1 कुरिन्थियों 10
पाठ
पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को इस्राएल के जंगल में ले जाते हैं: सब बादल के नीचे थे, सब समुद्र पार गए, सब ने एक ही आत्मिक भोजन और जल पाया, और फिर भी "परमेश्वर उनमें से बहुतों से प्रसन्न ना था, इसलिए वे जंगल में ढेर हो गए।" इस चेतावनी से वे मूर्तिपूजा के विरुद्ध सीधी आज्ञा तक पहुँचते हैं, प्रभु भोज की मेज और दुष्टात्माओं की मेज के बीच चुनाव रखते हैं, और अंत में मूर्तियों को चढ़ाए माँस के व्यावहारिक प्रश्न को इस सिद्धांत पर टिकाते हैं कि स्वतंत्रता का लक्ष्य दूसरे का उद्धार है।
मर्म
ध्यान दीजिए कि पौलुस पाँच बार "सब" कहते हैं। सब को छुटकारा मिला, सब को चिन्ह मिले, सब को भोजन मिला। और फिर वह छोटा सा "परन्तु" आता है जो पूरे अध्याय का भार उठाता है। यहाँ अनुग्रह की एक कड़ी सच्चाई खुलती है: परमेश्वर का उद्धार सचमुच मुफ़्त है, पर वह जादू नहीं है। संस्कार, चिन्ह, सदस्यता, अनुभव, ये सब वास्तविक हैं और फिर भी अपने आप में सुरक्षा-कवच नहीं। इसीलिए वचन 12 इतना चुभता है: "जो समझता है, 'मैं स्थिर हूँ,' वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़े।" कुरिन्थ के लोग ज्ञान पर घमंड करते थे। पौलुस उनके ज्ञान को नहीं, उनकी निश्चिंतता को तोड़ते हैं। और तुरंत वचन 13 में परमेश्वर की विश्वासयोग्यता रख देते हैं, ताकि चेतावनी निराशा न बन जाए। डर और भरोसा यहाँ एक साथ खड़े हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
"वह चट्टान मसीह था।" यह वाक्य लापरवाही से नहीं कहा गया। पौलुस यह नहीं कह रहे कि जंगल में एक पत्थर लुढ़कता चलता था, बल्कि यह कि जो जीवनदायी उपस्थिति इस्राएल को पिलाती रही, वही मसीह थे। इसका अर्थ है कि पुराना नियम मसीह की पूर्व-कथा भर नहीं, उनकी उपस्थिति की कहानी है। एक ही परमेश्वर, एक ही वाचा-निष्ठा, एक ही अनुग्रह, दो युगों में। और इसीलिए खतरा भी एक ही है। लाल समुद्र से निकलना और बपतिस्मा, मन्ना और रोटी, चट्टान का जल और कटोरा, ये समानांतर रेखाएँ हैं। जो इस्राएल के साथ हुआ वह "दृष्टान्त की रीति पर" था, यानी हमारे लिए लिखा गया नक्शा, जिसमें गड्ढे चिन्हित हैं।
आईना
हम मूर्तिपूजा को दूर की चीज़ समझते हैं, किसी और धर्म की बात। पर पौलुस जिन पाँच पापों को गिनाते हैं, वे बहुत घरेलू हैं: लालच, मूर्तिपूजा, व्यभिचार, प्रभु को परखना, और कुड़कुड़ाना। आख़िरी वाला सबसे नज़दीक है। नौकरी पर वेतन, घर में जीवनसाथी, कलीसिया में नेतृत्व, हर जगह कुड़कुड़ाहट इतनी सामान्य लगती है कि हम उसे पाप ही नहीं मानते। पर मूल में वह कहती है: परमेश्वर, आपने मेरे साथ ठीक नहीं किया। और "मैं स्थिर हूँ" वाली भावना? यह उस व्यक्ति की भाषा है जो बीस साल से मसीही है, बाइबल पढ़ाता है, और इसीलिए मानता है कि अब गिरना उसके लिए असंभव है। ठीक वहीं पैर फिसलता है।
श्रोता
कुरिन्थ के विश्वासी अधिकतर अन्यजातियों में से थे। उनके लिए मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं थे, वे भोजनालय, व्यापार संघ और सामाजिक जीवन के केंद्र थे। किसी ग्राहक का निमंत्रण ठुकराना धंधे का नुकसान था; परिवार के उत्सव में न जाना रिश्ता तोड़ना था। कुछ लोग तर्क देते थे कि मूर्ति तो कुछ है ही नहीं, इसलिए खाने में क्या हर्ज। पौलुस उनका धर्मशास्त्र स्वीकार करते हैं और फिर भी रोकते हैं: मूरत कुछ नहीं, पर उसके पीछे की शक्ति कुछ है। जब वे कहते हैं "तुम प्रभु के कटोरे, और दुष्टात्माओं के कटोरे दोनों में से नहीं पी सकते," तो सुनने वालों के कानों में सामाजिक बहिष्कार की आवाज़ गूँजी होगी।
