बाइबल पुस्तक

फिलिप्पियों की पत्री: हर परिस्थिति में आनन्द और मसीह जैसा मन

परिचय

आधी रात को एक अंधेरी कोठरी में, पीठ पर कोड़ों के ताज़े घाव लिए, पैर काठ में जकड़े हुए दो आदमी गा रहे हैं। बाकी कैदी सुन रहे हैं, क्योंकि ऐसा उन्होंने पहले कभी नहीं सुना। यह फिलिप्पी शहर है, और यही उस कलीसिया का जन्मस्थान है जिसे लगभग दस साल बाद एक चिट्ठी मिलेगी, फिर से किसी जेल से, फिर से उसी पौलुस की कलम से, और उसमें बार-बार एक ही शब्द गूँजेगा: आनन्द।

यह संयोग नहीं है। फिलिप्पियों की पत्री उन लोगों के लिए लिखी गई जिनकी कलीसिया जंजीरों के बीच गाए गए गीत से शुरू हुई थी। इस पृष्ठ पर आप इस छोटी सी चिट्ठी के लेखक, समय, परिस्थिति, बनावट और मुख्य विषयों को गहराई से समझेंगे, और इससे भी बढ़कर यह देखेंगे कि पौलुस का आनन्द कहाँ से आता था और आपका कहाँ से आ सकता है।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

अधिकतर लोग फिलिप्पियों को "आनन्द की पुस्तक" कहकर पढ़ते हैं, मानो यह सकारात्मक सोच की एक प्राचीन पुस्तिका हो। यह मार्गदर्शिका एक अलग दिशा से चलती है: फिलिप्पियों आनन्द की नहीं, झुकने की पुस्तक है। इसका हृदय अध्याय 2 का वह गीत है जिसमें मसीह ऊपर से नीचे उतरते हैं, क्रूस तक, और तब परमेश्वर उन्हें ऊँचा उठाते हैं। पौलुस का आनन्द परिस्थिति बदलने से नहीं, बल्कि उसी नीचे उतरने वाले मन को अपनाने से पैदा हुआ। इसलिए हम इस चिट्ठी को ऊपर चढ़ने की सीढ़ी की तरह नहीं, बल्कि नीचे उतरने वाले मार्ग की तरह पढ़ेंगे, जहाँ अप्रत्याशित रूप से आनन्द मिलता है।

बाइबल फिलिप्पियों की पत्री के बारे में क्या कहती है?

पत्री अपने लेखक को छिपाती नहीं। पहली ही पंक्ति में पौलुस और तीमुथियुस अपने आप को "मसीह यीशु के दास" कहकर प्रस्तुत करते हैं, और सम्बोधन उन सब पवित्र लोगों के नाम है जो फिलिप्पी में हैं, साथ ही अध्यक्षों और सेवकों के नाम भी। कलीसिया के इतिहास में किसी ने भी गम्भीरता से इस बात पर सन्देह नहीं किया कि यह चिट्ठी प्रेरित पौलुस की है; दूसरी शताब्दी के आरम्भ में पॉलीकार्प इसे पौलुस की चिट्ठी के रूप में उद्धृत करता है। तीमुथियुस सह-प्रेषक है, पर शैली, हृदय और आँसू पूरी तरह पौलुस के हैं।

परिस्थिति भी स्पष्ट है: पौलुस बन्धुआई में है। वह लिखता है कि उसके बन्धन "सारे राजभवन" में प्रकट हो गए हैं, और अन्त में वह "कैसर के घराने" के विश्वासियों की ओर से नमस्कार भेजता है। इसी से अधिकांश बाइबल विद्वान मानते हैं कि यह चिट्ठी रोम से लिखी गई, लगभग सन् 60 से 62 के बीच, उस समय जब पौलुस किराए के घर में पहरे के अधीन था, जैसा प्रेरितों के काम 28 में वर्णित है। कुछ लोग इफिसुस या कैसरिया की जेल का सुझाव देते हैं, परन्तु रोम वाला दृष्टिकोण सबसे स्वाभाविक बैठता है। तात्कालिक कारण यह था कि फिलिप्पी की कलीसिया ने इपफ्रुदीतुस के हाथ उसके लिए भेंट भेजी थी, वह वहाँ बीमार पड़ गया, और अब स्वस्थ होकर लौट रहा है, और उसी के हाथ यह धन्यवाद-पत्र भेजा जा रहा है।

