फिलिप्पियों 1:6
पाठ
पौलुस जेल में बैठा है, जंजीरों में, और लिखता है: "मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा।" ध्यान दीजिए, वाक्य में कर्ता फिलिप्पी के विश्वासी नहीं हैं। उन्होंने कुछ शुरू नहीं किया; उनमें कुछ शुरू किया गया। और जो पूरा करेगा, वह भी वही है जिसने आरम्भ किया। बीच में एक लम्बा, अनिश्चित अंतराल है, "पहले दिन से लेकर आज तक" और उससे आगे "मसीह के दिन" तक, और उस पूरे अंतराल पर पौलुस एक ही नाम लिखता है: परमेश्वर का।
मूल बात
यहाँ उद्धार को एक घटना के रूप में नहीं, एक निर्माणकार्य के रूप में देखा गया है जिसका ठेकेदार कभी काम अधूरा छोड़कर नहीं जाता। यह बात सुनने में मीठी लगती है, पर इसकी धार महसूस कीजिए: यदि आरम्भ आपका नहीं था, तो समापन भी आपके प्रदर्शन पर टिका नहीं है। आपकी आत्मिक सुरक्षा आपकी निरंतरता पर नहीं, परमेश्वर की निरंतरता पर खड़ी है। यही अनुग्रह का असली वज़न है, और यही उसका अपमान भी लगता है, क्योंकि यह आपके हाथ से श्रेय छीन लेता है। साथ ही ध्यान दीजिए कि "पूरा करेगा" का अर्थ है काम अभी अधूरा है। परमेश्वर आपको वैसा ही छोड़ देने वाले नहीं जैसे आप आज हैं, और यह आराम भी है और चेतावनी भी।
जोड़ने वाला धागा
परमेश्वर के काम करने का यह तरीका नया नहीं है। पूरे पुराने नियम में एक ही पैटर्न दोहराता है: वे शुरू करते हैं, और फिर उसी काम से बँध जाते हैं। इस्राएल को मिस्र से निकालना आधा काम था; उसे देश में पहुँचाना वादे का दूसरा आधा हिस्सा, और मूसा बार-बार परमेश्वर की ही प्रतिष्ठा की दुहाई देकर प्रार्थना करता है, मानो कह रहा हो: आपने आरम्भ किया है, अब आप ही पूरा कीजिए। पौलुस उसी तर्क को मसीह पर ले जाता है। क्रूस और पुनरुत्थान में परमेश्वर ने जो आरम्भ किया, वह "यीशु मसीह के दिन" पर जाकर पूरा होगा, जब वे लौटेंगे। इसलिए आपका व्यक्तिगत आत्मिक जीवन कोई अलग-थलग परियोजना नहीं है; वह उस विशाल काम का एक धागा है जिसे परमेश्वर इतिहास के पार तक बुन रहे हैं। आपकी अपूर्णता उसी बड़े "अभी नहीं" का हिस्सा है।
दर्पण
यह पद आपके उस डर पर उँगली रखता है जिसे आप प्रार्थना सभा में नहीं बोलते: कि शायद आप पीछे छूट रहे हैं। वही पाप जो दस साल से नहीं टूटा। वह गुस्सा जो बच्चों पर फूट पड़ता है और फिर आप रात में छत देखते रह जाते हैं। वह ठंडापन जो बाइबल पढ़ते समय महसूस होता है, और आप सोचते हैं कि पहले जैसा जोश क्यों नहीं रहा। आप चुपके से मानते हैं कि परमेश्वर का धैर्य एक सीमा तक है, और आप उस सीमा के पास हैं। पौलुस कहता है, आपका मामला किसी और के हाथ में है। पर यह दर्पण दूसरी ओर भी चुभता है: यदि वे पूरा कर रहे हैं, तो आपका यह कहना कि "मैं ऐसा ही हूँ, मैं बदल नहीं सकता" एक झूठ है जिसे आप आराम के लिए पालते हैं।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर अपने जीवन का वह एक हिस्सा लिखिए जिसे आप लाइलाज मान चुके हैं, और उसके नीचे लिखिए "आरम्भ आपने किया, पूरा भी आप कीजिए", फिर उसे ज़ोर से पढ़कर प्रार्थना कीजिए।
एक बारीकी
"अच्छा काम" शब्द पर रुकिए। पौलुस यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने तुममें एक आवश्यक काम या कठिन काम आरम्भ किया, बल्कि अच्छा। और तुरंत पिछले पद में वह बताता है कि यह अच्छा काम दिखता कैसा है: "तुम पहले दिन से लेकर आज तक सुसमाचार के फैलाने में मेरे सहभागी रहे हो।" यानी जिस काम की वह बात कर रहा है, वह केवल भीतर का निजी अनुभव नहीं है; वह उस समुदाय में दिख रहा है जो जेल में पड़े एक कैदी को पैसे और साथ भेजता है। परमेश्वर का भीतरी काम बाहरी, छूने योग्य, खर्चीले रूप लेता है। इसलिए जब आप पूछते हैं कि क्या परमेश्वर सचमुच मुझमें काम कर रहे हैं, तो केवल अपनी भावनाओं की जाँच मत कीजिए। पूछिए: पिछले साल मेरा हाथ किसके लिए खुला?
