छोटे और अयोग्य, फिर भी चुने गए
कमजोरों का चुनाव
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए निर्गमन 12:5, 1 राजा 3:7, निर्गमन 3:11 and लूका 19:5.
☀ सुबह का पल
तुम्हारा मेम्ना निर्दोष और पहले वर्ष का नर हो, और उसे चाहे भेड़ों में से लेना चाहे बकरियों में से।
निर्गमन 12:5
निर्गमन 12:5 में एक छोटा सा शब्द है जिसे ज़्यादातर पाठक पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं, 'एक वर्ष का'। यह मेमना नवजात नहीं था, न बूढ़ा मेढ़ा। ठीक एक साल का, जवानी की पूरी ताक़त में, फिर भी कोमल। इस्राएल के चरवाहे जानते थे कि इस उम्र में भेड़ का बच्चा सबसे स्वस्थ होता है, अभी तक किसी घाव ने उसे छुआ नहीं होता। यही वह मेमना था जो हर परिवार के लिए चुना गया।
यह मेमना कुछ दिन परिवार के आँगन में रहता था, बच्चों के पास, घर का हिस्सा बनकर। फिर उसी शाम उसका लहू दरवाज़ों की चौखट पर लगाया गया, और उसका मांस जल्दी-जल्दी, कमर बाँधे, जूते पहने खाया गया। उस रात मौत पूरे मिस्र में फिरी, पर जिस घर पर लहू था, वहाँ से होकर निकल गई।
सदियों बाद यरदन नदी के किनारे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने यीशु को आते देखा और कहा, 'देखो, परमेश्वर का मेमना'। निष्कलंक, बेदाग़, जिसने घाव और बीमारी से भरे संसार में बिना दाग़ के जीवन जिया। वही मेमना, जिसकी ओर मिस्र का हर मेमना केवल इशारा था।
जैसे इस्राएल के परिवार उस रात कमर बाँधे, जूते पहने खड़े थे, चलने को तैयार, वैसे ही आज तू भी तैयार खड़ा हो सकता है। मेमने का लहू उन्हें हिम्मत देता था अनजानी रात में निकलने की। वही हिम्मत आज तेरे दरवाज़े पर भी है।
आज
आज घर से निकलने से पहले दरवाज़े की चौखट को हाथ से छू और धीरे से कह, 'मेमना मेरे आगे चल चुका है'। यह छोटा सा काम तुझे याद दिलाएगा कि तू अकेला नहीं निकल रहा।
✦ दोपहर का पल
अब, हे यहोवा मेरे परमेश्वर, तूने अपने दास को मेरे पिता दाऊद के स्थान पर राजा बनाया है, और मैं एक छोटा बालक हूं; मुझे बाहर जाने और भीतर आने का ज्ञान नहीं।
1 राजा 3:7
गिबोन की ऊंची वेदी पर अभी भी धुआं उठ रहा है। एक हज़ार होमबलि चढ़ाए गए हैं, राख अभी ठंडी भी नहीं हुई कि सुलैमान वहीं रात बिताता है, और नींद में परमेश्वर उससे बोलते हैं, मांग, मैं तुझे क्या दूं।
यह कोई अनुभवी राजा नहीं है। गद्दी नई है, पिता दाऊद अभी-अभी गुजरे हैं, और राज्य की हर छोटी-बड़ी बात अब इसी जवान के कंधों पर है। वह झूठी विनम्रता नहीं दिखाता, वह सच कहता है, मुझे बाहर जाने और भीतर आने का ज्ञान नहीं।
यही वह जगह है जहां से असली प्रार्थना शुरू होती है, वहां नहीं जहां हम सब कुछ जानते हैं, बल्कि वहां जहां हम मानते हैं कि नहीं जानते। सुलैमान धन नहीं मांगता, लंबी उम्र नहीं मांगता, वह एक सुनने वाला हृदय मांगता है, ऐसा हृदय जो न्याय करने से पहले सुन सके, फैसला लेने से पहले ठहर सके।
दफ्तर की मेज पर, क्लास रूम में, फोन पर आती मांगों के बीच, हम अक्सर जल्दी जवाब देना सीख जाते हैं। पर जो हृदय सुनना भूल जाए, वह बुद्धि से भी बड़ी चीज़ खो देता है। सुलैमान की प्रार्थना सिखाती है कि नेतृत्व की शुरुआत ज्ञान से नहीं, सुनने की चाह से होती है।
आज
आज दोपहर जो भी अगला निर्णय तुम्हें लेना है, उससे पहले एक कागज़ पर लिखो, मुझे सुनने वाला हृदय दे, और फिर वह निर्णय लो।
◐ दोपहर का पल
तब मूसा ने परमेश्वर से कहा, “मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?”