अब ध्यान दीजिए कि पौलुस अपनी जंजीरों के बारे में क्या कहता है। वह शिकायत नहीं करता, बल्कि लिखता है कि जो कुछ उस पर बीता है उससे सुसमाचार ही बढ़ा है। उसका शरीर बँधा है, पर वचन खुला है।

जंजीरें सुसमाचार को नहीं, केवल पौलुस को बाँध सकीं।

इसी भरोसे की जड़ पहले अध्याय के उस पद में दिखाई देती है जो आज भी अनगिनत विश्वासियों का सहारा है: "और मुझे इस बात का भरोसा है, कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा" (फिलिप्पियों 1:6)। पौलुस का आशावाद उसके हालात पर नहीं, परमेश्वर के काम करने के तरीके पर टिका है। जो आरम्भ करते हैं, वही पूरा भी करते हैं। कलीसिया एक अधूरी इमारत है, पर ठेकेदार भरोसेमंद है।

इसी भरोसे से वह जीवन और मृत्यु दोनों को तौल सकता है: "क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है" (फिलिप्पियों 1:21)। यहाँ कोई मृत्यु का रोमानी महिमामंडन नहीं है, बल्कि एक ऐसा समीकरण है जिसमें दोनों पलड़े भारी हैं। जीना मसीह की सेवा है, मरना मसीह के पास पहुँचना है; हारने का कोई रास्ता ही नहीं बचता।

और फिर वह चिन्ता से भरे लोगों को वह आदेश देता है जो सदियों से घुटनों के बल ले आता है: "किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ" (फिलिप्पियों 4:6)। यह दमन नहीं, स्थानान्तरण है: चिन्ता को दबाना नहीं, उसे उठाकर परमेश्वर के सामने रख देना। इसका परिणाम वही शान्ति है जो समझ से परे है और हृदय तथा विचारों की पहरेदारी करती है, जैसे रोमी सिपाही पौलुस की पहरेदारी कर रहे थे।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

फिलिप्पियों का आनन्द अचानक नए नियम में पैदा नहीं हुआ। पुराने नियम में भी आनन्द बार-बार वहीं से फूटता है जहाँ परिस्थिति सबसे बुरी होती है। नहेम्याह के दिनों में लौटे हुए बन्धुए व्यवस्था सुनकर रो रहे थे, तब उनसे कहा गया, "यहोवा का आनन्द तुम्हारा दृढ़ गढ़ है।" आनन्द यहाँ भावना नहीं, किला है। हबक्कूक ने उजड़े हुए खेतों और खाली भेड़शालाओं को देखकर भी कहा कि वह यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहेगा। भजन 16:11 में दाऊद गाता है, "तू मुझे जीवन का मार्ग दिखाएगा; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है।" ध्यान दीजिए, भरपूरी "तेरे निकट" है, परिस्थितियों में नहीं।

यही बात शान्ति के विषय में भी सच है। फिलिप्पियों 4:6-7 कोई नई खोज नहीं, बल्कि एक पुराने वादे की प्रतिध्वनि है: "जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शान्ति के साथ रक्षा करता है क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है" (यशायाह 26:3)। यशायाह ने भी घिरे हुए नगर, गिरते राज्यों और डरे हुए लोगों के बीच यह लिखा था। मन का परमेश्वर पर टिके रहना और परमेश्वर का उस मन की रक्षा करना, यह वही दोहरा चक्र है जो पौलुस चार सौ साल बाद दोहराता है। बाइबल की शान्ति भीतर से उपजी शान्ति नहीं, बाहर से पहरा देती हुई शान्ति है।

पर सूत्र का सिरा अध्याय 2 में खुलता है। जब पौलुस लिखता है कि हर एक घुटना यीशु के नाम पर टिकेगा और हर एक जीभ अंगीकार करेगी कि यीशु मसीह ही प्रभु है, तो वह यशायाह 45:23 को उद्धृत कर रहा है, जहाँ परमेश्वर अपनी ही शपथ खाकर कहते हैं कि प्रत्येक घुटना उन्हीं के सामने टिकेगा। पुराने नियम में जो आदर केवल यहोवा का था, पौलुस उसे बिना झिझक यीशु को दे देता है। यहीं पुराने नियम की दो धाराएँ मिलती हैं: यशायाह 53 का दुःख उठाने वाला दास जो अपने आप को मृत्यु तक उंडेल देता है, और दानिय्येल 7 का मनुष्य का पुत्र जिसे सारी प्रभुता दी जाती है। फिलिप्पियों 2 में दोनों एक ही व्यक्ति हैं।

