अपने भाई का रखवाला बनना
प्रेम और जिम्मेदारी
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए मत्ती 18:21-22, उत्पत्ति 4:9, व्यवस्थाविवरण 32:11 and प्रेरितों के काम 11:26.
☀ सुबह का पल
तब पतरस ने पास आकर, उससे कहा, “हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ, क्या सात बार तक?” यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझ से यह नहीं कहता, कि सात बार, वरन्सात बार के सत्तर गुनेतक।
मत्ती 18:21-22
व्यापारी अपने खाते की पट्टी पर हर उधार का निशान बनाता था, मिट्टी की पटिया पर एक-एक खरोंच, जब तक कर्ज़ चुकता न हो जाए। हर निशान एक याद था कि किसने कितना देना है। पूरे बाज़ार में हिसाब रखने का यही तरीका था, नाम, तारीख, और एक कतार में गिनी हुई खरोंचें।
पतरस के मन में भी ऐसा ही एक हिसाब चल रहा था। उस समय के यहूदी शिक्षक सिखाते थे कि किसी को तीन बार माफ़ करना ही काफी है, उसके बाद रिश्ता तोड़ना जायज़ है। पतरस ने सात तक जाकर उदारता दिखाने की कोशिश की, यह उस पुराने माप से पहले ही दोगुने से ज़्यादा था।
पर यीशु ने जवाब में एक ऐसी संख्या दी जो गिनती को ही खत्म कर देती है। सत्तर गुना सात, यानी चार सौ नब्बे बार। कोई भी हिसाब रखने वाला इतनी बार खरोंचें नहीं गिनता रह पाता। यह संख्या इसलिए नहीं दी गई कि हम चार सौ इक्यानवेवीं बार गिनना बंद कर दें, बल्कि इसलिए कि पट्टी ही टूट जाए।
यही संख्या एक और जगह भी सुनाई देती है, जहाँ लेमेक ने घमंड से गाया था कि वह सत्तर गुना सात बदला लेगा। यीशु उसी संख्या को उठाकर पूरी तरह उलट देते हैं, बदले की जगह क्षमा, हिसाब की जगह मुक्ति।
आज की सुबह अगर मन में किसी का हिसाब अब भी चल रहा है, कोई पुरानी खरोंच जो अभी तक मिटी नहीं, तो यही शब्द उस पट्टी को हाथ से उठा देने का मौका देते हैं।
आज
एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखें जिसके साथ आप हिसाब रखते आए हैं, और उसके नीचे उस बात को भी लिख दें जो अब तक गिनी जाती रही है। फिर उस कागज़ को फाड़ दें, अपने हाथ से, आज गिनती बंद करने के निशान के रूप में।
✦ दोपहर का पल
तब यहोवा ने कैन से पूछा, “तेरा भाई हाबिल कहाँ है?” उसने कहा, “मालूम नहीं; क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?”
उत्पत्ति 4:9
ध्यान दो, कैन एक भी सवाल का जवाब नहीं देता। परमेश्वर पूछते हैं, तेरा भाई कहाँ है। कैन कहता है, मुझे नहीं मालूम, और फिर तुरंत एक और सवाल फेंक देता है। यह जवाब नहीं, बचाव है। एक सवाल से भाग कर दूसरे सवाल की आड़ में छिप जाना।
जिस शब्द का अनुवाद रखवाला हुआ है, वह वही शब्द है जो चरवाहे के लिए, या नगर के फाटक पर पहरा देने वाले के लिए इस्तेमाल होता था। यह किसी हल्के से ध्यान देने की बात नहीं थी, यह जिम्मेदारी उठाने की बात थी। कैन यह जानता था, इसीलिए उसने वह शब्द खुद चुना, ताकि सवाल को हास्यास्पद बना सके।
परमेश्वर उस सवाल का कोई जवाब नहीं देते। वे सीधे अगला सवाल पूछते हैं, तूने क्या किया है। सवाल हवा में लटका रह जाता है, हर पाठक के सामने, आज तक।
दोपहर के इस छोटे विश्राम में यह सवाल असहज करने के लिए ही है। दफ्तर में, मोहल्ले में, घर में, कोई न कोई तुम्हारी निगरानी में है, चाहे तुमने वह जिम्मेदारी माँगी हो या नहीं।
आज
एक नाम सोचो, जिसकी जिम्मेदारी तुमने चुपचाप टाल रखी है। अभी उसे एक छोटा संदेश भेजो, बस इतना पूछते हुए कि वह ठीक तो है।
◐ दोपहर का पल
जैसे उकाब अपने घोंसले को हिला-हिलाकर अपने बच्चों के ऊपर-ऊपर मण्डराता है, वैसे ही उसने अपने पंख फैलाकर उसको अपने परों पर उठा लिया।
व्यवस्थाविवरण 32:11