निर्गमन 3:11
मैं। सिर्फ एक शब्द, पर पूरा वाक्य उसी पर टिका है। मूसा यह नहीं पूछता कि यह काम कैसे होगा, या कितना समय लगेगा। वह पूछता है कि मैं कौन हूं। यह सवाल योजना का नहीं, पहचान का है। और अक्सर हम इस पंक्ति से इतनी जल्दी आगे बढ़ जाते हैं कि इसका वज़न महसूस ही नहीं होता।
याद रखें, यह वही मूसा है जिसने चालीस साल पहले एक मिस्री को मार डाला था, फिर भाग गया, और अब भेड़ें चराते हुए अपनी ज़िंदगी के बाकी दिन गिन रहा था। जलती हुई झाड़ी से आवाज़ आती है, फिरौन के पास जा। और मूसा का पहला उत्तर दावा नहीं, पीछे हटना है।
यह सवाल उसे खोखला नहीं करता, उसे सच्चा बनाता है। उसकी असफलता, उसकी उम्र, उसका भूला हुआ आत्मविश्वास, सब कुछ उस एक वाक्य में बोल उठता है। परमेश्वर तुरंत उसे दिलासा नहीं देता कि चिंता मत कर, तू काबिल है। पाठ वहीं ठहर जाता है, सवाल हवा में लटका रहता है।
शायद आज दोपहर किसी ज़िम्मेदारी के सामने तुम्हारे भीतर भी यही आवाज़ उठी हो, मैं कौन हूं इसके लिए। उस सवाल को दबाओ मत। वह कमजोरी की निशानी नहीं, सच बोलने की शुरुआत है।
आज
एक कागज़ पर आज जो काम तुम्हें भारी लग रहा है उसके आगे लिखो, मैं कौन हूं कि यह करूं। उस पर्ची को मेज़ पर रखो, बिना उसका उत्तर भरे, और आज उसे वहीं पड़ा रहने दो।
☾ संध्या का क्षण
जब यीशु उस जगह पहुँचा, तो ऊपर दृष्टि करके उससे कहा, “हे जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।”
लूका 19:5
भीड़ में छिपकर, दूर से देखना सबसे सुरक्षित तरीका लगता है, बिना जुड़े देख लेना, बिना पहचाने जाने का जोखिम उठाए दिन को देख लेना। जक्कई भी यही करना चाहता था।
यरीहो के एक पेड़ पर एक छोटे कद का आदमी चढ़ा हुआ है। वह चुंगी लेनेवालों का सरदार है, धनी है, पर अपने ही लोगों से घृणित है, क्योंकि वह रोमी सरकार के लिए कर वसूलता था। एक प्रतिष्ठित, अमीर आदमी का भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़ना, यह बच्चों जैसा काम था। पर देखने की चाह ने उसकी प्रतिष्ठा की परवाह मिटा दी।
यीशु उस भीड़ भरी गली में ठीक उसी पेड़ के नीचे रुकते हैं, ऊपर देखते हैं, और नाम लेकर बुलाते हैं। जो छिपकर देखना चाहता था, उसे अचानक घर का मेज़बान बनना पड़ता है। आज, उसी दिन, यीशु उसके घर ठहरते हैं।
आज का दिन भी ऐसा ही बीता होगा, कुछ दूरी बनाए रखते हुए, थोड़ा हिसाब लगाते हुए कि कितना शामिल होना सुरक्षित है। पर यीशु आज भी ऊपर देखते हैं और नाम लेकर बुलाते हैं।
आज
आज रात, घर के उस कमरे में जाएं जहां आप सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, और धीरे से ज़ोर से कहें, यीशु, आज रात मेरे घर में ठहर।
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5तुम्हारा मेम्ना निर्दोष और पहले वर्ष का नर हो, और उसे चाहे भेड़ों में से लेना चाहे बकरियों में से।
11तब मूसा ने परमेश्वर से कहा, “मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?”
5जब यीशु उस जगह पहुँचा, तो ऊपर दृष्टि करके उससे कहा, “हे जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।”
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