सभोपदेशक 8
पाठ
सभोपदेशक इस अध्याय में एक असहज सच्चाई से टकराते हैं: राजा के सामने बुद्धिमानी से चलो, क्योंकि उसके शब्द में शक्ति है; परन्तु उसी संसार में धर्मी को दुष्ट का फल मिलता है और दुष्ट को धर्मी का। न्याय की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती, इसलिए मनुष्य का मन बुराई से भरता है। फिर भी, लेखक की गहरी प्रतीति यही रहती है कि परमेश्वर से डरनेवालों का भला होगा, चाहे आँखें कुछ और ही देखें।
मर्म
यह अध्याय दो सच्चाइयों को एक साथ पकड़े रखता है, बिना किसी को छोड़े। एक ओर, परमेश्वर का न्याय निश्चित है: "जो परमेश्वर से डरते हैं… उनका भला ही होगा।" दूसरी ओर, इस जीवन में यह न्याय अक्सर विलंब से आता है, इतना विलंब से कि दुष्ट पवित्रस्थान से चलकर सम्मान के साथ दफनाए जाते हैं। सभोपदेशक इस विरोधाभास को हल नहीं करते; वे इसमें रहना सिखाते हैं। विश्वास का असली परीक्षण यही है, जब आँखों का प्रमाण और परमेश्वर की प्रतिज्ञा एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, तब भी उसके भय में टिके रहना।
साझा सूत्र
पद 11 पूरे बाइबल की एक कुंजी है: "बुरे काम के दण्ड की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती; इस कारण मनुष्यों का मन बुरा काम करने की इच्छा से भरा रहता है।" यही तनाव 2 पतरस 3 में लौटता है, जहाँ लोग पूछते हैं कि प्रभु के आने की प्रतिज्ञा कहाँ है, और पतरस उत्तर देते हैं कि परमेश्वर की सहनशीलता ही मन फिराने का अवसर है। जिसे सभोपदेशक "व्यर्थता" कहते हैं, नया नियम उसे "धीरज" कहता है। मसीह के क्रूस पर वह देर टूटती है: वहाँ धर्मी को दुष्ट का दण्ड मिला, ताकि अंतिम न्याय के दिन दुष्टों को धर्मी की महिमा मिल सके। पद 14 की उलटी हुई दुनिया गुलगुता पर सीधी होती है।
दर्पण
पद 11 हमारे भीतर झाँकता है। जब दण्ड टलता है, तो हम बदलते नहीं, हम साहसी होते जाते हैं। छोटा झूठ जो पकड़ा नहीं गया, अगली बार बड़ा होता है। दफ्तर में की गई बेईमानी जिसका परिणाम नहीं आया, आदत बन जाती है। परमेश्वर की सहनशीलता को हम उसकी अनुपस्थिति समझ लेते हैं। और फिर पद 14 का दूसरा दर्द: आप ईमानदारी से चलते हैं और घाटे में रहते हैं, जबकि पड़ोसी चालाकी से चलकर फलता है। यहाँ सभोपदेशक आपके कंधे पर हाथ रखते हैं और कहते हैं, हाँ, यह असली है, मैंने भी देखा है। पर परमेश्वर का भय छोड़ना उत्तर नहीं। खाओ, पिओ, अपने काम में आनन्द लो, और उसकी अथाह योजना पर भरोसा रखो।
पात्र
पहले सुननेवाले संभवतः फारसी या हेलनिस्टिक शासन के अधीन यहूदी थे, जो एक विदेशी राजा की छाया में जीते थे। "राजा की आज्ञा मान" (पद 2) उनके लिए भावुक उपदेश नहीं, जीने-मरने का प्रश्न था। वे जानते थे कि राजा के सामने उतावली से लौटना क्या होता है, दानिय्येल और एस्तेर की पुस्तकें इसी माहौल से निकली हैं। साथ ही उन्होंने वह भी देखा था जो पद 10 कहता है: भ्रष्ट लोग मंदिर में आते-जाते, धर्म का दिखावा करते, और सम्मान के साथ दफनाए जाते। यह उनके लिए दार्शनिक पहेली नहीं थी, रोज़ का घाव था। सभोपदेशक इस घाव पर मरहम नहीं लगाते, वे उसे नाम देते हैं।