चील का घोंसला किसी ऊँची चट्टान की दरार में बना होता है, पहुँच से बाहर, और भीतर से मुलायम, फुलाहट और पंखों से बिछा हुआ। बच्चों के छोटे रहते वह वहाँ सुरक्षित पड़े रहते हैं। पर एक दिन माँ चील उस नरम बिछावन को हटाने लगती है। नीचे की टहनियाँ और काँटे उघड़ आते हैं। घोंसला अचानक चुभने लगता है।
यही वह शब्द है जो पढ़ते हुए अक्सर छूट जाता है, उभारती है। यह घोंसला तोड़ना नहीं है, न ही उसे छोड़ देना है। यह जानबूझकर की गई हलचल है, आराम को हिला देना, ताकि बच्चे किनारे तक आएँ, पंख फड़फड़ाएँ, और अंततः उड़ें।
और ठीक उसी पल वह माँ नीचे मंडराती रहती है। यदि कोई बच्चा गिरने लगे, तो वह अपने पंख फैलाकर उसे थाम लेती है, अपने ही परों पर उठा लेती है। इस्राएल के लिए भी परमेश्वर ने यही किया, जंगल की बंजर भूमि में उन्हें उकसाया, उनके आराम को हिलाया, पर साथ ही उन्हें अपने पंखों पर उठाए भी रखा।
पर सवाल यहीं रह जाता है, बिना जल्दी सुलझे। जब मेरी आरामदायक जगह अचानक चुभने लगे, नौकरी में, रिश्ते में, अपनी ही आदतों में, तो क्या वह उजाड़ है या वह हलचल है जो उड़ना सिखा रही है। इसका जवाब तुरंत नहीं मिलता। इसे सहना पड़ता है।
आज
आज एक कागज़ पर वह एक आरामदायक बात लिखें जो आपको हिलने नहीं दे रही, कोई आदत, कोई सुरक्षा, कोई टालमटोल। उसे बदलने की कोशिश मत कीजिए, बस उसे लिखकर परमेश्वर के सामने खुला रख दीजिए।
☾ संध्या का क्षण
और जब उनसे मिला तो उसे अन्ताकिया में लाया, और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत से लोगों को उपदेश देते रहे, और चेले सबसे पहले अन्ताकिया ही में मसीही कहलाए।
प्रेरितों के काम 11:26
कोई नाम आमतौर पर वही रखता है जिसका वह होता है। हम खुद चुनते हैं कि लोग हमें क्या कहें, अपनी पहचान खुद बनाते हैं, अपनी उपाधि खुद कमाते हैं। पर अन्ताकिया में ऐसा नहीं हुआ। वहाँ के लोगों ने उन्हें देखा और खुद ही एक नाम दे दिया, मसीही। किसी ने माँगा नहीं था, किसी ने खुद को यह नाम नहीं दिया।
अन्ताकिया रोमी साम्राज्य का तीसरा बड़ा शहर था, सीरिया की व्यापारिक राजधानी, जहाँ बंदरगाह से मसाले, कपड़े और लोग हर दिन आते जाते थे। यूनानी, यहूदी, रोमी, सब मिलकर एक भीड़भाड़ वाली गली में रहते थे। ऐसी जगह में एक साल तक विश्वासी इकट्ठे होते रहे, सीखते रहे, साथ खाते रहे। उनका जीवन इतना अलग था कि आस-पास के लोगों ने उन्हें एक नया नाम दे दिया, जो सदियों तक चला।
यह सोचने लायक बात है कि नाम उस शहर की भीड़ से निकला, किसी मंच से नहीं। पहचान वहाँ बनी जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी बीतती थी, बाज़ार में, गली में, पड़ोस में।
आज शाम इस पर ठहरें, आपका जीवन आज किसी को क्या दिखा सकता था। नाम बाद में मिलता है, जीवन पहले दिया जाता है।
आज
एक कागज़ पर लिखें कि आज किसी क्षण में आपके व्यवहार से मसीह की झलक दिख सकती थी, और उसके लिए परमेश्वर को धीरे से धन्यवाद दें।
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21तब पतरस ने पास आकर, उससे कहा, “हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ, क्या सात बार तक?”
22यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझ से यह नहीं कहता, कि सात बार, वरन्सात बार के सत्तर गुनेतक।
9तब यहोवा ने कैन से पूछा, “तेरा भाई हाबिल कहाँ है?” उसने कहा, “मालूम नहीं; क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?”
11जैसे उकाब अपने घोंसले को हिला-हिलाकर अपने बच्चों के ऊपर-ऊपर मण्डराता है, वैसे ही उसने अपने पंख फैलाकर उसको अपने परों पर उठा लिया।
26और जब उनसे मिला तो उसे अन्ताकिया में लाया, और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत से लोगों को उपदेश देते रहे, और चेले सबसे पहले अन्ताकिया ही में मसीही कहलाए।
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