विषय

बाइबल के अनुसार बच्चों की परवरिश: माता-पिता के लिए परमेश्वर का मार्गदर्शन

परिचय

रात के साढ़े नौ बजे हैं। रसोई में बर्तन पड़े हैं, छोटा बेटा तीसरी बार पानी माँगने उठ चुका है, और बड़ी बेटी दरवाज़ा बंद करके अपने फ़ोन में डूबी है। आपने आज सुबह ही सोचा था कि आज शांति से, प्यार से पेश आऊँगा। लेकिन शाम तक आपकी आवाज़ ऊँची हो चुकी थी, और अब बिस्तर पर लेटते हुए एक ही सवाल मन में घूम रहा है: क्या मैं इसे ठीक कर पा रहा हूँ?

यह सवाल हर पीढ़ी के माता-पिता ने पूछा है, और बाइबल इस सवाल से कतराती नहीं। पर वह जवाब वहाँ से नहीं शुरू करती जहाँ से हम शुरू करते हैं। हम पूछते हैं, "बच्चे को कैसे सुधारूँ?" परमेश्वर का वचन पूछता है, "तेरे मन में क्या बसा हुआ है?"

इस पृष्ठ पर आप देखेंगे कि बाइबल बच्चों की परवरिश को कोई तकनीक नहीं, बल्कि एक गवाही मानती है; कि बच्चे हमारी संपत्ति नहीं, परमेश्वर की सौंपी हुई अमानत हैं; और कि अनुग्रह उन माता-पिता के लिए भी है जो देर से जागे हैं।

इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण

यह पृष्ठ बच्चों की परवरिश को "बच्चे को ठीक करने की विधि" के रूप में नहीं पढ़ता। व्यवस्थाविवरण 6 में परमेश्वर की आज्ञा पहले बच्चे पर नहीं, माता-पिता के मन पर आती है: बातें पहले तेरे मन में बनी रहें, फिर तू उन्हें अपने बालकों को सिखा। इसलिए हमारा दृष्टिकोण यह है कि बाइबल के अनुसार परवरिश का पहला पाठ्यक्रम माता-पिता का हृदय है, और बच्चा हमारी परियोजना नहीं बल्कि परमेश्वर का दिया हुआ भाग है जिसका हम भण्डारी हैं। यह बात मायने रखती है, क्योंकि यही हमें दो गड्ढों से बचाती है: अपने ऊपर का घमंड और अपनी असफलता का कुचलने वाला बोझ।

बाइबल बच्चों की परवरिश के बारे में क्या कहती है?

बाइबल की सबसे पुरानी और सबसे गहरी शिक्षा इस विषय पर इस्राएल के उस पद से आती है जिसे हर घर में दिन में दो बार दोहराया जाता था। मूसा कहता है, "और ये आज्ञाएँ जो मैं आज तुझको सुनाता हूँ वे तेरे मन में बनी रहें" (व्यवस्थाविवरण 6:6)। ध्यान दीजिए, आज्ञा यह नहीं है कि "ये बातें तेरे बच्चों के मन में बनी रहें।" पहला निशाना पिता और माता का अपना भीतर है। अगला पद ही बताता है कि क्यों: "और तू इन्हें अपने बालकों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना" (व्यवस्थाविवरण 6:7)। जो बात मन में नहीं बसी, वह चलते-फिरते बातचीत में नहीं टपकती। वह केवल उपदेश बनकर निकलती है, और बच्चे उपदेश और गवाही के बीच का फ़र्क बहुत जल्दी पकड़ लेते हैं।

इसके बाद दूसरा स्तंभ आता है, बच्चे की पहचान। "देखो, सन्तान यहोवा का दिया हुआ भाग है, गर्भ का फल उसकी ओर से बदला है" (भजन संहिता 127:3)। यह भजन उसी अध्याय में है जो कहता है कि यदि यहोवा घर न बनाए तो बनानेवालों का परिश्रम व्यर्थ है। बच्चा "भाग" है, यानी विरासत, अमानत, उपहार। उपहार पर हमारा अधिकार नहीं होता, ज़िम्मेदारी होती है। जिस क्षण हम बच्चे को अपनी संपत्ति समझ लेते हैं, हम उससे अपनी इच्छाएँ पूरी कराने लगते हैं; जिस क्षण हम उसे परमेश्वर की अमानत समझते हैं, हम उसके लिए प्रार्थना करने लगते हैं।

