थोमा चेला कौन था: शक से लेकर 'मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर' तक
परिचय
सोचिए, आप एक कमरे के बाहर खड़े हैं। भीतर से हँसी की आवाज़ आ रही है, आँसुओं में डूबी हुई हँसी। आपके साथी, जिनके साथ आपने तीन साल सड़कों की धूल फाँकी, जिनके साथ आपने रोटी तोड़ी, वे कह रहे हैं कि जो मर गया था वह जीवित है। और आप? आप बाहर थे। आपने कुछ नहीं देखा। आपकी आँखों में अब भी वही अंतिम दृश्य अटका है: कीलें, लहू, एक लाश, और एक कब्र जिस पर पत्थर लुढ़का दिया गया था।
यही थोमा की जगह थी। बाइबल में जिस चेले को हम सबसे जल्दी "शक्की" कहकर किनारे कर देते हैं, वही चेला सबसे पहले यह कहता है कि चलो, प्रभु के साथ मरने चलें। इस पृष्ठ पर आप थोमा के पूरे जीवन को क्रम से देखेंगे: उसका नाम, उसका बुलावा, उसके तीन साहसी और तीन टूटे हुए पल, उसका वह विश्वासवाक्य जो पूरे यूहन्ना के सुसमाचार का शिखर है, और भारत से जुड़ी उस परंपरा का ईमानदार मूल्यांकन जो हमारे देश में सदियों से चली आ रही है।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
यहाँ थोमा को "शक्की थोमा" के ठप्पे से नहीं देखा जाएगा, बल्कि एक ऐसे प्रेमी शिष्य के रूप में जिसका दिल टूट चुका था। उसका संकट बुद्धि का नहीं, शोक का था, और वह ठीक उस समय डगमगाया जब वह विश्वासियों की संगति से अलग था। उसका विश्वास तर्कों से नहीं, बल्कि जी उठे मसीह के घावों से लौटा। इसलिए हम इन तीन धागों को बार-बार पकड़ेंगे: शोक से पैदा हुआ शक, संगति से अलग होने का खतरा, और घावों के द्वारा मिलने वाली चंगाई। यह दृष्टिकोण मायने रखता है, क्योंकि आज कलीसिया में भी सबसे ज़्यादा डगमगाते वही लोग हैं जो सबसे गहरा प्रेम करते हैं।
बाइबल थोमा चेले के बारे में क्या कहती है?
थोमा का नाम बाइबल में आठ बार आता है, और हर बार वह बारह चेलों की सूची या किसी निर्णायक घटना में दिखता है। पहला उल्लेख चेलों के बुलावे की सूची में है: "फिलिप्पुस और बरतुलमै, थोमा और चुंगी लेनेवाला मत्ती, हलफई का पुत्र याकूब और तद्दै," (मत्ती 10:3)। इस एक पंक्ति में बहुत कुछ छिपा है। थोमा किसी धार्मिक घराने का प्रतिष्ठित व्यक्ति नहीं था; उसका नाम एक चुंगी लेनेवाले और एक अनजान तद्दै के बीच दबा हुआ है। वह उन बारह में था जिन्हें प्रभु यीशु ने अधिकार देकर भेजा, और यही उसकी पहचान का आधार है। थोमा चेला इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने शक किया, बल्कि इसलिए कि मसीह ने उसे चुना।
मरकुस 3:18 और लूका 6:15 में भी उसका नाम उसी समूह में आता है। यूहन्ना का सुसमाचार उसे एक और नाम देता है: दिदुमुस, जिसका अर्थ है जुड़वाँ। किसका जुड़वाँ, यह बाइबल नहीं बताती। मूल अरामी में "तोमा" शब्द का अर्थ भी जुड़वाँ ही है, इसलिए संभव है कि यह उसका उपनाम ही बन गया हो। कलीसिया के इतिहास में कुछ लोगों ने ठिठोली में कहा कि थोमा हम सबका जुड़वाँ भाई है, क्योंकि उसके भीतर जो संघर्ष चल रहा था वह हमारे भीतर भी चलता है।
