स्तिफनुस का जीवन: कलीसिया के पहले शहीद की साहसी गवाही
परिचय
कल्पना कीजिए: यरूशलेम के बाहर की ढलान, धूल, और ज़मीन पर रखे हुए कपड़ों का एक ढेर। उन कपड़ों की रखवाली एक जवान कर रहा है जिसका नाम शाऊल है। कुछ कदम दूर एक आदमी घुटनों पर है, पत्थरों की बौछार के नीचे, और वह चिल्लाकर जो आख़िरी वाक्य कहता है वह अपने लिए नहीं, अपने हत्यारों के लिए है। उसका चेहरा, कुछ घंटे पहले अदालत में, स्वर्गदूत जैसा दिखा था।
यह आदमी कोई प्रेरित नहीं था। वह बारह में से नहीं था। उसका काम शुरू हुआ था विधवाओं को भोजन बाँटने की एक झगड़ालू शिकायत सुलझाने से। फिर भी कलीसिया के इतिहास में पहला लहू उसी का बहा।
इस पृष्ठ पर आप स्तिफनुस को शुरू से अंत तक जानेंगे: वह कहाँ से आया, उसने क्या कहा, वह क्यों मारा गया, और उसकी मौत ने सुसमाचार के लिए कौन-सा दरवाज़ा खोल दिया जो शायद और किसी तरह न खुलता।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
पूरी बाइबल में यीशु मसीह को परमेश्वर के दाहिने बैठा हुआ बताया गया है। केवल एक बार वे खड़े दिखाई देते हैं, और वह स्तिफनुस के लिए। यही इस पृष्ठ का सूत्र है। स्तिफनुस का पूरा उपदेश इसी एक सच्चाई के इर्द-गिर्द घूमता है: परमेश्वर कभी एक जगह बैठकर नहीं रह जाते। वे अब्राहम के साथ मेसोपोटामिया में चले, यूसुफ के साथ मिस्र गए, मूसा के साथ जंगल में रहे, तम्बू में बसे, मन्दिर में क़ैद नहीं हुए। स्तिफनुस को इसी "चलते हुए परमेश्वर" की गवाही देने पर मारा गया, और उसकी मृत्यु के बाद कलीसिया भी यरूशलेम से उठकर चल पड़ी। खड़े हुए मसीह, बिखरी हुई कलीसिया, खुलता हुआ संसार: यही धागा हम पकड़ेंगे।
बाइबल स्तिफनुस के बारे में क्या कहती है?
स्तिफनुस का प्रवेश किसी चमत्कार से नहीं, एक शिकायत से होता है। प्रेरितों के काम 6 के शुरू में कलीसिया बढ़ रही है, और बढ़ोतरी अपने साथ तनाव लाती है: यूनानी भाषा बोलनेवाले यहूदी विश्वासियों को लगता है कि रोज़ाना के भोजन-वितरण में उनकी विधवाओं की उपेक्षा हो रही है। प्रेरित प्रार्थना और वचन की सेवा छोड़ना नहीं चाहते, इसलिए वे कलीसिया से कहते हैं कि सात ऐसे पुरुष चुने जाएँ जो "पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण" हों। और फिर वह पद आता है जिससे स्तिफनुस का नाम बाइबल में पहली बार सुनाई देता है।
प्रेरितों के काम 6:5 कहता है: "यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी, और उन्होंने स्तिफनुस नाम एक पुरुष को जो विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था, और फिलेप्पुस और प्रखुरुस और नीकानोर और तीमोन और परमिनास और अन्ताकी के नवयहूदी नीकुलाउस को चुन लिया।" ध्यान दीजिए, सातों के नाम यूनानी हैं। जिस समुदाय ने शिकायत की थी, उसी में से सेवक चुने गए। और स्तिफनुस के बारे में लूका एक अतिरिक्त बात जोड़ता है जो बाक़ी छह के लिए नहीं लिखी गई: वह विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था। यह उसका पद नहीं, उसका स्वभाव है।