तीसरा स्तंभ दिशा है। "लड़के को जिस मार्ग पर चलना चाहिये उसी की शिक्षा दे, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा" (नीतिवचन 22:6)। नीतिवचन की पुस्तक बुद्धि की भाषा बोलती है, और यह पद हमें याद दिलाता है कि परवरिश एक दिशा देने का काम है, एक मार्ग पर चलाने का काम, न कि हर व्यवहार को तुरंत काबू करने का। बच्चे को केवल नियम नहीं, एक रास्ता चाहिए; और रास्ता वही दिखा सकता है जो खुद उस पर चल रहा हो।

नए नियम में पौलुस इसी बात को घर की चौखट पर ले आता है। "और हे बच्चे वालों, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उनका पालन-पोषण करो" (इफिसियों 6:4)। यह पद दो बातें एक साथ कहता है। पहली, एक निषेध: अपने बच्चों को क्रोध में न भड़काओ। दूसरी, एक सकारात्मक आज्ञा: प्रभु की शिक्षा में उनका पालन-पोषण करो। "पालन-पोषण" वाला शब्द वही भाव रखता है जो एक पौधे को पानी और धूप देने में है। शिक्षा है, पर वह "प्रभु की" शिक्षा है, हमारी अपनी नहीं; और वह डाँट-फटकार के बजाय पोषण के रूप में आती है।

कुलुस्सियों में वही पौलुस और भी सीधा हो जाता है: "हे बच्चे वालों, अपने बच्चों को तंग न करो, न हो कि उनका साहस टूट जाए" (कुलुस्सियों 3:21)। यहाँ ख़तरा साफ़ नाम लेकर लिखा गया है, टूटा हुआ साहस। लगातार आलोचना, तुलना, ताने और असंभव अपेक्षाएँ बच्चे के भीतर की रौशनी बुझा देती हैं। बाइबल माता-पिता के अधिकार को मानती है, पर वह अधिकार बच्चे को बुझाने का लाइसेंस नहीं है।

और अंत में, शिक्षा की विषय-वस्तु। पौलुस तीमुथियुस को लिखता है, "और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह यीशु पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है" (2 तीमुथियुस 3:15)। तीमुथियुस के घर में पिता विश्वासी नहीं था, फिर भी नानी लोइस और माता यूनीके ने उसे बालकपन से पवित्र शास्त्र पढ़कर सुनाया। ध्यान दीजिए कि शास्त्र किसलिए बुद्धिमान बनाता है, नैतिक रूप से भले होने के लिए नहीं, बल्कि "मसीह यीशु पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये।" बाइबल के अनुसार परवरिश का लक्ष्य आदर्श बच्चा नहीं, मसीह को जानने वाला बच्चा है।

बाइबल में चलने वाला सूत्र

यह विषय बाइबल के किसी एक कोने में नहीं पड़ा है; यह पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने तक बुना हुआ है।

उत्पत्ति में परमेश्वर पहले जोड़े को आशीष देकर कहते हैं कि फूलो-फलो और पृथ्वी में भर जाओ। संतान सृष्टि की आशीष का हिस्सा है, कोई दुर्घटना नहीं। अब्राहम के बारे में परमेश्वर स्वयं कहते हैं, "क्योंकि मैं जानता हूँ, कि वह अपने पुत्रों और परिवार को जो उसके पीछे रह जाएँगे आज्ञा देगा, कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें" (उत्पत्ति 18:19)। यानी परमेश्वर की वाचा घर के रास्ते से आगे बढ़ती है।

निर्गमन में फसह की रात एक अद्भुत निर्देश आता है: जब तुम्हारे बच्चे पूछें कि यह रीति क्या है, तब तुम उन्हें बताना कि यहोवा ने क्या किया। परमेश्वर ने अपने छुटकारे को एक ऐसी रीति में बाँध दिया जिससे बच्चे सवाल पूछें। इस्राएल की आराधना का ढाँचा ही बच्चों के प्रश्नों के इर्द-गिर्द बनाया गया था।

बाइबल का घर एक कक्षा नहीं, एक गवाही का मंच है।

व्यवस्थाविवरण में मूसा की पूरी विदाई-शिक्षा अगली पीढ़ी पर टिकी है। भजन संहिता 78:4 में आसफ गाता है कि हम इन बातों को उनके वंश से छिपा न रखेंगे, परन्तु आनेवाली पीढ़ी से यहोवा के आश्चर्यकर्मों का वर्णन करेंगे। नीतिवचन की पूरी पुस्तक एक पिता की आवाज़ है जो अपने बेटे को बुद्धि के रास्ते पर बुला रहा है: "हे मेरे पुत्र, अपने पिता की शिक्षा पर कान लगा, और अपनी माता की शिक्षा को न तज" (नीतिवचन 1:8)। माता की शिक्षा को बराबर का स्थान मिला है, यह उस युग में एक असाधारण बात थी।