थोमा का पहला दर्ज किया गया वाक्य कोई शिकायत नहीं, एक ललकार है। लाज़र की मृत्यु के बाद जब प्रभु यीशु ने यहूदिया लौटने की बात कही, जहाँ पत्थर उठाए जा चुके थे और जान का खतरा था, तब चेले हिचकिचाए। उसी घड़ी में थोमा बोला: "तब थोमा ने जो दिदुमुस कहलाता है, अपने साथ के चेलों से कहा, 'आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।'" (यूहन्ना 11:16)। गौर कीजिए, यह आदमी भागने की बात नहीं कर रहा। उसे यह भरोसा नहीं है कि सब ठीक होगा, फिर भी वह साथ चलने को तैयार है। यह अंधा आशावाद नहीं, आँखें खोलकर किया गया समर्पण है। जो व्यक्ति मरने के लिए तैयार था, उसे हम आसानी से कायर नहीं कह सकते।
दूसरा वाक्य ऊपरी कमरे में निकलता है, प्रभु के दुख भोगने से कुछ घंटे पहले। यीशु ने कहा कि वे पिता के घर जा रहे हैं और चेले मार्ग जानते हैं। थोमा चुप नहीं रहा: "थोमा ने उससे कहा, 'हे प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहाँ जाता है तो मार्ग कैसे जानें?'" (यूहन्ना 14:5)। यह ईमानदारी की आवाज़ है। बाकी चेले सिर हिला रहे थे जैसे उन्हें सब समझ आ गया हो; थोमा ने मान लिया कि उसे समझ नहीं आया। और उसकी इस कच्ची, अनगढ़ उलझन के जवाब में बाइबल का सबसे महान वचन निकला: "यीशु ने उससे कहा, 'मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।'" (यूहन्ना 14:6)। यदि थोमा ने अपना प्रश्न दबा लिया होता, तो कलीसिया इस उत्तर से वंचित रह जाती।
तीसरा और सबसे प्रसिद्ध दृश्य पुनरुत्थान के बाद का है। यूहन्ना साफ लिखता है कि जब जी उठे प्रभु पहली बार चेलों के बीच आए, थोमा वहाँ नहीं था (यूहन्ना 20:24)। उसकी अनुपस्थिति ही उसके शक की जड़ बनी। लौटने पर उसने जो कहा, वह कठोर लगता है: "तब और चेलों ने उससे कहा, 'हमने प्रभु को देखा है।' परन्तु उसने उनसे कहा, 'जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के छेद न देख लूँ और कीलों के छेदों में अपनी उँगली न डाल लूँ, और उसके पंजर में अपना हाथ न डाल लूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।'" (यूहन्ना 20:25)। यह केवल सबूत की माँग नहीं है, यह एक घायल आदमी की चीख है जो दोबारा धोखा नहीं खाना चाहता।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
थोमा अचानक आकाश से नहीं टपका। पवित्रशास्त्र उन लोगों से भरा है जिन्होंने परमेश्वर से सवाल किए और फिर भी उनकी गोद में बने रहे। अब्राहम ने वादा सुनकर मुँह के बल गिरकर हँस दिया। सारा ने तंबू के भीतर से हँसी उड़ाई, और परमेश्वर ने फिर भी इसहाक दिया। मूसा ने जलती झाड़ी के सामने बार-बार बहाने बनाए। गिदोन ने ऊन का टुकड़ा रखकर दो बार चिन्ह माँगा, और परमेश्वर ने उसकी कमज़ोरी पर क्रोध नहीं किया, चिन्ह दे दिया। हबक्कूक ने खुलकर पूछा कि आप कब तक सुनेंगे नहीं। भजनकार बार-बार कराहता है कि आपने मुझे क्यों छोड़ दिया।