अगला ही वाक्य हमें चौंकाता है। जिस आदमी को मेज़ों की सेवा के लिए चुना गया था, वह परमेश्वर की सामर्थ्य का माध्यम बन जाता है। प्रेरितों के काम 6:8 कहता है: "और स्तिफनुस अनुग्रह और सामर्थ्य से परिपूर्ण होकर लोगों में बड़े-बड़े अद्भुत काम और चिन्ह दिखाया करता था।" यहाँ "अनुग्रह" शब्द महत्वपूर्ण है। स्तिफनुस की सामर्थ्य उसकी योग्यता से नहीं आई, उस अनुग्रह से आई जो उसे दिया गया था। जो आदमी भोजन बाँटता था, वही अब परमेश्वर का काम बाँट रहा है।
विरोध जल्दी आता है। यरूशलेम के यूनानी-भाषी आराधनालयों के लोग उससे बहस करते हैं, पर हार जाते हैं, क्योंकि "उस ज्ञान और उस आत्मा जिससे वह बातें करता था, उनसे वे सामना न कर सके" (प्रेरितों के काम 6:10)। जब तर्क हार जाता है तो झूठे गवाह बुलाए जाते हैं। आरोप: वह मूसा की व्यवस्था और इस पवित्र स्थान के विरुद्ध बोलता है। महासभा के सामने खड़े उस आदमी के बारे में लूका लिखता है कि सबने "उसका मुख स्वर्गदूत के समान देखा" (प्रेरितों के काम 6:15)।
इसके बाद आता है प्रेरितों के काम 7, नए नियम का सबसे लम्बा उपदेश। स्तिफनुस अपना बचाव नहीं करता; वह इस्राएल का इतिहास सुनाता है, और उस इतिहास में बार-बार दिखाता है कि परमेश्वर ने अपने लोगों से मन्दिर के भीतर नहीं, बाहर मुलाकात की। अब्राहम से मेसोपोटामिया में, यूसुफ से मिस्र में, मूसा से मिद्यान की जलती झाड़ी में। और फिर वह निशाना साधता है: "परन्तु परमप्रधान हाथ के बनाए घरों में नहीं रहता" (प्रेरितों के काम 7:48)।
अंत तीखा है। प्रेरितों के काम 7:51 में वह कहता है: "हे हठीले, और मन और कान के खतनारहित लोगों, तुम सदा पवित्र आत्मा का विरोध करते हो; जैसा तुम्हारे बापदादे करते थे, वैसे ही तुम भी करते हो।" यह कोई अपमान नहीं, भविष्यद्वक्ताओं की भाषा है; मूसा ने स्वयं यही शब्द इस्राएल पर लगाए थे। आरोप यह है कि जो मूसा के नाम पर उसका न्याय कर रहे हैं, वे ही मूसा की बात नहीं मानते।
भीड़ दाँत पीसने लगती है, और तभी स्वर्ग खुल जाता है। प्रेरितों के काम 7:55 लिखता है: "परन्तु उसने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखा।" नीचे अदालत उसे दोषी ठहरा रही है; ऊपर उसका प्रभु उसके लिए खड़े हैं।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
स्तिफनुस का उपदेश खुद इस बात का सबसे अच्छा उत्तर है कि वह पुराने नियम को कैसे पढ़ता था। उसने इतिहास को इस तरह सुनाया कि एक ही बात बार-बार लौटती है: परमेश्वर अपने लोगों के पीछे-पीछे चलते हैं, और उनके लोग बार-बार उन्हें ठुकराते हैं।
