यिर्मयाह का जीवन: आँसू बहाने वाले भविष्यद्वक्ता की वफ़ादारी
परिचय
एक आदमी कीचड़ से भरे गड्ढे में गले तक धँसा हुआ है। ऊपर से सूरज की रोशनी एक पतली गोल लकीर की तरह दिखाई देती है। उसने चालीस साल तक अपने लोगों से सच बोला, और यही उसका इनाम है। न कोई भीड़, न कोई तालियाँ, न एक भी ऐसा राजा जिसने उसका संदेश मान लिया हो। अगर सेवकाई की सफलता गिनती से नापी जाती, तो यिर्मयाह बाइबल का सबसे बड़ा असफल व्यक्ति होता।
पर परमेश्वर ने उसे असफल नहीं कहा। परमेश्वर ने उसे "जातियों का भविष्यद्वक्ता" कहा, गर्भ में रचे जाने से भी पहले।
इस पृष्ठ पर आप यिर्मयाह के पूरे जीवन से गुज़रेंगे: उसका बुलावा, उसका संघर्ष, उसके आँसू, उसकी कैद, और उसकी वह भविष्यद्वाणी जो यीशु मसीह के लहू में पूरी हुई। और आप यह भी देखेंगे कि जब आपका अपना जीवन बेअसर लगता है, तब परमेश्वर उसे किस नज़र से देखते हैं।
इस मार्गदर्शिका का दृष्टिकोण
अधिकतर लेख यिर्मयाह को "उदास भविष्यद्वक्ता" कहकर आगे बढ़ जाते हैं। हम यहाँ एक और ही कोण से चलेंगे: यिर्मयाह का जीवन इस बात का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि वफ़ादारी का पैमाना परिणाम नहीं, आज्ञाकारिता है, और उसके आँसू कोई भावनात्मक कमज़ोरी नहीं, बल्कि परमेश्वर के अपने हृदय की छाप थे। जो आदमी बाहर से हारता हुआ दिखा, वह भीतर से परमेश्वर के सबसे निकट खड़ा था। इसलिए हम हर पड़ाव पर दो सवाल पूछेंगे: यहाँ यिर्मयाह ने क्या खोया, और यहाँ परमेश्वर का हृदय किस तरह दिखाई दिया? यह कोण मायने रखता है, क्योंकि आज भी बहुत से विश्वासी अपनी वफ़ादारी को नतीजों से तौलकर निराश बैठे हैं।
बाइबल यिर्मयाह के जीवन के बारे में क्या कहती है?
यिर्मयाह हिल्किय्याह का बेटा था, बिन्यामीन देश के अनातोत गाँव के याजकों के घराने से। यानी वह एक धार्मिक परिवार में पैदा हुआ, मंदिर की सेवा उसकी विरासत थी। पर परमेश्वर ने उसे याजक की शांत ज़िंदगी के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी पीढ़ी के सामने खड़े होने के लिए चुना जो अपने विनाश की ओर दौड़ रही थी।
उसका बुलावा योशिय्याह राजा के तेरहवें वर्ष में आया, लगभग 627 ईसा पूर्व। और परमेश्वर का पहला वाक्य ही उसके पूरे जीवन की नींव बन गया: "गर्भ में रचने से पहले ही मैंने तुझ पर चित्त लगाया, और उत्पन्न होने से पहले ही मैंने तुझे पवित्र ठहराया; मैंने तुझे जातियों का भविष्यद्वक्ता ठहराया" (यिर्मयाह 1:5)। ध्यान दीजिए कि यह वाक्य यिर्मयाह की योग्यता के बारे में कुछ नहीं कहता। यह पूरी तरह परमेश्वर के निर्णय के बारे में है। यिर्मयाह के पास न अनुभव था, न आत्मविश्वास। उसका जवाब था: "हाय, प्रभु यहोवा! देख, मैं तो बोलना ही नहीं जानता, क्योंकि मैं लड़का ही हूँ" (यिर्मयाह 1:6)। परमेश्वर ने उसकी आपत्ति को खारिज नहीं किया, उसे ढक दिया: "तू उनके मुख को देखकर मत डर, क्योंकि तेरे बचाने को मैं तेरे साथ हूँ" (यिर्मयाह 1:8)।
शुरुआती वर्ष योशिय्याह के सुधार के दिन थे। मंदिर की मरम्मत के दौरान व्यवस्था की पुस्तक मिली, मूर्तियाँ तोड़ी गईं, फसह मनाया गया। बाहर से लगता था कि पुनरुद्धार आ गया है। पर यिर्मयाह ने वह देखा जो दूसरों ने नहीं देखा: सुधार राजा के आदेश से हुआ था, हृदय से नहीं। इसीलिए वह बार-बार "मन" की बात करता है: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उसमें असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" (यिर्मयाह 17:9)। यहाँ से यिर्मयाह की पूरी सेवकाई का स्वर तय हो जाता है। वह बाहरी धर्म के खिलाफ, और भीतरी बदलाव के पक्ष में बोलने वाला आदमी था।