सबसे गहरा पूर्वरूप अय्यूब है। राख में बैठा, शरीर से टूटा, दोस्तों से घिरा वह आदमी अचानक घोषणा करता है: "मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ाने वाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।" (अय्यूब 19:25)। यह वाक्य दुख की तलहटी से निकला है, आराम की कुर्सी से नहीं। अय्यूब और थोमा एक ही गोत्र के हैं: वे लोग जो परमेश्वर से झगड़ते हुए भी उन्हें छोड़कर नहीं जाते।
दूसरा सूत्र घावों का है, और यह पुराने नियम से सीधे गोलगोथा तक जाता है। यशायाह ने लिखा: "परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएँ।" (यशायाह 53:5)। भजन 22 में बेधे गए हाथ और पाँव की भविष्यवाणी है। और जब यूहन्ना क्रूस के पास खड़ा होकर भाले से बेधे गए पंजर को देखता है, तो वह लिखता है: "फिर एक और वचन पूरा हुआ, 'जिसे उन्होंने बेधा है, उस पर दृष्टि करेंगे।'" (यूहन्ना 19:37)।
यहीं सारा सूत्र एक गाँठ में बँध जाता है। थोमा ने जो माँगा था, वही परमेश्वर की योजना में सदियों पहले लिखा जा चुका था: एक छुड़ाने वाला जो घायल होगा, और जिसके घावों पर उसके लोग दृष्टि करेंगे। थोमा को लगा कि वह असंभव शर्त रख रहा है। असल में वह अनजाने में भविष्यद्वक्ताओं की भाषा बोल रहा था। जी उठे मसीह ने उसके घाव अपने घावों से भरे। उद्धार की कहानी में यह मामूली बात नहीं है: स्वर्ग में आज भी एक देह है जिस पर कीलों के निशान हैं, और वे निशान इस बात का प्रमाण हैं कि कर्ज़ चुका दिया गया।
घायल परमेश्वर ही घायल दिलों को चंगा कर सकते हैं।
उसके जीवन का सार
थोमा के जीवन के तीन मोड़ हैं, और तीनों में वही धागे दिखते हैं जिनकी बात हमने शुरू में की।
पहला मोड़ बैतनिय्याह की सड़क है। लाज़र मर चुका है, यरूशलेम में शत्रु तैयार हैं, और चेले डरे हुए हैं। उसी सन्नाटे में थोमा का यह वाक्य गूँजता है कि आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें (यूहन्ना 11:16)। यहाँ थोमा नेता है। वह समूह से अलग नहीं, समूह के आगे चल रहा है। ध्यान दीजिए कि उसकी भक्ति का केंद्र "प्रभु के साथ" रहना है, भले ही वह "साथ" मौत तक ले जाए। यह प्रेम था, लेकिन इसमें एक दरार भी थी: वह केवल मरने की कल्पना कर पा रहा था, जी उठने की नहीं। जिसने तीन साल तक चमत्कार देखे थे, वह भी पुनरुत्थान की कल्पना नहीं कर सका। हमारी श्रद्धा अक्सर इतनी ही बड़ी होती है जितनी बड़ी हमारी कल्पना।
दूसरा मोड़ ऊपरी कमरे का वह प्रश्न है (यूहन्ना 14:5)। यह थोमा का सबसे उपयोगी क्षण है। वह दिखावा नहीं करता, वह उलझन को मेज़ पर रख देता है। प्रभु उसे झिड़कते नहीं; वे उसे अपना परिचय देते हैं। इससे एक बात हमेशा के लिए साफ हो जाती है: मसीह ईमानदार प्रश्नों से नहीं घबराते, वे दिखावटी धार्मिकता से दुखी होते हैं। कलीसिया में जो लोग प्रश्न पूछने से डरते हैं, वे अक्सर अपने उत्तर से भी वंचित रह जाते हैं।
