1 तीमुथियुस 4
पाठ
पौलुस चेतावनी देता है कि आगे ऐसे समय आएँगे जब कुछ लोग विश्वास छोड़ देंगे और भरमानेवाली शिक्षाओं के पीछे चल पड़ेंगे; ये शिक्षक विवाह पर रोक लगाएँगे और कुछ भोजनों को वर्जित ठहराएँगे, यानी उस सृष्टि को अस्वीकार करेंगे जिसे परमेश्वर ने धन्यवाद के साथ ग्रहण करने के लिए बनाया है। इसके सामने पौलुस तीमुथियुस को एक दूसरी दिशा देता है: कहानियों से दूर रह, भक्ति में खुद को प्रशिक्षित कर, जवानी के बावजूद आदर्श बन, पढ़ने-सिखाने में लौलीन रह, और अपने वरदान की उपेक्षा मत कर। अध्याय का अंत एक भारी वाक्य पर होता है: अपनी और अपने उपदेश की चौकसी तेरे और तेरे सुननेवालों के उद्धार से जुड़ी है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि पौलुस झूठी शिक्षा को कहाँ पकड़ता है: सृष्टि के सिद्धांत में। "परमेश्वर की सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है, और कोई वस्तु अस्वीकार करने के योग्य नहीं।" यह उत्पत्ति 1 की गूँज है, और यही इस अध्याय की धुरी है। जो लोग विवाह और भोजन को त्यागकर अधिक पवित्र दिखते हैं, वे असल में सृष्टिकर्ता पर आरोप लगा रहे हैं, मानो पदार्थ, देह और आनंद स्वयं अशुद्ध हों। बाइबल की पवित्रता कभी सृष्टि से भागना नहीं है; वह सृष्टि को परमेश्वर के हाथ से लेकर, धन्यवाद के साथ, उनकी इच्छा के अधीन भोगना है। इसलिए शुद्धिकरण का साधन कोई नियम नहीं, बल्कि "परमेश्वर के वचन और प्रार्थना" है: वचन बताता है कि यह अच्छा है, प्रार्थना उसे देनेवाले को स्वीकार करती है। कृपा भोजन की थाली तक पहुँचती है।
जुड़ा हुआ सूत्र
यह अध्याय उस लंबी कहानी में खड़ा है जो "परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है" से शुरू होती है, जो जलप्रलय के बाद नूह को जीवजंतु खाने की छूट में आगे बढ़ती है, और जो मसीह में अपने चरम पर पहुँचती है, जहाँ शुद्ध-अशुद्ध की दीवार गिर जाती है। पुराने नियम के भोजन-नियम इस्राएल को राष्ट्रों से अलग करने का चिन्ह थे, छाया थे; मसीह के आने पर छाया अपने शरीर में समा गई। इसीलिए पौलुस "विश्वासी और सत्य के पहचाननेवाले" कहता है: सुसमाचार जाननेवाला जानता है कि उसकी स्वच्छता उसके मेनू से नहीं, क्रूस से आती है। और वचन 10 इसे व्यापक करता है: जीविता परमेश्वर "सब मनुष्यों का और विशेष रूप से विश्वासियों का उद्धारकर्ता है", यानी सृष्टि का पालक और वाचा का मुक्तिदाता एक ही हैं।
आइना
धार्मिकता की एक चालाक नकल है जो त्याग की भाषा बोलती है। हम भी इसे जानते हैं: वह आवाज़ जो कहती है कि अगर मैं और कम सोऊँ, और कम खाऊँ, और कम हँसूँ, तो परमेश्वर मुझसे अधिक प्रसन्न होंगे। इसमें एक छिपा गर्व है, क्योंकि त्याग को नापा जा सकता है और दूसरों से तुलना की जा सकती है; कृपा को नहीं। दूसरी ओर पौलुस तीमुथियुस से आलस्य भी स्वीकार नहीं करता: "भक्ति में खुद को प्रशिक्षित कर" एक व्यायामशाला का शब्द है, पसीने वाला शब्द। अंतर नियत का है। एक प्रशिक्षण परमेश्वर की स्वीकृति कमाने के लिए है, दूसरा उस स्वीकृति के भीतर बढ़ने के लिए। आज एक छोटा काम कीजिए: अपने अगले भोजन से पहले ज़ोर से, नाम लेकर, उस थाली में रखी हर चीज़ के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दीजिए, जल्दबाज़ी की रटी हुई प्रार्थना नहीं, बल्कि पूरे वाक्यों में।
प्रश्न
वचन 16 खटकता है: "तू अपने, और अपने सुननेवालों के लिये भी उद्धार का कारण होगा।" क्या उद्धार मनुष्य के परिश्रम पर टिका है? पौलुस ही लिखता है कि हमारी आशा जीविते परमेश्वर पर है, वही उद्धारकर्ता हैं। तो फिर यह वाक्य क्यों? इसे मीठा करके टालना बेईमानी होगी। बाइबल परमेश्वर की सम्पूर्ण पहल और मनुष्य की सच्ची ज़िम्मेदारी को साथ-साथ रखती है, बिना समझाए कि दोनों तर्क में कैसे मिलते हैं। परमेश्वर उद्धार देते हैं, और वे उसे शिक्षकों, माता-पिताओं, मित्रों के लड़खड़ाते मुँह से देते हैं। इसका अर्थ है कि आपकी लापरवाही किसी और की आत्मा को छू सकती है। यह बोझ हल्का नहीं होता; यह केवल सही जगह रखा जाता है, उनके हाथ में जो अकेले बचाते हैं और फिर भी हमें काम पर लगाते हैं।