योशिय्याह की मृत्यु के बाद स्थिति तेज़ी से बिगड़ी। यहोयाकीम के राज में यिर्मयाह ने मंदिर के फाटक पर खड़े होकर वह उपदेश दिया जिसने उसकी जान लगभग ले ली: लोग "यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर" कहते हुए झूठी सुरक्षा में जी रहे थे, जबकि उनके हाथ अन्याय से भरे थे। इसी काल में उसे कुम्हार के घर भेजा गया, जहाँ उसने देखा कि मिट्टी कुम्हार के हाथ में है, और परमेश्वर ने कहा कि इस्राएल भी उनके हाथ में वैसा ही है। इसी काल में पशहूर नाम के याजक ने उसे पिटवाकर काठ में डाल दिया। और इसी काल में उसने वह वाक्य कहा जो हर थके हुए सेवक का वाक्य है: "यदि मैं कहूँ, मैं उसकी चर्चा न करूँगा न उसके नाम से बोलूँगा, तो मेरा हृदय मानो जलती हुई आग से भर जाता है जो मेरी हड्डियों में छिपी रहती है, और मैं उसे रोकते रोकते थक गया पर रोक नहीं सकता" (यिर्मयाह 20:9)।
यह कोई विजयी घोषणा नहीं है। यह एक हारे हुए आदमी का कबूलनामा है कि वह छोड़ना चाहता था पर छोड़ नहीं सका। वचन उसके भीतर आग बन चुका था।
फिर बेबीलोन आया। पहली बंधुआई में यहोयाकीन और कुलीन लोग निकाल ले जाए गए। और तब यिर्मयाह ने वह चिट्ठी लिखी जिसका एक वाक्य आज सबसे ज़्यादा उद्धृत किया जाता है: "क्योंकि मैं तुम्हारे विषय की कल्पनाओं को जानता हूँ, वे हानि की नहीं वरन कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा; यहोवा की यही वाणी है" (यिर्मयाह 29:11)। यह वचन किसी सुखी सभा को नहीं, बल्कि निर्वासित, अपमानित, घर से उजड़े लोगों को लिखा गया था, जिन्हें कहा गया था कि सत्तर साल वहीं रहना है, घर बनाओ, बाग़ लगाओ, बच्चों की शादी करो। परमेश्वर की भलाई का वादा तुरन्त राहत का वादा नहीं था; यह एक लम्बे अंधेरे के पार उजाले का वादा था।
अंत में सिदकिय्याह के दिनों में यरूशलेम घिर गया। यिर्मयाह ने आत्मसमर्पण करने को कहा, और इसी कारण उसे देशद्रोही घोषित किया गया: "तब उन्होंने यिर्मयाह को लेकर राजपुत्र मल्किय्याह के उस गड़हे में जो पहरे के आँगन में था, रस्सियों से उतारकर डाल दिया। और उस गड़हे में पानी न था, केवल कीचड़ ही कीचड़ था; और यिर्मयाह कीचड़ में धँस गया" (यिर्मयाह 38:6)। 586 ईसा पूर्व में नगर गिरा, मंदिर जल गया। बेबीलोन के अधिकारियों ने यिर्मयाह को आदर के साथ छोड़ दिया; उसके अपने लोगों ने उसे कीचड़ में डाला था। अंत में बचे हुए यहूदी उसकी चेतावनी के विरुद्ध मिस्र भाग गए और उसे ज़बरदस्ती साथ ले गए। बाइबल हमें तहपन्हेस में छोड़ देती है, जहाँ बूढ़ा भविष्यद्वक्ता अब भी वही कर रहा है जो चालीस साल से कर रहा था: परमेश्वर का वचन बोल रहा है, ऐसे लोगों से जो सुनना नहीं चाहते।
बाइबल में चलने वाला सूत्र
यिर्मयाह अकेला खड़ा नहीं है। वह उस लम्बी श्रृंखला की एक कड़ी है जिसमें परमेश्वर अपने लोगों को बार-बार चेतावनी और करुणा दोनों भेजते हैं। मूसा ने व्यवस्थाविवरण में कहा था कि परमेश्वर एक दिन उनके हृदय का खतना करेंगे; यिर्मयाह उसी वादे को अपनी पीढ़ी के मलबे के बीच दोहराता है। होशे ने बेवफ़ा पत्नी का चित्र दिया, यशायाह ने पीड़ित दास का, और यिर्मयाह ने उस भविष्यद्वक्ता का जो अपने लोगों के साथ रोता है।