अब्राहम को बुलावा तब मिला जब वह अभी कनान में नहीं पहुँचा था, और उसे वह देश जीते जी नहीं मिला; वह जीवन भर तम्बू में रहा। यूसुफ को उसके अपने भाइयों ने बेच दिया, और परमेश्वर उसके साथ मिस्र तक गए। मूसा को पहली बार इस्राएलियों ने ठुकराया और कहा, किसने तुझे हम पर हाकिम ठहराया? चालीस साल बाद वही ठुकराया हुआ आदमी छुड़ानेवाला बनकर लौटा। जंगल में परमेश्वर ने तम्बू में वास किया, एक ऐसा घर जिसे उठाकर आगे ले जाया जा सकता था। जब सुलैमान ने मन्दिर बनाया, तब भी भविष्यद्वक्ता ने याद दिलाया कि स्वर्ग उनका सिंहासन है और पृथ्वी उनके पाँवों की चौकी।
यह कोई मन्दिर-विरोधी भाषण नहीं था। यह उस प्रवृत्ति पर चोट थी जो परमेश्वर को पत्थरों में बाँधकर निश्चिन्त हो जाना चाहती है। परमेश्वर को हमारे पते की ज़रूरत नहीं, हमें उनकी ज़रूरत है।
और यह सारा सूत्र मसीह में पूरा होता है। यीशु ने स्वयं कहा था कि इस मन्दिर को ढा दो, और मैं तीन दिन में इसे खड़ा कर दूँगा, और यूहन्ना बताता है कि वे अपनी देह के मन्दिर की बात कर रहे थे। जो परमेश्वर तम्बू में चले, वे देह लेकर हमारे बीच डेरा डालने आए। ठुकराया गया यूसुफ, ठुकराया गया मूसा, ठुकराए गए भविष्यद्वक्ता: ये सब उस एक की ओर इशारा करते थे जिसे अपने ही लोगों ने नगर के बाहर निकालकर मार डाला। स्तिफनुस ने यही कहा, और इसी बात पर उसे भी नगर के बाहर निकालकर मार डाला गया।
फिर पुराने और नए नियम के बीच एक और पुल दिखता है, जो दिल को छू जाता है। क्रूस पर यीशु ने कहा था, हे पिता, इन्हें क्षमा कर, और, हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ। स्तिफनुस मरते समय लगभग वही दो वाक्य बोलता है, सिर्फ़ पते का अन्तर है: "हे प्रभु यीशु, मेरी आत्मा को ग्रहण कर" (प्रेरितों के काम 7:59)। जिस यीशु को उसने स्वर्ग में खड़ा देखा, उन्हीं को उसने वह प्रार्थना सौंपी जो यीशु ने पिता से की थी। यह नए नियम की सबसे स्पष्ट झलकियों में से एक है कि आरंभिक कलीसिया यीशु मसीह को परमेश्वर मानकर उनकी आराधना करती थी।
उसके जीवन का सार
पहला निर्णायक क्षण उसका चुनाव है। स्तिफनुस किसी आत्मिक मंच पर नहीं, एक प्रशासनिक झगड़े के बीच सामने आता है। कलीसिया में भाषा और संस्कृति की दरार पड़ गई थी, और विधवाओं का भोजन उस दरार का पहला शिकार था। कलीसिया ने इस समस्या को दबाया नहीं; उसने ऐसे लोग चुने जिन पर भरोसा किया जा सकता था। स्तिफनुस उस दिन "नेता" नहीं बना, वह "सेवक" बना। बाइबल उसे पहले विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण कहती है, फिर उसके चमत्कारों का ज़िक्र करती है। क्रम पलटिए मत। परमेश्वर ने पहले उसके भीतर काम किया, फिर उसके द्वारा। और यह भी ध्यान देने योग्य है कि मेज़ों की सेवा से शुरू हुआ आदमी बाद में धर्मशास्त्र का सबसे गहरा उपदेश देता है। आत्मिक काम और व्यावहारिक काम के बीच की दीवार हमने खड़ी की है, परमेश्वर ने नहीं।
