मौन में परमेश्वर की उपस्थिति
मौन और भरोसा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए रोमियों 8:32, नीतिवचन 10:19, हबक्कूक 2:1 and भजन संहिता 139:11-12.
☀ सुबह का पल
जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?
रोमियों 8:32
बुवाई के मौसम में किसान अपने भंडार से बीज निकालता है, पर हर बोरी नहीं खोलता। सबसे अच्छा गेहूँ, सबसे मोटे दाने, अलग रख दिए जाते हैं, आने वाले साल के लिए सुरक्षित। कोई भी अपनी सबसे बहुमूल्य चीज़ आसानी से हाथ से नहीं जाने देता, चाहे कितना भी उदार हो।
परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया। उसने अपने सबसे बहुमूल्य को, अपने पुत्र को, रोक नहीं रखा। कुछ भी सुरक्षित बचाकर नहीं रखा गया। जो सबसे कीमती था, वह पूरी तरह से दे दिया गया, हमारे लिए।
सोमवार की सुबह अक्सर हिसाब-किताब से शुरू होती है, कितना काम बचा है, कितना समय है, क्या कुछ छूट जाएगा। मन खुद ही तराज़ू बन जाता है, हर चीज़ की कमी नापता रहता है।
पर जिस परमेश्वर ने अपना सबसे बड़ा खज़ाना दे दिया, वह छोटी-छोटी ज़रूरतों में क्यों पीछे रहेगा? यह प्रश्न पौलुस का भी है, और उसका उत्तर आज की चिंता से बड़ा है।
आज
आज सुबह, कागज़ पर या फोन में, वह एक चीज़ लिख लें जिसकी आपको आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस हो रही है, चाहे वह समय हो, शांति हो या हिम्मत। लिखने के बाद उसे परमेश्वर के हाथ में सौंपते हुए ज़ोर से कहें, तू ने अपना पुत्र नहीं रोका, यह भी दे देगा।
✦ दोपहर का पल
जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुँह को बन्द रखता है वह बुद्धि से काम करता है।
नीतिवचन 10:19
कैंटीन की मेज़ पर यह मान लिया जाता है कि जो सबसे ज़्यादा बोलता है, वही सबसे ज़्यादा जुड़ता है, वही सबसे मिलनसार लगता है। बातों का ढेर लगाना दोस्ती की निशानी समझा जाता है। पर नीतिवचन की यह पंक्ति इस भरोसे में एक दरार डाल देती है।
दोपहर के भोजन की मेज़ पर बातें अपने आप बढ़ती जाती हैं। बॉस की शिकायत, किसी सहकर्मी की कमी, दफ्तर की राजनीति, हर विषय पर एक टिप्पणी तैयार रहती है। शब्द जितने ज़्यादा, उतना ही आसान है कि उनमें कोई तीखी बात, कोई अधूरा सच, कोई छोटा पाप घुस जाए।
बुद्धि यहाँ चुप्पी को डर से नहीं जोड़ती, संयम से जोड़ती है। जो अपने होठों पर लगाम रखता है, वह कमज़ोर नहीं, समझदार कहा गया है। हर विचार को ज़बान देना ज़रूरी नहीं।
यीशु के शब्द भी याद दिलाते हैं कि कम बोलना कमी नहीं, गहराई हो सकती है। उनके वाक्य छोटे थे, पर वज़नदार। वे जानते थे कि कब रुकना है।
आज
आज भोजन के समय जब बातचीत किसी की आलोचना या गपशप की ओर मुड़े, तो एक वाक्य बीच में रोक लो और चुपचाप कुछ और खाना शुरू कर दो। यह छोटा रुकना ही आज की बुद्धि होगी।
◐ दोपहर का पल
मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूँगा, और गुम्मट पर चढ़कर ठहरा रहूँगा, और ताकता रहूँगा कि मुझसे वह क्या कहेगा? मैं अपने दिए हुए उलाहने के विषय में क्या उत्तर दूँ?