पुराने नियम में उसकी सबसे बड़ी देन वह वाक्य है जो पूरी बाइबल का मोड़ है: "यहोवा की यह वाणी है, सुन, ऐसे दिन आनेवाले हैं जब मैं इस्राएल और यहूदा के घरानों से नई वाचा बाँधूँगा" (यिर्मयाह 31:31)। सोचिए कि यह कब कहा गया। शहर घिरा हुआ था, पुरानी वाचा टूट चुकी थी, मंदिर गिरने वाला था। ठीक उसी घड़ी में परमेश्वर ने नए सिरे से शुरू करने की घोषणा की, और ऐसी वाचा का वादा किया जो पत्थर पर नहीं, हृदय पर लिखी जाएगी, जिसमें पाप की क्षमा स्थायी होगी और हर व्यक्ति परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानेगा।
नए नियम में यह सूत्र सीधे यीशु मसीह के हाथों तक जाता है। ऊपरी कमरे में, कटोरा उठाकर उन्होंने कहा: "यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिये बहाया जाता है, नई वाचा है" (लूका 22:20)। यिर्मयाह ने जो पाँच सौ साल पहले खंडहरों के बीच बोला था, वह गतसमनी और गुलगुता में पूरा हुआ। इब्रानियों की पत्री तो यिर्मयाह 31 को पूरा का पूरा उद्धृत करके साबित करती है कि मसीह एक बेहतर वाचा के मध्यस्थ हैं। पुरानी वाचा नियम देती थी; नई वाचा नया हृदय देती है।
और एक और तार जुड़ता है। जब यीशु ने पूछा कि लोग उन्हें कौन कहते हैं, तो चेलों ने कहा: "कोई तो यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला कहते हैं और कोई एलिय्याह, और कोई यिर्मयाह या भविष्यद्वक्ताओं में से कोई" (मत्ती 16:14)। लोगों ने यीशु में यिर्मयाह की छाया देखी, और यह अकारण नहीं था। दोनों ने मंदिर के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई। दोनों ने यरूशलेम के विनाश की भविष्यद्वाणी की। दोनों को अपने ही लोगों ने ठुकराया। दोनों नगर को देखकर रोए। फर्क यह है कि यिर्मयाह अपने लोगों के दण्ड पर रोया, जबकि यीशु ने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया। रोने वाला भविष्यद्वक्ता उस रोने वाले उद्धारकर्ता की ओर इशारा करता है जो केवल आँसू नहीं, बल्कि लहू बहाने आए।
उसके जीवन का सार
पहला निर्णायक क्षण उसका बुलावा है। यिर्मयाह 1:5 में परमेश्वर तीन क्रियाएँ बोलते हैं: जाना, पवित्र ठहराया, नियुक्त किया। ये तीनों यिर्मयाह के जन्म से पहले हुईं। इसका अर्थ यह है कि उसकी पहचान उसकी सफलता से पहले तय हो चुकी थी। यह बात उसके पूरे जीवन के लिए ज़रूरी थी, क्योंकि आगे चलकर उसके पास दिखाने को कुछ नहीं बचा: न अनुयायी, न परिवार, न सुरक्षा। परमेश्वर ने उसे विवाह करने से भी रोका, ताकि उसका अकेलापन ही उस पीढ़ी के लिए एक जीवित चिन्ह बने। जिस आदमी के पास बाहर कुछ नहीं था, उसे भीतर एक अटल बात दी गई थी: तुझे मैंने चुना, इससे पहले कि तू कुछ कर पाता।
दूसरा निर्णायक क्षण वह है जब यहोयाकीम ने उसकी लिखी हुई पुस्तक जला दी। बारूक ने यिर्मयाह के सारे संदेश एक चर्मपत्र पर लिखे थे, बरसों की मेहनत। राजा ने सर्दी की अँगीठी के सामने बैठकर तीन-चार पन्ने पढ़वाए, चाकू से काटा, और आग में डाल दिया, और डरा तक नहीं। यह किसी भी सेवक के लिए टूटने का क्षण होता: तुम्हारे जीवन भर का काम एक रात में राख। पर परमेश्वर ने कहा, फिर से लिखो। और यिर्मयाह ने फिर से लिखा, और उसमें और भी बहुत से वचन जोड़े गए। आज वह पुस्तक आपके हाथ में है और यहोयाकीम की अँगीठी कहीं नहीं है। परमेश्वर का वचन जलाया जा सकता है, मिटाया नहीं।