तीसरा और निर्णायक मोड़ वह आठ दिन हैं जो यूहन्ना 20:24 से 20:28 के बीच बीतते हैं। थोमा उस पहली शाम को वहाँ नहीं था। बाइबल कारण नहीं बताती, पर इतना साफ है कि वह अकेला शोक कर रहा था। और अकेला शोक शक की सबसे उपजाऊ ज़मीन है। उसने शर्तें रखीं, कीलों के छेद और पंजर का घाव। फिर आठ दिन बाद जी उठे प्रभु फिर आए, बंद दरवाज़ों के बीच से, और उन्होंने थोमा से कहा: "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी न हो, परन्तु विश्वासी हो।" (यूहन्ना 20:27)। प्रभु ने उसकी शर्तें शब्द-दर-शब्द दोहरा दीं। जिसने कोई शर्त मानने की ज़रूरत नहीं थी, उसने झुककर उसकी शर्त पूरी कर दी।
और तब वह वाक्य निकला जिसके बाद यूहन्ना का सुसमाचार अपने शिखर पर पहुँच जाता है: "थोमा ने उत्तर दिया, 'हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!'" (यूहन्ना 20:28)। जो चेला सबसे पीछे था, उसी के मुँह से यीशु की ईश्वरता की सबसे स्पष्ट घोषणा निकली। सुसमाचार की शुरुआत में लिखा था कि वचन परमेश्वर था; अंत में एक टूटा हुआ आदमी घुटनों पर यही कहता है। उसके बाद प्रभु का उत्तर आया: "यीशु ने उससे कहा, 'तू ने मुझे देखा है इसलिए विश्वास किया है; धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।'" (यूहन्ना 20:29)। यह फटकार नहीं, आशीर्वाद है, और वह आशीर्वाद हमारे लिए है, जो दो हज़ार साल बाद बिना देखे विश्वास करते हैं।
इसके बाद थोमा दो बार और दिखता है: तिबिरियास झील के किनारे मछली पकड़ते चेलों में, "शमौन पतरस और थोमा जो दिदुमुस कहलाता है" (यूहन्ना 21:2), और पिन्तेकुस्त से पहले प्रार्थना करती मंडली में, "पतरस और यूहन्ना और याकूब और अन्द्रियास, फिलिप्पुस और थोमा" (प्रेरितों के काम 1:13)। दोनों बार वह अकेला नहीं है। जो अकेलेपन में डगमगाया था, वह संगति में टिक गया।
थोमा से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ यह है कि संगति से कटना आत्मिक रूप से महंगा पड़ता है। थोमा का शक किसी किताब से नहीं, एक खाली कुर्सी से पैदा हुआ। जब बाकी लोग इकट्ठे थे, वह कहीं और था, और उसी एक शाम ने उसे आठ दिन के अंधेरे में धकेल दिया। आज भी ऐसा ही होता है। दुख, शर्म या थकान में हम सबसे पहले वही छोड़ते हैं जिसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है: भाई-बहनों की संगति, वचन सुनना, साथ प्रार्थना करना। और जब प्रभु थोमा से मिले, तो वे उसे सड़क पर अकेले नहीं मिले; वे फिर उसी कमरे में आए जहाँ चेले इकट्ठे थे। परमेश्वर आपको अकेले में भी ढूँढ़ सकते हैं, पर उन्होंने आम तौर पर अपनी देह, कलीसिया, को ही मिलने की जगह ठहराया है।
दूसरा पाठ यह है कि शक और अविश्वास एक चीज़ नहीं हैं। अविश्वास कहता है, मुझे मसीह नहीं चाहिए। शक कहता है, मुझे मसीह चाहिए, पर मैं डरता हूँ कि कहीं यह सच न हो। थोमा का सवाल दूसरी किस्म का था, इसीलिए वह उन चेलों के बीच ही खड़ा रहा जिनकी गवाही पर उसे भरोसा नहीं हो रहा था। वह गया नहीं, वह रुका रहा। उस पिता की तरह जिसने पुकारकर कहा, "मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर।" (मरकुस 9:24)। अगर आपकी प्रार्थना इन दिनों इतनी ही है, तो जान लीजिए, यह प्रार्थना बाइबल में दर्ज है और प्रभु ने इसका जवाब दिया।
