प्रेरितों के काम 17:24
पाठ
अरियुपगुस की चट्टान पर खड़ा वह आदमी ऊपर की ओर इशारा नहीं करता, पर सबकी आँखें वहीं जाती हैं: ठीक सिर के ऊपर एक्रोपोलिस, संगमरमर का पार्थेनन, भीतर सोने और हाथीदाँत की अथेने। और पौलुस कहता है: "जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उसकी सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।" यानी: जो सचमुच परमेश्वर है, उसने यह सब बनाया; और जिसने सब बनाया, उसे तुम्हारे बनाए हुए किसी कमरे में ठहराया नहीं जा सकता। पिछली आयत की वह "अनजाने ईश्वर" वाली वेदी अब नाम पा रही है, और वह नाम इस पूरे नगर की धार्मिकता को उलट देता है।
हृदय
यह वाक्य विनम्र नहीं है, यह ढहाने वाला है। एथेंस का पूरा धार्मिक तन्त्र इसी धारणा पर टिका था कि देवता को एक जगह बाँधा जा सकता है, बुलाया जा सकता है, सेवा-टहल से सन्तुष्ट रखा जा सकता है। पौलुस उस सौदेबाज़ी की जड़ काट देता है: सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच की रेखा को कोई कारीगर पार नहीं कर सकता। जो सब कुछ का स्वामी है, वह किसी का किरायेदार नहीं बनता। और यहीं इस बात की दूसरी धार है, जो सान्त्वना देती है: ऐसा परमेश्वर हमारी पूजा का मुहताज नहीं, इसलिए उसकी निकटता हमारी कारीगरी पर निर्भर नहीं करती। वह घिरता नहीं, इसीलिए वह कहीं भी, किसी के भी पास, पहुँच सकता है।
सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में यह तनाव चलता रहता है: परमेश्वर अपने लोगों के बीच बसना चाहते हैं, पर कोई दीवार उन्हें थाम नहीं सकती। मिलापवाले तम्बू से लेकर सुलैमान के मन्दिर तक, समर्पण के दिन ही सुलैमान ने स्वीकार किया कि आकाशों का आकाश भी परमेश्वर के लिए छोटा है, तो यह घर क्या होगा। मन्दिर कभी परमेश्वर का पता नहीं था, वह उनकी कृपा का चिह्न था। और फिर वह हुआ जिसकी किसी कारीगर ने कल्पना नहीं की थी: परमेश्वर ने पत्थर में नहीं, देह में वास किया। पौलुस इसी ओर बढ़ रहा है, क्योंकि आयत 31 में वह "उस मनुष्य" तक पहुँचता है जिसे परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया। हाथ के बनाए मन्दिर गिरते हैं; जी उठा हुआ मसीह वह जीवित स्थान है जहाँ परमेश्वर हमसे मिलते हैं।
दर्पण
हम मूर्तियाँ नहीं गढ़ते, पर हम कमरे ज़रूर बनाते हैं जिनमें परमेश्वर को ठहराना चाहते हैं। रविवार की सुबह का वह डेढ़ घंटा, वह विशेष कुर्सी जहाँ बैठकर हम "आत्मिक" महसूस करते हैं, वह सेवा जिसे करते हुए लगता है कि अब हिसाब बराबर है। और उन दीवारों के बाहर, सोमवार की ऑफ़िस मीटिंग में, बैंक के मैसेज में, बीमार माता-पिता के कमरे में, हम ऐसे जीते हैं जैसे परमेश्वर वहाँ किरायेदार भी नहीं। यह आयत उस बँटवारे को तोड़ती है। स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी आपके दफ़्तर का भी स्वामी है, और आपके पैसे का, और उस रिश्ते का जिसे आप उससे छिपाकर रखते हैं। आज अपने घर के सबसे साधारण कोने में, रसोई में या सीढ़ी पर, खड़े होकर ज़ोर से कहिए: "आप यहाँ भी स्वामी हैं," और वहीं एक मिनट प्रार्थना कीजिए।
अन्य वचनों की गूँज
सुलैमान की वह प्रार्थना, जिसमें वह मन्दिर के उद्घाटन पर ही मानता है कि परमेश्वर उसमें समा नहीं सकते, दिखाती है कि पौलुस कोई नई बात नहीं कह रहा; वह इस्राएल के अपने विश्वास की सबसे पुरानी चेतावनी दोहरा रहा है। और स्तिफनुस ने महासभा के सामने लगभग यही शब्द कहे थे, कि परमेश्वर हाथ के बनाए घरों में नहीं रहते, और उसी वाक्य पर पत्थर चले। ध्यान दीजिए: वही बात जो यरूशलेम में निन्दा थी, एथेंस में दर्शन की चर्चा बन जाती है। पौलुस, जो उन पत्थरों के समय वहीं खड़ा था, अब वही सत्य यूनानियों के सामने रख रहा है। सुसमाचार दोनों जगह एक ही चीज़ छीनता है: परमेश्वर पर हमारा नियन्त्रण।
पहले सुननेवाले
