1 तीमुथियुस 2:5
पाठ
पौलुस प्रार्थना की बात करते-करते अचानक एक ऐसे वाक्य पर पहुँचते हैं जो किसी विश्वास-कथन की तरह ठोस है: "क्योंकि परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।" एक ही परमेश्वर, एक ही मध्यस्थ, और वह मध्यस्थ कोई स्वर्गीय दूत नहीं बल्कि एक मनुष्य है। अगले ही वाक्य में पौलुस जोड़ते हैं कि इसी मसीह ने "अपने आपको सब के छुटकारे के दाम में दे दिया।" यानी मध्यस्थता कोई वकालत नहीं, कीमत चुकाना है।
मर्म
इस छोटे वाक्य में दो सत्य एक-दूसरे से बँधे हैं। पहला, परमेश्वर एक ही है। यह इस्राएल की सबसे पुरानी स्वीकारोक्ति है, वह पंक्ति जो हर यहूदी घर में सुबह-शाम दोहराई जाती थी। दूसरा, इस एक परमेश्वर तक पहुँचने का रास्ता भी एक ही है। ध्यान दीजिए, पौलुस कहते हैं कि मध्यस्थ "मनुष्य है"। परमेश्वर और मनुष्य के बीच जो खाई है, वह ऊपर से पाटी नहीं गई, उसमें कोई उतरा। यहीं पर देहधारण का पूरा वजन टिका है: यदि मसीह सचमुच मनुष्य नहीं होते, तो वे हमारी ओर से खड़े नहीं हो सकते थे; यदि वे केवल मनुष्य होते, तो परमेश्वर की ओर से बोल नहीं सकते थे। और यह मध्यस्थता मुफ्त नहीं थी। "छुटकारे के दाम" वाला शब्द बाज़ार और गुलामी की दुनिया से आता है, जहाँ किसी को आज़ाद कराने के लिए असली सिक्के गिने जाते थे।
सूत्र
पुराने नियम की पूरी कहानी मध्यस्थों की कहानी है, और हर मध्यस्थ अधूरा रह जाता है। मूसा पहाड़ पर चढ़कर परमेश्वर के क्रोध और लोगों के पाप के बीच खड़ा होता है और अपने आपको मिटा देने तक की पेशकश करता है, पर वह स्वयं वादे के देश में नहीं जा पाता। हारून प्रायश्चित्त के दिन पर्दे के भीतर जाता है, पर हर साल फिर से जाना पड़ता है, क्योंकि उसका अपना पाप भी बलिदान माँगता है। अय्यूब कराहता है कि काश कोई होता जो परमेश्वर और उस पर एक साथ हाथ रख सके। पौलुस का वाक्य उसी लंबी प्रतीक्षा का उत्तर है। वाचा हमेशा किसी मध्यस्थ के हाथ से आई, और अंतिम वाचा उस मध्यस्थ के हाथ से आई जो स्वयं ही दाम बन गया।
दर्पण
हम धर्म को अक्सर पुल बनाने का काम समझते हैं। थोड़ी और प्रार्थना, थोड़ी और सेवा, रविवार की उपस्थिति, पिछले साल की वह गलती जिसे किसी तरह ढँकना है। यह आयत उस पूरे उद्योग को बंद कर देती है। बीच में खड़े होने के लिए कोई और जगह खाली नहीं है, न आपके अच्छे कामों के लिए, न आपके अपराध-बोध के लिए। और यह उतना ही चुभता भी है: यदि केवल एक ही मध्यस्थ है, तो मेरा वह पड़ोसी, वह सहकर्मी, वह रिश्तेदार जिसके साथ मेरा झगड़ा है, उसके लिए भी वही एक रास्ता है जो मेरे लिए है। पौलुस ने यह वाक्य प्रार्थना के संदर्भ में लिखा है, यह संयोग नहीं। जिसे आप मसीह से बाहर मान बैठे हैं, उसका नाम आपकी प्रार्थना में आना चाहिए।
संदर्भ
तीमुथियुस इफिसुस में है, रोमी साम्राज्य के एक बड़े व्यापारिक शहर में, जहाँ अरतिमिस का विशाल मंदिर खड़ा था और देवताओं की भीड़ रोज़मर्रा का हिस्सा थी। उस दुनिया में हर काम के लिए एक अलग देवता था और हर देवता तक पहुँचने के लिए अलग पुजारी, अलग चढ़ावा, अलग रस्म। सम्राट को भी "उद्धारकर्ता" कहा जाता था और उसके लिए मंदिर बने थे। इसी माहौल में पौलुस मंडली से कहते हैं कि राजाओं के लिए प्रार्थना करो, पर उन्हें पूजो मत, क्योंकि "परमेश्वर एक ही है।" यह वाक्य उस शहर में केवल धार्मिक कथन नहीं था, वह एक राजनीतिक जोखिम भी था।
पाठकवर्ग