दूसरा निर्णायक क्षण महासभा के सामने उसका उपदेश है। यहाँ ईमानदारी ज़रूरी है। स्तिफनुस ने अपनी जान बचाने की कोशिश नहीं की, और उसके शब्द तीखे थे। कुछ पाठक सोचते हैं कि अगर वह थोड़ा नरम बोलता तो शायद बच जाता। शायद। पर उसका तीखापन गुस्से से नहीं, भविष्यद्वाणी की परम्परा से आया था; वह वही कह रहा था जो यशायाह और यिर्मयाह कह चुके थे। फिर भी यह याद रखना ज़रूरी है कि हम अपनी कठोरता, अपने तानों और अपनी ऑनलाइन लड़ाइयों को स्तिफनुस के नाम से पवित्र नहीं कर सकते। उसका चेहरा स्वर्गदूत जैसा था और उसकी अन्तिम प्रार्थना क्षमा की थी; जिनके भीतर वह प्रेम नहीं, उनके मुँह में प्रेरितों के काम 7:51 की भाषा अच्छी नहीं लगती।
तीसरा निर्णायक क्षण उसकी मृत्यु है। नगर के बाहर, बिना रोमी अनुमति के, एक भीड़ के गुस्से में। और उस भीड़ के कपड़ों की रखवाली एक जवान कर रहा था जिसका नाम शाऊल था। प्रेरितों के काम 7:60 लिखता है: "फिर घुटने टेककर ऊँचे शब्द से पुकारा, 'हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा।' और यह कहकर सो गया।" ध्यान दीजिए, लूका "मर गया" नहीं लिखता, "सो गया" लिखता है। जिस आदमी ने खड़े हुए मसीह को देख लिया, उसके लिए मृत्यु नींद बन गई। और उसकी क्षमा की वह प्रार्थना अनसुनी नहीं रही; दमिश्क की सड़क पर उसका उत्तर मिला।
स्तिफनुस से हम क्या सीखते हैं
पहली सीख यह है कि छोटी सेवा और बड़ी गवाही एक ही पेड़ की दो शाखाएँ हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि परमेश्वर का "असली" काम मंच पर होता है और बाक़ी सब भरती है। स्तिफनुस का जीवन इस सोच को तोड़ देता है। जिस व्यक्ति ने भोजन की सूची सँभाली, उसी ने इतिहास का सबसे साहसी उपदेश दिया। अगर आप आज रसोई में, दफ़्तर के हिसाब में, किसी बुज़ुर्ग की दवा में या बच्चों की कक्षा में परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं, तो आप "छोटे" काम में नहीं हैं। आप उसी जगह हैं जहाँ परमेश्वर चरित्र गढ़ते हैं।
दूसरी सीख उस दृष्टि से जुड़ी है जो उसे अन्त में मिली। जब चारों ओर से पत्थर आ रहे थे, तब स्तिफनुस ने ऊपर देखा। उसकी हिम्मत उसके स्वभाव से नहीं, उसकी दृष्टि से आई। यीशु मसीह उसके लिए खड़े थे, जैसे कोई गवाह अपने साथी के पक्ष में खड़ा होता है, जैसे कोई मेज़बान अपने मेहमान का स्वागत करने उठ खड़ा होता है। जब आप अकेले खड़े होते हैं, तब स्वर्ग में कोई है जो आपके लिए खड़ा है। नीचे की अदालत आख़िरी अदालत नहीं है।
तीसरी सीख क्षमा की है, और यह सबसे कठिन है। स्तिफनुस ने अपने हत्यारों के लिए प्रार्थना की, और परमेश्वर ने वह प्रार्थना उस आदमी पर लागू की जो उस दिन कपड़ों की रखवाली कर रहा था। पौलुस ने बाद में स्वयं स्वीकार किया कि वह वहाँ खड़ा था और उस हत्या में सहमत था। सोचिए: जिस आदमी ने दुनिया भर में सुसमाचार पहुँचाया, उसके जीवन की जड़ में किसी की मरते समय की माफ़ी है। आप जिस व्यक्ति को आज माफ़ करने से इंकार कर रहे हैं, हो सकता है परमेश्वर उसी के द्वारा कल कुछ बड़ा करना चाहते हों। क्षमा कमज़ोरी नहीं, बीज बोना है।
