एलीशा का जीवन: दुगुनी आत्मा पाने वाले भविष्यद्वक्ता के चमत्कार
परिचय
कल्पना कीजिए: उत्तरी इस्राएल का एक खेत, बसंत की मिट्टी, बारह जोड़ी बैल हाँकते मजदूर, और सबसे पीछे हल की मूठ पकड़े एक जवान किसान, जिसके कंधों पर पसीना और धूल जमी है। उसका दिन सामान्य था, उसका भविष्य तय था, उसकी ज़िंदगी का नक्शा उसके पिता की ज़मीन जितना बड़ा था। फिर अचानक एक अजनबी भविष्यद्वक्ता खेत में उतरता है, कुछ कहता नहीं, बस अपनी चद्दर उस किसान के कंधों पर फेंककर आगे बढ़ जाता है। उस एक पल में एलीशा की सारी योजनाएँ खत्म हो गईं, और परमेश्वर की योजना शुरू हुई।
इस पृष्ठ पर आप एलीशा के पूरे जीवन से गुज़रेंगे: खेत से बुलावे तक, यरदन के किनारे की उस विदाई तक, उन चमत्कारों तक जो रसोई और कर्ज़ और बीमारी जैसी बहुत ही साधारण जगहों में हुए, उसकी कमज़ोरियों तक, और अंत में उस कब्र तक जहाँ से भी जीवन फूट पड़ा। और आप देखेंगे कि यह सब किस तरह यीशु मसीह की ओर इशारा करता है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
बहुत से लेख एलीशा के चमत्कारों की गिनती करते हैं। यह पृष्ठ एक और सवाल पूछता है: वे चमत्कार कहाँ हुए? जवाब चौंकाने वाला है। एलिय्याह की सेवकाई आग, सूखा और कर्मेल पर्वत के टकराव की थी; एलीशा की सेवकाई आटे की हाँडी, उधार की कुल्हाड़ी, विधवा के तेल के घड़े और एक परदेशी सेनापति के कोढ़ की थी। "दुगुनी आत्मा" का अर्थ दुगुनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि पहिलौठे पुत्र का दुगुना अंश, यानी उत्तराधिकार था। इसलिए हम एलीशा को अनुग्रह के भविष्यद्वक्ता के रूप में पढ़ेंगे, जिसके जीवन में परमेश्वर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतर आते हैं। यही दृष्टिकोण हमें सीधे यीशु मसीह के पास ले जाता है।
बाइबल एलीशा के जीवन के बारे में क्या कहती है?
एलीशा की कहानी 1 राजा 19 में शुरू होती है, और विडंबना यह है कि वह एलिय्याह के सबसे निराश क्षण के बाद आती है। होरेब पर्वत पर टूटे हुए एलिय्याह से परमेश्वर कहते हैं कि जाकर एलीशा को अपने स्थान पर भविष्यद्वक्ता होने के लिये अभिषेक कर। और फिर 1 राजा 19:19 में वह दृश्य आता है: "वह वहाँ से चलकर शापात के पुत्र एलीशा को मिला, जो हल जोत रहा था; उसके आगे बारह जोड़ी बैल थे, और वह आप पिछली जोड़ी के संग था; और एलिय्याह उसके पास जाकर अपनी चद्दर उस पर डाल दी।" बारह जोड़ी बैल बताते हैं कि एलीशा गरीब नहीं था; वह एक सम्पन्न घर का बेटा था। वह अपनी गरीबी से भागकर भविष्यद्वक्ता नहीं बना, उसने अपनी सम्पन्नता छोड़कर बुलावे को चुना। उसने बैलों को बलि करके, हल की लकड़ी से आग जलाकर, लोगों को खिलाया और चल पड़ा। उसका पहला काम ही एक भोज था; उसकी पूरी सेवकाई का स्वाद वहीं तय हो गया।
इसके बाद कई साल ऐसे हैं जिनके बारे में बाइबल लगभग चुप है। एलीशा शिष्य बना रहा, और उसकी पहचान यह बन गई कि वह "एलिय्याह के हाथों पर पानी डालता था" (2 राजा 3:11)। यह राजा के दरबार में उसका परिचय-पत्र था: मैं सेवक रहा हूँ। परमेश्वर के काम में छोटे कामों से बड़े अभिषेक पकते हैं।
