1 कुरिन्थियों 14:1
पाठ
पौलुस एक ही वाक्य में तीन क्रियाएँ रखते हैं, और उनका क्रम ही सब कुछ तय कर देता है: "प्रेम का अनुकरण करो, और आत्मिक वरदानों की भी धुन में रहो विशेष करके यह, कि भविष्यद्वाणी करो।" पहले प्रेम, जिसके पीछे दौड़ना है; फिर वरदान, जिनके लिए जलती हुई लालसा रखनी है; और उन वरदानों में भी एक को विशेष स्थान, भविष्यद्वाणी। यह पद प्रेम की उस लंबी स्तुति के ठीक बाद आता है जो तेरहवें अध्याय में है, और उस व्यावहारिक उलझन से ठीक पहले जिसमें कुरिन्थ की सभा अन्य भाषाओं को लेकर फँसी हुई थी। एक वाक्य, जो काव्य को व्यवस्था से जोड़ देता है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर के विषय में एक चुपचाप कही गई बात है: वे अपनी आत्मा के वरदान इसलिए नहीं बाँटते कि कोई व्यक्ति अपनी आत्मिकता का प्रमाण-पत्र बना ले, बल्कि इसलिए कि समुदाय बने। "प्रेम का अनुकरण करो" में जो क्रिया है, वह पीछा करने की है, जैसे कोई शिकारी या भगोड़े के पीछे दौड़ता हो; और "धुन में रहो" में जो शब्द है, वही ग्रीक में ईर्ष्या के लिए भी चलता है, ज़ेलोउते, यानी जलती हुई चाह। पौलुस उत्साह को ठंडा नहीं करते, उसे दिशा देते हैं। वरदान माँगना स्वार्थ नहीं है, बशर्ते माँग का मुँह दूसरों की ओर हो। अनुग्रह अपने स्वभाव से ही बहता है; जो वरदान बहना बंद कर दे, वह वरदान होना बंद कर देता है।
जुड़ा हुआ सूत्र
भविष्यद्वाणी की यह चाह कोई नई बात नहीं है; यह पुराने नियम की एक अधूरी इच्छा का पूरा होना है। गिनती की पुस्तक में मूसा, जब उनके सहायक दो अनधिकृत भविष्यद्वक्ताओं को रोकना चाहते हैं, तड़प कर कहते हैं कि काश प्रभु के सब लोग भविष्यद्वक्ता होते और प्रभु अपनी आत्मा उन सब पर रखते। योएल ने उसी तड़प को प्रतिज्ञा में बदल दिया: बेटे और बेटियाँ, दास और दासियाँ, सब भविष्यद्वाणी करेंगे। पिन्तेकुस्त के दिन पतरस ने कहा कि वह घड़ी आ गई। तो पौलुस यहाँ कुरिन्थ की अव्यवस्थित सभा से जो कह रहे हैं, वह वास्तव में मसीह के काम का फल है: क्रूस और पुनरुत्थान के बाद आत्मा अब किसी चुने हुए अभिषिक्त पर नहीं, पूरी देह पर उतरी है। इसलिए "भविष्यद्वाणी करो" कोई विशेषाधिकार का निमंत्रण नहीं, नए नियम की सामान्य स्थिति है।
दर्पण
हममें से अधिकांश आत्मिक जीवन को निजी खाते की तरह चलाते हैं। सुबह की प्रार्थना, मन की शांति, वह गीत जो मुझे छू जाता है, वह वचन जो मेरे लिए था। इसमें कुछ गलत नहीं, पर पौलुस का तराजू दूसरा है: अगला पद कहता है कि अन्य भाषा बोलनेवाला "अपनी ही उन्नति करता है", और भविष्यद्वाणी करनेवाला "कलीसिया की उन्नति"। यह सवाल दफ्तर में भी चुभता है, घर में भी: मेरी बातचीत का असर किस पर पड़ता है, मुझ पर या दूसरे पर? हम अक्सर चाहते हैं कि लोग हमें आत्मिक समझें; पौलुस चाहते हैं कि लोग हमारे कारण मज़बूत हों। और पद 3 भविष्यद्वाणी को तीन सीधे शब्दों में खोलता है: उन्नति, उपदेश, शान्ति। कोई रहस्यमय परदा नहीं, बस परमेश्वर की ओर से कहा गया ऐसा शब्द जो किसी को खड़ा कर दे।
आज, अगले दस मिनट में, एक ऐसे व्यक्ति को संदेश भेजिए जिसका विश्वास इन दिनों थका हुआ है, और उसमें केवल यह लिखिए कि परमेश्वर उसे देख रहे हैं और आप उसके लिए प्रार्थना कर रहे हैं; कोई सलाह नहीं, सिर्फ उन्नति की बात।
संदर्भ