दर्पण
अब सीधे आपसे। स्तिफनुस की कहानी हमें इसलिए असहज करती है क्योंकि हम में से ज़्यादातर लोग मरने से नहीं, असुविधा से डरते हैं। दफ़्तर में जब मज़ाक में आपके विश्वास पर टिप्पणी होती है, तो क्या आप मुस्कुराकर विषय बदल देते हैं? रिश्तेदारों के बीच जब आपसे पूछा जाता है कि आप इतने "अलग" क्यों हो गए हैं, तो क्या आपकी आवाज़ धीमी पड़ जाती है? स्तिफनुस ने जान दी; हम कभी-कभी सिर्फ़ अपनी छवि बचाने के लिए चुप रह जाते हैं।
दूसरी जगह यह कहानी चुभती है: आपका मन्दिर कौन-सा है? यानी वह चीज़ जिसमें आपने परमेश्वर को बाँध दिया है और जिसके कारण आप आगे नहीं बढ़ते। किसी के लिए वह एक इमारत है, किसी के लिए एक परम्परा, किसी के लिए वह सुरक्षित नौकरी, वह बचत खाता, वह शहर जहाँ से हिलना नामंज़ूर है। परमेश्वर तम्बू में रहने वाले परमेश्वर हैं। अगर वे आपसे कहें कि उठो, चलो, तो क्या आपके पैर हिलेंगे या आपका सामान आपको रोक लेगा?
और तीसरी जगह, सबसे कोमल जगह: क्षमा। शायद कोई नाम है जिसे सुनते ही आपका पेट कस जाता है। एक भाई जिसने ज़मीन हड़प ली। एक साथी जिसने झूठ बोलकर आपकी पदोन्नति छीन ली। एक माता-पिता जिनके शब्द बीस साल बाद भी आपके भीतर गूँजते हैं। स्तिफनुस के घुटने ज़मीन पर थे और पत्थर उसकी हड्डियाँ तोड़ रहे थे, और उसने कहा, यह पाप उन पर मत लगा। वह आपसे यह नहीं कह रहा कि दर्द नकली है। वह दिखा रहा है कि जिसने स्वर्ग में खुला दरवाज़ा देख लिया, वह ज़मीन पर मुट्ठी नहीं भींचता। आप किस चीज़ को इतनी मज़बूती से पकड़े हैं कि आपके हाथ प्रार्थना के लिए नहीं खुल पाते?
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को स्तिफनुस की कहानी सुनाना आसान है, बशर्ते हम सही जगह से शुरू करें। शुरुआत खून से नहीं, भोजन से कीजिए। बताइए कि शुरुआती कलीसिया में बहुत सारे लोग एक-दूसरे का ख़याल रखते थे, और कुछ विधवाओं को खाना ठीक से नहीं मिल रहा था, इसलिए सात भरोसेमंद लोग चुने गए। उनमें से एक का नाम स्तिफनुस था, और वह परमेश्वर से इतना प्रेम करता था कि उसका चेहरा चमक उठता था।
फिर बताइए कि उसने लोगों को यीशु मसीह के बारे में सच बताया, और कुछ लोग इतने गुस्सा हुए कि उन्होंने उसे मार डाला। छोटे बच्चों के लिए यह डरावना हो सकता है, इसलिए कहानी को वहीं ख़त्म मत कीजिए। जोड़िए कि मरते समय स्तिफनुस ने ऊपर देखा और यीशु मसीह को खड़े हुए देखा, मानो वे कह रहे हों, मैं तुम्हारा स्वागत करने के लिए उठ खड़ा हुआ हूँ। और यह भी कि उसने परमेश्वर से कहा कि इन लोगों को माफ़ कर दीजिए, और परमेश्वर ने उनमें से एक को बाद में अपना सबसे बड़ा प्रचारक बना दिया।
बच्चों से पूछिए: तुम्हें किसी को माफ़ करना कब सबसे मुश्किल लगता है?