तीसरा पाठ अनुग्रह का है, और यही सबसे मीठा है। थोमा ने सबूत माँगा और उसे सबूत से बढ़कर कुछ मिला: उसे छूने का न्योता मिला। प्रभु यीशु ने उसकी बेअदब शर्तों को ताना मारकर नहीं दोहराया, उन्होंने करुणा से दोहराया। और जब थोमा आगे बढ़कर उन घावों तक पहुँचा, तो उसे किसी उँगली की ज़रूरत ही नहीं पड़ी; बाइबल यह नहीं कहती कि उसने छुआ, वह कहती है कि उसने आराधना की। अनुग्रह ऐसा ही करता है। वह हमारी शर्तें नहीं तोड़ता, वह हमें उनसे बड़ा बना देता है।
अनुग्रह शर्तें तोड़ता नहीं, शर्तों से ऊपर उठा देता है।
दर्पण
अब थोड़ी देर थोमा को छोड़कर अपनी ओर देखिए। आप भी किसी बंद कमरे के बाहर खड़े हो सकते हैं। शायद आपने प्रार्थना की थी कि नौकरी बनी रहे, और छँटनी का कागज़ आ गया। शायद आपने बीमार माँ के लिए रातें जागकर मन्नतें मानीं, और फिर भी कब्र खोदनी पड़ी। शायद आपकी शादी वह नहीं बनी जो आपने चाही थी, और हर रविवार को गीत गाते हुए आपका गला रुँध जाता है, क्योंकि आपको लगता है कि आप झूठ गा रहे हैं। और अब जब दूसरे लोग गवाही देते हैं कि प्रभु जीवित हैं, उनकी खुशी आपको चुभती है।
मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि आपके सवाल पाप हैं। थोमा ने जो कहा, वह उससे भी ज़्यादा कड़ा था, और प्रभु ने उसे कलीसिया से बाहर नहीं किया। लेकिन मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ: आप कहाँ रुककर शोक कर रहे हैं? अकेले कमरे में, मोबाइल की नीली रोशनी में, या भाई-बहनों के बीच? थोमा का आठ दिन का अंधेरा उसकी कमज़ोर बुद्धि का नतीजा नहीं था, उसकी गैरहाज़िरी का नतीजा था। जब वह लौटा, तो उसे वही मिल गया जिसके लिए वह तरस रहा था।
आपकी शर्तें प्रभु से छिपी नहीं हैं। आपने भी मन में कहा होगा कि अगर यह हो जाए तो मैं मान लूँगा, अगर वह चंगा हो जाए तो मैं भरोसा करूँगा, अगर पैसा आ जाए तो मैं जान लूँगा कि परमेश्वर सुनते हैं। प्रभु यीशु इन शर्तों पर नाराज़ नहीं होते, पर वे उनसे कुछ बेहतर देते हैं। वे अपने घाव दिखाते हैं। वे कहते हैं, देख, मैंने तेरे लिए यह कीमत चुकाई है; अब तू तय कर कि क्या मेरे घाव तेरे संदेह से छोटे हैं।
अगले रविवार उस कमरे में जाइए, चाहे मन न हो। अपने प्रश्न साथ ले जाइए, छोड़कर मत जाइए। और जब कोई गीत गाया जाए जिसे आप गा नहीं पाएँ, तो चुप खड़े रहिए। चुप खड़ा थोमा भी वहीं था जब दरवाज़े बंद थे और प्रभु भीतर आ गए।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को थोमा की कहानी बहुत भाती है, क्योंकि बच्चे सवाल पूछने में शर्माते नहीं। आप उन्हें इतना बता सकते हैं: थोमा यीशु के बारह खास दोस्तों में से एक था। वह बहादुर था और उसने एक बार कहा था कि वह यीशु के साथ कहीं भी जाएगा, चाहे खतरा हो। पर जब यीशु क्रूस पर मर गए, थोमा का दिल बहुत टूट गया। जब बाकी दोस्तों ने कहा कि यीशु जी उठे हैं, थोमा ने कहा कि मैं तब तक नहीं मानूँगा जब तक उनके हाथों के निशान खुद न देख लूँ। एक हफ्ते बाद यीशु आए और थोमा से कहा, आ, मेरे हाथ देख। यीशु ने उसे डाँटा नहीं। थोमा ने घुटने टेककर कहा, आप मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर हैं।