फिर वह दिन आया जब एलिय्याह को उठा लिया जाना था। एलीशा ने गिलगाल से बेतेल, बेतेल से यरीहो, यरीहो से यरदन तक अपने गुरु का पीछा नहीं छोड़ा, और नदी के पार उसने वह माँग रखी जिसने उसके पूरे जीवन को आकार दिया। 2 राजा 2:9 कहता है: "पार होने पर एलिय्याह ने एलीशा से कहा, 'इससे पहले कि मैं तेरे पास से उठा लिया जाऊँ, जो कुछ तू चाहे कि मैं तेरे लिये करूँ, वह मुझ से माँग।' एलीशा ने कहा, 'मुझे तेरी आत्मा का दो गुणा भाग मिले।'" यह घमंड की माँग नहीं थी। व्यवस्थाविवरण 21:17 में पहिलौठे पुत्र को पिता की सम्पत्ति का दुगुना अंश मिलता था। एलीशा कह रहा था: मुझे आपका पुत्र, आपका वारिस बना दीजिए। और जब अग्निमय रथ ने एलिय्याह को उठा लिया, एलीशा ने चिल्लाकर कहा, "हे मेरे पिता, हे मेरे पिता," और उसकी गिरी हुई चद्दर उठाकर यरदन को दो भाग कर दिया। वारिस ने विरासत सँभाल ली।
अब वह चौथाई सदी से ज़्यादा लंबी सेवकाई शुरू होती है, और उसका रंग देखिए। यरीहो के खारे सोते मीठे किए गए। मोआब के विरुद्ध मरती हुई तीन सेनाओं को पानी मिला। एक कर्ज़ में डूबी विधवा का तेल ऐसा बढ़ा कि कर्ज़ चुक गया और बेटे बिकने से बच गए। अकाल में भविष्यद्वक्ताओं के दल के लिये ज़हरीली हाँडी ठीक हुई। बीस रोटियों से सौ आदमी खाकर तृप्त हुए। एक शिष्य की उधार ली हुई कुल्हाड़ी का फल पानी से तैरकर ऊपर आया। और शूनेम की उस औरत का मरा हुआ बेटा, जिसने भविष्यद्वक्ता के लिये छत पर एक कोठरी बनाई थी, फिर जी उठा। 2 राजा 4:34 उस दृश्य को बहुत कोमलता से बताता है: "तब वह खाट पर चढ़कर बालक के ऊपर इस रीति लेट गया, कि अपना मुँह उसके मुँह पर, और अपनी आँखें उसकी आँखों पर, और अपने हाथ उसके हाथों पर रखे; और उस पर झुका रहा, और बालक की देह गर्म हो गई।" भविष्यद्वक्ता दूर से जादू नहीं करता; वह मौत के ऊपर अपना शरीर फैला देता है।
एलीशा केवल घरों तक सीमित नहीं रहा। उसने अराम के सेनापति नामान को कोढ़ से चंगाई दी, पर अपनी शर्तों पर नहीं, परमेश्वर की शर्तों पर: जाकर यरदन में सात बार डुबकी लगा। 2 राजा 5:14 में लिखा है: "तब उसने जाकर यरदन में सात बार डुबकी मारी, जैसे परमेश्वर के भक्त ने कहा था, और उसका शरीर छोटे बालक का सा हो गया और वह शुद्ध हो गया।" उसने अराम की सेना के बीच सामरिया को बचाया, और अपने डरे हुए सेवक के लिये वह प्रार्थना की जो आज भी हमारी प्रार्थना बन सकती है। 2 राजा 6:17 कहता है: "तब एलीशा ने यह प्रार्थना की, 'हे यहोवा, इसकी आँखें खोल दे कि यह देख सके।' तब यहोवा ने सेवक की आँखें खोल दीं, और जब उसने देखा, तो क्या देखा कि एलीशा के चारों ओर का पहाड़ अग्निमय घोड़ों और रथों से भरा हुआ है।" राजाओं को बनाना और गिराना भी उसके हाथ में सौंपा गया: उसने हजाएल का भविष्य बताया, येहू का अभिषेक कराया, और मरते-मरते योआश को तीर चलाने का आदेश दिया।