अलग-अलग उम्र के लिए अलग तरीका चाहिए। हमारे पास तीन से छह साल के छोटे बच्चों के लिए, सात से बारह साल के स्कूली बच्चों के लिए, और बारह साल से ऊपर के किशोरों के लिए स्तिफनुस की कहानी की अलग-अलग व्याख्याएँ उपलब्ध हैं, जिनमें भाषा, गहराई और प्रश्न उनकी उम्र के अनुसार तैयार किए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स्तिफनुस कौन था?
स्तिफनुस यरूशलेम की आरंभिक कलीसिया का एक यूनानी भाषा बोलने वाला यहूदी विश्वासी था, जिसे प्रेरितों के काम 6 में उन सात पुरुषों में चुना गया जो विधवाओं के रोज़ाना भोजन-वितरण की देखरेख करते थे। बाइबल उसे विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण बताती है, और कहती है कि वह अनुग्रह और सामर्थ्य से भरकर बड़े चिन्ह दिखाता था। महासभा के सामने उसने इस्राएल के इतिहास पर एक लम्बा उपदेश दिया और यीशु मसीह को अस्वीकार करने के लिए अगुवों को दोषी ठहराया। इसी कारण उसे नगर के बाहर पथराव करके मार डाला गया, और वह मसीही कलीसिया का पहला शहीद बना।
स्तिफनुस नाम का अर्थ क्या है?
स्तिफनुस यूनानी नाम "स्तेफ़ानोस" का हिन्दी रूप है, जिसका अर्थ है मुकुट या विजय का सेहरा, वह माला जो खेलों में जीतने वाले को पहनाई जाती थी। यह नाम उसके माता-पिता ने उसके जन्म पर रखा था, पर उसकी कहानी जानने के बाद यह लगभग भविष्यद्वाणी जैसा लगता है, क्योंकि नया नियम विश्वासयोग्य बने रहने वालों से "जीवन का मुकुट" पाने का वादा करता है। उसका यूनानी नाम यह भी बताता है कि वह यहूदी समाज के उस हिस्से से था जो यूनानी भाषा और संस्कृति में पला-बढ़ा था।
स्तिफनुस की मृत्यु कैसे हुई?
उसे पथराव करके मारा गया, यानी भीड़ ने उस पर पत्थर बरसाए जब तक उसकी मृत्यु नहीं हो गई। यह यहूदी व्यवस्था में ईश्वर-निन्दा की सज़ा थी, पर यहाँ पूरी प्रक्रिया मुक़दमे से ज़्यादा भीड़ के गुस्से जैसी लगती है। गवाहों ने अपने ऊपरी कपड़े उतारकर शाऊल नामक एक जवान के पाँवों के पास रख दिए, और पथराव शुरू हुआ। स्तिफनुस मरते समय दो प्रार्थनाएँ करता है, एक अपनी आत्मा के लिए और एक अपने हत्यारों की क्षमा के लिए। प्रेरितों के काम 7:60 उसकी मृत्यु को "सो गया" कहकर बयान करता है।
स्तिफनुस को पहला शहीद क्यों कहा जाता है?
क्योंकि नए नियम में वह पहला व्यक्ति है जिसे स्पष्ट रूप से यीशु मसीह की गवाही देने के कारण मार डाला गया। "शहीद" के लिए जो यूनानी शब्द है, उसका मूल अर्थ "गवाह" है, और यही शब्द पौलुस स्तिफनुस के लिए इस्तेमाल करता है जब वह कहता है कि तेरे गवाह स्तिफनुस का लहू बहाया जा रहा था। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की हत्या मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान से पहले हुई थी, इसलिए कलीसिया की गवाही के इतिहास में स्तिफनुस का नाम पहले आता है।
क्या स्तिफनुस एक प्रेरित था?
