसे तुम आज अपनी ही ताकत से खींच रहे हो। फिर धीरे से बोलो, यहोवा, मैं यह तुझ पर छोड़ता हूँ। कागज़ को जेब में रखो और दोपहर में जब भी हाथ उस पर पड़े, वही वाक्य फिर से कहो।
☾ संध्या का क्षण
हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूँ तब तू मुझे उत्तर दे; जब मैं संकट में पड़ा तब तूने मुझे सहारा दिया। मुझ पर अनुग्रह कर और मेरी प्रार्थना सुन ले।
भजन संहिता 4:1
"मेरे धर्म के परमेश्वर", यह शब्द-क्रम अजीब लगता है। हम कहना चाहेंगे "मेरा धर्मी परमेश्वर", यानी परमेश्वर जो धर्मी है। पर दाऊद कुछ और कहता है, वह कहता है परमेश्वर जो मेरे धर्म का स्रोत है। मेरी सच्चाई, मेरी सफाई मुझसे नहीं आती, वह उसी से आती है जिसे मैं पुकार रहा हूं।
यह शाम के समय बड़ी राहत की बात है। दिन भर हमने खुद को सही ठहराने की कोशिश की, अपने काम से, अपने निर्णयों से, अपनी बातचीत से। अब सूरज ढल गया है और वह हिसाब भी थोड़ा ढीला पड़ सकता है।
दाऊद यहां खुद को साफ नहीं बताता। वह संकट में है, फिर भी वह अपने धर्म की बात करता है, क्योंकि वह जानता है कि उसका खड़ा रहना उस पर टिका है जिसे वह पुकारता है, अपने ऊपर नहीं।
इसलिए वह मांग सकता है, राहत मांग सकता है, दया मांग सकता है, बिना शर्मिंदा हुए। जो अपने धर्म का स्रोत परमेश्वर में पाता है, वह खाली हाथ आकर भी डरता नहीं।
आज
आज रात एक मिनट रुककर, दिन की उस एक बात को धीरे से बोल दें जिसने आपको परेशान किया, और फिर वही शब्द कहें, "मुझ पर दया कर, और मेरी प्रार्थना सुन।" इसके बाद फोन को दूसरे कमरे में रख दें और बाकी शाम उसे वहीं रहने दें।
इन अंशों को IRV Hindi 2019 में पढ़ें
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3जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए हैं, उसकी तू पूर्ण शान्ति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है। (फिलि. 4:7)
14और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो मानो धुंध के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है। (नीति. 27:1)
5यहोवा यह कहता है, “श्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और उसका सहारा लेता है, जिसका मन यहोवा से भटक जाता है।
6वह निर्जल देश के अधमरे पेड़ के समान होगा और कभी भलाई न देखेगा। वह निर्जल और निर्जन तथा लोनछाई भूमि पर बसेगा।
1हे मेरे धर्ममय परमेश्वर, जब मैं पुकारूँ तब तू मुझे उत्तर दे; जब मैं संकट में पड़ा तब तूने मुझे सहारा दिया। मुझ पर अनुग्रह कर और मेरी प्रार्थना सुन ले।
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