और अंत? एलीशा बीमारी से मरा, किसी अग्निमय रथ में नहीं। पर उसकी कब्र भी खाली हाथ नहीं रही। 2 राजा 13:21 बताता है: "और ऐसा हुआ कि कुछ लोग एक जन को मिट्टी देने जा रहे थे, कि उन्होंने एक दल को देखा; तब उस जन को एलीशा की कब्र में डाल दिया; और वह जन एलीशा की हड्डियों के छूते ही जी उठा, और अपने पाँवों के बल खड़ा हो गया।" जिस भविष्यद्वक्ता का पूरा जीवन जीवन देने में बीता, उसकी मिट्टी से भी जीवन फूटा।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
एलीशा अकेला खड़ा नहीं है। वह एक जोड़ी का दूसरा भाग है, और बाइबल इस जोड़ी को बार-बार दोहराती है। एलिय्याह का नाम ही एक चुनौती है: "यहोवा मेरा परमेश्वर है।" उसकी सेवकाई मूर्तिपूजा के खिलाफ आग, सूखा और तलवार की थी। एलीशा के नाम का अर्थ है "मेरा परमेश्वर उद्धार है," और उसकी सेवकाई में पानी मीठा होता है, भोजन बढ़ता है, बाँझपन टूटता है, कोढ़ी शुद्ध होता है और मुर्दे जी उठते हैं। पहले न्याय की पुकार, फिर अनुग्रह की दावत। यह क्रम संयोग नहीं; यह परमेश्वर के काम करने का तरीका है। व्यवस्था तोड़ती है, अनुग्रह जोड़ता है।
पुराने नियम में यह सूत्र और पीछे तक जाता है। मूसा समुद्र को दो भाग करता है, यहोशू यरदन को; एलिय्याह यरदन को दो भाग करता है, और फिर एलीशा उसी चद्दर से वही करता है। परमेश्वर अपने वचन को एक पीढ़ी के साथ दफ़न नहीं होने देते। जब एलिय्याह जाता है तो लोग डरते हैं कि अब आवाज़ बंद हो गई; पर परमेश्वर ने पहले ही वारिस खड़ा कर रखा था।
नया नियम इस सूत्र को खुलकर उठाता है। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला "एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य" में आया, जंगल में, कठोर शब्दों और पश्चाताप के बुलावे के साथ। और उसके ठीक बाद यरदन में से यीशु निकलते हैं, जिन पर आत्मा उतरता है, और जिनकी सेवकाई रोटी, चंगाई, स्पर्श और पुनरुत्थान की है। एलीशा बीस रोटियों से सौ लोगों को खिलाता है; यीशु पाँच रोटियों से पाँच हज़ार को। एलीशा शूनेम की औरत का बेटा लौटाता है; यीशु नाईन की विधवा का बेटा लौटाते हैं, और वह भी बिना किसी से माँगे। एलीशा नामान को यरदन भेजता है; यीशु कोढ़ियों को छूकर शुद्ध करते हैं।
खुद यीशु ने एलीशा का नाम अपने पहले उपदेश में लिया, और वह उपदेश उन्हें लगभग जान से मरवा बैठा। लूका 4:27 में वे कहते हैं: "और एलीशा भविष्यद्वक्ता के समय में इस्राएल में बहुत से कोढ़ी थे, पर उनमें से कोई शुद्ध न किया गया, केवल सूरिया देश का नामान।" नासरत के लोगों को यह सुनना मंज़ूर नहीं था कि परमेश्वर का अनुग्रह उनकी सीमा के बाहर भी बहता है। पर यीशु ने ठीक यही कहा: नामान की चंगाई इस बात का सबूत थी कि परमेश्वर की दया किसी जाति की जागीर नहीं है। एलीशा का जीवन इस तरह उस मिशन का पहला चिन्ह बन गया जो आगे प्रेरितों के काम में हर जाति तक फैल गया।
और दुगुनी आत्मा? वह माँग पिन्तेकुस्त में अपनी पूर्णता पाती है। जो आत्मा पहले एक भविष्यद्वक्ता पर थी, वह मसीह के ऊपर संपूर्णता में आई, और मसीह के द्वारा उनके सब लोगों पर उँडेली गई। एलीशा को एक चद्दर मिली थी; कलीसिया को पवित्र आत्मा मिला है।
उसके जीवन का सार