पुराने नियम में चेतावनियाँ भी हैं। एली याजक अपने पुत्रों को जानता था, उन्हें समझाया भी, पर रोका नहीं; और घर के साथ-साथ उसकी सेवा भी ढह गई। दाऊद का परिवार हमें दिखाता है कि परमेश्वर का प्यारा जन भी पिता के रूप में चूक सकता है। बाइबल आदर्श परिवारों की सजी हुई तस्वीरें नहीं दिखाती, वह घावों के साथ सच बोलती है।

फिर पुराना नियम एक अनोखे वादे पर ख़त्म होता है। मलाकी कहता है कि एलिय्याह आएगा और "वह पिताओं के मन को उनके बाल-बच्चों की ओर, और बाल-बच्चों के मन को उनके पिताओं की ओर फेरेगा।" ध्यान दीजिए, पुराने नियम का अंतिम बोझ यह नहीं है कि बच्चे सुधर जाएँ, बल्कि यह कि पिताओं के मन अपने बच्चों की ओर लौट आएँ। यही हमारा दृष्टिकोण है, और यह वचन के अंत में परमेश्वर का ही निदान है।

नए नियम में वह वादा पूरा होता है। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के बारे में स्वर्गदूत यही शब्द दोहराता है, और उसके बाद मसीह आते हैं। यीशु उस समाज में, जहाँ बच्चों को गिनती में नहीं लिया जाता था, कहते हैं, "बालकों को मेरे पास आने दो, और उन्हें मना न करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है" (मत्ती 19:14)। वे स्वयं एक बढ़ई के घर में माता-पिता के अधीन बड़े हुए; लूका लिखता है कि "यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया" (लूका 2:52)। परमेश्वर का पुत्र एक इंसानी घर की छाँव में बड़ा हुआ, और इससे हर घर की गोपनीय मेहनत पवित्र हो गई।

पौलुस इस सूत्र को कलीसिया की व्यवस्था में गूँथ देता है, और इब्रानियों 12 में परमेश्वर की ताड़ना को एक पिता के प्रेम के रूप में समझाया जाता है। फिर प्रकाशितवाक्य में सब कुछ अपनी मंज़िल पर पहुँचता है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि "मैं उसका परमेश्वर होऊँगा, और वह मेरा पुत्र होगा।" बाइबल एक बगीचे में एक परिवार से शुरू होकर एक नगर में परमेश्वर के परिवार पर ख़त्म होती है। यही कारण है कि हमारी परवरिश का असली नमूना कोई मानव विशेषज्ञ नहीं, बल्कि वह पिता है जिसने हमें अपनी सन्तान कहलाने का अधिकार दिया।

आम भ्रांतियाँ

पहली भ्रांति यह है कि नीतिवचन 22:6 एक पक्की गारंटी है। बहुत से माता-पिता इस पद को एक अनुबंध की तरह पढ़ते हैं: मैंने अपना हिस्सा किया, अब परमेश्वर को अपना हिस्सा करना होगा, और मेरा बच्चा ज़रूर विश्वास में लौटेगा। पर नीतिवचन बुद्धि-साहित्य है; वह सामान्य सच्चाई बोलता है, कानूनी वारंटी नहीं। उसी पुस्तक में यह भी लिखा है कि आलसी दरिद्र होता है, फिर भी हम जानते हैं कि हर गरीब आलसी नहीं। साथ ही परमेश्वर हर व्यक्ति को अपने विश्वास के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं। एक भक्त घर में बुरा बेटा निकल सकता है और एक बुरे घर में योशिय्याह जैसा राजा उठ सकता है। यह पद हमें निष्ठा के लिए बुलाता है, परिणाम की चाबी हमारे हाथ में नहीं देता।