हबक्कूक 2:1
पत्थर की सीढ़ियां पैरों के नीचे खुरदरी हैं। हबक्कूक चढ़ता जाता है, सांस भारी होती है, हवा ऊपर तेज़ बहती है और उसके कपड़े खींचती है। वह गुम्मट पर पहुंचकर रुक जाता है, आगे कोई कदम नहीं, बस प्रतीक्षा।
पीछे उसने जो कहा था वह हल्का नहीं था, हिंसा, अन्याय, चुप्पी की शिकायत सीधे परमेश्वर से। अब वह जवाब मांगने नहीं, जवाब सुनने खड़ा है। फर्क बड़ा है। शिकायत करना आसान है, ठहरकर सुनना कठिन।
सोमवार की दोपहर में हमारा मन भी उत्तर चाहता है, फौरन, फोन की स्क्रीन जितनी तेज़। जब जवाब नहीं आता तो हम अगला काम पकड़ लेते हैं, सवाल को दबा देते हैं। हबक्कूक ऐसा नहीं करता। वह गुम्मट छोड़ता नहीं।
यह ठहरना कमज़ोरी नहीं, हिम्मत है। वह जानता है परमेश्वर देर से बोल सकता है, और शायद जो उत्तर आए वह उसकी उम्मीद जैसा न हो। फिर भी वह पहरे पर रहता है, क्योंकि वह मानता है कि परमेश्वर बोलेगा।
आज
आज दस मिनट के लिए फोन को दूसरे कमरे में रख दें, कुर्सी पर सीधे बैठें, और उस एक अनुत्तरित सवाल को ज़ोर से बोल दें जो आपने मन में दबा रखा है। फिर चुपचाप बैठे रहें, बिना जल्दी उठे।
☾ संध्या का क्षण
यदि मैं कहूँ कि अंधकार में तो मैं छिप जाऊँगा, और मेरे चारों ओर का उजियाला रात का अंधेरा हो जाएगा, तो भी अंधकार तुझ से न छिपाएगा, रात तो दिन के तुल्य प्रकाश देगी; क्योंकि तेरे लिये अंधियारा और उजियाला दोनों एक समान हैं।
भजन संहिता 139:11-12
ध्यान दो, दाऊद पहले खुद अपनी बात कहता है, "यदि मैं कहूं", मानो वह अपने ही डर को ज़ोर से बोलकर सुन रहा हो। वह ढोंग नहीं करता कि अंधेरा डरावना नहीं लगता। वह उसे स्वीकार करता है, नाम देता है, और फिर उसी सांस में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है।
यही शाम का सच है। दिन खत्म होते ही मन में कई बातें उभर आती हैं, जो दिन में दबी रहीं, चिंता, थकान, अधूरे काम, कोई कठिन बातचीत। अंधेरा बढ़ता है, और साथ में भीतर का अंधेरा भी।
पर दाऊद यहीं नहीं रुकता। वह कहता है कि परमेश्वर के लिए रात और दिन में कोई फर्क नहीं। जहां हमारी आंखें कुछ नहीं देख पातीं, वहां वह देखता है। जहां हम टटोलते हैं, वहां वह चलता है, बिना ठोकर खाए।
यह तसल्ली दिलासे भरी है। तुम्हारा आज का उलझा हुआ मन, तुम्हारी अनकही थकान, तुम्हारा वह डर जो तुमने किसी से नहीं कहा, वह सब उसके सामने खुला है। उसे अंधेरे में देखने के लिए किसी दीये की ज़रूरत नहीं।
आज
आज रात अपने कमरे की बत्ती एक मिनट के लिए बंद कर दो। अंधेरे में चुपचाप बैठो और धीरे से बोलो, "प्रभु, आप यहां मुझे देख रहे हैं।" फिर बत्ती जलाकर सो जाओ।
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32जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?
19जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुँह को बन्द रखता है वह बुद्धि से काम करता है।
1मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूँगा, और गुम्मट पर चढ़कर ठहरा रहूँगा, और ताकता रहूँगा कि मुझसे वह क्या कहेगा? मैं अपने दिए हुए उलाहने के विषय में क्या उत्तर दूँ?
11यदि मैं कहूँ कि अंधकार में तो मैं छिप जाऊँगा, और मेरे चारों ओर का उजियाला रात का अंधेरा हो जाएगा,
12तो भी अंधकार तुझ से न छिपाएगा, रात तो दिन के तुल्य प्रकाश देगी; क्योंकि तेरे लिये अंधियारा और उजियाला दोनों एक समान हैं।
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