संदर्भ
पौलुस लगभग सन् 55 में इफिसुस से यह पत्र लिखते हैं। कुरिन्थ एक धनी बंदरगाह नगर था, दो समुद्रों के बीच, जहाँ पैसा और प्रतिष्ठा तेज़ी से बदलते थे। कलीसिया में गुट थे, मुकदमे थे, प्रभु भोज पर अमीर-गरीब का भेद था। इसी माहौल में सहभागिता, यूनानी में कोइनोनिया, केवल भावनात्मक संगति नहीं थी; इसका अर्थ था साझी हिस्सेदारी, एक ही चीज़ में सचमुच जुड़ जाना। इसीलिए वचन 17 में एक रोटी से एक देह का तर्क बनता है। मेज़ पर बैठना, चाहे प्रभु की हो या मूर्ति की, वहाँ के स्वामी से बँध जाना है।
केन्द्रीय व्यक्ति
इस अध्याय का मुख्य पात्र परमेश्वर हैं, और उनका चेहरा यहाँ दो-तरफ़ा दिखता है। वे वही हैं जो चट्टान से जल देते हैं, जिनकी है "पृथ्वी और उसकी भरपूरी," जो हर परीक्षा के साथ "निकास भी करेगा"। और वे वही हैं जिनसे प्रश्न पूछा जाता है, "क्या हम उससे शक्तिमान हैं?" यह उदासीन देवता नहीं है जो हर चीज़ पर मुस्कुरा दे। उनकी ईर्ष्या प्रेम का दूसरा नाम है: वे अपने लोगों को बाँटकर रखने को तैयार नहीं। यही परमेश्वर हैं जिन्होंने अपने पुत्र की देह और लहू में हमें सहभागी बनाया। जो इतना देता है, वह आधा हृदय स्वीकार नहीं करेगा।
चिंतन
आपके जीवन में कौन सी "मेज़" है जिस पर आप बैठते तो हैं, पर स्वीकार नहीं करना चाहते कि वह आपको बाँध रही है?
कुड़कुड़ाहट को पौलुस मूर्तिपूजा और व्यभिचार के साथ एक ही सूची में रखते हैं। यह आपके पिछले सप्ताह के बारे में क्या कहता है?
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1 Corinthians 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 कुरिन्थियों 10 किस विषय में है?
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1 कुरिन्थियों 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस मूरतों के सामने चढ़ाए माँस की बहस के बीच यह कहता है: "तुम न यहूदियों, न यूनानियों, और न परमेश्वर की कलीसिया के लिये ठोकर के कारण बनो।" यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि मुझे छूट है या नहीं, बल्कि यह कि मेरी छूट किसी के पाँव में पत्थर तो नहीं बन रही। आज अपने से पूछ: मेरे सही होने से कौन लड़खड़ा रहा है?
पिता, मेरे मन में कई चीज़ें आपकी जगह लेने की कोशिश करती हैं। पैसा, नाम, लोगों की वाहवाही। मुझे ताकत दीजिए कि मैं उनसे दूर भागूँ, न कि उनके साथ समझौता करूँ। मेरा दिल सिर्फ आपका रहे, क्योंकि आप ही मेरे सच्चे परमेश्वर हैं।
पिता, मैं अक्सर पहले अपना ही फायदा देखता हूँ। मेरी सोच को थोड़ा चौड़ा कर दे, ताकि मैं दूसरों की भलाई भी ढूँढ़ूँ। आज किसी एक व्यक्ति के लिए मुझे कुछ छोड़ने का साहस दे, और उसमें तेरी खुशी हो।
इस्राएल के पास मन्ना था, हर सुबह ताज़ा, फिर भी उनका मन मिस्र के मांस पर लगा रहा। कमी नहीं थी, भूख गलत थी। पौलुस कहता है, "ये बातें उनके लिए दृष्टान्त ठहरीं और हमारी चेतावनी के लिए लिखी गईं कि हम उनके समान बुरी वस्तुओं की लालसा न करें।"
सोचो, आज तुम्हारी थाली में परमेश्वर ने जो रखा है, उसे धन्यवाद के साथ खाते हो, या आँखें किसी और की थाली में हैं? उनकी कहानी हमारे लिए आईना बन गई।
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