तीसरा निर्णायक क्षण अनातोत का खेत है। घेराबंदी के बीच, जब यिर्मयाह खुद कैद में था और सबको पता था कि देश बेबीलोन के हाथ जाने वाला है, परमेश्वर ने उससे कहा कि वह अपने चचेरे भाई से एक खेत खरीद ले। उसने सत्रह शेकेल चाँदी तौलकर दी, दस्तावेज़ पर गवाहों के दस्तखत कराए, और उसे मिट्टी के बर्तन में सुरक्षित रखवा दिया, और कहा: "इस देश में घर और खेत और दाख की बारियाँ फिर मोल ली जाएँगी" (यिर्मयाह 32:15)। यह बाइबल की सबसे सुंदर बेतुकी बात है। डूबते जहाज़ पर आदमी ज़मीन खरीद रहा है, क्योंकि वह परमेश्वर के वादे पर विश्वास करता है। यिर्मयाह की वफ़ादारी केवल विनाश की घोषणा में नहीं थी; वह उस बहाली में निवेश करने में भी थी जिसे वह अपनी आँखों से कभी नहीं देखेगा।
यिर्मयाह से हम क्या सीखते हैं
पहला पाठ यह है कि आज्ञाकारिता और लोकप्रियता का कोई रिश्ता नहीं है। यिर्मयाह ने पाँच राजाओं के अधीन चार दशक सेवा की और शायद एक भी सामूहिक मन-फिराव नहीं देखा। उसके गाँव वालों ने उसे मारने की साज़िश की, याजकों ने उसे पिटवाया, दरबारियों ने उसे कीचड़ में डाला, और आखिर में उसे ज़बरदस्ती मिस्र ले जाया गया। अगर आप अपनी सेवकाई, अपनी प्रार्थना, अपने परिवार में बोए गए वचन को संख्या से तौलते हैं, तो यिर्मयाह का जीवन आपकी पूरी नापतौल की मशीन तोड़ देता है। परमेश्वर ने उससे फल नहीं माँगा; उन्होंने वफ़ादारी माँगी, और फल अपने हाथ में रखा।
दूसरा पाठ यह है कि परमेश्वर के सामने ईमानदार दुःख अविश्वास नहीं है। यिर्मयाह की "स्वीकारोक्तियाँ" चौंकाने वाली हैं। उसने कहा, "श्रापित हो वह दिन जिसमें मैं उत्पन्न हुआ!" (यिर्मयाह 20:14)। उसने परमेश्वर पर आरोप तक लगाया कि उन्होंने उसे बहका दिया। और फिर भी परमेश्वर ने उसे नहीं छोड़ा, उसकी भविष्यद्वक्ता की पदवी नहीं छीनी, और उसकी ये कड़वी प्रार्थनाएँ पवित्रशास्त्र में सुरक्षित रख दीं। इसका मतलब साफ़ है: आप परमेश्वर के पास अपने आँसुओं और अपने गुस्से के साथ आ सकते हैं। जो रिश्ता शिकायत झेल सकता है, वही असली रिश्ता है। यिर्मयाह भागा नहीं; उसने अपनी पीड़ा परमेश्वर के सामने उंडेली, और उसी जगह उसे फिर से ताकत मिली।
तीसरा पाठ यह है कि आँसू परमेश्वर के हृदय की नकल हैं। "भला होता कि मेरा सिर जल ही जल होता, और मेरी आँखें आँसुओं का सोता होतीं, कि मैं रात दिन अपने समाज की कन्या के मारे हुओं के लिये रोता रहता!" (यिर्मयाह 9:1)। यिर्मयाह न्याय की घोषणा ठंडे मन से नहीं करता था। जिन लोगों के विनाश की उसने भविष्यद्वाणी की, उन्हीं के लिए वह रोया और प्रार्थना की। यही अंतर है सच्चे भविष्यद्वक्ता और कट्टरपंथी में। सच्चाई बिना करुणा के हथियार बन जाती है; करुणा बिना सच्चाई के धोखा बन जाती है। यिर्मयाह में दोनों एक साथ थे, और इसीलिए वह मसीह की ओर इशारा करता है।
दर्पण
अब आपकी बारी। आपने शायद पिछले पाँच साल से अपने पति या पत्नी के लिए प्रार्थना की है और कुछ नहीं बदला। शायद आपने अपने बच्चों को बचपन से कलीसिया ले जाया और आज वे फ़ोन पर सिर झुकाए बैठे हैं और परमेश्वर का नाम सुनना नहीं चाहते। शायद आप उस दफ़्तर में ईमानदार रहे जहाँ बेईमानी से तरक्की मिलती है, और आप वहीं के वहीं हैं, जबकि झूठ बोलने वाले ऊपर चढ़ गए। शायद आपने किसी छोटी कलीसिया में सालों पसीना बहाया और लोग फिर भी कम हो रहे हैं।
तो अब आप अपने आप से यह सवाल पूछने लगे हैं जो यिर्मयाह ने भी पूछा था: क्या इसका कोई फ़ायदा है? क्या परमेश्वर देख भी रहे हैं?