अरियुपगुस पर बैठे लोग मूर्ख नहीं थे। स्तोईकी दार्शनिक भी मानते थे कि ईश्वर मन्दिरों में सीमित नहीं; कवियों ने भी ऐसा लिखा था। तो शुरू में पौलुस की बात उन्हें परिचित, यहाँ तक कि सभ्य लगी होगी, सिर हिलाने लायक। पर उनका दर्शन उनके शहर को नहीं बदलता था; वे विचार में मन्दिरों से ऊपर थे और व्यवहार में हर पर्व, हर बलि, हर वेदी के साथ चलते थे। पौलुस उस आराम को नहीं रहने देता। वह कहता है कि यह अनजाना परमेश्वर केवल एक विचार नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता और स्वामी है जो अब मन फिराने की आज्ञा देता है। यहीं सभ्य सहमति टूटती है, और आयत 32 का उपहास शुरू होता है।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर किसी इमारत में नहीं रहते, तो हम गिरजाघर क्यों बनाते हैं, और क्यों कुछ जगहें हमें सचमुच परमेश्वर के निकट कर देती हैं? पौलुस जगहों को नकार नहीं रहा; वह सौदे को नकार रहा है। ख़तरा इमारत में नहीं, उस चुपचाप पलने वाली धारणा में है कि परमेश्वर वहाँ बँधे हैं और इसलिए बाक़ी जगहों में हम स्वतन्त्र हैं। पर एक बेचैनी बची रहती है: परमेश्वर हमारे बनाए मन्दिरों में नहीं रहते, फिर भी वे हमारे बीच रहना चाहते हैं, और यह चाह उन्हें देह और क्रूस तक ले गई। इस विरोधाभास को सुलझाया नहीं जा सकता, केवल झुककर स्वीकारा जा सकता है: जिसे कोई दीवार थाम नहीं सकती, वह स्वयं को थमा देता है।
चिन्तन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन सा हिस्सा अब भी "मन्दिर के बाहर" है, जहाँ आप व्यवहार में परमेश्वर को स्वामी नहीं मानते?
आप परमेश्वर को क्या देकर उन्हें सन्तुष्ट या अपने पक्ष में रखना चाहते हैं, और यह आयत उस सौदे के बारे में क्या कहती है?
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Acts 17:24 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
प्रेरितों के काम 17:24 का क्या अर्थ है?
प्रेरितों के काम 17:24 किस विषय में है?
प्रेरितों के काम 17:24 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
प्रेरितों के काम 17:24 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
प्रेरितों के काम 17:24 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Acts 17 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यासोन ने कुछ खास नहीं किया था, बस अपना दरवाज़ा खोला था। और उसी एक काम की कीमत उसे चुकानी पड़ी: "तब उन्होंने यासोन और बाकी लोगों से ज़मानत लेकर उन्हें छोड़ दिया।" अपनी जमा पूँजी गिरवी रखकर उसने पौलुस को जाने दिया। कभी सोचा है, मसीह के किसी जन को अपने घर में जगह देना तुम्हें कितना महँगा पड़ सकता है? और क्या तुम फिर भी दरवाज़ा खोलोगे?
एथेंस में पौलुस का उपदेश किसी बड़ी जयजयकार पर नहीं, एक सादे वाक्य पर खत्म होता है, "इस पर पौलुस उनके बीच में से चला गया।" कुछ हँसे, कुछ ने कहा फिर कभी सुनेंगे। फिर भी वह रुककर बहस नहीं करता, चुपचाप निकल जाता है। और अगली ही आयत में दो नाम हैं जिन्होंने विश्वास किया। तेरी सेवा का फल हमेशा भीड़ में नहीं, कभी कभी दो लोगों में गिना जाता है। क्या तू इतने से संतुष्ट रह पाएगा?
पौलुस एथेंस की मूर्तियों को देखकर भीतर से बेचैन हुआ, पर उसने न शिकायत की, न दूरी बनाई। वह लोगों के बीच गया, "अतः वह आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से और चौक में जो लोग मिलते थे, उनसे प्रतिदिन वाद-विवाद किया करता था।"
चौक यानी बाज़ार, जहाँ लोग सौदा करते, गपशप करते थे। मसीह की बात वहीं पहुँची जहाँ ज़िंदगी चलती है। तेरा चौक कौन सा है? दफ्तर, दुकान, रसोई के पास की बातचीत? वहीं तेरा बुलावा है।
अथेने के लोग मूर्तियों से भरे शहर में रहते थे, और पौलुस ने उन्हें ताना नहीं मारा। उसने कहा, "इसलिए परमेश्वर ने अज्ञानता के समयों पर ध्यान नहीं दिया, पर अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है।" ध्यान दे, यह सलाह नहीं, आज्ञा है। और वह छोटा सा शब्द "अब" तेरे लिए भी है। कल तक जो न जानता था, वह माफ़ था। पर आज तू जान गया है। अब क्या करेगा?
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