निर्गमन 15:25
पाठ
तीन दिन से पानी नहीं मिला, और जब मिला तो वह खारा था। लोग बड़बड़ाने लगे, और मूसा ने चुपचाप उन पर क्रोध करने के बजाय "यहोवा की दुहाई दी।" परमेश्वर ने उसे एक पौधा दिखाया; उसे पानी में डालते ही "वह पानी मीठा हो गया।" पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उसी जगह, उसी घड़ी, पानी के किनारे खड़े इन प्यासे लोगों के लिए यहोवा ने "एक विधि और नियम" बनाया, और आयत खुद कहती है कि वहीं उसने "उनकी परीक्षा की।" यानी मारा का पानी सिर्फ़ एक चमत्कार की जगह नहीं है, यह एक पाठशाला है जहाँ छुड़ाए हुए लोगों को पहली बार सिखाया जाता है कि आज़ादी के साथ आज्ञाकारिता आती है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर ने क्रम क्या रखा: पहले पानी मीठा हुआ, फिर विधि दी गई। नियम बचाने की शर्त नहीं, बचाए जाने का परिणाम है। यह पूरे बाइबल की नैतिकता की जड़ है, और यहीं वह हमारे सामने पहली बार साफ़ खड़ी होती है। परमेश्वर ने पहले लाल समुद्र पार कराया, फिर पीने को दिया, और उसके बाद कहा: अब ऐसे जियो। दूसरी बात उतनी ही तीखी है, "वहीं उसने यह कहकर उनकी परीक्षा की।" परीक्षा का मतलब यह नहीं कि परमेश्वर जानना चाहते हैं कि हम कैसे हैं; इसका मतलब है कि वे हमें दिखाना चाहते हैं कि हम कैसे हैं। खारा पानी हमारे भीतर का असली स्वाद बाहर ले आता है। तीन दिन की प्यास बताती है कि हमारा भरोसा कितना गहरा है, और हमारी बड़बड़ाहट बताती है कि हम किसे सचमुच अपना उद्धारकर्ता मानते हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
मारा का पेड़ किसी जादू की छड़ी नहीं था। एक पौधा, जो शायद वहीं आसपास उगता था, परमेश्वर के कहने पर खारे पानी में डाला गया, और कड़वाहट मिठास में बदल गई। यह पैटर्न पूरे बाइबल में लौटता है: परमेश्वर कड़वाहट को हटाते नहीं, उसमें कुछ डालते हैं। सदियों बाद एक और लकड़ी, एक क्रूस, इतिहास के सबसे कड़वे पानी में डाली गई, और वहीं से जीवन बहा। यह रूपक जबरदस्ती का नहीं है, क्योंकि तर्क एक ही है: उद्धार किसी सुखद परिस्थिति से नहीं आता, बल्कि परमेश्वर के दिए गए साधन से, जो देखने में मामूली होता है। और जैसे मारा में मिठास के बाद विधि आई, वैसे ही मसीह की कृपा के बाद आज्ञाकारिता आती है। पहले पिलाया जाता है, फिर बुलाया जाता है।
दर्पण
तीन दिन बिना पानी के चलना आपको भी पता है: वह प्रोजेक्ट जो नहीं चल रहा, वह रिश्ता जहाँ बातचीत सूख गई, वह रिपोर्ट जिसका इंतज़ार आप डरते हुए कर रहे हैं। और फिर वह क्षण आता है जब कुछ मिलता तो है, पर खारा। नौकरी मिली, पर मनचाही नहीं। माफ़ी मिली, पर आधी। इस्राएल की प्रतिक्रिया इतनी जानी-पहचानी है कि चुभती है: वे परमेश्वर से नहीं, मूसा से शिकायत करते हैं, यानी उस इंसान से जो सामने खड़ा है। हम भी यही करते हैं, पत्नी पर, सहकर्मी पर, पादरी पर, बच्चों पर। मूसा का रास्ता दूसरा था, "मूसा ने यहोवा की दुहाई दी।" शिकायत को उसके सही पते पर भेजना ही पहला नैतिक कदम है।
आज ही करें: जिस बात पर आप पिछले दिनों किसी इंसान से चिढ़ रहे हैं, उसे कागज़ पर एक वाक्य में लिखिए, और वही वाक्य ज़ोर से परमेश्वर से कहिए, उसी व्यक्ति से नहीं।