अंतर्पाठ
पतरस की छत पर देखी गई दृष्टि, जहाँ उसे पशु खाने को कहा जाता है और वह मना करता है, ठीक इसी सिद्धांत पर उतरती है: जिसे परमेश्वर शुद्ध ठहराते हैं, उसे मनुष्य अशुद्ध न कहे। पौलुस यहाँ उसी सत्य को भोजन से आगे बढ़ाकर विवाह तक ले जाता है, क्योंकि दोनों सृष्टि की देन हैं। इसके विपरीत कुलुस्सियों में उन नियमों की चर्चा है जो "मत छू, मत चख" कहते हैं और जो देह को दबाने में कुछ भी हासिल नहीं करते। दोनों जगह निशाना एक ही है: एक ऐसी धार्मिकता जो शरीर से घृणा करके आत्मा को ऊँचा उठाना चाहती है, और इस प्रयास में सृष्टिकर्ता को ही ठुकरा देती है।
मुख्य पात्र
तीमुथियुस इस अध्याय में एक असहज जगह पर खड़ा है: जवान, नाज़ुक स्वभाव का, अनुभवी झूठे शिक्षकों के सामने एक कलीसिया का ज़िम्मेदार। "कोई तेरी जवानी को तुच्छ न समझने पाए" से साफ़ है कि लोग उसे तुच्छ समझ रहे थे, और वह यह महसूस कर रहा था। पौलुस उसे आत्मविश्वास का भाषण नहीं देता; वह उसे काम देता है, और उसकी नींव याद दिलाता है: प्राचीनों के हाथ रखने और भविष्यद्वाणी के द्वारा मिला वरदान, जिसकी उपेक्षा वह कर सकता था। यहाँ मनुष्य का चित्र यथार्थ है: बुलाया हुआ, पर डरा हुआ; वरदान पाया हुआ, पर उसे दबाए बैठा। और परमेश्वर का चित्र भी: वे ऐसे ही लोगों के हाथ में अपनी कलीसिया देते हैं, और उन्हें वचन, चाल चलन, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में धीरे-धीरे ढालते हैं, जब तक "उन्नति सब पर प्रगट" न हो जाए।
चिंतन
आप अपने जीवन में किस त्याग को गुप्त रूप से परमेश्वर की स्वीकृति कमाने का साधन बना बैठे हैं, और धन्यवाद उसकी जगह कैसे ले सकता है?
परमेश्वर ने आपको जो वरदान दिया है, उसके प्रति आप "निश्चिन्त" कहाँ हो गए हैं, और उसे फिर से काम में लाने का पहला कदम क्या होगा?
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1 Timothy 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 तीमुथियुस 4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि मेरा विवेक जलते हुए लोहे से दागा नहीं गया। जब मैं गलत राह पर बढ़ता हूँ, तो भीतर आपकी आवाज़ चुभती है और मुझे रोक लेती है। यह कोमल मन आपका ही दिया उपहार है। धन्यवाद कि आपने मुझे कपट से नहीं, सच्चाई से जीने के लिए बुलाया है।
पिता, कई बार मेहनत करते करते थक जाता हूँ और लगता है कि सब बेकार है। फिर याद आता है कि मेरी आशा किसी नतीजे पर नहीं, जीवित तुझ पर टिकी है। तू सबका उद्धारकर्ता है, और मुझे भी थामे हुए है। इसी भरोसे के साथ आज फिर काम में लगता हूँ।
कुछ लोग सिखा रहे थे कि विवाह मत करो, यह मत खाओ, वह मत छूओ। पौलुस ने कहा, परमेश्वर की बनाई हर चीज़ अच्छी है, "क्योंकि परमेश्वर के वचन और प्रार्थना से वह पवित्र हो जाता है।" यानी रोटी का टुकड़ा भी, जब तू उसके वचन को याद करके धन्यवाद देता है, पवित्र बन जाता है। तेरी थाली, तेरा घर, तेरा काम। क्या तू इन्हें साधारण समझकर जी रहा है?
पिता, आज की रोटी, दाल और पानी के लिए धन्यवाद। तेरा वचन कहता है कि तेरी सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है और कोई वस्तु त्यागने के योग्य नहीं। धन्यवाद कि मेज़ पर रखी साधारण थाली भी तेरे हाथ का दिया हुआ उपहार है, और मैं इसे धन्यवाद के साथ ग्रहण करता हूँ।
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