यहाँ सबसे जरूरी बात बच्चों को यही सिखानी है कि यीशु सवालों से नहीं डरते, और जो बच्चा उलझन में है वह प्रभु से दूर नहीं है। साथ ही यह भी कि आज हम यीशु को आँखों से नहीं देखते, फिर भी वे हमारे साथ हैं, और इसी को विश्वास कहते हैं।
उम्र के हिसाब से इस कहानी को कहने का तरीका बदलता है। छोटे बच्चों (तीन से छह साल) के लिए हमारे पास एक बहुत सरल कहानी-रूप है जिसमें हाथों के निशान और प्यार पर ज़ोर है। सात से बारह साल के बच्चों के लिए सवाल-जवाब वाली व्याख्या है, जिसमें वे सीखते हैं कि सबूत और भरोसे में क्या फर्क है। और किशोरों (बारह साल से ऊपर) के लिए एक गहरी बातचीत है, जो शक, सोशल मीडिया के सवालों और पुनरुत्थान के ऐतिहासिक प्रमाणों को छूती है। अपने बच्चे की उम्र के अनुसार वह पृष्ठ चुनिए, और कहानी सुनाने के बाद एक छोटा सवाल ज़रूर पूछिए: तुम्हें यीशु से क्या पूछना है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
थोमा चेला कौन था?
थोमा प्रभु यीशु के उन बारह चेलों में से एक था जिन्हें उन्होंने खुद चुनकर भेजा। उसका नाम मत्ती 10:3, मरकुस 3:18, लूका 6:15 और प्रेरितों के काम 1:13 की सूचियों में आता है, और यूहन्ना का सुसमाचार उसे चार जगह सक्रिय रूप में दिखाता है। वह गलील का यहूदी था, पेशे के बारे में बाइबल चुप है, पर यूहन्ना 21:2 में वह मछली पकड़ने जाने वालों के साथ है। उसकी पहचान एक ही वाक्य में समेटी जा सकती है: गहरा प्रेम करने वाला, खुलकर सवाल पूछने वाला, और अंत में यीशु को परमेश्वर कहकर आराधना करने वाला चेला।
थोमा को "दिदुमुस" क्यों कहा गया है, इसका मतलब क्या है?
यूहन्ना 11:16, यूहन्ना 20:24 और यूहन्ना 21:2 में उसे "थोमा जो दिदुमुस कहलाता है" कहा गया है। "दिदुमुस" यूनानी शब्द है जिसका अर्थ जुड़वाँ होता है, और अरामी में "तोमा" का अर्थ भी यही है। यानी एक ही नाम दो भाषाओं में दिया गया है, जैसे कि उसका जुड़वाँ होना उसकी पहचान का हिस्सा बन गया था। उसका जुड़वाँ भाई या बहन कौन था, पवित्रशास्त्र यह नहीं बताता, और जहाँ बाइबल चुप है वहाँ हमें अनुमानों पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।
क्या थोमा को "शक्की थोमा" कहना सही है?
यह नाम अधूरा और अन्याय से भरा है। जिस आदमी को हम शक्की कहते हैं, वही सबसे पहले कहता है, "आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।" (यूहन्ना 11:16)। उसका संदेह जीवन भर की आदत नहीं, शोक के आठ दिनों की एक अवस्था थी, और वह अवस्था तब आई जब वह चेलों की संगति से अलग था। बाइबल उसे अंत में संदेह करने वाले के रूप में नहीं छोड़ती, वह उसे आराधना करने वाले के रूप में छोड़ती है। अगर कोई उपनाम देना है, तो "आराधक थोमा" ज़्यादा सच्चा होगा।
यूहन्ना 20:29 का मतलब क्या है, क्या देखकर विश्वास करना कमज़ोर विश्वास है?
