लूका 7
पाठ
लूका 7 चार दृश्यों में चलता है, और हर दृश्य में कोई ऐसा व्यक्ति केंद्र में आ जाता है जिसे धार्मिक समाज हाशिये पर रखता था। पहले कफरनहूम का रोमी सूबेदार, जो यीशु को अपने घर बुलाने के योग्य भी अपने आपको नहीं समझता, पर कहता है, "वचन ही कह दे तो मेरा सेवक चंगा हो जाएगा"; फिर नाईन के फाटक पर एक विधवा, जिसका एकलौता बेटा अर्थी पर जा रहा है और जिसे यीशु जीवित लौटा देते हैं। इसके बाद बंदीगृह से यूहन्ना का संदेश आता है, "क्या आनेवाला तू ही है?", और यीशु अपने कामों की सूची को ही उत्तर बना देते हैं। अंत में शमौन फरीसी के भोजन-कक्ष में एक पापिन स्त्री अपने आँसुओं और इत्र से यीशु के पाँव धोती है, और घर के मालिक की शिष्टता उसकी श्रद्धा के सामने खोखली पड़ जाती है।
मूल बात
यह अध्याय एक ही प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अंत में भोजन करनेवालों के मुँह से फूट पड़ता है: "यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?" लूका उत्तर सीधे नहीं देते, वे दृश्य सजाते हैं। एक अन्यजाति सैनिक समझ जाता है कि यीशु का वचन उसी अधिकार से चलता है जिससे उसकी अपनी आज्ञा चलती है; एक जनाज़े का जुलूस उनके स्पर्श से रुक जाता है; और एक बदनाम स्त्री बिना कुछ माँगे वह पा लेती है जिसे मेज़ पर बैठे धर्मी लोग अपना अधिकार समझते थे। परमेश्वर का राज्य यहाँ योग्यता के क्रम को उलट देता है। ध्यान दीजिए, दृष्टान्त में महाजन दोनों देनदारों को इसलिए क्षमा करता है क्योंकि "उनके पास वापस लौटाने को कुछ न रहा", न इसलिए कि उन्होंने प्रेम किया। प्रेम क्षमा की कीमत नहीं, उसका फल है। और जो अपने आपको थोड़ा ही कर्ज़दार मानता है, वह थोड़ा ही प्रेम कर पाता है, यही शमौन की असली बीमारी है।
सूत्र
नाईन का दृश्य कोई नया चमत्कार नहीं, एक पुरानी कहानी की दोहराई गई पंक्ति है। एलिय्याह ने सारपत की विधवा के बेटे को जिलाकर "उसे उसकी माँ को सौंप दिया" (1 राजा 17), और एलीशा ने शूनेम में, नाईन से कुछ ही मील दूर, ठीक वही किया। लूका उसी वाक्य को दोहराते हैं: "उसने उसे उसकी माँ को सौंप दिया।" भीड़ की प्रतिक्रिया इसीलिए सही है, "हमारे बीच में एक बड़ा भविष्यद्वक्ता उठा है", पर अधूरी भी। क्योंकि एलिय्याह ने प्रार्थना की थी, यीशु आज्ञा देते हैं: "हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!" भविष्यद्वक्ता परमेश्वर से जीवन माँगता है; यहाँ जीवन स्वयं फाटक पर खड़ा है। यही वह सूत्र है जो पूरे शास्त्र में चलता है, विधवा, अनाथ, परदेशी पर झुकनेवाला परमेश्वर, और अब वह झुकना देह पहनकर सड़क पर चल रहा है।
दर्पण
शमौन ने कुछ गलत नहीं किया। उसने यीशु को बुलाया, खाना खिलाया, आदर से "हे गुरु" कहा। उसकी कमी यह नहीं कि उसने पाप किया, बल्कि यह कि उसे अपना कर्ज़ छोटा लगता है। यह हम में से बहुतों की बीमारी है: हमने कभी घर नहीं तोड़ा, पैसा नहीं चुराया, नाम खराब नहीं किया, इसलिए क्षमा हमारे लिए एक सैद्धांतिक बात बनी रहती है, और प्रेम ठंडा रह जाता है। रविवार को गाते हुए आँख गीली नहीं होती, और दिल ही दिल में हम यह हिसाब लगाते रहते हैं कि कौन इस मेज़ पर बैठने के योग्य है और कौन नहीं। पचास दीनार वाला भी दिवालिया था, बस उसे यह बात चुभती नहीं थी। आज ही एक कागज़ पर अपना वह एक पाप लिखिए जिसे आप किसी को बताना नहीं चाहेंगे, और उसके नीचे ऊँची आवाज़ में कहिए: "तेरे पाप क्षमा हुए।" फिर कागज़ फाड़ दीजिए।
संदर्भ