इसलिए यह चिट्ठी हमें केवल "खुश रहने" की सलाह नहीं देती। यह दिखाती है कि इस्राएल के शास्त्र जिस राह पर इशारा करते रहे, वह राह नीचे से होकर ऊपर जाती है: पहले कुण्ड, फिर मुकुट; पहले क्रूस, फिर नाम जो सब नामों में श्रेष्ठ है। मसीह उस मार्ग पर चले, और हमें उन्हीं के पीछे बुलाया गया है।

रचना और मुख्य विषय

फिलिप्पियों में चार अध्याय और लगभग एक सौ चार पद हैं, पर इसकी बनावट किसी तार्किक शोध-पत्र जैसी नहीं, एक मित्र की चिट्ठी जैसी है जो विषय से विषय पर सहजता से बहती है।

शुरुआत में नमस्कार और धन्यवाद है (1:1-11), जहाँ पौलुस फिलिप्पियों के साथ अपनी "सहभागिता" का उल्लेख करता है, एक ऐसा शब्द जो इस चिट्ठी में बार-बार लौटता है और जिसका अर्थ केवल भावनात्मक मेलजोल नहीं, बल्कि सुसमाचार के काम में साझेदारी है, पैसे और प्रार्थना दोनों से। इसके बाद पौलुस अपनी स्थिति का समाचार देता है (1:12-26): कैदखाना सुसमाचार के लिए मंच बन गया है, कुछ लोग ईर्ष्या से मसीह का प्रचार कर रहे हैं और कुछ प्रेम से, पर पौलुस को इससे भी आनन्द है कि मसीह का नाम तो सुनाया जा रहा है। यहीं उसका वह प्रसिद्ध दुविधा-वचन आता है कि जीना मसीह है और मरना लाभ।

फिर पत्री का हृदय आता है (1:27-2:18)। पौलुस फिलिप्पियों से कहता है कि उनका चाल-चलन सुसमाचार के योग्य हो, कि वे एक मन होकर खड़े रहें, कि वे विरोधियों से न डरें। और एकता का रास्ता वह नियमों में नहीं, एक व्यक्ति में दिखाता है: "जो मसीह यीशु का स्वभाव था वही तुम्हारा भी स्वभाव हो" (2:5)। इसके बाद वह गीत आता है जिसे कलीसिया "मसीह का भजन" कहती है, जिसमें मसीह परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी अपने आप को खाली करते हैं, दास का रूप धरते हैं, और "मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली" (फिलिप्पियों 2:8)। तब परमेश्वर उन्हें अति महान करते हैं। इस गीत के तुरन्त बाद पौलुस कहता है कि डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ, क्योंकि परमेश्वर ही है जो तुम में इच्छा और काम दोनों का प्रभाव डालता है। अनुग्रह आलस्य नहीं सिखाता, वह भीतर से काम करता है।

इसके बाद दो जीवित उदाहरण आते हैं (2:19-30): तीमुथियुस, जो अपने स्वार्थ की नहीं बल्कि दूसरों की चिन्ता करता है, और इपफ्रुदीतुस, जो मसीह के काम के लिए मृत्यु के मुँह तक चला गया। सिद्धान्त के तुरन्त बाद पौलुस आपको चेहरे दिखाता है, क्योंकि मसीह जैसा मन कोई अमूर्त विचार नहीं, चलते-फिरते लोग हैं।

अध्याय 3 में स्वर बदल जाता है। पौलुस उन लोगों के विरुद्ध कड़ी चेतावनी देता है जो खतने और वंश के बल पर धार्मिकता का दावा करते थे, और अपनी ही धार्मिक उपलब्धियों की सूची गिनाकर उन्हें हानि और कूड़ा ठहरा देता है, क्योंकि मसीह को जानने की उत्तमता के सामने सब फीका है। यहीं दौड़ का चित्र आता है, और स्वर्ग की नागरिकता का उल्लेख, जो उस रोमी उपनिवेश के निवासियों के लिए बहुत अर्थपूर्ण था जो अपनी रोमी नागरिकता पर गर्व करते थे।

अन्तिम भाग (4:1-23) व्यावहारिक है: यूओदिया और सुन्तुखे के झगड़े का सीधा नाम लेकर समाधान, सदा आनन्दित रहने का बुलावा, चिन्ता के बदले प्रार्थना, विचारों को सुन्दर बातों से भरने का आदेश, सन्तोष सीखने की गवाही, और भेंट के लिए हार्दिक धन्यवाद, जो इस बात की याद दिलाता है कि यह चिट्ठी किसी गोष्ठी के लिए नहीं, असली लोगों के असली उपहार के उत्तर में लिखी गई थी।