प्रभु कहते हैं, "तू ने मुझे देखा है इसलिए विश्वास किया है; धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।" (यूहन्ना 20:29)। यह थोमा को नीचा दिखाने के लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों को हिम्मत देने के लिए कहा गया है। थोमा का विश्वास सच्चा था, पर वह आखिरी पीढ़ी थी जिसने जी उठे प्रभु को आँखों से देखा। हम प्रेरितों की गवाही और लिखे गए वचन के सहारे विश्वास करते हैं, और यीशु कहते हैं कि यह आशीषित है। पतरस भी यही लिखता है: "उससे तुम बिन देखे प्रेम रखते हो।" (1 पतरस 1:8)।
थोमा ने यीशु के घावों को छुआ या नहीं?
पवित्रशास्त्र यह नहीं कहता कि उसने छुआ। यीशु ने न्योता दिया, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल" (यूहन्ना 20:27), और इसके तुरंत बाद लिखा है कि थोमा ने उत्तर देकर कहा, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!" (यूहन्ना 20:28)। कई चित्रकारों ने उसे उँगली डालते हुए दिखाया है, पर पाठ में छूने का वर्णन नहीं है। जान पड़ता है कि जी उठे प्रभु की उपस्थिति ने उसकी सारी शर्तें गला दीं। जहाँ मसीह खुद खड़े हो जाते हैं, वहाँ सबूत की सूची बेमानी हो जाती है।
थोमा ने यीशु को "मेरे प्रभु और मेरे परमेश्वर" कहा, क्या इससे यीशु की ईश्वरता साबित होती है?
हाँ, और यह नए नियम के सबसे मज़बूत प्रमाणों में से एक है। यूहन्ना 20:28 में थोमा सीधे यीशु को संबोधित करके उन्हें प्रभु और परमेश्वर दोनों कहता है, और यीशु उसे सुधारते नहीं, बल्कि उसके विश्वास की सराहना करते हैं। एक सच्चा एकेश्वरवादी यहूदी किसी मनुष्य को यह कहकर आराधना नहीं करता, जब तक कि उसके सामने परमेश्वर स्वयं न हों। यह वाक्य यूहन्ना के सुसमाचार के आरंभिक शब्दों को पूरा करता है, जहाँ लिखा है कि वचन परमेश्वर था।
क्या थोमा भारत आया था?
बाइबल इस बारे में कुछ नहीं कहती, इसलिए इसे विश्वास का अनिवार्य अंग नहीं बनाया जा सकता। फिर भी यह परंपरा बहुत प्राचीन और व्यापक है। भारतीय कलीसिया की बहुत पुरानी स्मृति कहती है कि थोमा पहली सदी में मलाबार तट (आज का केरल) पहुँचा, वहाँ मंडलियाँ स्थापित कीं, और मैलापुर (चेन्नई के पास) में शहीद हुआ। केरल के "सेंट थॉमस क्रिश्चियन" समुदाय अपनी जड़ें इसी सेवा में देखते हैं। इतिहास इसे निश्चित रूप से सिद्ध नहीं कर सकता, पर इसे हल्के में खारिज करना भी उचित नहीं है।
"थोमा का सुसमाचार" क्या है, क्या यह बाइबल का हिस्सा है?
नहीं, वह बाइबल का हिस्सा नहीं है और कभी नहीं था। "थोमा का सुसमाचार" दूसरी सदी के आसपास लिखा गया वचनों का एक संग्रह है, जिस पर ज्ञानवाद (नॉस्टिकवाद) की गहरी छाप है। उसमें सृष्टि, देह और उद्धार के बारे में ऐसी बातें हैं जो प्रेरितों की शिक्षा के विपरीत हैं, और उसमें मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान का वह केंद्रीय स्थान नहीं है जो चारों सुसमाचारों में है। थोमा का नाम उस पर अधिकार जताने के लिए जोड़ा गया था। कलीसिया ने उसे सही कारणों से कभी स्वीकार नहीं किया।
बाइबल में थोमा का नाम कितनी बार आता है?