नहीं, वह बारह प्रेरितों में से नहीं था, और नया नियम उसे कभी प्रेरित नहीं कहता। उसे मूल रूप से एक सेवक के रूप में चुना गया था, जिसे परम्परागत रूप से "डीकन" या सेवक-पद का आरंभ माना जाता है, हालाँकि प्रेरितों के काम 6 में यह उपाधि नहीं दी गई। फिर भी परमेश्वर ने उसके द्वारा चिन्ह और अद्भुत काम किए और उसे असाधारण प्रचार की सामर्थ्य दी। यह अपने आप में एक उपदेश है: परमेश्वर के काम के लिए पद नहीं, आत्मा की परिपूर्णता चाहिए।
स्तिफनुस का भाषण इतना लंबा क्यों है?
प्रेरितों के काम 7 नए नियम का सबसे लम्बा उपदेश है, और लूका ने उसे पूरा दर्ज किया क्योंकि वह पूरी पुस्तक की दिशा समझाता है। स्तिफनुस अपना बचाव नहीं कर रहा था; वह दिखा रहा था कि परमेश्वर ने हमेशा अपने लोगों से मन्दिर के बाहर, चलते-फिरते मुलाक़ात की, और इस्राएल ने हमेशा अपने छुड़ानेवालों को ठुकराया। यह तर्क सुसमाचार के यरूशलेम से निकलकर सामरिया और अन्यजातियों तक जाने की नींव रखता है। इसलिए यह भाषण सिर्फ़ एक मुक़दमे का बयान नहीं, प्रेरितों के काम का धार्मिक नक़्शा है।
यीशु मसीह स्तिफनुस के लिए खड़े क्यों थे?
नए नियम में बाक़ी जगहों पर यीशु मसीह को परमेश्वर के दाहिने बैठा हुआ बताया गया है, जो उनके पूरे हुए काम और राजसी अधिकार का चिह्न है। प्रेरितों के काम 7:55 में वे खड़े दिखाई देते हैं, और यही इस दृश्य को इतना मार्मिक बनाता है। कुछ इसे ऐसे समझते हैं कि नीचे की अदालत में जब स्तिफनुस के पक्ष में कोई गवाह नहीं था, तब स्वर्ग में उसका वकील उठ खड़ा हुआ। दूसरे इसे स्वागत का संकेत मानते हैं, जैसे मेज़बान अपने प्रिय जन के आने पर उठ खड़ा होता है। दोनों अर्थ एक ही सच्चाई कहते हैं: वह अकेला नहीं मरा।
शाऊल यानी पौलुस का स्तिफनुस की मृत्यु से क्या संबंध है?
प्रेरितों के काम 7:58 बताता है कि गवाहों ने अपने कपड़े शाऊल नामक एक जवान के पाँवों के पास रखे, और प्रेरितों के काम 8:1 साफ़ कहता है कि शाऊल उसके वध में सहमत था। बाद में पौलुस ने स्वयं अपनी गवाही में इसे स्वीकार किया और कहा कि वह वहाँ खड़ा था और हत्यारों के कपड़ों की रखवाली करता था। यह स्मृति उसे जीवन भर नहीं छोड़ी, और शायद इसीलिए वह अपने को पापियों में सबसे बड़ा कहता है। स्तिफनुस की क्षमा की प्रार्थना का उत्तर दमिश्क की सड़क पर मिला।
क्या स्तिफनुस की मृत्यु कानूनी थी?
इतिहासकार आम तौर पर मानते हैं कि उस समय यहूदी महासभा को रोमी शासन के अधीन मृत्युदण्ड देने का अधिकार नहीं था, जैसा यीशु मसीह के मुक़दमे से भी दिखता है। प्रेरितों के काम 7 का वर्णन भी एक व्यवस्थित फ़ैसले से ज़्यादा भीड़ के फूट पड़ने जैसा लगता है: लोग दाँत पीसते हैं, कान बन्द कर लेते हैं, एक स्वर से चिल्लाकर उस पर झपटते हैं और उसे घसीटकर नगर के बाहर ले जाते हैं। चाहे यह औपचारिक सज़ा थी या भीड़ का न्याय, नतीजा वही रहा, और कलीसिया पर खुला उपद्रव शुरू हो गया।
स्तिफनुस पर किस बात का आरोप लगाया गया था?