इफिसुस की मंडली में यहूदी भी थे और अन्यजाति भी। यहूदी विश्वासी "परमेश्वर एक ही है" सुनकर तुरंत अपनी बचपन की स्वीकारोक्ति पहचान लेते, और फिर चौंक जाते, क्योंकि उसी साँस में मसीह यीशु को परमेश्वर और मनुष्यों के बीच अकेला मध्यस्थ कहा जा रहा था। अन्यजाति विश्वासियों के लिए यह और भी बड़ी राहत थी: उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर, पर्दे के बाहर खड़ा नहीं रहना था। पौलुस स्वयं आगे कहते हैं कि वे "अन्यजातियों के लिये विश्वास और सत्य का उपदेशक ठहराया गया।" जो कभी बाहरी थे, उनके लिए भी वही एक द्वार खुला है, और वह द्वार चौड़ा नहीं है, पर खुला है।
अंतर्पाठ
पद 4 पौलुस के इस दावे की जड़ है: परमेश्वर "यह चाहता है, कि सब मनुष्यों का उद्धार हो; और वे सत्य को भली भाँति पहचान लें।" इसके साथ जुड़ा हुआ संदर्भ यहेजकेल 18 है, जहाँ परमेश्वर कहते हैं कि दुष्ट की मृत्यु में उन्हें कोई प्रसन्नता नहीं। एक ही मध्यस्थ का सत्य इसलिए संकीर्णता नहीं, बल्कि उस परमेश्वर की उदारता है जो किसी को खोना नहीं चाहते। दूसरी ओर, इब्रानियों की पत्री इसी मध्यस्थता को महायाजक की भाषा में खोलती है: एक ऐसा याजक जो हमारी कमज़ोरियों में हमारे साथ दुख उठा चुका है और जिसे हर साल फिर से बलि नहीं चढ़ानी पड़ती। दोनों मिलकर एक ही बात कहते हैं: द्वार एक है, और वह द्वार खुला रखा गया है।
चिंतन
यदि परमेश्वर तक पहुँचने का काम पूरी तरह मसीह के हाथ में है, तो मेरे जीवन में कौन-सी कोशिश असल में उस जगह को भरने की कोशिश है जो पहले से भरी हुई है?
किस व्यक्ति का नाम मैं इसलिए प्रार्थना से बाहर रखता हूँ क्योंकि मन ही मन मैंने उसे उस "सब मनुष्यों" की सूची से काट दिया है?
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1 Timothy 2:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 तीमुथियुस 2:5 का क्या अर्थ है?
1 तीमुथियुस 2:5 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 2:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 तीमुथियुस 2:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 2:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 2 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
और आदम बहकाया न गया, पर स्त्री बहकावे में आकर अपराध में पड़ गई।" बहकावे में आना, यही सबसे डरावनी बात है। हव्वा ने जान बूझकर बगावत नहीं की थी, वह बस एक मीठी सी बात पर भरोसा कर बैठी। आज भी झूठ चिल्लाकर नहीं आता, वह समझाकर आता है। इसलिए परमेश्वर का वचन किसी और के मुँह से सुनना काफी नहीं, तुझे खुद उसे जानना होगा।
परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।" ध्यान दे, पौलुस यह बात तब कहता है जब वह सब मनुष्यों के लिए प्रार्थना करने को कह रहा है। यानी जिस दरवाज़े से तू भीतर आया, वही दरवाज़ा उसके लिए भी खुला है जिसे तू सबसे दूर समझता है। तेरी प्रार्थना में उसका नाम है?
पौलुस पहले हव्वा की चूक याद दिलाता है, और फिर तुरंत जीवन की ओर मुड़ जाता है। जहाँ शाप गहरा था, वहीं परमेश्वर ने आशा रख दी। "फिर भी बच्चे जनने के द्वारा उसका उद्धार होगा; यदि वे संयम सहित विश्वास, प्रेम और पवित्रता में स्थिर रहें।" ध्यान दे, ज़ोर बच्चों पर नहीं, स्थिर रहने पर है। तेरी रोज़ की छोटी सी वफ़ादारी उसकी नज़र से छिपी नहीं।
स्त्री चुपचाप, पूरी अधीनता में सीखे।" इस वाक्य में जो सबसे पहले चुभता है वह शायद "चुपचाप" है, पर ठहरकर देखो, आज्ञा तो सीखने की है। उस समय में यह कहना ही बड़ी बात थी कि वह भी शिष्य बने, परमेश्वर का वचन सुने। सवाल यह है कि क्या तू सीखने को तैयार है, या पहले से सब जानने के भ्रम में बैठा है?
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