1 तीमुथियुस 6:6
पाठ
पौलुस ने अभी-अभी उन शिक्षकों का चित्र खींचा है "जो समझते हैं कि भक्ति लाभ का द्वार है" (पद 5), यानी जो धर्म को कमाई का जरिया बना लेते हैं। और फिर, जैसे किसी ने बीच वाक्य में शब्द छीनकर उसे उलट दिया हो, वह कहता है: "पर सन्तोष सहित भक्ति बड़ी लाभ है।" वह "लाभ" शब्द को फेंकता नहीं, छोड़ता नहीं, बल्कि उसे उठाकर उसका अर्थ बदल देता है। हाँ, भक्ति में लाभ है, बहुत बड़ा लाभ; पर वह लाभ तब मिलता है जब भक्ति के साथ सन्तोष चलता हो, न कि तब जब भक्ति किसी और चीज़ पाने का साधन बन जाए। एक ही शब्द, दो बिलकुल विपरीत दुनियाएँ।
मर्म
यहाँ सवाल यह नहीं है कि विश्वास से फायदा होता है या नहीं। सवाल यह है कि फायदा किस चीज़ को कहते हैं। झूठे शिक्षक भक्ति को एक निवेश समझते थे: परमेश्वर में लगाओ, संसार में वसूल करो। पौलुस कहता है कि जो व्यक्ति परमेश्वर के साथ जीता है और साथ ही यह जान चुका है कि उसे और कुछ चाहिए ही नहीं, वही सबसे धनी आदमी है, चाहे उसकी तिजोरी खाली हो। सन्तोष यहाँ स्वभाव नहीं, फल है; यह उस मन में उगता है जिसने परमेश्वर को साधन की जगह लक्ष्य मान लिया है। और यही अनुग्रह का तर्क है: परमेश्वर कोई ऐसे देवता नहीं जिनसे सौदा किया जाए, वे स्वयं ही वह पूँजी हैं जिसे पाकर आदमी की भूख शान्त होती है।
जोड़ने वाला सूत्र
पौलुस जो कह रहा है, वह मसीह के जीवन का ही गद्य में अनुवाद है। जिस परमेश्वर ने इस्राएल को जंगल में हर सुबह उतना ही मन्ना दिया जितना उस दिन के लिए काफ़ी था, न इससे ज़्यादा जो जमा हो सके, वही परमेश्वर अपने पुत्र में इतने नीचे उतरे कि उनके पास सिर रखने की जगह न रही। और इसी अध्याय में पौलुस उस क्षण की याद दिलाता है जब यीशु ने "पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया" (पद 13): वहाँ खड़ा आदमी सचमुच कंगाल था, उसके पास सत्ता नहीं, समर्थक नहीं, बचाव नहीं, केवल पिता के साथ का रिश्ता। और वही सबसे धनी था। छुटकारे की पूरी कहानी इसी उलटफेर पर टिकी है: जो सब कुछ खो देता है और परमेश्वर को पकड़े रहता है, उसने कुछ नहीं खोया।
आईना
अब ईमानदारी से पूछिए: आपकी प्रार्थनाओं में परमेश्वर किस भूमिका में हैं? क्या वे वह व्यक्ति हैं जिनसे आप बात करना चाहते हैं, या वह दरवाज़ा हैं जिससे होकर आप कहीं और पहुँचना चाहते हैं? नौकरी में प्रमोशन, बच्चे का दाखिला, बीमारी से चंगाई, घर की किश्त। इनमें से कोई भी माँगना गलत नहीं है। पर एक सवाल चुभता है: अगर इनमें से कुछ भी न मिले, तो क्या परमेश्वर के साथ आपका रिश्ता वैसा ही बना रहेगा, या भीतर कहीं एक ठंडी शिकायत जम जाएगी कि सौदा पूरा नहीं हुआ?