पहला निर्णायक क्षण खेत में आया। चद्दर कंधों पर पड़ी, और एलीशा ने एक विनती की: पहले मुझे अपने माता-पिता को चूम लेने दे। एलिय्याह का जवाब कठोर लगता है, पर उसका मतलब यह था कि बुलावा एलिय्याह का नहीं, परमेश्वर का है, इसलिए फैसला भी एलीशा का ही होगा। और एलीशा ने जो किया, वह केवल विदाई नहीं थी; उसने अपने बैलों की बलि चढ़ाई और हल की लकड़ी जलाकर मांस पकाया। खेती के औज़ार राख हो गए। पीछे लौटने का रास्ता उसने अपने हाथों से जला दिया। यहाँ हम उसकी सबसे बड़ी ताकत देखते हैं: पूरी तरह चलना। जो व्यक्ति आगे चलकर दूसरों की हाँडी, कुल्हाड़ी और तेल की चिंता करेगा, उसने पहले अपनी सारी सुरक्षा परमेश्वर के हाथ में रख दी।
दूसरा निर्णायक क्षण यरदन के किनारे था। एलिय्याह ने तीन बार कहा कि यहीं ठहर जा, और तीन बार एलीशा ने मना किया। भविष्यद्वक्ताओं के दल पास ही खड़े थे, पर वे दूर से देखने वाले बने रहे। एलीशा ने निकटता चुनी, और निकटता ही विरासत की कीमत थी। उसकी माँग, "मुझे तेरी आत्मा का दो गुणा भाग मिले," पद पाने की भूख नहीं थी। वह जानता था कि जो काम आ रहा है, वह मनुष्य की सामर्थ्य से नहीं हो सकता। एलिय्याह ने साफ कहा कि यह उसके बस में नहीं; यदि एलीशा उसका उठा लिया जाना देख सके, तो मिलेगा। यह आत्मा का उपहार परमेश्वर के हाथ में रहा, किसी गुरु की जेब में नहीं। और जब सब खत्म हुआ, एलीशा के हाथ में एक ही चीज़ बची: एक पुरानी चद्दर और एक सवाल, "एलिय्याह का परमेश्वर यहोवा कहाँ है?" उसने उस चद्दर से पानी पर मारा, और पानी बँट गया। विरासत चीज़ों में नहीं, जीवित परमेश्वर में थी।
तीसरा निर्णायक क्षण उसके अंत में है, और यहाँ हमें ईमानदार होना पड़ेगा। एलीशा ने चमत्कार से भरा जीवन जिया, पर वह चमत्कारी ढंग से नहीं गया। "एलीशा को वह रोग लग गया जिससे उसकी मृत्यु हुई," बाइबल सीधे कहती है। उसके जीवन में छाया वाले हिस्से भी हैं: बेतेल के बाहर उसका शाप देना, जिस पर पाठक आज भी ठिठकते हैं; गेहजी जैसा सेवक, जिसने अनुग्रह के पास रहकर भी लालच चुना; और मरते समय योआश पर उसका क्रोध, क्योंकि राजा ने तीर तीन ही बार मारे और बस। यहाँ कोई बेदाग नायक खड़ा नहीं है। यहाँ एक मनुष्य है जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपनी दया बहाई। उसका सार यह नहीं कि वह कितना महान था, बल्कि यह कि वह किसकी चद्दर ओढ़े हुए था। विरासत पद में नहीं, उपस्थिति में मिलती है।
एलीशा से हम क्या सीखते हैं
पहली सीख: परमेश्वर का अनुग्रह रसोई तक आता है। यदि आप सोचते हैं कि परमेश्वर केवल बड़े, आत्मिक, मंच वाले मामलों में दिलचस्पी रखते हैं, तो एलीशा की सूची पढ़िए। एक औरत के कर्ज़ का तेल, एक दल का ज़हरीला भोजन, एक शिष्य की उधार ली हुई कुल्हाड़ी, एक माँ का बुखार से मरा बेटा, एक परदेशी की चमड़ी। ये "छोटी" ज़रूरतें थीं, और परमेश्वर ने उनमें अपना नाम बड़ा किया। आपका किराया, आपकी रिपोर्ट, आपके बच्चे का बुखार, आपकी टूटी चीज़ें: ये परमेश्वर के लिए बहुत छोटी नहीं हैं।