दूसरी भ्रांति यह है कि अनुशासन का मतलब कठोरता और मार है। हाँ, नीतिवचन "छड़ी" की भाषा का प्रयोग करता है, और बाइबल सुधार को प्रेम का अंग मानती है। पर उसी बाइबल में लिखा है कि "हे बच्चे वालों, अपने बच्चों को तंग न करो, न हो कि उनका साहस टूट जाए" (कुलुस्सियों 3:21)। जिस अनुशासन का नमूना इब्रानियों 12 देता है, वह परमेश्वर का अनुशासन है, जो हमारे लाभ के लिए, सोच-समझकर, प्रेम में आता है, और धार्मिकता का फल पैदा करता है। जो सुधार गुस्से में, अपमान के साथ, या अपनी थकान उतारने के लिए किया जाता है, वह बाइबल का अनुशासन नहीं; वह इफिसियों 6:4 के "रिस न दिलाओ" का उल्लंघन है। सच्चा अनुशासन सीमाएँ खींचता है, पर बच्चे की गरिमा नहीं तोड़ता।

तीसरी भ्रांति यह है कि अच्छी परवरिश बच्चे का उद्धार करती है। यह सोच माता-पिता को या तो घमंडी बनाती है या टुकड़े-टुकड़े कर देती है। उद्धार अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा मिलता है, किसी पारिवारिक विधि से नहीं। हम बीज बो सकते हैं, पानी दे सकते हैं, पर नया जन्म पवित्र आत्मा का काम है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा काम बेकार है; 2 तीमुथियुस 3:15 दिखाता है कि परमेश्वर बचपन में बोए गए वचन को उद्धार के लिए इस्तेमाल करते हैं। पर वचन बोना और हृदय बदलना दो अलग काम हैं, और दूसरा काम हमारा नहीं है।

चौथी भ्रांति यह है कि बच्चे हमारे हैं, हमारी इच्छाओं का विस्तार। भजन संहिता 127:3 इसे जड़ से काटता है: सन्तान यहोवा का दिया हुआ भाग है। हन्ना ने शमूएल को माँगा, पाया, और फिर परमेश्वर को लौटा दिया। जब हम भूल जाते हैं कि बच्चा किसका है, तब हम उसके अंक, उसका करियर, उसकी शादी और उसकी छवि अपनी इज़्ज़त का पैमाना बना लेते हैं। तब घर एक दबाव-कक्ष बन जाता है। और एक जुड़ी हुई भ्रांति यह भी है कि आत्मिक शिक्षा कलीसिया या रविवार पाठशाला की ज़िम्मेदारी है। व्यवस्थाविवरण 6:7 इसे रसोई, सड़क और सोने के समय में रखता है। कलीसिया मदद करती है, जगह नहीं लेती।

आज इसे जीवन में उतारना

शुरुआत वहीं से करें जहाँ से परमेश्वर करते हैं, अपने मन से। अगर वचन आपके लिए बोझ है, तो वह आपके बच्चों के लिए बोझ ही बनेगा। रोज़ पाँच मिनट अकेले बाइबल के साथ बैठना कोई छोटी बात नहीं; वही पाँच मिनट आपकी आवाज़ का सुर बदल देंगे। और जिस दिन आप हार जाएँ, उस दिन बच्चों के सामने माफ़ी माँगना उस दिन के सबसे शक्तिशाली उपदेश से बड़ा होगा। जब बच्चा देखता है कि पापा गलती मानते हैं और परमेश्वर से क्षमा माँगते हैं, तब उसे अनुग्रह की व्याख्या नहीं, झलक मिलती है।

घर में वचन को बातचीत का हिस्सा बनाइए, कार्यक्रम का नहीं। रात के खाने पर एक पद पढ़िए और एक सवाल पूछिए। स्कूल से लौटते समय गाड़ी या ऑटो में पूछिए कि आज किस बात पर डर लगा और किस बात पर खुशी हुई, और उसी बात को परमेश्वर के सामने प्रार्थना में रख दीजिए। सोते समय एक छोटी प्रार्थना और एक आशीष के शब्द, हर रोज़, बीस साल तक; यह कोई महान योजना नहीं, पर यही व्यवस्थाविवरण 6:7 का "लेटते, उठते" है।

अनुशासन के पल में एक नियम बना लीजिए: पहले ठहरिए, फिर बोलिए। जब खून खौल रहा हो, सुधार पीछे मुड़कर बच्चे पर चोट बन जाता है। बच्चे को बताइए कि क्या गलत था, क्यों गलत था, और उसका परिणाम क्या होगा; और फिर उसे गले लगाकर यह भी बताइए कि उसकी गलती से आपका प्रेम कम नहीं होता। सीमाएँ स्पष्ट रखिए, पर तुलना को घर से बाहर फेंक दीजिए। "देख, तेरे भाई को देख" जैसी बातें साहस तोड़ने की सबसे तेज़ कैंची हैं।

