जब डर घेरे, तब भरोसा थामे
भय से भरोसा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए यशायाह 43:1, मत्ती 6:31, अय्यूब 7:6 and भजन संहिता 34:4.
☀ सुबह का पल
हे याकूब तेरा सृजनहार यहोवा, और हे इस्राएल तेरा रचनेवाला, अब यह कहता है, “मत डर, क्योंकि मैंने तुझे छुड़ा लिया है; मैंने तुझे नाम लेकर बुलाया है, तू मेरा ही है।
यशायाह 43:1
सोमवार की सुबह पौने सात बजे, चाय अभी गरम है और मोबाइल की स्क्रीन पर हफ्ते भर के काम की सूची पहले से चमक रही है। मन एक साथ कई दिशाओं में भागने लगता है, मीटिंग, बच्चों का स्कूल बैग, कोई अनसुलझा सवाल जो कल रात भी सोने नहीं दे रहा था।
ठीक ऐसे ही किसी सुबह के लिए यह वचन लिखा गया है। यह किसी अजनबी की आवाज़ नहीं है। यह उसकी आवाज़ है जिसने तुम्हें बनाया, जिसने तुम्हें नाम से जाना। परमेश्वर सामान्य भीड़ को नहीं बुलाते, वे तुम्हें बुलाते हैं, ठीक तुम्हारे नाम से।
“डरो मत” यह कोई खोखला दिलासा नहीं है। यह एक ठोस आधार पर टिका वादा है, क्योंकि वे कहते हैं “मैंने तुझे छुड़ाया है” और “तू मेरा है”। इस दिन की अनिश्चितता के बीच यही एक बात स्थिर है, तुम्हारी पहचान किसी काम, किसी परिणाम से नहीं बनती, बल्कि उस परमेश्वर से बनती है जिसने तुम्हें अपना कहा है।
इस पहचान को याद रखते हुए दिन शुरू करना डर को घटा देता है, चाहे बाहर जो भी हो।
आज
आज घर से निकलने से पहले दर्पण के सामने खड़े हो जाइए और ऊँची आवाज़ में एक बार कहिए, ‘मैं परमेश्वर का हूं’, फिर उसके बाद ही दरवाज़ा खोलकर दिन में कदम रखिए।
✦ दोपहर का पल
“इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे?
मत्ती 6:31
पहाड़ी पर बैठी भीड़ में किसान थे, मछुआरे थे, दिहाड़ी मजदूर थे, ऐसे लोग जिन्हें सच में पता नहीं था कि आज रात चूल्हे पर क्या पकेगा। यीशु उनकी आँखों में देखकर यह बात कहते हैं, किसी आरामदायक कमरे से नहीं, बल्कि उस असुरक्षा के बीच जो हर दिन की रोटी से जुड़ी होती है।
आज तुम्हारी असुरक्षा शायद रोटी की नहीं है। शायद वह ईमेल है जो जवाब मांग रहा है, वह मीटिंग जो अभी बाकी है, वह हिसाब जो शाम तक पूरा नहीं होगा। लेकिन बेचैनी वही है, वही सवाल कि क्या सब संभल जाएगा।
यीशु चिंता को गलत नहीं कहते क्योंकि वह अस्वाभाविक है, वे उसे गलत कहते हैं क्योंकि वह भूल जाती है कि पिता देख रहा है। दोपहर के भोजन का यह छोटा ठहराव, यही याद दिलाने के लिए काफी है।
थाली सामने आती है, हाथ रुकते हैं, फोन एक ओर रखा जाता है, और एक क्षण के लिए मन उस सवाल से हट जाता है जो सुबह से भारी था। यह छोटी सी शांति, यही असली भोजन है।
आज
आज दोपहर, खाना उठाने से पहले एक क्षण रुकें, हाथ जोड़ें और धीरे से बोलें, यहोवा, आज के लिए धन्यवाद, फिर आराम से खाएं, बिना फोन देखे।
◐ दोपहर का पल
मेरे दिन जुलाहे की ढरकी से अधिक फुर्ती से चलनेवाले हैं और निराशा में बीते जाते हैं।