इस पुस्तक के मुख्य पद

"और मुझे इस बात का भरोसा है, कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा" (फिलिप्पियों 1:6)। इस पद में तीन बातें छिपी हैं: काम परमेश्वर ने आरम्भ किया, काम अभी अधूरा है, और उसकी समाप्ति की तिथि परमेश्वर के हाथ में है। पौलुस यह किसी आदर्श कलीसिया के बारे में नहीं लिख रहा, बल्कि ऐसी कलीसिया के बारे में जिसमें दो स्त्रियाँ आपस में नहीं बन पा रहीं और कुछ लोग शिकायती स्वभाव के हैं। फिर भी वह आश्वस्त है, क्योंकि उसका भरोसा उनके प्रदर्शन पर नहीं, परमेश्वर की निष्ठा पर है। जो आज अपनी आत्मिक प्रगति से निराश हैं, उनके लिए यह पद आराम की कुर्सी नहीं, बल्कि आगे चलने की ताकत है।

"निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है" (फिलिप्पियों 3:14)। ठीक इससे पहले पौलुस कहता है कि वह पीछे की बातों को भूलकर आगे की बातों की ओर बढ़ता है। यहाँ "भूलना" का अर्थ स्मृति मिटाना नहीं, बल्कि पीछे मुड़कर न देखना है, न अपनी असफलताओं को और न अपनी सफलताओं को। दौड़ने वाला गर्दन घुमाकर नहीं दौड़ता। और ध्यान दीजिए कि इनाम कोई वस्तु नहीं, वह बुलाहट की पूर्ति है, अर्थात् मसीह स्वयं। यह पद परिश्रम की बात करता है, पर यह परिश्रम अनुग्रह कमाने के लिए नहीं, अनुग्रह से पकड़े जाने के कारण है।

"जो मुझे सामर्थ देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ" (फिलिप्पियों 4:13)। यह सम्भवतः इस चिट्ठी का सबसे ग़लत समझा गया पद है, जिसे अक्सर खेल और सफलता का नारा बना दिया जाता है। पर इसका संदर्भ पढ़िए: ठीक पहले पौलुस कह रहा है कि उसने हर दशा में सन्तोष करना सीखा है, भूखा रहना भी और तृप्त रहना भी, घटी में भी और बढ़ती में भी। "सब कुछ" का अर्थ है हर हालत, न कि हर मनचाही उपलब्धि। यह पद आपको सपने पूरे करने की गारंटी नहीं देता, बल्कि उस दिन के लिए सामर्थ्य देता है जब कुछ भी आपके मन के अनुसार नहीं हो रहा।

सन्तोष जन्मजात स्वभाव नहीं, सीखा हुआ हुनर है।

दर्पण

आप शायद इस पृष्ठ पर इसलिए आए हैं क्योंकि आपके जीवन में इस समय आनन्द की भारी कमी है। नौकरी की असुरक्षा, महीने के अन्त तक खिंचती तनख्वाह, एक रिश्ता जो ठंडा पड़ गया है, शरीर जो पहले जैसा साथ नहीं देता, या वह अकेलापन जो भीड़ में भी पीछा नहीं छोड़ता। और अब कोई कह रहा है, "प्रभु में सदा आनन्दित रहो।" सच कहिए, यह सुनकर भीतर कुछ चुभता है, मानो किसी ने आपके दुःख को हल्के में ले लिया हो।

पर जिसने यह लिखा, उसकी कलाई पर जंजीर थी, उसका मुकदमा लंबित था, और उसके अपने साथी उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठाकर उसे नीचा दिखा रहे थे। उसने आपके दर्द को हल्का नहीं समझा; उसने बस यह खोज लिया था कि आनन्द का स्रोत कहीं और है।

यहीं वह बात चुभती है जिससे हम सब बचना चाहते हैं। फिलिप्पियों कहती है कि आनन्द का रास्ता ऊपर नहीं, नीचे जाता है। हम सोचते हैं कि अगर पद थोड़ा ऊँचा हो जाए, घर थोड़ा बड़ा हो जाए, लोग थोड़ा अधिक सम्मान दें, तो मन शान्त हो जाएगा। मसीह ठीक उल्टी दिशा में गए। उन्होंने पकड़े रहने योग्य चीज़ को छोड़ा, दास का रूप लिया, और क्रूस तक झुके। जब तक आप ऊपर चढ़ने की होड़ में हैं, तब तक हर व्यक्ति आपका प्रतिद्वंद्वी है, और प्रतिद्वंद्वियों से घिरे हुए मन में आनन्द नहीं उग सकता।