यिर्मयाह का जीवन आपको एक झूठ से आज़ाद करता है, उस झूठ से कि परमेश्वर की मंज़ूरी नतीजों के साथ आती है। अगर यह सच होता, तो यिर्मयाह सबसे बड़ा असफल होता और यहोयाकीम सबसे बड़ा सफल। पर वह चालीस साल की "असफल" सेवकाई पवित्रशास्त्र में दर्ज है, और उस राजा की अँगीठी राख हो चुकी है।
पर यह जीवन आपको चुभता भी है। क्योंकि यिर्मयाह ने केवल धैर्य नहीं रखा, उसने रोया भी। आप और मैं अक्सर उन लोगों से बस थक जाते हैं जो नहीं सुनते। हम उनके बारे में कड़वे हो जाते हैं, उन्हें छोड़ देते हैं, मन ही मन उन्हें दोषी ठहराते हैं। यिर्मयाह ने उन्हीं लोगों के लिए आँसू बहाए जिन्होंने उसे गड्ढे में डाला था।
तो पूछिए: जिस इंसान से आप सबसे ज़्यादा निराश हैं, क्या आप आज उसके लिए रो सकते हैं? क्या आप वह खेत खरीद सकते हैं जिसकी फ़सल शायद आपको कभी न मिले? परमेश्वर आपसे यह नहीं पूछेंगे कि आपने कितने लोगों को बदला। वे यह पूछेंगे कि क्या आप वहीं खड़े रहे जहाँ उन्होंने आपको खड़ा किया था।
बच्चों के लिए समझाया गया
बच्चों को यिर्मयाह बहुत पसंद आता है, अगर आप उसे सही तरीके से बताएँ। उन्हें यह कहकर शुरू मत कीजिए कि "वह एक उदास आदमी था"। कहिए कि वह एक बहादुर लड़का था जिसे परमेश्वर ने तब चुना जब वह खुद को बहुत छोटा समझता था। परमेश्वर ने उससे कहा कि उन्होंने उसे उसके जन्म से भी पहले जान लिया था, और यही बात हर बच्चे के लिए एक सुंदर सच्चाई है: तुम्हें परमेश्वर ने जाना, पसंद किया और चुना, इससे पहले कि तुम कुछ अच्छा या बुरा करते।
फिर उन्हें कहानी की तस्वीरें दीजिए, क्योंकि बच्चे तस्वीरों से सीखते हैं। कुम्हार का चाक जिस पर मिट्टी नए सिरे से गढ़ी जाती है। वह राजा जिसने किताब जला दी, और यिर्मयाह ने उसे फिर से लिख दिया। वह गहरा कीचड़ भरा गड्ढा, और एबेदमेलेक नाम का वह विदेशी आदमी जिसने पुराने कपड़े और चिथड़े रस्सियों के साथ नीचे भेजे ताकि यिर्मयाह की बग़लें छिल न जाएँ। यह छोटी सी दयालुता बच्चों के दिल को छू जाती है।
बड़े बच्चों के साथ आप एक कदम आगे जा सकते हैं: यिर्मयाह रोया क्योंकि परमेश्वर का दिल दुखी था, और आगे चलकर यीशु भी यरूशलेम को देखकर रोए।
अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए हमारे पास अलग-अलग तैयार व्याख्याएँ उपलब्ध हैं: छोटे बच्चों (3 से 6 वर्ष) के लिए सरल कहानी और चित्र, प्राथमिक कक्षा के बच्चों (7 से 12 वर्ष) के लिए इतिहास और प्रश्नोत्तर, और किशोरों (12 वर्ष से ऊपर) के लिए वे गहरे सवाल जो वे सचमुच पूछते हैं, जैसे कि परमेश्वर से नाराज़ होना ठीक है या नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यिर्मयाह कौन था और वह किस समय में जीवित रहा?