कुरिन्थ एक बंदरगाह शहर था, दो समुद्रों के बीच, धन और धर्मों का चौराहा। वहाँ के मंदिरों में परमानंद की अवस्था में बोलना, बुदबुदाना, अस्पष्ट स्वर निकालना आत्मिक शक्ति का प्रमाण माना जाता था। जो लोग इस संस्कृति से निकलकर मसीही हुए, वे अपने साथ यह पैमाना भी ले आए: जितनी अधिक समझ से परे बात, उतनी अधिक आत्मिकता। पौलुस का पहला पत्र लगभग पचास के दशक के मध्य में, इफिसुस से लिखा गया। यह कलीसिया गरीब और धनी, यहूदी और यूनानी, दास और स्वामी का मिला-जुला समूह थी, जो किसी के घर के भोजन-कक्ष में इकट्ठी होती थी, जहाँ तीस-चालीस लोग मुश्किल से समाते। उस तंग कमरे में अगर सब एक साथ अन्य भाषाओं में बोलें, तो वह उपासना नहीं, शोर बन जाता है, और पौलुस बाद में कहते हैं कि बाहर का आदमी तुम्हें पागल कहेगा।
एक बारीकी
"विशेष करके यह, कि भविष्यद्वाणी करो" में वह छोटा सा "विशेष करके" पूरे अध्याय का ताला खोलता है। पौलुस अन्य भाषाओं को मना नहीं करते; अंत में साफ कहते हैं, "अन्य भाषा बोलने से मना न करो।" वे प्राथमिकता तय कर रहे हैं, निषेध नहीं लगा रहे। यह अंतर बहुत लोग चूक जाते हैं, और फिर यह अध्याय या तो वरदानों के विरुद्ध हथियार बन जाता है या वरदानों की अंधी वकालत। पौलुस दोनों से इनकार करते हैं। उनका मापदंड केवल एक है, जो पद 12 में खुलकर आता है: "तुम्हारे वरदानों की उन्नति से कलीसिया की उन्नति हो।" आत्मिकता की दौड़ नहीं, निर्माण का काम। वरदान ईंट हैं, और ईंट का मूल्य इस बात में है कि वह दीवार में कहाँ बैठती है।
मुख्य पात्र
इस पद के पीछे खड़ा मुख्य पात्र पवित्र आत्मा हैं, और उनका चरित्र यहाँ चुपचाप प्रकट होता है। वे बोलते हैं, और बोलने के लिए मनुष्य का मुँह चुनते हैं। वे समझ को रद्द नहीं करते; पौलुस आगे कहते हैं कि वे आत्मा से भी प्रार्थना करेंगे और बुद्धि से भी। वे भविष्यद्वक्ता को वश से बाहर नहीं करते, क्योंकि "भविष्यद्वक्ताओं की आत्मा भविष्यद्वक्ताओं के वश में है"। यह मूर्तियों के मंदिर वाले देवताओं से बिल्कुल उलट है, जो मनुष्य को अपने कब्जे में लेकर बेसुध कर देते थे। परमेश्वर की आत्मा व्यक्ति को मिटाती नहीं, उसे जिम्मेदार बनाती है। और वे "गड़बड़ी का नहीं, परन्तु शान्ति का कर्ता" हैं, जो सृष्टि के पहले दिन से उनका हस्ताक्षर रहा है: अराजकता में से व्यवस्था।
अंतर्पाठ
सबसे तीखा अंतर्पाठ स्वयं पौलुस इसी अध्याय में देते हैं, यशायाह 28 से: "मैं अन्य भाषा बोलनेवालों के द्वारा, और पराए मुख के द्वारा इन लोगों से बात करूँगा तो भी वे मेरी न सुनेंगे।" यशायाह में यह आशीष नहीं, न्याय था; जब इस्राएल ने भविष्यद्वक्ताओं की सीधी हिन्दी सुनने से इनकार किया, तो परमेश्वर ने अश्शूरी सैनिकों की अनजानी भाषा के द्वारा बात की। समझ से परे भाषा वहाँ कठोर हृदय का चिह्न है। कुरिन्थ के लोग जिसे अपनी उन्नति का प्रमाण समझ रहे थे, पौलुस उसे एक चेतावनी के पर्दे में लपेटकर लौटा देते हैं। दूसरी ओर, बाबेल में भाषाएँ बिखराव का दंड थीं और पिन्तेकुस्त में वे इकट्ठा करने का चमत्कार; जहाँ कुरिन्थ की सभा समझ से परे बोलकर फिर से बिखरती है, वहाँ वह उलटी दिशा में चल पड़ती है। और थिस्सलुनीकियों को लिखी पौलुस की चेतावनी, कि भविष्यद्वाणी को तुच्छ न जानो, इस पद की जुड़वाँ बहन है।
पहले सुननेवाले
उस भोजन-कक्ष में बैठे लोग इस वाक्य को सम्मान की भाषा में सुनते थे। यूनानी-रोमी संसार में बोलने का अधिकार दर्जे से तय होता था: धनी संरक्षक बोलता, दास सुनता। कुरिन्थ में अन्य भाषाओं का वरदान शायद उन लोगों के लिए एक नया दर्जा बन गया था, वह सीढ़ी जिस पर चढ़कर कोई भी "सबसे अधिक आत्मिक" कहला सकता था। पौलुस उस सीढ़ी को गिरा देते हैं, यह कहकर कि "तुम सब एक-एक करके भविष्यद्वाणी कर सकते हो"। उनके कानों में यह आज़ादी भी थी और झटका भी: वह दास जो कभी सार्वजनिक रूप से नहीं बोला था, अब परमेश्वर की ओर से शब्द ला सकता था; और वह आदमी जिसने अपनी पहचान अन्य भाषाओं पर टिकाई थी, अचानक खुद को दूसरी पंक्ति में पाता था।