किशोरों के साथ रणनीति बदलती है। तेरह साल के बच्चे को उपदेश से ज़्यादा सुने जाने की ज़रूरत है। उसके कठिन सवालों से डरिए नहीं; अगर वह आपसे पूछ रहा है, तो यह भरोसे की निशानी है। कहिए, "मुझे भी पूरा जवाब नहीं पता, चलो साथ मिलकर खोजें।" स्क्रीन और मोबाइल के मामले में नियम अकेले काफ़ी नहीं; बच्चे को यह देखना चाहिए कि आपका फ़ोन भी आपका मालिक नहीं है।

और उन माता-पिता के लिए जो अकेले लड़ रहे हैं, जिनका साथी नहीं है, या जिनके काम के घंटे बेरहम हैं: तीमुथियुस का घर आधा-अधूरा था, फिर भी परमेश्वर ने उस घर से कलीसिया के लिए एक सेवक तैयार किया। आपकी परिस्थिति परमेश्वर के हाथ नहीं बाँधती। और अगर आपके बच्चे बड़े हो चुके हैं और आपको लगता है कि समय निकल गया, तो याद रखिए कि प्रार्थना की उम्र कभी ख़त्म नहीं होती।

दर्पण

अब मैं सीधे आपसे बात करता हूँ। आप जानते हैं कि आपका बच्चा आपके उपदेश से नहीं, आपकी आदतों से सीख रहा है। वह देख रहा है कि आप ट्रैफ़िक में किस लहज़े में बात करते हैं, पैसे की चर्चा पर आपका चेहरा कैसा हो जाता है, और रविवार को आप जल्दी उठने की कोशिश करते हैं या नहीं। वह यह भी देख रहा है कि आप उससे बात करते समय फ़ोन नीचे रखते हैं या स्क्रीन पर आँख टिकाए हुए "हाँ, सुन रहा हूँ" कहते हैं।

यह बात चुभती है, और चुभनी चाहिए। क्योंकि इसका मतलब है कि परवरिश आपको वहीं पकड़ती है जहाँ आप सबसे कमज़ोर हैं: आपकी थकान में, आपके गुस्से में, आपके अधूरे सपनों में जिन्हें आप चुपके से अपने बच्चे के कंधों पर रख देते हैं। जब आप उसके अंकों को लेकर बेचैन होते हैं, तो कई बार डर बच्चे के भविष्य का नहीं, लोगों के सामने अपनी इज़्ज़त का होता है। यह कड़वी बात है, पर इसे मान लेना ही आज़ादी की शुरुआत है।

और यहीं यह विषय बंधन नहीं, राहत बन जाता है। अगर आपका बच्चा आपकी परियोजना होता, तो उसकी हर कमी आपका फ़ैसला होती। पर वह परमेश्वर का दिया हुआ भाग है। आपको उसका उद्धारकर्ता बनने की ज़रूरत नहीं; वह पद पहले से भरा हुआ है। आपको केवल विश्वासयोग्य होना है, और जहाँ आप चूकते हैं, वहाँ अनुग्रह माँगना है।

आप उसके माता-पिता हैं, उसके मसीह नहीं।

तो आज रात, दोष के बोझ में मत लेटिए। अगर कुछ टूटा है, तो कल सुबह माफ़ी माँगने से शुरू कीजिए। अगर बरसों बीत गए हैं, तो जिस उम्र का बच्चा अब है, उसी से आज की बातचीत शुरू कीजिए। परमेश्वर वही हैं जो पिताओं के मन को उनके बच्चों की ओर फेरते हैं, और वे आपके मन के साथ भी यही करना चाहते हैं।

बच्चों के लिए समझाया गया

बच्चों को यह विषय समझाना आसान है, क्योंकि वे इसमें जी रहे हैं। छोटे बच्चे से कहा जा सकता है: "परमेश्वर ने तुम्हें हमें उपहार की तरह दिया है। तुम मम्मी-पापा के दिल में बहुत ख़ास हो, लेकिन सबसे पहले तुम परमेश्वर के हो। वे तुमसे हमसे भी ज़्यादा प्रेम करते हैं।" बड़े बच्चे को यह जोड़ा जा सकता है कि परमेश्वर ने घर को एक ऐसी जगह बनाया है जहाँ उनके बारे में बातें होती हैं, जहाँ गलती करने पर सुधार मिलता है और माफ़ी भी मिलती है, और जहाँ माता-पिता भी सीख रहे होते हैं। किशोरों के साथ इस पर खुलकर बात हो सकती है कि आदर करने का मतलब अंधा समर्पण नहीं, और अधिकार का मतलब मनमानी नहीं; दोनों पक्ष एक ही प्रभु के सामने जवाबदेह हैं।