दूसरी सीख: माँगने का सलीका सीखिए। एलीशा ने सामर्थ्य नहीं माँगी, उत्तराधिकार माँगा; उसने चमत्कार नहीं माँगे, आत्मा माँगी। और उसकी प्रार्थनाओं में सबसे सुंदर वह है जो उसने अपने लिये नहीं, अपने डरे हुए सेवक के लिये की: आँखें खोल दे कि यह देख सके। हमारी प्रार्थनाएँ अक्सर हालात बदलने के लिये होती हैं; कभी-कभी सबसे गहरी ज़रूरत यह होती है कि हमारी आँखें बदल जाएँ। जो पहाड़ आपको घेर रखा हुआ लगता है, वह असल में अग्निमय रथों से भरा हो सकता है।
तीसरी सीख: अनुग्रह सीमाओं का आदर नहीं करता, और यह हमें असहज करता है। नामान दुश्मन देश का सेनापति था, उसी अराम का, जिसने इस्राएल को लूटा था। परमेश्वर ने उसे शुद्ध किया, और उसी समय इस्राएल के बहुत से कोढ़ी अशुद्ध रह गए, जैसा यीशु ने लूका 4:27 में याद दिलाया। एलीशा का जीवन हमें उस परमेश्वर के सामने खड़ा करता है जो उन लोगों पर दया करते हैं जिन्हें हम सूची से बाहर रखते हैं। और यह वही अनुग्रह है जिसने हमें भी, जो पराई जातियों से थे, मसीह में भीतर बुलाया। जो इस अनुग्रह को समझता है, वह दूसरों के लिये दरवाज़ा बंद नहीं कर सकता।
दर्पण
अब एक पल रुकिए और अपने बारे में सोचिए। एलीशा के खेत में जो चद्दर गिरी थी, वह आपकी ज़िंदगी में कहाँ गिरी है और आपने उसे उठाया या नहीं? हममें से बहुत लोग परमेश्वर की बुलाहट के सामने यह चालाकी करते हैं: हम "हाँ" कहते हैं, पर बैल नहीं काटते। हल बचा रखते हैं, पुराना रास्ता खुला रखते हैं, नौकरी, रिश्ता, आदत, योजना, कुछ भी जो हमें फिर पीछे खींच सके। बुलावा वहीं अटक जाता है, और हम सालों तक दो नावों में पैर रखकर जीते हैं।
और दूसरी तरफ, क्या आप यह सोचकर थक गए हैं कि आपकी ज़िंदगी बहुत ही मामूली है? आपका दिन बर्तन, बिल, बस और बीमारी से भरा है। आप सोचते हैं परमेश्वर कहीं बड़े काम कर रहे हैं, आपके घर में नहीं। एलीशा की कहानी आपके रसोईघर में आकर बैठती है। उस विधवा के पास बस थोड़ा सा तेल था, और परमेश्वर ने उसी थोड़े से शुरू किया। आपके पास जो थोड़ा है, वही परमेश्वर के हाथ में रखने की चीज़ है; जो आपके पास नहीं है, उसकी वे मांग नहीं करते।
और सबसे असहज बात: नामान। किसका नाम आपके मन में उस सूची में है जिसे आप परमेश्वर की दया के योग्य नहीं मानते? वह रिश्तेदार जिसने आपका नुकसान किया, वह मालिक जिसने आपको अपमानित किया, वह समुदाय जिसे आप दूर रखते हैं। एलीशा ने उस दुश्मन सेनापति को यरदन भेजा, और इस्राएल के अपने कोढ़ी घर बैठे रहे। यह कहानी हमारे दिल का नक्शा खोल देती है।
अगर आज आपका दिल डरा हुआ है, तो एलीशा के सेवक की जगह पर खड़े होकर प्रार्थना कीजिए: प्रभु, मेरी आँखें खोल दीजिए। आपके चारों ओर जो दिखता है, वह सब कुछ नहीं है।