असन्तोष का सबसे बड़ा झूठ यह है कि वह हमेशा भविष्य में रहता है। थोड़ा और, फिर चैन आएगा। पर वह "थोड़ा और" कभी नहीं आता, क्योंकि वह चीज़ों का नहीं, मन का अकाल है। और यह अकाल भक्ति के भीतर भी घुस आता है: हम अपनी सेवा, अपनी नियमितता, अपने दान को चुपचाप एक रसीद की तरह सँभालकर रखते हैं, और उम्मीद करते हैं कि परमेश्वर उसे भुनाएँगे।
आज यह कीजिए: अपने फोन में वह शॉपिंग कार्ट या विशलिस्ट खोलिए जिसे आप बार-बार देखते हैं, और उसमें से एक चीज़ हटा दीजिए, और हटाते समय ज़ोर से कहिए, "सन्तोष सहित भक्ति बड़ी लाभ है।"
पृष्ठभूमि
तीमुथियुस इफिसुस में है, रोमी साम्राज्य के एक अमीर बंदरगाह शहर में, जहाँ अरतिमिस का विशाल मन्दिर धर्म और अर्थव्यवस्था दोनों का केन्द्र था। वहाँ धर्म से पैसा कमाना कोई घोटाला नहीं, एक स्थापित पेशा था। घूमते-फिरते दार्शनिक और गुरु शिष्यों से शुल्क लेते, संरक्षकों के घरों में रहते, और अपनी वाक्पटुता को बेचते थे। इसी माहौल में कुछ लोग कलीसिया के भीतर वही मॉडल ले आए थे: बहस, शब्दों की कुश्ती, और उससे कमाई। पौलुस उन्हें पद 4 में "अभिमानी" कहता है और साफ कहता है कि उन्हें "विवाद और शब्दों पर तर्क करने का रोग है"। पद 6 उस पूरे धंधे के आर-पार खींची गई एक लकीर है।
एक बारीकी
"सन्तोष" के लिए पौलुस जो यूनानी शब्द चुनता है, वह है ऑटार्केइया, जिसका शाब्दिक अर्थ है "अपने आप में पर्याप्त होना"। यह उस समय के दार्शनिकों का प्रिय शब्द था: वे सिखाते थे कि सच्चा आदमी वही है जिसे बाहर से कुछ नहीं चाहिए, जो अपनी इच्छाओं को इतना काट दे कि परिस्थिति उसे छू न सके। पौलुस शब्द तो उधार लेता है, पर उसकी जड़ बदल देता है। मसीही सन्तोष आत्मनिर्भरता नहीं है; वह भीतर की सख्ती से नहीं, बल्कि इस भरोसे से आता है कि परमेश्वर "हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से देता है" (पद 17)। यानी मैं इसलिए शान्त नहीं कि मुझे किसी की ज़रूरत नहीं, बल्कि इसलिए कि मेरी ज़रूरत जिनके हाथ में है, वे भरोसेमंद हैं।
मुख्य पात्र
इस वाक्य के पीछे जो चेहरा खड़ा है, वह परमेश्वर का है, और पौलुस उसे कुछ पदों बाद खोलकर दिखाता है: "एकमात्र अधिपति और राजाओं का राजा, और प्रभुओं का प्रभु", जो "अगम्य ज्योति में रहता है" (पद 15-16)। यह वर्णन संयोग नहीं है। जिस परमेश्वर से हम सौदा करना चाहते हैं, वे किसी के मोहताज नहीं; उन्हें हमारी भक्ति से कुछ मिलता नहीं। और ठीक इसीलिए उनका देना अनुग्रह है, लेन-देन नहीं। एक ऐसे राजा के सामने खड़ा होना जिसे रिश्वत नहीं दी जा सकती, पहले डराता है और फिर अजीब तरह से हल्का कर देता है। क्योंकि जहाँ सौदा नहीं होता, वहाँ असफल होने का डर भी नहीं होता। वहाँ केवल दिया जाता है।
शास्त्र की गूँज
अगला ही पद अय्यूब की ओर इशारा करता है: वह आदमी जिसने एक ही दिन में सब खोकर परमेश्वर को धन्य कहा। पौलुस राख पर बैठे उस व्यक्ति को अपने तर्क का गवाह बनाता है, क्योंकि अय्यूब की कहानी ठीक यही सवाल पूछती है जो शैतान ने उठाया था: क्या इंसान परमेश्वर से बिना फायदे के भी प्रेम कर सकता है? दूसरी गूँज पौलुस के अपने जीवन से आती है। फिलिप्पियों को लिखते हुए, जेल से, वह कहता है कि उसने हर हाल में सन्तुष्ट रहना सीख लिया है। "सीख लिया" शब्द महत्वपूर्ण है। सन्तोष जन्मजात स्वभाव नहीं, एक शिष्यता है, जो कमी और बहुतायत दोनों के स्कूल में सिखाई जाती है।
पहले सुननेवाले