विवरण
पद 8 पर रुकिए: "ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसका वश प्राण पर चले… और न दुष्ट लोग अपनी दुष्टता के कारण बच सकते हैं।" चार असंभवताएँ एक साँस में: हवा को रोकना, मृत्यु का दिन टालना, युद्ध से छुट्टी पाना, और दुष्टता से बच निकलना। पहली तीन सार्वभौमिक सीमाएँ हैं, हर मनुष्य पर लागू। पर चौथी अलग है, वह नैतिक है। सभोपदेशक चतुराई से मृत्यु और दुष्टता को एक साथ रखते हैं: जैसे कोई अपनी मृत्यु का दिन नहीं टाल सकता, वैसे ही कोई अपनी दुष्टता का अंतिम परिणाम भी नहीं टाल सकता। पद 11 की देर पद 8 की निश्चितता को नहीं मिटाती। न्याय आता है, चाहे धीरे।
अंतर्पाठ
अय्यूब और भजन 73 इस अध्याय के जुड़वाँ हैं। आसाप भजन 73 में ठीक वही देखते हैं जो सभोपदेशक पद 14 में: दुष्टों की सुख-समृद्धि और धर्मी का कष्ट। आसाप लगभग फिसल पड़ते हैं, "मैंने व्यर्थ ही अपने हृदय को शुद्ध किया," पर परमेश्वर के पवित्रस्थान में जाकर उन्हें दुष्टों का अंत दिखता है। सभोपदेशक वही निष्कर्ष अलग रास्ते से पाते हैं। यीशु मत्ती 13 के गेहूँ और जंगली दाने के दृष्टान्त में पद 11 की समस्या को सीधे उठाते हैं: क्यों नहीं अभी उखाड़ते? क्योंकि कटनी का समय नियत है। और पौलुस रोमियों 2 में लिखते हैं कि परमेश्वर की कृपा का धीरज मन फिराने के लिए है, पर कठोर हृदय अपने लिए क्रोध जमा करता है। पूरी बाइबल पद 11 की गुत्थी के चारों ओर घूमती है, और क्रूस पर उसका उत्तर देती है।
चिंतन
जब मेरे जीवन में परमेश्वर के दण्ड की देर होती है, तो मैं उसे उसकी सहनशीलता समझता हूँ या उसकी अनुपस्थिति?
*पद 15
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Ecclesiastes 8 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Ecclesiastes 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मैं जानता हूँ कि न हवा मेरे हाथ में है और न वह दिन जब मेरी साँस थम जाएगी। जो मेरे बस में नहीं, उसे पकड़े रहने की कोशिश छोड़कर मैं तुझ पर भरोसा करना चाहता हूँ। मुझे सिखा कि हर दिन को तेरी देन मानकर सच्चाई से जीऊँ।
पिता, धन्यवाद कि जब मैंने जानबूझकर गलत किया, तब आपने तुरंत दण्ड नहीं दिया। "बुरे काम के दण्ड की आज्ञा फुर्ती से नहीं दी जाती" यह आपकी धीरज भरी दया है, जिसने मुझे पछताने और लौट आने का अवसर दिया। आपके इस ठहरे हुए प्रेम के लिए मैं आभारी हूँ।
पिता, कई बार गलत राह पर चलने वाले फलते दिखते हैं और मन डगमगाने लगता है। फिर भी मैं जानता हूँ कि जो तेरा भय मानते हैं, उनका अंत भला ही होगा। मुझे धीरज दे, तेरी राह पर टिके रहने का साहस दे।
पिता, धन्यवाद कि "हर एक विषय का समय और नियम है।" मेरी अटकी हुई प्रार्थनाएँ, लंबा इंतज़ार, अनसुलझे सवाल, सब आपके ठहराए समय में हैं। जब बोझ भारी लगता है, तब भी आप घड़ी थामे हुए हैं, और यही मेरा चैन है।
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