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों के लिए एलीशा की कहानी सुनाने का सबसे अच्छा दरवाज़ा चमत्कारों का डर नहीं, बल्कि उनकी कोमलता है। आप उन्हें बता सकते हैं कि एलीशा एक किसान था जो खेत में काम कर रहा था, और एक दिन परमेश्वर ने उसे एक खास काम के लिए बुलाया: लोगों को परमेश्वर के बारे में बताना और उनकी मदद करना। और परमेश्वर ने उसके द्वारा ऐसे काम किए जो किसी इंसान से नहीं हो सकते। एक माँ के पास खाने के लिए कुछ नहीं था, और परमेश्वर ने उसका तेल बढ़ा दिया। एक लड़का बहुत बीमार होकर मर गया, और परमेश्वर ने उसे फिर जीवित कर दिया। एक सेनापति की चमड़ी की बीमारी नदी में सात बार डुबकी लगाने पर ठीक हो गई, क्योंकि उसने परमेश्वर की बात मानी। और जब एलीशा का सेवक दुश्मन की सेना देखकर डर गया, तो परमेश्वर ने उसकी आँखें खोलीं और उसे दिखाया कि परमेश्वर के स्वर्गदूत उनके चारों ओर हैं।
छोटे बच्चों के लिए यही संदेश काफी है: परमेश्वर हमारी छोटी-छोटी ज़रूरतों की भी परवाह करते हैं, और हमारे डर से बड़े हैं। बड़े बच्चों के साथ आप यह जोड़ सकते हैं कि यीशु ने भी भूखों को खिलाया, बीमारों को छुआ और मरे हुओं को जिलाया, इसलिए एलीशा की कहानियाँ यीशु की तरफ इशारा करने वाले संकेत हैं।
हमारी वेबसाइट पर एलीशा के जीवन की अलग-अलग उम्र के लिए तैयार की गई व्याख्याएँ भी उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष) के लिए सरल और सचित्र, स्कूल जाने वाले बच्चों (7 से 12 वर्ष) के लिए कहानी और सवाल-जवाब के साथ, और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए गहरे सवालों और आज के जीवन से जुड़े विषयों के साथ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एलीशा कौन थे और वे कब जिए?
एलीशा शापात का पुत्र था और आबेल-महोला नाम की जगह का था, जो यरदन घाटी में इस्राएल के उत्तरी राज्य में पड़ता था। वह एक सम्पन्न किसान परिवार से था और एलिय्याह के बुलावे पर अपनी खेती छोड़कर भविष्यद्वक्ता बना। उसकी सेवकाई इस्राएल के उत्तरी राज्य में लगभग ईसा पूर्व नवीं सदी के मध्य से आठवीं सदी की शुरुआत तक चली, यानी राजा योराम से लेकर योआश तक, कुल पचास वर्ष के आसपास। उसकी कहानी 1 राजा 19 से शुरू होकर 2 राजा 13 तक फैली हुई है।
एलीशा ने दुगुनी आत्मा क्यों माँगी?
2 राजा 2:9 में एलीशा की माँग को बहुत बार गलत समझा जाता है। वह एलिय्याह से दोगुना शक्तिशाली बनने की महत्वाकांक्षा नहीं थी। इस्राएल में पहिलौठे पुत्र को पिता की सम्पत्ति का दुगुना अंश मिलता था, जैसा व्यवस्थाविवरण 21:17 में लिखा है। एलीशा अपने गुरु से यह कह रहा था कि मुझे आपका कानूनी वारिस मानिए, आपके काम का उत्तराधिकारी बनाइए। और इसीलिए उसने एलिय्याह के उठा लिए जाने पर पुकारा, "हे मेरे पिता।" वह शक्ति नहीं, ज़िम्मेदारी और आत्मा की सामर्थ्य माँग रहा था।
क्या एलीशा ने एलिय्याह से दोगुने चमत्कार किए?
एक पुरानी परंपरा एलिय्याह के सात और एलीशा के चौदह चमत्कार गिनती है, पर बाइबल खुद ऐसी कोई गिनती नहीं देती, और गिनने का तरीका बदलने पर संख्या भी बदल जाती है। यह सच है कि एलीशा के वृत्तांत में चमत्कारों की भरमार है, पर उनका ज़ोर संख्या पर नहीं, स्वभाव पर है। एलिय्याह की सेवकाई मुख्यतः न्याय और टकराव की थी, एलीशा की मुख्यतः दया, भोजन, चंगाई और जीवन की। "दुगुना" शब्द विरासत की भाषा है, आँकड़ों की नहीं।
एलीशा ने बेतेल के लड़कों को शाप क्यों दिया?
