प्रभु ही सबसे जरूरी बात
प्रभु पर टिकी आस्था
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मरकुस 10:51, यूहन्ना 15:4, न्यायियों 5:3 and लूका 10:41-42.
☀ सुबह का पल
इस पर यीशु ने उससे कहा, “तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिये करूँ?” अंधे ने उससे कहा, “हे रब्बी, यह कि मैं देखने लगूँ।”
मरकुस 10:51
सड़क के किनारे बैठे रहना एक आदत बन जाती है। लोग तेज़ चलते हैं, कोई रुकता नहीं, और आवाज़ धीरे-धीरे भीतर ही दबने लगती है।
बरतिमाई यरीहो की सड़क पर ऐसे ही बैठा था, अंधा, भीख माँगता हुआ। जब उसने सुना कि यीशु पास से गुज़र रहे हैं, तो वह चिल्लाया। भीड़ ने उसे चुप कराने की कोशिश की, पर वह और ज़ोर से पुकारता रहा। और यीशु रुक गए। इतनी बड़ी भीड़ में, इतने सारे लोगों के बीच, वे रुके और उसे अपने पास बुलाया।
फिर आया वह सवाल, सीधा और सरल: तू मुझसे क्या चाहता है कि मैं तेरे लिये करूँ? यह सवाल किसी परीक्षा जैसा नहीं था। यीशु जानते थे कि वह अंधा है, पर उन्होंने उसे बोलने का मौका दिया। उसकी अपनी आवाज़ में, अपने शब्दों में।
यह जान लेना अच्छा है कि प्रभु आज भी वैसे ही रुकते हैं। वे भीड़ की आवाज़ों से थके नहीं हैं, न ही तुम्हारी पुकार से परेशान। जो चीज़ तुम्हारे भीतर सुबह से दबी है, वह उनके सामने कही जा सकती है।
आज
आज सुबह घर से निकलने से पहले, अकेले में, ऊँची आवाज़ में एक वाक्य कहो: यीशु, मैं चाहता हूँ कि तू आज मेरे लिए यह करे। जो सच में मन में है, वही कहो, चुप मत रहो।
✦ दोपहर का पल
तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।
यूहन्ना 15:4
काटी गई डाली की सारी मेहनत बेकार है। वह कुछ घंटों में सूख जाती है, और उसमें से एक भी दाना नहीं निकलता।
इस्राएल की पहाड़ियों पर दाखलताएँ ज़मीन के पास फैलाई जाती थीं, तने से निकली हर डाली रस पर ज़िंदा रहती थी, वह रस लगातार जड़ से बहता रहता था। जिस पल डाली काट दी जाती, प्रवाह रुक जाता। वह हरी दिखती रह सकती थी, पर भीतर कुछ नहीं बचता था, बस जलाने के लिए लकड़ी। यशायाह में वही उपमा और गहरी हो जाती है, एक उत्तम दाखलता उपजाऊ पहाड़ी पर लगाई जाती है, अच्छे फल की आशा में, और जंगली अंगूर निकलते हैं।
यीशु इस रोज़मर्रा के दृश्य को उठाकर एक असाधारण दावा करते हैं, मैं दाखलता हूँ, तुम डालियाँ। फल कोई कोशिश से नहीं आता, जुड़े रहने से आता है।
दोपहर के इस समय काम की गति तेज़ होती है, सूची लंबी होती है, और यह भ्रम आसान होता है कि व्यस्त होना ही जुड़े होना है। पर डाली कितनी भी हरी दिखे, अगर रस नहीं बह रहा, फल नहीं आएगा।
आज
अभी, काम की सूची से नज़र हटाकर, धीरे से इन शब्दों को ऊँची आवाज़ में कहो, मैं तुझ में बना रहता हूँ। फिर एक गहरी साँस लेकर अगला काम शुरू करो।
◐ दोपहर का पल
“हे राजाओं, सुनो; हे अधिपतियों कान लगाओ, मैं आप यहोवा के लिये गीत गाऊँगी; इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का मैं भजन करूँगी।
न्यायियों 5:3
दोपहर की मीटिंग खत्म हुई है, स्क्रीन अभी भी खुली है, और कोई एक कोने में बैठा सोच रहा है कि आज की उलझनों को किसे बताए। ऐसे ही किसी थकान भरे पल में देबोरा का यह गीत खड़ा होता है, तेज़ और बिना झिझक के।
