फिलिप्पियों 4:13
पाठ
वचन छोटा है और लगभग कहावत जैसा बन चुका है: "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।" पर इसे अपने पड़ोसी वाक्यों से काटकर पढ़ना इसे विकृत कर देता है। ठीक पहले पौलुस कहता है कि उसने "दीन होना भी" और "बढ़ना भी" सीखा है, तृप्त होना और भूखा रहना, घटना और बढ़ना। यानी "सब कुछ" का अर्थ है: हर दशा, चाहे वह भरी हो या खाली, मसीह में सही जाती है। यह उपलब्धि का नारा नहीं, बन्दीगृह से लिखी गई एक शान्त स्वीकारोक्ति है।
मर्म
यहाँ दो बातें एक साथ कही जा रही हैं जो आमतौर पर अलग रखी जाती हैं: सीखना और सामर्थ्य पाना। पौलुस कहता है "मैंने यह सीखा है", जैसे कोई शिल्प वर्षों में सीखता है; और फिर कहता है कि सामर्थ्य उसकी नहीं, किसी और की दी हुई है। सन्तोष कोई स्वभाव नहीं जो कुछ लोगों में जन्म से होता है, न ही कोई जादुई अनुभव जो एक रात में उतर आता है। यह मसीह के साथ चलते-चलते बना हुआ कौशल है, जिसमें शक्ति बाहर से आती है पर अभ्यास भीतर होता है। परमेश्वर यहाँ परिस्थिति नहीं बदलते; वे मनुष्य को ऐसा बना देते हैं जो हर परिस्थिति में टिक सके। यह अनुग्रह का कम चमकीला, पर कहीं अधिक भरोसेमन्द रूप है।
सूत्र
यूनानी में जो क्रिया यहाँ है, वह लगातार चलने वाली है: "जो मुझे सामर्थ्य भरता रहता है।" यानी एक बार मिली हुई ऊर्जा नहीं, बल्कि जुड़ी हुई धारा। और यह धारा किसी अज्ञात शक्ति से नहीं, उस मसीह से आती है जिसके विषय में पौलुस ने इसी पत्री में लिखा था कि उन्होंने अपने आप को रिक्त किया, दास का रूप लिया, मृत्यु तक आज्ञाकारी रहे। जो मसीह स्वयं "दीन होना" जानते थे, वही अपने दास को दीनता में टिकना सिखा रहे हैं। यह मुक्ति की कथा का मूल स्वर है: परमेश्वर हमें कष्ट के ऊपर से उड़ा नहीं ले जाते, वे उसमें से होकर गुजरे और अब हमें उसी राह पर सँभालते हैं। क्रूस और पुनरुत्थान इस वचन के पीछे खड़े हैं; इसीलिए यह खोखला आशावाद नहीं।
दर्पण
हम इस वचन को प्राय: वहाँ चिपकाते हैं जहाँ हमें सफलता चाहिए: परीक्षा, साक्षात्कार, पदोन्नति, बीमारी से चंगाई। पर पौलुस इसे वहाँ रखता है जहाँ कुछ भी हाथ में नहीं है। सोचिए उस महीने की जब वेतन कम पड़ा और आपने किसी को बताया नहीं; उस रिश्ते की जो सुधरा नहीं; उस शरीर की जो अब पहले जैसा साथ नहीं देता। और दूसरी तरफ, उस समय की जब सब ठीक चल रहा था और आप परमेश्वर को भूल ही गए थे, क्योंकि "बढ़ना" भी एक परीक्षा है जिसे पौलुस ने अलग से सीखना पड़ा। यह वचन आपकी महत्वाकांक्षा को ईंधन नहीं देता; वह उसे शान्त करता है।
आज एक काम कीजिए: अपनी जीवन की वह एक दशा लिखिए जिसमें आप अभी हैं, चाहे "घटी" हो या "बढ़ती", और उसके नीचे यह वाक्य अपने नाम के साथ ऊँची आवाज़ में बोलिए: "इसी दशा में मसीह मुझे सामर्थ्य देते हैं।"
कठिन प्रश्न
पर क्या यह सच है? क्या हर विश्वासी हर दशा में टिक पाता है? हम सब ऐसे लोगों को जानते हैं जो टूट गए: अवसाद में, शोक में, लम्बी बीमारी में। क्या उन्होंने पर्याप्त "सीखा" नहीं था? पाठ इसका आसान उत्तर नहीं देता, और हमें भी नहीं देना चाहिए। ध्यान दीजिए कि पौलुस यह सामान्य नियम के रूप में नहीं, अपनी गवाही के रूप में कहता है: "मैंने यह सीखा है।" और वह अकेला नहीं था; अगली ही पंक्तियों में वह फिलिप्पी वालों की भेजी हुई सहायता के लिए धन्यवाद देता है। जिस मनुष्य ने "सब कुछ कर सकता हूँ" लिखा, उसी ने थैला खोलकर दूसरों की मदद ली। सामर्थ्य का वादा आत्मनिर्भरता का वादा नहीं है, और टूटना विश्वास की असफलता नहीं।