तो आज किस जगह पर आपको झुकना है? वह माफी जो आप देना नहीं चाहते क्योंकि गलती आपकी नहीं थी। वह सेवा जो किसी को दिखेगी नहीं। वह अधिकार जिसे आप छोड़ सकते हैं ताकि घर में शान्ति बनी रहे। वह चिन्ता जिसे आप रात भर पालते रहते हैं, पर प्रार्थना में परमेश्वर के सामने रखना नहीं चाहते, क्योंकि गहरे में आप उसे अपने ही हाथ में रखना चाहते हैं।

परमेश्वर आपकी परिस्थिति बदलने से पहले शायद आपका मन बदलना चाहते हैं। और यही वह जगह है जहाँ जंजीरों में भी गीत फूट पड़ता है।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को फिलिप्पियों समझाने का सबसे अच्छा तरीका कहानी से शुरू करना है, सिद्धान्त से नहीं। उन्हें बताइए कि पौलुस नाम का एक आदमी जेल में बन्द था, पर वह रो नहीं रहा था, वह गा रहा था। फिर उनसे पूछिए: कोई जेल में भला कैसे गा सकता है? यहीं से रास्ता खुलता है। समझाइए कि पौलुस का आनन्द इस बात पर नहीं टिका था कि उसके साथ क्या हो रहा है, बल्कि इस बात पर कि उसका सबसे अच्छा मित्र यीशु उसके साथ हैं, और यीशु उसे कभी नहीं छोड़ेंगे।

छोटे बच्चों के लिए फिलिप्पियों 4:6 बहुत काम का है। उन्हें सिखाइए कि जब डर लगे, जब स्कूल जाने से घबराहट हो, जब कोई उनका मज़ाक उड़ाए, तो वे चुपचाप मन में परमेश्वर से बात कर सकते हैं, और परमेश्वर सुनते हैं। बड़े बच्चों के साथ अध्याय 2 के उस चित्र पर बात कीजिए कि यीशु राजा होकर भी सबसे नीचे चले गए, और पूछिए कि घर में या मैदान में "सबसे नीचे" जाने का क्या मतलब हो सकता है, जैसे सबसे छोटा हिस्सा लेना या पहले माफी माँगना।

याद रखिए कि बच्चों को कहानी के साथ सच्चाई चाहिए, उपदेश नहीं। Faith.network पर इस पुस्तक की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए, जहाँ सन्तोष, तुलना और आत्म-मूल्य जैसे सवालों को उनकी भाषा में छुआ गया है।

पढ़ने की व्यावहारिक मार्गदर्शिका

फिलिप्पियों को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले इसे एक ही बैठक में, आरम्भ से अन्त तक, बिना रुके पढ़िए। इसमें लगभग पन्द्रह मिनट लगेंगे, और तभी आपको इसका स्वर समझ आएगा, क्योंकि यह चिट्ठी टुकड़ों में पढ़ने के लिए नहीं, पढ़कर सुनाने के लिए लिखी गई थी। हो सके तो उससे पहले प्रेरितों के काम 16 पढ़ लीजिए, ताकि लुदिया, वह दासी और दरोगा आपकी आँखों के सामने आ जाएँ; तब पौलुस के "हर समय" के आनन्द का मतलब बदल जाता है।

दूसरे चरण में इसे चार हिस्सों में बाँटिए और चार हफ्ते लगाइए। पहले हफ्ते अध्याय 1 पर रुकिए और यह देखिए कि पौलुस कठिनाई को किस नज़र से देखता है। दूसरे हफ्ते अध्याय 2 पर, और उसमें 2:5 से 11 तक के गीत को कई बार, धीरे-धीरे, बोलकर पढ़िए, शायद कागज़ पर उतारिए, क्योंकि यही पूरी चिट्ठी की धुरी है। तीसरे हफ्ते अध्याय 3 पढ़िए और एक ईमानदार सूची बनाइए कि आप किन बातों पर अपनी पहचान टिकाते हैं, फिर पूछिए कि क्या आप उन्हें मसीह के सामने हानि समझ सकते हैं। चौथे हफ्ते अध्याय 4 पर आइए और एक अभ्यास कीजिए: हर बार जब चिन्ता मन में उठे, उसी क्षण उसे प्रार्थना में बदल दीजिए, धन्यवाद के साथ।

