इफिसियों 3:18
पाठ
पौलुस की प्रार्थना यहाँ एक अजीब मोड़ लेती है। वह नहीं कहता कि वे अधिक जानें, बल्कि कि उन्हें "समझने की शक्ति" मिले, मानो समझना भी एक दान हो, कोई हुनर नहीं। और यह समझ अकेले में नहीं मिलती: "सब पवित्र लोगों के साथ भली भाँति समझने की शक्ति पाओ।" फिर वह जो नापने को देता है, उसका नाम ही नहीं लेता। सिर्फ़ चार दिशाएँ गिनाता है: "उसकी चौड़ाई, और लम्बाई, और ऊँचाई, और गहराई कितनी है।" किसकी चौड़ाई? वाक्य अधूरा छोड़ा गया है, और अगली आयत में पता चलता है कि मसीह का प्रेम ही वह अनन्त आयतन है जिसे नापने चले हैं। यानी: एक सामूहिक नाप-जोख, एक ऐसी वस्तु की, जो नापी नहीं जा सकती।
मूल बात
इफिसुस के पाठक ऐसे शहर में रहते थे जहाँ नापने की चीज़ें विशाल थीं: अर्तिमिस का मन्दिर, एक सौ सत्ताईस खम्भे, दुनिया के सात अजूबों में गिना जाने वाला। लोग उसकी लम्बाई-चौड़ाई पर गर्व करते थे, जैसे आज लोग किसी इमारत की मंज़िलें गिनते हैं। पौलुस उसी नाप की भाषा उठाकर कहीं और मोड़ देता है। परमेश्वर की महानता पत्थर में नहीं, प्रेम में मापी जाती है, और वह प्रेम चारों दिशाओं में फैलकर भी ख़त्म नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि उद्धार कोई लेन-देन नहीं, बल्कि एक ऐसे विस्तार में प्रवेश है जिसकी दीवार कहीं नहीं मिलती। और वह शक्ति, जो इसे समझने के लिये चाहिए, भीतर से नहीं आती; आत्मा उसे देता है। इसलिए विश्वास घमंड का नहीं, विस्मय का विषय है।
सूत्र
जो चार दिशाएँ पौलुस गिनाता है, वे इब्रानी बुद्धि-साहित्य की पुरानी भाषा हैं। अय्यूब में सोफ़र पूछता है कि क्या तू परमेश्वर की थाह पा सकता है, और फिर स्वर्ग से ऊँचा, अधोलोक से गहरा, पृथ्वी से लम्बा, समुद्र से चौड़ा कहकर हार मान लेता है। वहाँ नाप का नतीजा था: मनुष्य छोटा है, चुप रहे। पौलुस वही नाप उठाता है और उल्टा नतीजा निकालता है: तुम इसमें घुस सकते हो, बल्कि तुम्हें इसमें जड़ पकड़नी है। बीच में क्या आया? क्रूस। जो परमेश्वर अय्यूब के लिये अथाह था, वही मसीह में शरीर लेकर नापने की दूरी पर आ खड़ा हुआ। अनन्तता अब दूर का आसमान नहीं, पाँव के नीचे की मिट्टी है जिसमें जड़ें फैलती हैं।
दर्पण
ईमानदारी से: हममें से ज़्यादातर लोग विश्वास को अकेले का मामला मानते हैं। सुबह की चुप्पी, अपनी डायरी, अपने नोट्स, अपना प्रभु। कलीसिया उस निजी अनुभव का सहायक उपकरण है, उसकी शर्त नहीं। पौलुस यह सुविधा छीन लेता है। "सब पवित्र लोगों के साथ" का मतलब है कि मसीह के प्रेम का वह कोना जो आपको कभी नहीं दिखेगा, शायद उस भाई को दिखा है जिसकी बातें आपको उबाऊ लगती हैं, या उस बहन को जिसकी राजनीति आपसे उलटी है। जिस व्यक्ति से आप कतराते हैं, वह आपके ज्ञान का लापता हिस्सा हो सकता है। यह घमंड पर सीधा वार है, और उस थकान पर भी जो कहती है, मैं अकेला ही ठीक हूँ।
आज ही अपनी मण्डली के उस एक व्यक्ति को संदेश भेजिए जिससे आपका स्वभाव बिलकुल मेल नहीं खाता, और उससे यह एक सवाल पूछिए: इस साल मसीह के प्रेम के बारे में आपने ऐसा क्या सीखा जो पहले नहीं जानते थे।
संदर्भ