यिर्मयाह हिल्किय्याह नाम के याजक का पुत्र था और बिन्यामीन प्रदेश के अनातोत गाँव का रहने वाला था। उसका बुलावा राजा योशिय्याह के तेरहवें वर्ष में हुआ, लगभग 627 ईसा पूर्व, और उसकी सेवकाई यहूदा के अंतिम पाँच राजाओं के दिनों तक चली, जिसमें 586 ईसा पूर्व में यरूशलेम और मंदिर का विनाश भी शामिल है। यानी वह लगभग चालीस वर्ष तक एक ऐसे राष्ट्र से बोलता रहा जो अपने पतन की ओर बढ़ रहा था। वह उस पीढ़ी का चश्मदीद गवाह है जिसने वाचा का टूटना अपनी आँखों से देखा।
यिर्मयाह को "आँसू बहाने वाला भविष्यद्वक्ता" क्यों कहा जाता है?
यह नाम उसकी अपनी पुस्तक से आता है, जहाँ वह बार-बार अपने लोगों के लिए रोता है। यिर्मयाह 9:1 में वह कहता है कि काश उसका सिर पानी और उसकी आँखें आँसुओं का सोता होतीं, ताकि वह रात-दिन अपने लोगों के लिए रो सके। साथ ही परंपरागत रूप से विलापगीत की पुस्तक भी उसी से जोड़ी जाती है, जो यरूशलेम के खंडहरों पर लिखा गया शोकगीत है। उसके आँसू भावुकता नहीं थे; वे उस परमेश्वर के हृदय को दिखाते हैं जो पापी के मरने से प्रसन्न नहीं होते।
यिर्मयाह 1:5 का वास्तव में क्या अर्थ है?
इस पद में परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने यिर्मयाह को गर्भ में रचे जाने से पहले जाना, जन्म से पहले पवित्र ठहराया और जातियों का भविष्यद्वक्ता नियुक्त किया। मुख्य बात यह है कि यिर्मयाह का चुनाव उसकी काबिलियत या उसके निर्णयों पर आधारित नहीं था, बल्कि पूरी तरह परमेश्वर की पहल पर। यह पद सीधे तौर पर हर व्यक्ति को भविष्यद्वक्ता नहीं बनाता, लेकिन यह सिद्धांत ज़रूर सिखाता है कि परमेश्वर अपने लोगों को समय से पहले जानते और ठहराते हैं, और मानव जीवन गर्भ में ही उनकी दृष्टि में मूल्यवान है।
क्या यिर्मयाह 29:11 हर विश्वासी पर लागू होता है?
यह वादा मूल रूप से बेबीलोन में निर्वासित यहूदियों से किया गया था, और यह तत्काल आराम का नहीं, बल्कि सत्तर साल के बाद बहाली का वादा था। इसलिए इसे "परमेश्वर तुम्हें अच्छी नौकरी देंगे" जैसे अर्थ में इस्तेमाल करना गलत है। फिर भी इसमें परमेश्वर का जो चरित्र प्रकट होता है, वह अपरिवर्तनीय है: वे अपने लोगों के प्रति भलाई के विचार रखते हैं और उनके लिए अंत में आशा तैयार करते हैं। मसीह में यह वादा और भी गहरा होकर हम तक पहुँचता है, भले ही रास्ता निर्वासन से होकर जाए।
यिर्मयाह ने विवाह क्यों नहीं किया?