पहले सुनने वाले
फिलिप्पी एक रोमी उपनिवेश था, सेवानिवृत्त सैनिकों का शहर, जहाँ रोम का नागरिक होना सबसे बड़ी पहचान थी। वहाँ की छोटी कलीसिया में एक धनी व्यापारी स्त्री भी थी और एक दासी भी, और उन्होंने देखा था कि पौलुस को उनके ही शहर में पीटा और जेल में डाला गया था। अब वही पौलुस फिर जेल से लिख रहा है। उनके मन में स्वाभाविक सवाल रहा होगा: जो आन्दोलन हमने शुरू किया, क्या वह खत्म होने वाला है? क्या हमारा नेता मर जाएगा और हम बिखर जाएँगे? इस डर के बीच पौलुस उनका ध्यान अपनी स्थिति से हटाकर परमेश्वर की विश्वसनीयता पर ले जाता है। उनका भविष्य रोमी अदालत के फैसले पर नहीं, बल्कि उस दिन पर टिका है जो किसी कैसर के हाथ में नहीं।
कठिन प्रश्न
तो क्या जो लोग विश्वास छोड़कर चले गए, उनमें परमेश्वर ने काम आरम्भ ही नहीं किया था? यह प्रश्न सिर्फ़ सिद्धांत का नहीं है; आपके परिवार में शायद कोई ऐसा नाम है। ईमानदारी से: पौलुस यहाँ इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहा। वह एक जीवित कलीसिया को उसकी वास्तविक सहभागिता के आधार पर आश्वासन दे रहा है, वह किसी के भाग्य की घोषणा नहीं कर रहा। और वह खुद ही इसी पत्र में उन्हें चेतावनी देता है कि "मसीह के दिन तक सच्चे बने रहो, और ठोकर न खाओ।" दोनों बातें साथ खड़ी हैं, और बाइबल उन्हें सुलझाती नहीं। जो भरोसा इस पद से मिलता है, वह आलस्य का तकिया नहीं बन सकता; और जो चेतावनी मिलती है, वह आतंक का कोड़ा नहीं बन सकती। हमें इस तनाव में ही जीना है, और शायद यही विश्वास कहलाता है।
चिंतन
आप अपने भीतर के किस अधूरेपन को गुप्त रूप से "अब कभी नहीं बदलेगा" मानकर छोड़ चुके हैं, और यह मान लेना आपको किस तरह सुविधाजनक लगता है?
यदि परमेश्वर का काम आपमें दिखाई देना था, तो पिछले छह महीनों में किस व्यक्ति ने उसे आप पर देखा होगा, और क्या देखा होगा?
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Philippians 1:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
फिलिप्पियों 1:6 का क्या अर्थ है?
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फिलिप्पियों 1:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिलिप्पियों 1:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Philippians 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस जेल में बैठा है, और फिर भी लिखता है, "और जब कभी तुम सब के लिये विनती करता हूँ, तो सदा आनन्द के साथ विनती करता हूँ।" उसकी प्रार्थना शिकायत की सूची नहीं, आनन्द से भरी है। सोचो, जब तुम किसी का नाम परमेश्वर के सामने लेते हो, तो मन में बोझ होता है या खुशी? कुछ लोग हैं जिनके लिए प्रार्थना करना ही तुम्हारे दिल को हल्का कर देता है। आज उनका नाम लो।
पिता, धन्यवाद कि मेरे जीने का अर्थ अब खाली नहीं रहा, क्योंकि "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।" धन्यवाद कि हर सुबह मसीह के लिए जीने का मकसद मिलता है, और मृत्यु का डर भी आपने लाभ में बदल दिया।
पौलुस की प्रार्थना यह नहीं थी कि तुम बुरे और भले में फर्क कर सको, वह तो साफ है। वह चाहता था कि तुम "उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो।" सबसे कठिन चुनाव अच्छे और बुरे के बीच नहीं, दो अच्छी चीज़ों के बीच होता है। और यह समझ किताबों से नहीं, बढ़ते हुए प्रेम से आती है। आज तुम्हारा समय किस अच्छी चीज़ पर लग रहा है, जो सबसे उत्तम चीज़ को खा रही है?
धन्यवाद प्रभु, कि पौलुस के बन्धन भी आपके हाथ में बेकार नहीं गए, बल्कि उनसे भाइयों ने हियाव बाँधा और निडर होकर आपका वचन सुनाया। धन्यवाद कि आज भी मेरी कठिनाइयों को देखकर किसी और का विश्वास मज़बूत हो सकता है, और आप ही साहस देनेवाले हैं।
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