यह गीत किसी शांत क्षण में नहीं लिखा गया। सीसरा की सेना हार चुकी थी, इस्राएल बरसों के दबाव से मुक्त हुआ था, और देबोरा और बाराक ने मिलकर यह गीत गाया। पर ध्यान दें, यह गीत सीधे राजाओं और शासकों को संबोधित है, 'हे राजाओं, सुनो! हे हाकिमों, ध्यान दो!' यह किसी घरेलू शुक्रगुज़ारी की भाषा नहीं, यह गवाही की भाषा है, अदालत में खड़े होकर बोलने जैसी। देबोरा शक्तिशाली लोगों के सामने साफ कहती है, यह जीत मेरी नहीं, यहोवा की है।
यही बात चुभती है। कितनी बार हमारी छोटी जीतें, दफ्तर की एक मुश्किल बातचीत सुलझ जाना, कोई बीमारी टल जाना, बिना किसी गीत के गुज़र जाती हैं। हम राहत महसूस करते हैं पर उसे शब्द नहीं देते। देबोरा 'मैं, मैं ही गाऊँगी' कहकर इस चुप्पी को तोड़ती है।
यह गीत हमें यह भाषा देता है, दबी हुई राहत को आवाज़ बनाने की भाषा।
आज
अभी दस मिनट लें। पिछले कुछ हफ्तों की किसी छोटी छुटकारे की बात एक पंक्ति में लिखें, और फिर उसे ऊँची आवाज़ में यहोवा के सामने कह दें, ठीक जैसे देबोरा ने कहा था।
☾ संध्या का क्षण
प्रभु ने उसे उत्तर दिया, “मार्था, हे मार्था; तू बहुत बातों के लिये चिन्ता करती और घबराती है। परन्तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उससे छीना न जाएगा।”
लूका 10:41-42
आज दिन के अंत में, थकान के साथ, यह सवाल मन में कहीं दबा बैठा है: क्या मैंने सही चुना, या बस भागती रही, बिना यह पूछे कि किस लिए?
मार्था ने अपना घर यीशु के लिए खोला था। यह छोटी बात नहीं थी, उस समय मेहमान का सत्कार करना एक गंभीर कर्तव्य था, इज़्ज़त की बात थी। इसलिए वह रसोई में लगी रही, तैयारी में डूबी, जबकि उसकी बहन मरियम यीशु के पैरों के पास बैठ गई और सुनती रही। मार्था चिढ़ गई, शिकायत लेकर आई। और यीशु ने उसे नाम से दो बार बुलाया, कठोरता से नहीं, कोमलता से।
"बहुत सी बातों" में उलझी हुई मार्था को यीशु एक बात की ओर मोड़ते हैं। काम गलत नहीं था, पर उसने काम को अपने ऊपर हावी होने दिया था, जहाँ बैठना और सुनना छूट गया।
यह शाम के लिए भी सच है। दिन भर की सूची पूरी हो या न हो, आज रात एक ही बात ज़रूरी है, उसके पास बैठना। यह आराम कमज़ोरी नहीं, यह चुना हुआ अच्छा भाग है।
आज
आज रात दस मिनट के लिए बैठ जाओ, बिना फोन, बिना किसी काम के, हाथ खाली रखो और चुपचाप कहो, "प्रभु, आज मैं सुनने बैठी हूँ।"
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51इस पर यीशु ने उससे कहा, “तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिये करूँ?” अंधे ने उससे कहा, “हे रब्बी, यह कि मैं देखने लगूँ।”
4तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते।
3“हे राजाओं, सुनो; हे अधिपतियों कान लगाओ, मैं आप यहोवा के लिये गीत गाऊँगी; इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का मैं भजन करूँगी।
41प्रभु ने उसे उत्तर दिया, “मार्था, हे मार्था; तू बहुत बातों के लिये चिन्ता करती और घबराती है।
42परन्तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उससे छीना न जाएगा।”
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