परमेश्वर ने स्वयं उसे विवाह करने और संतान पैदा करने से मना किया था, क्योंकि उस देश में जन्मे बच्चे भयानक दिनों का सामना करने वाले थे। यिर्मयाह का अकेलापन उसके संदेश का हिस्सा था: उसका खाली घर यहूदा के आने वाले खाली घरों का जीवित चिन्ह था। उसे शोक के घर और उत्सव के घर, दोनों में जाने से भी रोका गया। यह बाइबल में सेवकाई की सबसे भारी कीमतों में से एक है, और यह दिखाता है कि परमेश्वर कभी-कभी अपने सेवक के पूरे जीवन को ही संदेश बना देते हैं।
क्या विलापगीत की पुस्तक यिर्मयाह ने लिखी थी?
यह पुस्तक स्वयं लेखक का नाम नहीं बताती, लेकिन यहूदी और मसीही परंपरा बहुत पुराने समय से इसे यिर्मयाह से जोड़ती आई है, और इसकी भाषा, शैली और पीड़ा उसके अनुभव से पूरी तरह मेल खाती है। यह यरूशलेम के विनाश के बाद लिखे गए शोकगीतों का संग्रह है। इसके ठीक बीच में वह वचन खड़ा है जो पूरी पुस्तक का दिल है: "हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महा करुणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है" (विलापगीत 3:22)। सबसे गहरे अंधकार में सबसे उजली आशा।
यिर्मयाह को कीचड़ भरे गड्ढे में क्यों डाला गया?
यरूशलेम की घेराबंदी के दौरान यिर्मयाह लगातार यह कह रहा था कि नगर बेबीलोन के हाथ में दिया जाएगा और जो आत्मसमर्पण करेगा वह जीवित रहेगा। दरबार के अधिकारियों ने इसे देशद्रोह और सैनिकों का मनोबल तोड़ने वाला संदेश माना, इसलिए उन्होंने राजा सिदकिय्याह से अनुमति लेकर उसे रस्सियों से गड्ढे में उतार दिया, जहाँ पानी नहीं बल्कि कीचड़ था और वह उसमें धँस गया (यिर्मयाह 38:6)। बाद में एबेदमेलेक नाम के एक कूशी अधिकारी ने राजा से विनती करके उसे रस्सियों और पुराने चिथड़ों की मदद से बाहर निकाला।
यिर्मयाह की सेवकाई का फल क्या रहा?
अपने जीवनकाल में उसने लगभग कोई दिखाई देने वाला फल नहीं देखा। राजाओं ने उसकी नहीं सुनी, याजकों ने उसका विरोध किया, और उसके अपने गाँव वालों ने उसे मारने की योजना बनाई। लेकिन उसके शब्द बच गए और निर्वासन में परमेश्वर के लोगों की आत्मा को थामे रहे; दानिय्येल ने उसकी भविष्यद्वाणी पढ़कर प्रार्थना की, और उसकी नई वाचा की घोषणा नए नियम की नींव बन गई। उसका जीवन इस सच्चाई का सबसे साफ़ उदाहरण है कि वफ़ादारी का असली फल अक्सर सेवक की मृत्यु के बाद पकता है।
नई वाचा क्या है जिसका वादा यिर्मयाह ने किया?
यिर्मयाह 31:31 में परमेश्वर घोषणा करते हैं कि वे इस्राएल और यहूदा के घरानों से एक नई वाचा बाँधेंगे। यह पुरानी वाचा से अलग है, क्योंकि इसमें व्यवस्था पत्थर की पटियाओं पर नहीं बल्कि लोगों के हृदय पर लिखी जाएगी, हर कोई परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानेगा, और उनके पाप परमेश्वर फिर कभी स्मरण नहीं करेंगे। यीशु मसीह ने अंतिम भोज में कटोरा उठाकर स्पष्ट किया कि यह नई वाचा उनके लहू में स्थापित हो रही है (लूका 22:20)। इसलिए हर बार जब हम प्रभु भोज लेते हैं, हम यिर्मयाह की भविष्यद्वाणी की पूर्ति को छूते हैं।
क्या यिर्मयाह का परमेश्वर से शिकायत करना पाप था?
बाइबल यिर्मयाह की कड़वी प्रार्थनाओं को छिपाती नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखती है, और यह अपने आप में एक संदेश है। उसने अपने जन्मदिन को शाप दिया, परमेश्वर पर आरोप लगाया, और छोड़ देने की बात सोची, फिर भी परमेश्वर ने उसे अस्वीकार नहीं किया। अंतर यह है कि उसने अपनी शिकायत परमेश्वर से दूर जाकर नहीं, बल्कि सीधे उनके सामने रखी। ईमानदार पीड़ा प्रार्थना का दुश्मन नहीं है; भजन संहिता इससे भरी हुई है। पाप तब होता है जब हम कड़वाहट लेकर परमेश्वर से मुँह मोड़ लेते हैं।
यिर्मयाह और झूठे भविष्यद्वक्ता हनन्याह के बीच क्या हुआ?