तीसरे चरण में इस चिट्ठी में बार-बार आने वाले शब्दों को रेखांकित कीजिए, जैसे आनन्द, सुसमाचार, मन, सहभागिता और मसीह का दिन। बाइबल अध्ययन की सबसे सरल विधि यही है कि लेखक जिस शब्द को दोहराता है, उसी पर ध्यान दिया जाए। और अन्त में, इसे अकेले मत पढ़िए। फिलिप्पियों एकता, सन्तोष और साझेदारी के विषय में है, और ये बातें समूह में पढ़ने पर जल्दी खुलती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिलिप्पियों की पत्री किसने लिखी?

प्रेरित पौलुस ने, और पत्री के आरम्भ में तीमुथियुस का नाम सह-प्रेषक के रूप में जुड़ा है। चिट्ठी की भाषा, आत्मकथात्मक विवरण और भावनात्मक स्वर पूरी तरह पौलुस के हैं, और आरम्भिक कलीसिया ने कभी इसके लेखकत्व पर प्रश्न नहीं उठाया; दूसरी शताब्दी में पॉलीकार्प इसे खुले तौर पर पौलुस की चिट्ठी बताकर उद्धृत करता है। अध्याय 3 में पौलुस अपने यहूदी वंश, फरीसी पृष्ठभूमि और कलीसिया को सताने के इतिहास का जो विवरण देता है, वह प्रेरितों के काम में दिए गए उसके परिचय से पूरी तरह मेल खाता है।

फिलिप्पियों की पत्री कब और कहाँ से लिखी गई?

अधिकांश विद्वान मानते हैं कि यह चिट्ठी रोम से लगभग सन् 60 से 62 के बीच लिखी गई, जब पौलुस किराए के घर में पहरे के अधीन था, जैसा प्रेरितों के काम 28 के अन्त में बताया गया है। इसके दो मुख्य संकेत पत्री के भीतर ही हैं: पौलुस कहता है कि उसके बन्धन सारे राजभवन में प्रकट हो गए हैं, और अन्त में वह कैसर के घराने के विश्वासियों की ओर से नमस्कार भेजता है। कुछ विद्वान इफिसुस या कैसरिया की कैद का सुझाव देते हैं, पर रोम वाला मत सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।

फिलिप्पी शहर कहाँ था और वहाँ कलीसिया कैसे शुरू हुई?

फिलिप्पी मकिदुनिया प्रान्त का एक महत्वपूर्ण शहर था, जो आज के उत्तरी यूनान में पड़ता है, और सिकन्दर महान के पिता फिलिप के नाम पर बसा था। बाद में यह रोमी उपनिवेश बना, जहाँ सेवानिवृत्त सैनिक बसाए गए, इसलिए वहाँ के लोग अपनी रोमी नागरिकता पर बहुत गर्व करते थे। कलीसिया की शुरुआत प्रेरितों के काम 16 में दर्ज है, जब पौलुस को रात में मकिदुनिया वाले का दर्शन हुआ। वहाँ पहले लुदिया ने विश्वास किया, फिर एक दासी छुड़ाई गई, और अन्त में जेल का दरोगा अपने पूरे परिवार समेत विश्वास लाया।

फिलिप्पियों की पत्री का मुख्य विषय क्या है?

सतह पर इसका मुख्य विषय हर परिस्थिति में आनन्द है, क्योंकि आनन्द और आनन्दित होने से जुड़े शब्द चार छोटे अध्यायों में लगभग सोलह बार आते हैं। पर इस आनन्द की जड़ अध्याय 2 में है, जहाँ पौलुस कलीसिया से कहता है कि उनका मन मसीह जैसा हो, जो परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी अपने आप को दीन करके क्रूस तक झुक गए। इसलिए पत्री का असली विषय यह है कि मसीह का नम्र मन अपनाने वाला व्यक्ति ही ऐसा आनन्द पाता है जिसे परिस्थितियाँ छीन नहीं सकतीं।

"मेरे लिये जीवित रहना मसीह है" का क्या अर्थ है?