अय्यूब 7:6
करघे पर शटल तेज़ी से इधर से उधर उड़ता है, धागा खिंचता है, कपड़ा बुनता जाता है। न रुकना, न सुस्ताना, बस लगातार गति, जब तक कि सूत खत्म न हो जाए। अय्यूब ने अपने दिनों का वर्णन करने के लिए यही तस्वीर चुनी।
सोमवार की दोपहर में यह पंक्ति अजीब तरह से सच लगती है। सुबह से जो काम शुरू हुआ वह बिना रुके चलता जा रहा है, और भीतर कहीं एक थकान है जो सिर्फ शरीर की नहीं है। अय्यूब यहाँ उम्मीद नहीं बाँट रहा, वह सिर्फ कह रहा है कि दिन बिना आशा के बीतते जा रहे हैं।
यह असहज करने वाला वचन है। कोई तुरंत समाधान नहीं, कोई चमकीला अंत नहीं। पर यह बाइबल में है, परमेश्वर के वचन में दर्ज है, और यह अपने आप में कुछ कहता है। परमेश्वर के सामने ऐसी थकी हुई, बिना आशा की बात कहने की जगह है।
शायद आज का काम भी ऐसा ही लगे, बिना रुके चलने वाला शटल, बिना किसी स्पष्ट अर्थ के। यह वचन उस भावना को झुठलाता नहीं, बस उसे शब्द देता है।
आज
एक कागज़ पर लिखो, आज का दिन कैसा बीत रहा है, बिना उसे सुंदर बनाए। फिर वही वाक्य ज़ोर से पढ़ो, जैसे परमेश्वर के सामने खड़े होकर कह रहे हो।
☾ संध्या का क्षण
मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।
भजन संहिता 34:4
डर कभी दस्तक देकर नहीं आता, वह चुपचाप कमरे में बैठ जाता है। आज के दिन का कोई कोना, कोई अनसुलझी बात, कोई कल की चिंता, शायद वहीं बैठी है, आपके साथ इस समय भी।
दाऊद भी ऐसी ही रातों से गुज़रा। वह राजा शाऊल से भागता रहा, जान बचाता रहा, और फिर भी यह गीत लिख पाया। उसने डर को छुपाया नहीं, नकारा नहीं, बल्कि उसे शब्द दिए और परमेश्वर के सामने रख दिया। और उत्तर मिला, न सिर्फ राहत का आश्वासन, बल्कि खुद परमेश्वर की उपस्थिति।
यह वादा नहीं कि डर की वजह गायब हो जाएगी। दफ्तर की उलझन कल भी रहेगी, बच्चे की परीक्षा भी। पर यह वादा है कि जब हम खोजते हैं, तो अकेले नहीं खोजते। परमेश्वर सुनता है, और वह उत्तर देने से पीछे नहीं हटता।
आज रात यही करना है, जो पूरे दिन आपके भीतर दबा रहा उसे बाहर लाना। नाम देना उसे, और परमेश्वर के सामने रख देना, जैसे कोई बोझ हाथ से नीचे रखा जाता है।
आज
एक कागज़ पर आज के सबसे बड़े डर या चिंता को एक वाक्य में लिख लीजिए। फिर धीरे से बोलिए, यहोवा, यह मैं आपको सौंपता हूं, और कागज़ को मोड़कर अलग रख दीजिए।
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1हे याकूब तेरा सृजनहार यहोवा, और हे इस्राएल तेरा रचनेवाला, अब यह कहता है, “मत डर, क्योंकि मैंने तुझे छुड़ा लिया है; मैंने तुझे नाम लेकर बुलाया है, तू मेरा ही है।
31“इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे?
6मेरे दिन जुलाहे की ढरकी से अधिक फुर्ती से चलनेवाले हैं और निराशा में बीते जाते हैं।
4मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।
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