कफरनहूम सीमा पर बसा शहर था, जहाँ कर वसूली और सैनिक चौकी दोनों थीं। सूबेदार सौ सिपाहियों का अफसर, कब्ज़ा करनेवाली शक्ति का चेहरा, पर साथ ही ऐसा संरक्षक जिसने अपने पैसों से आराधनालय बनवाया था। इसीलिए यहूदी प्राचीन उसके दलाल बनकर आते हैं; यह उस समाज का सामान्य लेन-देन था, कृपा के बदले कृपा। नाईन में तस्वीर उलटी है: विधवा और इकलौते बेटे की मृत्यु का अर्थ केवल शोक नहीं, आर्थिक मृत्यु है, कोई कमानेवाला नहीं, कोई कानूनी आवाज़ नहीं। यूहन्ना उस समय हेरोदेस की कैद में है, और उसका प्रश्न बेकार की शंका नहीं, जेल की सलाखों से पूछा गया प्रश्न है। और शमौन का भोजन खुले आँगन में होता था, जहाँ बाहरी लोग दीवार से लगकर खड़े रह सकते थे। स्त्री का वहाँ पहुँचना अजीब नहीं था; उसका बाल खोलना और छूना ही घोटाला था।
अंतर्पाठ
लूका 4 में यीशु नासरत के आराधनालय में दो उदाहरण देते हैं, सारपत की विधवा और सीरियाई नामान, और भीड़ उन्हें पहाड़ से गिराने को उठ खड़ी होती है, क्योंकि परमेश्वर की कृपा इस्राएल की बाड़ से बाहर जाती दिखी। अध्याय 7 में वे ठीक वही दोनों काम कर दिखाते हैं: एक अन्यजाति अफसर का दास चंगा, एक विधवा का बेटा जीवित। घोषणा अब घटना बन गई है। यूहन्ना को दिया गया उत्तर यशायाह 35 और 61 की पंक्तियाँ हैं, पर एक चुभनेवाली चुप्पी के साथ: यशायाह की सूची में बंदियों की रिहाई भी थी, और यीशु उसे नहीं दोहराते, जबकि पूछनेवाला स्वयं बंदी है। इसके बाद "धन्य है वह, जो मेरे कारण ठोकर न खाए" केवल सांत्वना नहीं, एक ईमानदार चेतावनी है। और मलाकी 3:1 का उद्धरण, "मैं अपने दूत को तेरे आगे-आगे भेजता हूँ", मूल में परमेश्वर के आगे चलनेवाले दूत की बात थी; यीशु उसे अपने ऊपर लगा लेते हैं।
विवरण
एक ही शब्द अध्याय के पहले हिस्से की रीढ़ है: योग्य। प्राचीन कहते हैं, "वह इस योग्य है, कि तू उसके लिये यह करे", और तुरंत उसका बिल पेश करते हैं, जाति से प्रेम, आराधनालय का निर्माण। फिर सूबेदार स्वयं कहलवाता है, "मैं इस योग्य नहीं, कि तू मेरी छत के तले आए", और दोबारा, "मैंने अपने आपको इस योग्य भी न समझा, कि तेरे पास आऊँ।" जिस आदमी के पास योग्यता का पूरा प्रमाणपत्र था, वही उसे मेज़ पर नहीं रखता। और यीशु किसी और बात पर नहीं, इसी पर अचम्भा करते हैं। यह वही तर्क है जो अध्याय के अंत में दृष्टान्त बनकर लौटता है: जिसके पास लौटाने को कुछ नहीं रहा, वही सचमुच क्षमा पाता है। योग्यता की गिनती छोड़ना ही विश्वास की पहली सीढ़ी है।
चिंतन
आप अपने आपको पाँच सौ दीनार का देनदार मानते हैं या पचास का, और यह हिसाब आपके प्रेम की गर्मी के बारे में क्या बताता है?
यूहन्ना का प्रश्न, "क्या आनेवाला तू ही है", आपकी किस अनुत्तरित परिस्थिति में गूँजता है, और यीशु का अधूरा-सा उत्तर आपको ठोकर देता है या थामता है?
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Luke 7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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लूका 7 का क्या अर्थ है?
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Luke 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
शिमौन ने बिलकुल ठीक उत्तर दिया: "मेरी समझ में वह, जिसका उसने अधिक छोड़ दिया।" पर गौर कर, सही जवाब उसके होंठों पर था और आँसू उस स्त्री की आँखों में। क्षमा को समझना और क्षमा पाकर पिघल जाना, दो अलग बातें हैं। तेरा हिसाब कहाँ रुका है, सिर्फ़ जानने पर, या प्रेम तक पहुँचा?
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