यिर्मयाह ने परमेश्वर के आदेश पर अपनी गर्दन पर लकड़ी का जूआ पहना था, यह दिखाने के लिए कि यहूदा को बेबीलोन के अधीन होना पड़ेगा। हनन्याह ने सबके सामने वह जूआ तोड़कर घोषणा की कि दो साल में बंधुआई खत्म हो जाएगी, जो लोगों को सुनने में बहुत अच्छा लगा। यिर्मयाह पहले चुपचाप चला गया, फिर परमेश्वर का वचन लेकर लौटा और कहा कि लकड़ी के जूए की जगह लोहे का जूआ आएगा, और उसी वर्ष हनन्याह मर गया। यह घटना दिखाती है कि लोकप्रिय संदेश हमेशा सच्चा संदेश नहीं होता।
यिर्मयाह की मृत्यु कैसे हुई?
बाइबल इसका स्पष्ट विवरण नहीं देती। पवित्रशास्त्र में उसका अंतिम उल्लेख मिस्र के तहपन्हेस में है, जहाँ यहूदा के बचे हुए लोग उसकी चेतावनी के विरुद्ध भाग गए थे और उसे तथा बारूक को ज़बरदस्ती अपने साथ ले गए थे। वहाँ भी वह परमेश्वर का वचन बोलता रहा और मूर्तिपूजा के विरुद्ध खड़ा रहा। यहूदी परंपरा कहती है कि उसके अपने ही देशवासियों ने मिस्र में उसे पत्थरवाह करके मार डाला, पर यह बाइबल में दर्ज नहीं है। उसका जीवन जैसे शुरू हुआ था, वैसे ही समाप्त हुआ: बोलता हुआ, और न सुना जाता हुआ।
यिर्मयाह और यीशु मसीह में क्या समानता है?
दोनों ने मंदिर के भ्रष्टाचार के विरुद्ध खुलकर बोला, दोनों ने यरूशलेम के विनाश की भविष्यद्वाणी की, दोनों को अपने ही लोगों ने ठुकराया और देशद्रोही समझा, और दोनों उस नगर को देखकर रोए जो उन्हें मार डालना चाहता था। यही कारण है कि कुछ लोग यीशु को देखकर कहते थे कि शायद यह यिर्मयाह है (मत्ती 16:14)। पर अंतर बहुत बड़ा है: यिर्मयाह ने आने वाले न्याय की घोषणा की और उस पर आँसू बहाए, जबकि यीशु मसीह ने वह न्याय अपने ऊपर ले लिया और नई वाचा अपने लहू से बाँधी।
अंत में
यिर्मयाह के जीवन को अगर आप सफलता की सूची की तरह पढ़ेंगे, तो आपको निराशा मिलेगी। पर अगर आप उसे वफ़ादारी की कहानी की तरह पढ़ेंगे, तो आपको आज़ादी मिलेगी। एक आदमी ने चालीस साल तक बोला और लगभग कोई नहीं बदला; फिर भी परमेश्वर ने उसके शब्द ऐसे सहेजे कि वे निर्वासन में जा रहे लोगों की उम्मीद बने, दानिय्येल की प्रार्थना बने, और अंत में उस मेज़ तक पहुँचे जहाँ यीशु मसीह ने कटोरा उठाकर नई वाचा की घोषणा की।
इसलिए अपनी वफ़ादारी को आज के परिणामों से मत तौलिए। वह खेत खरीदिए जिसकी फ़सल आप शायद न देखें। उन लोगों के लिए रोइए जो आपकी बात नहीं सुनते। और जब भीतर सब सूख जाए, तो विलापगीत 3:22 को ज़ोर से पढ़िए: हम मिट नहीं गए, क्योंकि उनकी करुणा महान और उनकी दया अमर है।
आगे के अध्ययन के लिए यिर्मयाह 1, यिर्मयाह 20, यिर्मयाह 31 और यिर्मयाह 38 को एक साथ, एक ही बैठक में पढ़िए। बुलाहट, टूटन, वादा और कीचड़, इन चारों को एक साथ देखने पर आप उस परमेश्वर को पहचानेंगे जो अपने रोते हुए सेवकों को कभी अकेला नहीं छोड़ते।