पत्र लिखनेवाला जंजीर में है। वह पहली ही आयत में खुद को "मसीह यीशु का बन्दी" कहता है, और तेरहवीं में उन्हें साहस न छोड़ने की विनती करता है, क्योंकि उसके क्लेश उनके लिये हैं। यानी ये शब्द किसी शान्त अध्ययन-कक्ष से नहीं, एक ऐसे आदमी से आ रहे हैं जिसकी अपनी चारदीवारी नापी जा सकती है। बाहर इफिसुस है: बन्दरगाह, व्यापारी संघ, जादू-टोने के लिये मशहूर शहर, जहाँ अर्तिमिस के मन्दिर से जुड़ी आजीविका पर हाथ डालना दंगा करवा सकता था। और भीतर, किसी के घर के आँगन में, बीस-तीस लोग जमा हैं: कुछ यहूदी, ज़्यादातर अन्यजाति, कुछ दास, कुछ उनके मालिक। यही वह सभा है जिसे पौलुस कह रहा है कि स्वर्गीय अधिकारियों को परमेश्वर का ज्ञान तुम्हारे द्वारा दिखाया जा रहा है।
बारीकी
ध्यान दीजिए कि पौलुस "जानो" नहीं कहता, वह कहता है "समझने की शक्ति पाओ।" मूल यूनानी में यहाँ जो क्रिया है, कातालाम्बानो, उसका रोज़मर्रा का अर्थ है पकड़ लेना, दबोच लेना, किसी भागते हुए को जा पकड़ना। दौड़ में इसी शब्द से इनाम झपटने की बात होती थी। यह किताबी समझ नहीं है; यह हाथ बढ़ाकर कुछ थाम लेना है। और यहीं तनाव छिपा है: जिसे थामना है वह चारों दिशाओं में असीम है। आप उसे पकड़ते हैं, पर घेर नहीं पाते। जैसे समुद्र में उतरा आदमी पानी को हाथ में तो ले सकता है, समुद्र को नहीं। पौलुस प्रार्थना कर रहा है कि उन्हें ऐसी पकड़ मिले जो पकड़कर भी चकित रहे।
मुख्य पात्र
इस आयत में असली किरदार वह पिता है जिसके सामने पौलुस आयत चौदह में घुटने टेकता है। यह ब्यौरा छोटा नहीं। उस संसार में लोग प्रार्थना में खड़े होते थे, हाथ ऊपर उठाकर, आँखें खुली। घुटने टेकना शोक, हताशा या सम्राट के सामने समर्पण की मुद्रा थी। पौलुस जानबूझकर यह मुद्रा चुनता है, और जिस परमेश्वर के आगे झुकता है उसे ऐसा बताता है जिससे "स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।" रोमी घराने में नाम देने का अधिकार पिता का था; नाम देना यानी स्वीकार करना, अपना कहना। तो यह वह परमेश्वर है जो नापा नहीं जाता, पर जो नाम लेकर बुलाता है। असीम और निजी, एक साथ।
अंतर्पाठ
पौलुस ने इसी पत्र के दूसरे अध्याय में उन्हीं लोगों से कहा था कि वे कभी दूर थे, बिना आशा और बिना परमेश्वर के, और मसीह के लहू से निकट लाए गए, और बीच की दीवार गिरा दी गई। उस दीवार की याद के बिना यह आयत आधी रह जाती है। जिन्हें मन्दिर के आँगन में एक पत्थर की रेखा से रोका जाता था, उन्हें अब बिना दीवार वाला विस्तार नापने को कहा जा रहा है। और रोमियों के अन्त में पौलुस ऊँचाई और गहराई का यही जोड़ा फिर लाता है, यह कहने के लिये कि कोई भी चीज़ हमें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकती। वही नाप, वही निष्कर्ष: इस प्रेम की कोई सीमा-रेखा नहीं जिसके पार आप गिर सकें।
श्रोता
कल्पना कीजिए उस आँगन में बैठे एक अन्यजाति दास की, जिसका नाम उसके मालिक ने रखा था, जिसका कोई वंशवृक्ष नहीं, जो अर्तिमिस के उत्सवों से बचपन से परिचित है। वह सुनता है कि परमेश्वर हर घराने को नाम देते हैं, कि एक भेद सदियों से छिपा था और अब उस जैसे लोगों पर खुला है, कि वह "विरासत में सहभागी" है। और फिर यह: वह मसीह के प्रेम की थाह "सब पवित्र लोगों के साथ" लेगा, उसी सभा में बैठे यहूदी व्यापारी और अपनी मालकिन के साथ, बराबरी से। हमारे कानों में यह आयत एक सुन्दर प्रार्थना है। उनके कानों में यह सामाजिक भूकम्प था, नापने का अधिकार उन्हें दिया गया जिन्हें कल तक गिना भी नहीं जाता था।