संदर्भ
यह घटना लाल समुद्र पार करने के तीन दिन बाद की है, यानी जीत के गीत की गूँज अभी कानों में है। मिर्याम का डफ अभी शांत भी नहीं हुआ था कि शूर के जंगल में गला सूखने लगा। मिस्र में ये लोग गुलाम थे, पर पानी नील नदी से मिलता था, रोज़, भरोसे से। अब वे आज़ाद हैं और प्यासे हैं। यही रेगिस्तान का सामाजिक झटका है: गुलामी में सुरक्षा थी बिना गरिमा के, आज़ादी में गरिमा है बिना गारंटी के। मारा नाम का मतलब ही कड़वा है, और जगह का नाम उस अनुभव से पड़ा। परमेश्वर इन्हें सीधे कनान नहीं ले जाते; पहले उन्हें ऐसी जगह ले जाते हैं जहाँ जीना केवल भरोसे पर निर्भर हो।
प्रश्न
सबसे असहज सवाल यह है: परमेश्वर उन्हें उस रास्ते ले ही क्यों गए जहाँ पानी खारा था? आयत 22 साफ़ कहती है कि मूसा उन्हें आगे "ले गया," और वही ईश्वर बादल के खंभे में आगे चल रहे थे। यानी प्यास कोई दुर्घटना नहीं थी, वह रास्ते का हिस्सा थी। यह हमें आसान जवाब नहीं देता। कहना कि "परमेश्वर हमें मज़बूत बनाना चाहते थे" सच तो है, पर प्यासे आदमी के लिए यह ठंडा जवाब है। पाठ खुद इतना ही कहता है कि यह परीक्षा थी, और फिर आगे बढ़ जाता है। हमें भी शायद यही सीखना है: कुछ कड़वाहटों का पूरा हिसाब हमें इस जीवन में नहीं मिलेगा। पर आयत 27 में एलीम आता है, बारह सोते और सत्तर खजूर। मारा आख़िरी पड़ाव नहीं था।
बारीकी
"यहोवा ने उसे एक पौधा बता दिया।" ध्यान दीजिए, परमेश्वर ने पौधा बनाया नहीं, दिखाया। वह पहले से वहीं था, मूसा की नज़रों के दायरे में, और फिर भी उसे देखने के लिए परमेश्वर की ओर मुड़ना पड़ा। यह एक पूरी नैतिकता है। हमारी ज़्यादातर समस्याओं का हल किसी नए चमत्कार में नहीं, बल्कि उस चीज़ में छिपा है जो पहले से मौजूद है पर जिसे हम देख नहीं पा रहे: वह फोन कॉल, वह माफ़ी, वह बजट जिसे हम खोलना नहीं चाहते, वह आदत जिसे छोड़ना है। प्रार्थना अक्सर आसमान से कुछ गिराती नहीं, वह हमारी आँखें उस पर टिका देती है जो हमारे पैरों के पास उगा हुआ है।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन सा "खारा पानी" है, और आपने उसकी शिकायत अब तक किसके पास दर्ज कराई है?
अगर आज्ञाकारिता उद्धार की शर्त नहीं बल्कि उसका फल है, तो इस हफ़्ते आपकी कौन सी एक आदत यह दिखाती है कि आप अभी भी परमेश्वर की कृपा कमाने की कोशिश कर रहे हैं?
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Exodus 15:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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निर्गमन 15:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Exodus 15 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, जब सब कुछ बदलता दिखता है, तब भी आपका राज्य कभी नहीं हिलता। मेरे डर, मेरी उलझनें, मेरा कल, सब आपके हाथ में है। मुझे याद दिलाइए कि आप ही सदा सर्वदा राजा हैं, और आपके साथ चलना ही मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
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