फिलिप्पियों 1:21 में पौलुस अपने जीवन का पूरा हिसाब एक वाक्य में रख देता है। "जीवित रहना मसीह है" का अर्थ है कि उसके जीने का उद्देश्य, सामग्री और आनन्द सब मसीह ही हैं; अगर मसीह को हटा दिया जाए तो जीवन में कुछ बचता ही नहीं। और "मर जाना लाभ है" का अर्थ है कि मृत्यु उससे कुछ छीनती नहीं, बल्कि उसे मसीह की उपस्थिति में और निकट ले जाती है। यह वाक्य मृत्यु की इच्छा नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की स्वतंत्रता दिखाता है जिसके पास खोने को कुछ नहीं।

क्या फिलिप्पियों 4:13 का मतलब यह है कि मैं कुछ भी कर सकता हूँ?

नहीं, और यही इस पद के साथ होने वाली सबसे आम गलती है। संदर्भ देखिए: पौलुस भूख, कमी, बहुतायत और अभाव, हर दशा में सन्तोष करना सीखने की बात कर रहा है, और तब कहता है कि सामर्थ्य देने वाले में वह सब कुछ कर सकता है। यहाँ "सब कुछ" का अर्थ है हर परिस्थिति को मसीह के साथ सहना और उसमें विश्वासयोग्य रहना, न कि हर मनचाही सफलता पा लेना। यह पद परीक्षा, बीमारी और हानि के दिनों के लिए दिया गया सहारा है, न कि महत्वाकांक्षा का नारा।

फिलिप्पियों 2:5-11 को "मसीह का भजन" क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इन पदों की भाषा और लय साधारण गद्य से अलग है, और कई विद्वान मानते हैं कि पौलुस यहाँ आरम्भिक कलीसिया में गाए जाने वाले किसी भजन को उद्धृत कर रहा है, या स्वयं भजन जैसी शैली में लिख रहा है। इसका महत्व बहुत बड़ा है: यह मसीह की ईश्वरता, उनके देहधारण, उनकी आज्ञाकारिता, क्रूस और महिमा को कुछ ही पंक्तियों में समेट देता है, और वह भी नए नियम की सबसे आरम्भिक लिखतों में से एक में। ध्यान रहे, पौलुस इसे धर्मशास्त्र सिखाने के लिए नहीं, बल्कि झगड़ती हुई कलीसिया को नम्रता सिखाने के लिए लाता है।

क्या चिन्ता करना पाप है?

फिलिप्पियों 4:6 में "किसी भी बात की चिन्ता मत करो" एक आज्ञा है, पर इसे ताना मारने के लिए नहीं दिया गया। बाइबल चिन्ता को नैतिक अपराध की तरह नहीं, बल्कि गलत जगह रखे गए भरोसे की तरह देखती है, और इसीलिए आदेश अधूरा नहीं छोड़ा जाता; उसके साथ तुरन्त रास्ता भी दिया जाता है, कि प्रार्थना और बिनती में धन्यवाद के साथ हर बात परमेश्वर के सामने रखी जाए। जिन्हें घबराहट या अवसाद जैसी गहरी समस्याएँ हैं, उनके लिए यह पद दोष नहीं, निमंत्रण है, और ऐसे में आत्मिक सहारे के साथ उपयुक्त चिकित्सा सहायता लेना भी गलत नहीं।

इपफ्रुदीतुस कौन था और उसका क्या महत्व है?

इपफ्रुदीतुस फिलिप्पी की कलीसिया का एक विश्वासी था, जिसे उन्होंने पौलुस के लिए भेंट पहुँचाने और उसकी सेवा करने के लिए रोम भेजा था। वहाँ वह इतना बीमार पड़ गया कि मृत्यु के निकट पहुँच गया, पर परमेश्वर ने उस पर दया की। पौलुस उसे "मेरा भाई, सहकर्मी और संगी योद्धा" कहकर बड़े आदर से लौटाता है, और सम्भवतः यही चिट्ठी उसके हाथ भेजी गई। उसका महत्व यह है कि वह अध्याय 2 के मसीह-जैसे मन का जीता-जागता उदाहरण है, जिसने दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी।

यूओदिया और सुन्तुखे कौन थीं?

ये फिलिप्पी की कलीसिया की दो स्त्रियाँ थीं जिनके बीच किसी बात को लेकर मतभेद चल रहा था, और पौलुस चौथे अध्याय में उनका नाम लेकर उनसे प्रभु में एक मन रहने की बिनती करता है। वह उन्हें दोषी नहीं ठहराता, बल्कि याद दिलाता है कि उन्होंने सुसमाचार के लिए उसके साथ परिश्रम किया था और उनके नाम जीवन की पुस्तक में हैं। यह छोटा सा प्रसंग पूरी चिट्ठी के विषय को ज़मीन पर उतार देता है, क्योंकि मसीह का नम्र मन सबसे पहले वहीं परखा जाता है जहाँ दो विश्वासियों की आपस में नहीं बनती।

फिलिप्पियों 3:14 का "निशाना" और "इनाम" क्या है?