प्रश्न
फिर भी सवाल बचता है: अगर यह प्रेम ज्ञान से परे है, तो उसे समझने की प्रार्थना क्यों? क्या यह अपने ही पाँव काटना नहीं? पौलुस यह विरोधाभास सुलझाता नहीं, वह उसे जस का तस छोड़ देता है, और शायद यही ईमानदारी है। कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें जानने का एकमात्र तरीक़ा यह जान लेना है कि आप उन्हें कभी पूरा नहीं जानेंगे। जो माता-पिता तीस साल बाद कहते हैं कि अब मैं अपने बच्चे को समझने लगा हूँ, वे असल में यह कह रहे होते हैं कि अब मैं जानता हूँ कि कितना बाक़ी है। मसीह के प्रेम के साथ यही होता है। जिस दिन आपको लगे कि आपने उसे नाप लिया, उस दिन निश्चित जान लीजिए कि आपने कुछ और नापा है।
चिंतन
आपकी आत्मिक समझ का कौन सा हिस्सा आपने अकेले कमाया मानकर रखा है, और किसके साथ बाँटने से वह बढ़ सकता था?
पौलुस जंजीर में बैठकर असीम विस्तार की प्रार्थना करता है। आपकी अपनी तंग परिस्थिति इस समय आपकी प्रार्थना को किस तरह छोटा कर रही है?
मण्डली में कौन है जिसे आप चुपचाप "कम समझदार" मान चुके हैं, और अगर वह व्यक्ति आपके ज्ञान का लापता हिस्सा हो तो आप क्या खो रहे हैं?
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Ephesians 3:18 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इफिसियों 3:18 का क्या अर्थ है?
इफिसियों 3:18 किस विषय में है?
इफिसियों 3:18 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इफिसियों 3:18 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इफिसियों 3:18 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ephesians 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
इसी कारण मैं उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ," पौलुस यह जंजीरों में लिखता है। कैदखाने से वह न शिकायत करता है, न बहस। वह घुटने टेकता है। उस समय लोग अक्सर खड़े होकर प्रार्थना करते थे, घुटने टेकना गहरे बोझ की निशानी था। तेरे मन का बोझ आज कहाँ जा रहा है? पिता के सामने झुकना कमजोरी नहीं, वही सबसे सही जगह है।
पिता, मैं जानता हूँ कि जो कुछ भी मेरे हाथों से होता है, वह मेरी योग्यता से नहीं, आपके मुफ्त दिए हुए अनुग्रह से होता है। मुझे अपनी सामर्थ्य से भर दीजिए, ताकि मैं डर और झिझक छोड़कर आपके लोगों की सेवा कर सकूँ।
पिता, मेरे मन में आकर बस जा, वहीं रह जहाँ मैं किसी को नहीं आने देता। मेरी जड़ें तेरे प्रेम में गहरी कर दे, ताकि जब सब कुछ हिले, मैं टिका रहूँ। विश्वास कमज़ोर पड़े तो तू थाम लेना।
जिससे स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।" पौलुस घुटनों पर है, और जिस पिता के सामने झुका है, उसी से हर परिवार को उसका नाम मिला है। तेरा घर टूटा हो, तेरा उपनाम तुझे चुभता हो, या तू अकेला महसूस करता हो, फिर भी तेरी पहचान किसी इंसान के रजिस्टर में नहीं, पिता के मुँह से निकली है। वह तुझे नाम लेकर जानता है।
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