2 राजा 2:23-25 का यह दृश्य पाठकों को परेशान करता है, और ईमानदारी से कहना चाहिए कि बाइबल यहाँ एलीशा की तारीफ नहीं करती, वह केवल घटना बताती है। जिन्हें हम "लड़के" समझते हैं, वे युवकों का एक दल भी हो सकता है, और उनका मज़ाक एलीशा की व्यक्तिगत नहीं, परमेश्वर के भेजे हुए भविष्यद्वक्ता की पहचान का अपमान था, ठीक उसी इलाके में जहाँ मूर्तिपूजा का केंद्र था। फिर भी यह वृत्तांत हमें चेतावनी देता है कि परमेश्वर के वचन के साथ हँसी-ठट्ठा हल्की बात नहीं है।
नामान की चंगाई से हम क्या सीखते हैं?
2 राजा 5:14 में नामान की चंगाई तब हुई जब उसने अपनी प्रतिष्ठा छोड़कर एक मामूली आदेश मान लिया: यरदन में सात बार डुबकी। उसे न कोई मंत्र मिला, न कोई शानदार समारोह, न भविष्यद्वक्ता का स्पर्श। परमेश्वर ने जानबूझकर उसकी अपेक्षाओं को तोड़ा, ताकि चंगाई उसकी उपलब्धि न बनकर परमेश्वर का उपहार बने। और उसने इनाम देने की कोशिश की, पर एलीशा ने कुछ नहीं लिया। अनुग्रह बिकता नहीं। यही कारण है कि यीशु ने नासरत में इसी कहानी का हवाला दिया।
गेहजी के साथ क्या हुआ और उसका क्या सबक है?
गेहजी एलीशा का सेवक था, जिसने नामान के पीछे जाकर झूठ बोलकर चाँदी और कपड़े ले लिए, जिन्हें एलीशा ने जानबूझकर ठुकराया था। 2 राजा 5 के अंत में एलीशा ने कहा कि नामान का कोढ़ उस पर और उसके वंश पर लगेगा, और गेहजी कोढ़ी होकर वहाँ से निकला। यह कहानी डरावनी है, पर उसका सबक साफ है: अनुग्रह के इतने करीब रहकर भी दिल लालची रह सकता है। धार्मिक काम के साए में बैठना और परमेश्वर को जानना एक बात नहीं है।
एलीशा की हड्डियों से मुर्दा जी उठना क्या अवशेषों की पूजा को सही ठहराता है?
नहीं। 2 राजा 13:21 की घटना एक बार हुई, अचानक हुई, और उसमें कोई भक्ति, मन्नत या पूजा शामिल नहीं थी; लोग डाकुओं से भागते हुए शव को जल्दी में कब्र में डाल गए थे। बाइबल इसे कहीं भी किसी चलन या प्रथा का आधार नहीं बनाती, और एलीशा की कब्र आगे किसी तीर्थ का रूप नहीं लेती। इसका असली संदेश यह है कि परमेश्वर का जीवन देने वाला वचन, जो एलीशा के द्वारा बोला गया, उसकी मृत्यु के बाद भी निष्फल नहीं हुआ।
एलिय्याह और एलीशा में मुख्य अंतर क्या है?
एलिय्याह जंगल का आदमी था: अकेला, कठोर, टकराव में खड़ा, आग और सूखे का भविष्यद्वक्ता, जिसने अहाब और बाल के याजकों का सीधा सामना किया। एलीशा बस्तियों का आदमी था: भविष्यद्वक्ताओं के दलों के बीच रहने वाला, राजाओं के दरबार में आने-जाने वाला, विधवाओं, माताओं, सेवकों और परदेशियों की ज़रूरतों में उतरने वाला। एलिय्याह का नाम घोषणा करता है कि यहोवा ही परमेश्वर हैं; एलीशा का नाम घोषणा करता है कि परमेश्वर उद्धार हैं। दोनों एक ही परमेश्वर के दो चेहरे दिखाते हैं: पवित्रता और करुणा।
यीशु ने लूका 4:27 में एलीशा का नाम क्यों लिया?