झूठे गवाहों ने कहा कि वह मूसा की व्यवस्था और "इस पवित्र स्थान" यानी मन्दिर के विरुद्ध बोलता है, और यह भी कि उसने कहा कि यीशु नासरी इस जगह को नष्ट कर देगा और मूसा की दी हुई रीतियाँ बदल डालेगा। यह आरोप पूरी तरह झूठ नहीं था, पर उसे विकृत करके पेश किया गया था। स्तिफनुस मन्दिर से नफ़रत नहीं करता था; वह यह कह रहा था कि परमप्रधान हाथ के बनाए घरों में क़ैद नहीं रहते, और यही बात उसके आरोप लगाने वालों को सबसे ज़्यादा चुभी।
स्तिफनुस की मृत्यु से कलीसिया में क्या बदला?
उसकी मृत्यु ने यरूशलेम में बड़ा उत्पीड़न शुरू कर दिया, और विश्वासी बिखरकर यहूदिया और सामरिया में फैल गए। प्रेरितों के काम 11:19 इस कड़ी को और आगे ले जाता है और बताता है कि उस क्लेश से बिखरे हुए लोग फीनीके, साइप्रस और अन्ताकिया तक पहुँचे। वहीं अन्ताकिया में पहली बार अन्यजातियों को भी सुसमाचार सुनाया गया, और वहीं चेले पहली बार "मसीही" कहलाए। जिस पथराव ने एक मुँह बन्द करना चाहा, उसने सैकड़ों मुँह खोल दिए।
स्तिफनुस की कहानी बाइबल में कहाँ मिलती है?
उसका पूरा वर्णन प्रेरितों के काम 6:1 से 8:3 तक फैला हुआ है। अध्याय 6 में उसका चुनाव, सेवा, सामर्थ्य और गिरफ़्तारी है; अध्याय 7 पूरा उसका उपदेश और मृत्यु है; अध्याय 8 की शुरुआत में उसके दफ़न और उससे शुरू हुए उत्पीड़न का ज़िक्र है। इसके अलावा प्रेरितों के काम 11:19 और प्रेरितों के काम 22:20 में उसका नाम फिर आता है, जहाँ पौलुस स्वयं उसे परमेश्वर का गवाह कहता है। बाइबल में और कहीं उसका उल्लेख नहीं मिलता, पर इतने कम पन्नों में बहुत कुछ कहा गया है।
अंत में
स्तिफनुस की कहानी का केन्द्र उसका साहस नहीं, उसका दर्शन है। उसने उस परमेश्वर को देखा जो बैठे नहीं रह सकते। जो अब्राहम के साथ चले, यूसुफ के साथ क़ैदख़ाने तक गए, मूसा के साथ जंगल में तम्बू में रहे, और अन्त में देह लेकर हमारे बीच डेरा डालने आए। जब दुनिया की अदालत ने उस सेवक पर फ़ैसला सुनाया, तब स्वर्ग की अदालत में मसीह खड़े हो गए। और जब पत्थरों ने उसका शरीर तोड़ दिया, तब वही परमेश्वर कलीसिया को यरूशलेम की दीवारों से बाहर निकालकर फीनीके, साइप्रस और अन्ताकिया तक ले गए।
आगे पढ़ने के लिए प्रेरितों के काम 6 और 7 को एक ही बैठक में, धीरे-धीरे पढ़िए, और हर बार जहाँ परमेश्वर किसी के साथ "चलते" हैं, वहाँ रुककर सोचिए। फिर प्रेरितों के काम 8 और 11 पढ़िए और देखिए कि एक आदमी की मृत्यु से कितने शहरों में जीवन पहुँचा। और अन्त में अपने लिए पूछिए: मैं किसे पकड़े बैठा हूँ, और क्या मैं उस परमेश्वर के पीछे चलने को तैयार हूँ जो रुकते नहीं?