कठिन प्रश्न
अगर भविष्यद्वाणी हर विश्वासी के लिए खुला वरदान है, तो हमारी सभाओं में वह लगभग गायब क्यों है, और जहाँ है वहाँ अक्सर इतनी भ्रामक क्यों लगती है? ईमानदारी से: कुछ कलीसियाओं ने इसे पूरी तरह बंद कर दिया, कुछ ने इसे भविष्य बताने का खेल बना दिया, और दोनों ही पौलुस के पास से गुज़र गए। उनका इलाज दमन नहीं, परख है: "शेष लोग उनके वचन को परखें।" यह जोखिम भरा रास्ता है, क्योंकि परखने के लिए परिपक्वता चाहिए और परिपक्वता समय माँगती है। पौलुस इस जोखिम को हटाते नहीं; वे मानते हैं कि एक जीवित कलीसिया में गलत शब्द बोले जाएँगे और उन्हें ठीक करना पड़ेगा। सुरक्षित चुप्पी आसान है, पर वह उस आत्मा को चुप कराती है जो बोलने के लिए आई थी।
चिंतन के प्रश्न
पिछली बार आपने किसी को ऐसा शब्द कब कहा था जिससे वह उन्नति, उपदेश या शान्ति पाकर उठा, और आप यह कैसे जान पाए कि वह शब्द आपका नहीं, परमेश्वर का था?
आपकी अपनी आत्मिक भूख किस दिशा में मुँह किए खड़ी है, अपनी गहराई की ओर या अपनी कलीसिया के निर्माण की ओर; और यह सवाल किस ठोस आदत में दिखाई देगा?
आपकी सभा में "परखने" का काम व्यावहारिक रूप से कौन करता है, और क्या वहाँ किसी नए या कमजोर जन के लिए बोलकर गलती करने की जगह बची है?
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1 Corinthians 14:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
1 कुरिन्थियों 14:1 का क्या अर्थ है?
1 कुरिन्थियों 14:1 किस विषय में है?
1 कुरिन्थियों 14:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 कुरिन्थियों 14:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 कुरिन्थियों 14:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Corinthians 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कई बार मैं दूसरों की बातें सुनकर भी समझ नहीं पाता, और अपनी बात कहकर भी अनसुना रह जाता हूँ। मुझे ऐसे शब्द दे जो दिलों तक पहुँचें, और ऐसा मन दे जो सुनना जानता हो। हमारे बीच की दूरी मिटा दे, ताकि हम एक दूसरे के लिए अजनबी न रहें।
पिता, धन्यवाद कि जब कोई मेरी बात नहीं समझता, तब भी तू सुनता है। तेरा वचन कहता है कि अन्य भाषा में बोलनेवाला "मनुष्यों से नहीं, परन्तु परमेश्वर से बातें करता है।" मेरी आहें, मेरे बिना शब्दों के आँसू, सब तेरे कान तक पहुँचते हैं। इस बात के लिए मेरा मन तेरा आभारी है।
क्योंकि यदि मैं अन्य भाषा में प्रार्थना करूँ, तो मेरा आत्मा तो प्रार्थना करता है, परन्तु मेरी समझ काम नहीं देती।"
पौलुस उस प्रार्थना को गलत नहीं कहता, बस अधूरी कहता है। आत्मा उड़ रही है और मन पीछे खड़ा रह गया है। कभी सोचा है कि तेरी प्रार्थना में तेरा दिमाग कहाँ रहता है? परमेश्वर तुझे पूरा चाहता है, भावना भी और समझ भी। अगली बार जब घुटने टेके, मन को भी साथ ले आना।
हे प्रभु, धन्यवाद कि तू भ्रम का नहीं, पर व्यवस्था का परमेश्वर है। तेरी कलीसिया में जब कोई अन्य भाषा बोले, तो दो या तीन ही बोलें, बारी बारी से, और एक अनुवाद करे, यह सिखाने के लिए तेरा शुक्रिया। तेरी बुद्धि हमें मर्यादा और सुनने का मन देती है।
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