बच्चों से बात करते समय दो बातें याद रखिए। पहली, उन्हें केवल आज्ञा मत सिखाइए, उनके पीछे का प्रेम बताइए। दूसरी, अपनी कमज़ोरी छिपाइए नहीं; बच्चे उन माता-पिता पर भरोसा करते हैं जो सच बोलते हैं।

इस विषय पर हमारे पास अलग-अलग उम्र के लिए तैयार की गई सरल व्याख्याएँ भी उपलब्ध हैं: तीन से छह साल के नन्हे बच्चों के लिए छोटी कहानी और चित्र-भाषा में, सात से बारह साल के बच्चों के लिए सवाल-जवाब और उदाहरणों के साथ, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए उनके असली सवालों को छूती हुई गहरी बातचीत के रूप में। अपनी उम्र के अनुसार वह संस्करण चुनिए, और उसे अपने बच्चे के साथ बैठकर पढ़िए, अकेले नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बाइबल के अनुसार बच्चों की परवरिश का सबसे बड़ा सिद्धांत क्या है?

सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि परवरिश माता-पिता के हृदय से शुरू होती है। व्यवस्थाविवरण 6:6 में आज्ञा पहले माता-पिता को दी गई है कि परमेश्वर की बातें उनके मन में बनी रहें, और उसके बाद ही उन्हें बच्चों को सिखाने की बात आती है। इसका अर्थ है कि घर में वचन एक पाठ नहीं, एक जीवनशैली बनता है। दूसरा बड़ा सिद्धांत भजन संहिता 127:3 से आता है, कि बच्चा परमेश्वर का दिया हुआ भाग है; हम मालिक नहीं, भण्डारी हैं। इन दो बातों को समझ लेने से परवरिश की बाकी बातें अपनी जगह पा जाती हैं।

नीतिवचन 22:6 का सही अर्थ क्या है?

नीतिवचन 22:6 कहता है कि लड़के को जिस मार्ग पर चलना चाहिये उसी की शिक्षा दे, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा। यह पद बुद्धि-साहित्य का हिस्सा है, यानी यह एक सामान्य सच्चाई बताता है, कोई कानूनी गारंटी नहीं देता। इसका संदेश यह है कि बचपन की दिशा जीवन भर असर छोड़ती है, इसलिए आरंभिक वर्षों की शिक्षा को हल्के में न लें। पर यह पद किसी माता-पिता को यह आश्वासन नहीं देता कि सही तरीके से पालन करने पर बच्चा अनिवार्य रूप से विश्वास में बना रहेगा, क्योंकि हर व्यक्ति अपने विश्वास के लिए परमेश्वर के सामने स्वयं जवाबदेह है।

क्या बाइबल बच्चों को मारने की अनुमति देती है?

बाइबल सुधार और अनुशासन को प्रेम का अंग मानती है, और नीतिवचन में "छड़ी" की भाषा आती है, जो उस संस्कृति में सुधार का प्रतीक थी। पर वही बाइबल कुलुस्सियों 3:21 में चेतावनी देती है कि बच्चों को तंग न करो, कहीं उनका साहस टूट जाए, और इफिसियों 6:4 में कहती है कि उन्हें रिस न दिलाओ। इसलिए क्रोध में, अपमान के साथ या अपनी झुँझलाहट निकालने के लिए हाथ उठाना बाइबल का अनुशासन नहीं है। इब्रानियों 12 के अनुसार परमेश्वर की ताड़ना सोच-समझकर, हमारे लाभ के लिए और प्रेम से आती है; हमारा सुधार भी वैसा ही होना चाहिए।

इफिसियों 6:4 में "अपने बच्चों को रिस न दिलाओ" का मतलब क्या है?

इसका मतलब है कि माता-पिता का व्यवहार बच्चे के भीतर क्रोध और कड़वाहट पैदा न करे। यह भड़काना कई रूप लेता है: लगातार आलोचना, दूसरों से तुलना, अपनी बात पर टिके न रहना, ऐसी अपेक्षाएँ रखना जो बच्चा पूरी ही नहीं कर सकता, और सुधार करते समय उसकी गरिमा को कुचलना। पौलुस इस निषेध के तुरंत बाद सकारात्मक आज्ञा देता है कि प्रभु की शिक्षा और चितावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो। यानी अधिकार का उपयोग तोड़ने के लिए नहीं, पोषण के लिए होना चाहिए, ठीक जैसे एक माली पौधे की देखभाल करता है।

बच्चों को बाइबल पढ़ाना कब शुरू करना चाहिए?