उसका नाम आठ बार आता है। चार बार चेलों की सूचियों में: मत्ती 10:3, मरकुस 3:18, लूका 6:15 और प्रेरितों के काम 1:13। और चार बार यूहन्ना के सुसमाचार की घटनाओं में: लाज़र के प्रसंग में (यूहन्ना 11:16), ऊपरी कमरे में (यूहन्ना 14:5), पुनरुत्थान के बाद (यूहन्ना 20:24 से 20:28), और तिबिरियास झील के किनारे (यूहन्ना 21:2)। यूहन्ना ही उसे गहराई से चित्रित करता है, बाकी सुसमाचार उसे केवल नाम लेकर छोड़ देते हैं।
थोमा की मृत्यु कैसे हुई?
नया नियम उसकी मृत्यु का कोई विवरण नहीं देता। प्राचीन परंपरा कहती है कि वह भारत में, मैलापुर के पास, भाले से बेधकर शहीद हुआ। यह कहानी बाइबल से नहीं आती, पर इसमें एक मार्मिक गूँज है: जिस चेले ने अपने प्रभु के बेधे हुए पंजर के बारे में बात की थी, वह स्वयं बेधा गया। अगर यह सच है, तो उसका जीवन वहीं खत्म हुआ जहाँ से शुरू हुआ था, उसी संकल्प पर: आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।
यूहन्ना 11:16 में थोमा के शब्द क्या दिखाते हैं?
वे उसकी निष्ठा और उसकी उदासी, दोनों दिखाते हैं। जब दूसरे चेले यहूदिया लौटने से डर रहे थे, थोमा ने कहा, "आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।" (यूहन्ना 11:16)। उसे यकीन नहीं था कि अंजाम अच्छा होगा, फिर भी वह साथ चलने को तैयार था। यह एक ऐसा समर्पण है जो उम्मीद से नहीं, प्रेम से जन्मा है। पर यहीं उसकी सीमा भी दिखती है: वह मरने की कल्पना कर सकता था, जी उठने की नहीं, और इसी सीमा ने उसे बाद में आठ दिन के अंधेरे में डाला।
शक और अविश्वास में क्या अंतर है, और क्या शक करने से मेरा उद्धार खतरे में है?
शक वह आवाज़ है जो विश्वास के भीतर से उठती है और उत्तर चाहती है; अविश्वास वह निर्णय है जो उत्तर सुनना ही नहीं चाहता। थोमा संगति में लौटा, सवालों के साथ ही लौटा, और प्रभु उसी कमरे में आ गए। इसलिए डगमगाते मन पर घबराइए नहीं, उसे वचन, प्रार्थना और कलीसिया की संगति के सामने रखिए। याद रखिए, "अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।" (इब्रानियों 11:1)। आपका उद्धार आपकी भावनाओं की मज़बूती पर नहीं, मसीह के पूरे किए हुए काम पर टिका है।
अंत में
थोमा की कहानी इसलिए बची हुई है कि यूहन्ना ने उसे अपने सुसमाचार के अंत में, अपने मकसद के बिल्कुल पास रखा। उसके विश्वासवाक्य के बाद ही वह लिखता है: "परन्तु ये इसलिए लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।" (यूहन्ना 20:31)। यानी थोमा का सफर हमारे लिए सीढ़ी है। जो चेला शोक में अकेला पड़ गया था, जिसने शर्तें रखी थीं, जिसने माना था कि वह समझ नहीं पा रहा, वही अंत में घुटनों पर यीशु को प्रभु और परमेश्वर कहता है। और उस दृश्य के तुरंत बाद प्रभु हमारी ओर मुड़कर कहते हैं कि धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।
अगर आप आगे पढ़ना चाहें, तो यूहन्ना 20 पूरा एक बार धीरे-धीरे पढ़िए, और साथ में यशायाह 53 रखिए। दोनों को साथ पढ़ने पर वह बात खुलती है जो थोमा ने उस शाम देखी: परमेश्वर के घाव हमारी चंगाई हैं। और जब कभी आपका मन अटके, तो यह याद रखिए कि बंद दरवाज़े मसीह को नहीं रोक पाते, और आपका सबसे कड़ा सवाल उनके सबसे कोमल उत्तर से बड़ा नहीं है।