पौलुस यहाँ यूनानी खेलों की दौड़ का चित्र इस्तेमाल करता है, जहाँ धावक अन्तिम रेखा पर नज़र गड़ाए दौड़ता है। "निशाना" मसीह को पूरी तरह जानना और उनके समान हो जाना है, जिसकी बात वह ठीक पहले के पदों में कर रहा है, और "इनाम" कोई अलग वस्तु नहीं, बल्कि उस स्वर्गीय बुलाहट की पूर्ति है, यानी स्वयं मसीह की उपस्थिति। इसलिए यह पद आत्मिक उपलब्धि की सूची नहीं बनाता; यह एक ऐसे व्यक्ति की तड़प दिखाता है जो पहले ही पकड़ा जा चुका है और अब पकड़ने वाले की ओर दौड़ रहा है।

फिलिप्पियों और इफिसियों, कुलुस्सियों तथा फिलेमोन में क्या अन्तर है?

ये चारों "बन्दीगृह की पत्रियाँ" कहलाती हैं, क्योंकि सब बन्धुआई से लिखी गईं, पर इनका स्वभाव अलग है। इफिसियों कलीसिया के विशाल रहस्य और मसीह में परमेश्वर की योजना पर ध्यान देती है, कुलुस्सियों मसीह की सर्वोच्चता को झूठी शिक्षाओं के विरुद्ध स्थापित करती है, और फिलेमोन एक भागे हुए दास के विषय में लिखी गई व्यक्तिगत चिट्ठी है। फिलिप्पियों इन सबसे अधिक आत्मीय और धन्यवाद से भरी है, जिसमें सिद्धान्त कम और सम्बन्ध अधिक है, मानो कोई पिता अपने प्रिय बच्चों को लिख रहा हो।

फिलिप्पियों की पत्री आज हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि यह उस प्रश्न का उत्तर देती है जिससे हम सब जूझते हैं: जब हालात न बदलें, तब दिल कैसे टिका रहे। पौलुस यह आश्वासन देता है कि परमेश्वर अपना आरम्भ किया हुआ काम पूरा करेंगे, कि चिन्ता प्रार्थना में बदली जा सकती है, कि सन्तोष सीखा जा सकता है, और कि आनन्द का स्रोत परिस्थिति नहीं बल्कि मसीह की संगति है। और यह सब कोरा उपदेश नहीं, क्योंकि लिखने वाला खुद कैद में था और फिर भी गा रहा था, जैसा उसने वर्षों पहले उसी शहर की जेल में आधी रात को किया था।

अंत में

फिलिप्पियों की पत्री को "खुश रहो" वाली किताब समझकर पढ़ना इसके साथ अन्याय है। यह चिट्ठी हमें आनन्द का एक छोटा रास्ता नहीं दिखाती, बल्कि एक उल्टा रास्ता दिखाती है। मसीह ऊपर से नीचे आए, दास का रूप लिया, क्रूस तक झुके, और तब परमेश्वर ने उन्हें वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है। जो उनके पीछे उसी दिशा में चलता है, वह जेल में भी गा सकता है, घटी में भी सन्तुष्ट रह सकता है, और मृत्यु को भी लाभ कह सकता है।

अगली बार जब चिन्ता रात को जगाए रखे, तो फिलिप्पियों 4:6 को खोलिए और सचमुच वही कीजिए जो वह कहता है, धन्यवाद समेत। जब अपनी आत्मिक प्रगति पर सन्देह हो, तो फिलिप्पियों 1:6 पर ठहरिए। और जब मन में तुलना, कड़वाहट या ऊपर चढ़ने की होड़ उठे, तो अध्याय 2 का गीत धीरे-धीरे पढ़िए, जब तक वह गला भीगने न लगे।

आगे के अध्ययन के लिए प्रेरितों के काम 16 साथ में पढ़िए, और फिर यशायाह 53 तथा यशायाह 45:23 पर जाइए, ताकि आप देख सकें कि यह झुकने वाला मार्ग परमेश्वर के मन में कितना पुराना है। आनन्द वहीं मिलेगा जहाँ मसीह मिलते हैं, और मसीह सबसे नीचे मिलते हैं।

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