जितनी जल्दी हो, उतनी जल्दी। 2 तीमुथियुस 3:15 कहता है कि तीमुथियुस बालकपन से पवित्र शास्त्र जानता था, और यह जानना उसे मसीह यीशु पर विश्वास करने के लिए बुद्धिमान बनाने के काम आया। इसका अर्थ है कि बहुत छोटे बच्चे भी वचन ग्रहण कर सकते हैं, बस भाषा और तरीका उनकी उम्र के अनुसार होना चाहिए। शुरुआत सोने से पहले एक छोटी कहानी, एक पद और एक सरल प्रार्थना से हो सकती है। ज़रूरी बात रोज़ का बड़ा कार्यक्रम नहीं, बल्कि निरंतरता है; थोड़ा-थोड़ा, लंबे समय तक, बहुत गहरी जड़ें बनाता है।

भजन संहिता 127:3 में सन्तान को "भाग" कहने का क्या अर्थ है?

"भाग" का अर्थ है विरासत या सौंपी गई संपत्ति, जैसे इस्राएल को देश में भाग मिला था। यह कहकर भजनकार दो बातें एक साथ कहता है: बच्चा एक बड़ा मूल्यवान उपहार है, और वह उपहार देनेवाले का है, पानेवाले का नहीं। इसलिए माता-पिता का पद मालिक का नहीं, भण्डारी का है। यह समझ हमें बदलती है, क्योंकि तब हम बच्चे से अपनी अपेक्षाएँ पूरी कराने के बजाय उसे परमेश्वर के हाथों में सौंपना सीखते हैं। हन्ना का शमूएल को परमेश्वर को लौटा देना इसी सच्चाई का जीवित उदाहरण है।

अगर बड़ा होकर बच्चा विश्वास छोड़ दे तो क्या यह माता-पिता की गलती है?

हमेशा नहीं। बाइबल माता-पिता की ज़िम्मेदारी को गंभीरता से लेती है, पर वह हर व्यक्ति को उसके अपने विश्वास के लिए भी जवाबदेह ठहराती है। पवित्रशास्त्र में भक्त पिताओं के बुरे बेटे और बुरे पिताओं के भक्त बेटे, दोनों मिलते हैं। हाँ, यदि परमेश्वर हमें किसी ठोस चूक के बारे में मन में कचोटते हैं, तो पश्चाताप और, जहाँ ज़रूरी हो, बच्चे से माफ़ी माँगना उचित है। लेकिन आत्म-दोष का अनंत बोझ उठाना परमेश्वर की इच्छा नहीं। आपका काम विश्वासयोग्य बोना है; हृदय बदलना पवित्र आत्मा का काम है, और प्रार्थना की कोई समय-सीमा नहीं होती।

बाइबल माँ और पिता की भूमिका में क्या अंतर बताती है?

बाइबल दोनों को शिक्षा देने का अधिकार और ज़िम्मेदारी देती है। नीतिवचन 1:8 पिता की शिक्षा और माता की शिक्षा, दोनों को बराबर आदर देता है, जो उस युग में उल्लेखनीय बात थी। इफिसियों 6:4 और कुलुस्सियों 3:21 में पौलुस विशेष रूप से पिताओं को संबोधित करता है, क्योंकि घर की आत्मिक अगुवाई में पिता की भूमिका केंद्रीय है और उस पर लापरवाही या कठोरता, दोनों का जोखिम रहता है। साथ ही तीमुथियुस की कहानी दिखाती है कि जहाँ पिता साथ न हो, वहाँ माता और नानी के हाथों परमेश्वर बड़ा काम कर सकते हैं। भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं, मूल्य बराबर है।

किशोर बच्चों के साथ बाइबल की बातें कैसे करें?

किशोरों के साथ उपदेश की जगह बातचीत काम करती है। उनके सवालों को खतरा मानने की बजाय भरोसे की निशानी मानिए; जब वे पूछते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे आपके साथ सोचना चाहते हैं। जहाँ आपके पास जवाब न हो, वहाँ ईमानदारी से कहिए और साथ मिलकर वचन खोजिए। उन्हें अपनी संदेह भरी बातें कहने की जगह दीजिए, पर वचन का अधिकार भी शांत दृढ़ता से रखिए। और अपने जीवन की कमज़ोरियों और परमेश्वर के अनुग्रह की कहानियाँ साझा कीजिए; कुलुस्सियों 3:21 की चेतावनी को याद रखते हुए उनकी आत्म-गरिमा कभी मत तोड़िए।

क्या इफिसियों 6:4 और कुलुस्सियों 3:21 में कोई फ़र्क है?