नासरत के आराधनालय में अपने पहले उपदेश में यीशु ने दिखाया कि परमेश्वर का अनुग्रह कभी किसी जाति की मिलकियत नहीं रहा। एलीशा के दिनों में इस्राएल में कई कोढ़ी थे, पर शुद्ध हुआ अराम का सेनापति नामान, एक परदेशी। यीशु यह कह रहे थे कि जो मसीहा आया है, वह उन्हीं लोगों के पास जाएगा जिन्हें धर्मी लोग बाहर मानते हैं। सुननेवाले इतने क्रोधित हुए कि उन्होंने यीशु को नगर से बाहर निकालकर मार डालना चाहा। अनुग्रह आराम नहीं देता, वह दीवारें गिराता है।
एलीशा की मृत्यु कैसे हुई?
एलिय्याह की तरह एलीशा अग्निमय रथ में नहीं उठाया गया। 2 राजा 13:14 कहता है कि उसे वह रोग लग गया जिससे उसकी मृत्यु हुई, और उसी बीमारी के बिछौने पर उसने इस्राएल के राजा योआश को अराम पर विजय के बारे में अंतिम भविष्यवाणी दी। यह बहुत सांत्वना देने वाली बात है: परमेश्वर का सामर्थ्य उसके शरीर की कमज़ोरी के बावजूद काम करता रहा। चमत्कारों से भरा जीवन जीने वाला व्यक्ति भी एक साधारण बीमारी से मरा, और फिर भी उसकी मृत्यु व्यर्थ नहीं हुई।
क्या एलीशा यीशु मसीह का प्रतिरूप हैं?
एलीशा मसीह के आने का एक संकेत हैं, उनका समकक्ष नहीं। उनके चमत्कारों में हम यीशु की सेवकाई की झलक देखते हैं: थोड़े भोजन से भीड़ का खाना, मरे हुए बालक का जी उठना, कोढ़ी का शुद्ध होना, परदेशियों पर दया। पर अंतर बुनियादी है: एलीशा ने दूसरों की प्रार्थना में परमेश्वर से सामर्थ्य माँगी, यीशु अपने ही अधिकार से काम करते हैं; एलीशा मरे और कब्र में रहे, यीशु मरे और तीसरे दिन जी उठे। एलीशा जीवन का साधन था, यीशु जीवन हैं।
एलीशा के चमत्कारों की गिनती बाइबल कहाँ देती है?
बाइबल कोई सूची नहीं देती; उसके चमत्कार 2 राजा 2 से 13 तक कहानियों के रूप में बिखरे हुए हैं। यरीहो के पानी का मीठा होना, मोआब के युद्ध में पानी मिलना, विधवा के तेल का बढ़ना, शूनेमिन के बेटे का जी उठना, ज़हरीली हाँडी का शुद्ध होना, सौ लोगों का खाना, नामान की चंगाई, कुल्हाड़ी का फल तैरना, अरामी सेना का अंधा होना, सामरिया के अकाल का टूटना और अंत में कब्र की घटना। गिनती का सही तरीका कहानियों को जोड़ना नहीं, उनका एक सुर पहचानना है: परमेश्वर जीवन देते हैं।
अंत में
एलीशा की कहानी को चमत्कारों की सूची बनाकर पढ़ना आसान है, और उसी में उसका दिल खो जाता है। जिस चद्दर को उसने यरदन के किनारे उठाया था, वह जादू का कपड़ा नहीं थी; वह एक पुत्र की विरासत थी, और उस विरासत का फल यह निकला कि परमेश्वर की सामर्थ्य आम लोगों की सबसे आम ज़रूरतों में उतर आई। कर्ज़, भूख, बीमारी, डर, उधार की कुल्हाड़ी और दुश्मन की चमड़ी। अनुग्रह बड़े मंचों से नहीं, खाली घड़ों से शुरू होता है।
आगे पढ़ने के लिए 2 राजा 2 से 13 तक एक ही बैठक में पढ़िए, और हर कहानी पर यह सवाल लिखिए: यहाँ परमेश्वर किसकी ज़रूरत में उतरे, और उस व्यक्ति के पास देने के लिए क्या था? फिर लूका 4:16-30 और लूका 7:11-17 पढ़िए, और देखिए कि यीशु किस तरह एलीशा की धारा को अपने ऊपर ले लेते हैं और उसे पूरा करते हैं। अंत में उस सेवक की प्रार्थना को अपनी प्रार्थना बनाइए: प्रभु, मेरी आँखें खोल दीजिए, कि मैं देख सकूँ कि मेरे चारों ओर क्या है, और यह भी कि कौन मेरे साथ है।