एक बारीकी
"उसमें" शब्द पर रुकिए। पौलुस यह नहीं कहता कि मसीह मुझे सामर्थ्य देकर अलग हट जाते हैं और फिर मैं अपने बल पर करता हूँ। वह कहता है: उसमें, उसके भीतर रहते हुए। यह वही भाषा है जो इस अध्याय में बार-बार लौटती है: "प्रभु में स्थिर रहो", "प्रभु में एक मन रहें", "प्रभु में सदा आनन्दित रहो"। सामर्थ्य कोई वस्तु नहीं जो हमें थमाई जाती है; वह एक स्थान है जिसमें हम खड़े रहते हैं। बिजली तार में तभी तक है जब तक वह जुड़ा है। इसीलिए यह वचन अहंकार नहीं पैदा कर सकता, क्योंकि इसे कहने वाला हर बार स्वीकार करता है कि वह स्वयं स्रोत नहीं है।
पृष्ठभूमि
पौलुस यह पत्र कैद से लिखता है, सम्भवतः रोम से; अध्याय के अन्त में वह "कैसर के घराने" के विश्वासियों का नमस्कार भेजता है, यानी साम्राज्य के केन्द्र से। फिलिप्पी एक रोमी उपनिवेश था, जहाँ सैनिक-संस्कृति और सम्मान-अपमान की कड़ी व्यवस्था थी; वहाँ "सन्तोष" शब्द दार्शनिकों का प्रिय शब्द था, जिसका अर्थ था अपने भीतर से पर्याप्त होना। पौलुस वही शब्द उठाता है और उसे उलट देता है: पर्याप्तता मेरे भीतर से नहीं, मसीह से आती है। और वह यह बात उस समुदाय को लिखता है जिसने बार-बार उसकी "घटी पूरी करने के लिये" धन भेजा था। यानी पत्र धन्यवाद का है, और यह प्रसिद्ध वचन उस धन्यवाद के बीच में खड़ा है।
चिंतन के प्रश्न
आप इस वचन को आमतौर पर किस दशा में दोहराते हैं, "घटी" में या "बढ़ती" में, और इससे आपके विषय में क्या प्रकट होता है?
पौलुस ने सहायता लेने में संकोच नहीं किया; आप किससे सहायता माँगने से बच रहे हैं, और क्यों?
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Philippians 4:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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फिलिप्पियों 4:13 का क्या अर्थ है?
फिलिप्पियों 4:13 किस विषय में है?
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फिलिप्पियों 4:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 4:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे फिलिप्पियों, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में... तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहभागिता न की।" पौलुस को वह शुरुआती दिन याद है, जब वह जाना-पहचाना नाम नहीं था और देने में कोई फायदा नहीं दिखता था। तब फिलिप्पी ने हाथ बढ़ाया। सोचो, क्या तुम किसी का साथ तब देते हो जब उसका काम अभी छोटा और अनजाना है?
पिता, मुझे अपने में स्थिर रहना सिखा, तब भी जब मन डगमगाता है और हालात बदलते रहते हैं। उन लोगों के लिए धन्यवाद जो मेरे साथ चलते हैं, जिनकी वजह से दिल में खुशी बनी रहती है। हमें एक दूसरे को थामे रहने की ताकत दे।
पिता, धन्यवाद कि आज मेरे पास "सब कुछ है, बल्कि बहुतायत से भी है।" उन भाई बहनों के लिए धन्यवाद जिन्होंने अपने हाथों से मेरी ज़रूरत पूरी की। और धन्यवाद कि हमारा छोटा सा देना भी आपके सामने सुगन्ध और ग्रहण करने योग्य बलिदान बन जाता है।
पौलुस यह चिट्ठी जेल से लिख रहा है। चारों ओर जंजीरें और अनिश्चितता, फिर भी वह कहता है, "जो बातें सुहावनी हैं, जो बातें मनभावनी हैं... इन्हीं बातों पर ध्यान लगाया करो।" ध्यान लगाना अपने आप नहीं होता, वह एक चुनाव है। आज रात सोने से पहले तेरा मन किस बात को बार बार दोहराएगा? वही चीज़ धीरे धीरे तुझे गढ़ती जाएगी।
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