दोनों पद एक ही चिंता के दो पहलू हैं। इफिसियों 6:4 में पौलुस कहता है कि बच्चों को रिस न दिलाओ, बल्कि प्रभु की शिक्षा और चितावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो; यहाँ निषेध के साथ सकारात्मक आज्ञा भी है। कुलुस्सियों 3:21 में वह परिणाम पर ज़ोर देता है, कि बच्चों को तंग न करो, कहीं उनका साहस टूट जाए। पहला पद बताता है कि क्या करना है, दूसरा बताता है कि गलत रास्ते का अंजाम क्या होगा। दोनों मिलकर यह सिखाते हैं कि माता-पिता का अधिकार बच्चे को बुझाने के लिए नहीं, बढ़ाने के लिए दिया गया है।

व्यवस्थाविवरण 6:6 आज हमारे घरों पर कैसे लागू होता है?

यह पद कहता है कि परमेश्वर की आज्ञाएँ पहले हमारे अपने मन में बनी रहें। आज इसका सबसे सीधा अर्थ यह है कि हम बच्चों के लिए कोई ऐसी आत्मिक योजना न बनाएँ जिसमें हम खुद शामिल न हों। अगर आप चाहते हैं कि बच्चा प्रार्थना करे, तो उसे आपको प्रार्थना करते देखना चाहिए। अगले पद के अनुसार शिक्षा घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते और उठते होती है, यानी रसोई, सफ़र और सोने के समय में। इसलिए सबसे व्यावहारिक कदम अलग "बाइबल क्लास" नहीं, बल्कि रोज़ की बातों में वचन को स्वाभाविक रूप से बुनना है।

बच्चों की परवरिश में परमेश्वर के अनुग्रह की भूमिका क्या है?

अनुग्रह ही वह ज़मीन है जिस पर बाइबल की परवरिश खड़ी है। हम अनुग्रह से बचाए गए पापी हैं जो अनुग्रह से बचाए जाने वाले पापियों को पाल रहे हैं, इसलिए घर में क्षमा एक रोज़ की भाषा होनी चाहिए। अनुग्रह हमें दो चीज़ों से बचाता है: उस घमंड से जो सोचता है कि मैंने अपने बच्चे को अच्छा बनाया, और उस निराशा से जो सोचता है कि मैंने सब बर्बाद कर दिया। और अनुग्रह ही वह संदेश है जो हम बच्चे को देना चाहते हैं, क्योंकि 2 तीमुथियुस 3:15 के अनुसार शास्त्र का लक्ष्य उसे मसीह यीशु पर विश्वास करने के लिए बुद्धिमान बनाना है।

अंत में

अगर आप इस पूरे पृष्ठ से एक ही बात ले जाएँ, तो यह हो: परमेश्वर ने परवरिश की आज्ञा पहले बच्चे पर नहीं, माता-पिता के मन पर रखी। "ये आज्ञाएँ... तेरे मन में बनी रहें," और तब जाकर, "तू इन्हें अपने बालकों को समझाकर सिखाया करना।" इसी क्रम में हमारी राहत छिपी है। आप किसी विधि के मालिक नहीं हैं, आप एक भण्डारी हैं, और जिसे आप पाल रहे हैं वह परमेश्वर का दिया हुआ भाग है। इसलिए दबाव उतार दीजिए और निष्ठा उठा लीजिए।

आगे बढ़ने के लिए व्यवस्थाविवरण 6 को पूरा पढ़िए, फिर इफिसियों 5 और 6 को एक साथ, और उसके बाद इब्रानियों 12 के पहले ग्यारह पद, जहाँ परमेश्वर स्वयं एक पिता के रूप में हमारे साथ पेश आते हैं। नीतिवचन के पहले दस अध्याय एक महीने में, हर दिन एक अध्याय, आपकी सोच को बदल देंगे।

और आज रात, बच्चों के सोने के बाद, एक छोटी प्रार्थना कीजिए: "प्रभु, मेरे मन को मेरे बच्चों की ओर फेर दीजिए, और मेरे बच्चों के मन को अपनी ओर।" मलाकी के अंतिम पन्ने से लेकर प्रकाशितवाक्य के नए नगर तक, यही परमेश्वर का काम है, और वे इसे अधूरा नहीं छोड़ते।

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