इस पत्र को सुननेवालों में वे दास भी थे जिनका ज़िक्र इसी अध्याय के पहले पद में है, "जितने दास जूए के नीचे हैं"। कल्पना कीजिए कि उनके कानों में यह वाक्य कैसे पड़ा होगा। उनके पास न सम्पत्ति थी, न अपना शरीर, न भविष्य की योजना। और उन्हीं की सभा में कुछ लोग सिखा रहे थे कि सच्ची भक्ति से समृद्धि आती है, यानी परोक्ष रूप से कि इन दासों की भक्ति कहीं कमज़ोर है। पौलुस का वाक्य उस अपमान को काट देता है। वह दास से कहता है: तेरे पास वह पूँजी है जो तेरे मालिक के पास नहीं। और थोड़ी देर बाद वह अमीरों को आज्ञा देता है कि "वे अभिमानी न हों और अनिश्चित धन पर आशा न रखें" (पद 17)। कलीसिया में हिसाब उलटा चलता है।
कठिन प्रश्न
पर एक बात खटकती है। पद 8 कहता है, "और यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए।" और जिसके पास खाने को भी नहीं है? क्या उसका असन्तोष पाप है? पौलुस यहाँ हर गरीबी को पवित्र नहीं ठहरा रहा, और न ही वह भूखे आदमी को चुप रहने को कह रहा है। ध्यान दीजिए कि वह अमीरों को दान और उदारता की आज्ञा देकर ही यह अध्याय आगे बढ़ाता है, यानी अभाव को दूर करना कलीसिया का काम है, न कि उसे आध्यात्मिक बताना। फिर भी सवाल पूरी तरह हल नहीं होता, और शायद होना भी नहीं चाहिए। यह वाक्य उस आदमी के लिए है जिसके पास कुछ है और जो और चाहता है, न कि उस पर फेंकने के लिए जिसके पास कुछ नहीं। जब हम इसे भूखों पर लागू करते हैं, हम इसका दुरुपयोग करते हैं।
मनन के प्रश्न
अगर परमेश्वर आपको वह न दें जिसके लिए आप इस समय सबसे ज़्यादा प्रार्थना कर रहे हैं, तो आपकी भक्ति में क्या बदलेगा?
आपके जीवन में वह "थोड़ा और" इस समय किस चीज़ का नाम है, और आप कब से उसका पीछा कर रहे हैं?
आपके आसपास कौन है जिसके पास "खाने और पहनने को" पूरा नहीं है, और इस सप्ताह आपकी उदारता उस तक कैसे पहुँच सकती है?
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1 Timothy 6:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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1 तीमुथियुस 6:6 का क्या अर्थ है?
1 तीमुथियुस 6:6 किस विषय में है?
1 तीमुथियुस 6:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
1 तीमुथियुस 6:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
1 तीमुथियुस 6:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
1 Timothy 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें शब्दों पर बहस करने के उस रोग से सचेत किया, जिससे डाह, झगड़े और बुरे संदेह पैदा होते हैं। धन्यवाद कि आपके मसीह के खरे वचन हमें घमंड से बचाकर नम्रता और शांति में थामे रखते हैं।
धन्यवाद, प्रभु, कि मेरी मेहनत की सबसे छोटी जगह भी तेरे नाम की गवाही बन सकती है। जिनके अधीन मुझे काम करना है, उन्हें आदर देने की शक्ति तू देता है, ताकि तेरे नाम और उपदेश की निन्दा न हो। मेरा हर दिन तेरी नज़र में कीमती है।
पिता, धन्यवाद कि आपने हमें सत्य से विहीन नहीं छोड़ा, बल्कि अपने वचन में स्थिर रखा है। धन्यवाद कि भक्ति हमारे लिए कमाई का द्वार नहीं, बल्कि आपके साथ जीने का आनंद है। व्यर्थ के रगड़े झगड़ों से हमारा मन बचाइए और शुद्ध बुद्धि दीजिए।
पिता, मेरे हाथ जो थामे बैठे हैं उसे खोलना सिखा। मुझे पैसों में नहीं, भलाई में अमीर बना दे। जब किसी की ज़रूरत मेरे सामने आए, तो मैं हिसाब लगाने की जगह बाँटने को तैयार रहूँ। तेरी उदारता ही मेरा नाप बने।
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