निर्गमन 2:19
पाठ
रूएल की सात बेटियाँ घर लौटकर अपने पिता को बताती हैं कि कुएँ पर क्या हुआ: चरवाहों ने उन्हें हटा दिया था, पर एक अजनबी ने बीच में पड़कर उन्हें बचाया और इतना ही नहीं, उनके लिए पानी भी भरा और भेड़-बकरियों को पिलाया। उनके शब्द हैं, "एक मिस्री पुरुष ने हमको चरवाहों के हाथ से छुड़ाया, और हमारे लिये बहुत जल भरकर भेड़-बकरियों को पिलाया।" ध्यान दीजिए कि वे उसे क्या कहती हैं: मिस्री। जो व्यक्ति कुछ ही दिन पहले एक मिस्री को मारकर रेत में गाड़ आया था, जिसने अपने इब्री भाइयों के दुःख पर दृष्टि की थी, वह अब मिद्यान में मिस्री के रूप में पहचाना जाता है। कपड़े, भाषा, चाल; सब कुछ फ़िरौन के महल की गवाही देते हैं।
मूल बात
यह आयत एक अजीब विडंबना पर टिकी है। मूसा वह है जिसे जल से निकाला गया था, और अब वह दूसरों के लिए जल भर रहा है। जो स्वयं भागा हुआ है, वह दूसरों को छुड़ा रहा है। जिस शब्द का अनुवाद यहाँ "छुड़ाया" हुआ है, वही इब्रानी क्रिया नातसल परमेश्वर अध्याय 3 में अपने लिए प्रयोग करेंगे जब वे इस्राएल को मिस्रियों के हाथ से छुड़ाने की बात करेंगे। यानी मिद्यान के कुएँ पर, सात अनजान लड़कियों और कुछ दबंग चरवाहों के बीच, वही काम छोटे पैमाने पर घट रहा है जो आगे चलकर पूरे राष्ट्र के साथ होगा। परमेश्वर अपने उद्धारक को किसी प्रशिक्षण-संस्था में नहीं, बल्कि एक मामूली झगड़े में गढ़ रहे हैं। और सबसे चुभने वाली बात यह है कि बचाने वाला खुद अपनी पहचान खो चुका है; वह नहीं जानता कि वह कौन है, फिर भी वही करता है जो परमेश्वर करते हैं।
सूत्र-धारा
कुएँ के किनारे होने वाली मुलाक़ातें बाइबल में संयोग नहीं हैं। इसहाक के लिए दुल्हन कुएँ पर मिलती है, याकूब राहेल से कुएँ पर मिलता है और पत्थर हटाकर उसकी भेड़ों को पानी पिलाता है, और अब मूसा सात बहनों के लिए पानी भरता है और थोड़ी ही देर में सिप्पोरा उसकी पत्नी बन जाती है। पाठक जो इन कहानियों को जानता है, वह आयत 19 पढ़ते ही समझ जाता है कि आगे क्या होने वाला है। पर यहाँ एक मोड़ है: वाचा के परिवार का यह बेटा वाचा के बाहर, एक मिद्यानी याजक के घर में प्रवेश करता है। उद्धार की कहानी उन दरवाज़ों से होकर जाती है जिन्हें हम बंद मान लेते हैं। और अंततः एक और थका हुआ यात्री सामरिया के कुएँ पर बैठेगा, और एक स्त्री उसे भी ग़लत नाम से पुकारेगी: "यहूदी"।
दर्पण
आपको भी शायद उस नाम से पुकारा जाता है जो आपका सच नहीं है। दफ़्तर में "वह जो तरक़्क़ी से चूक गया", परिवार में "वह जो अलग हो गया", कलीसिया में "वह जिसके बारे में बात होती है"। मूसा ने उन लड़कियों को सुधारा नहीं। उसने यह नहीं कहा, "मैं मिस्री नहीं, इब्री हूँ, लेवी के घराने का।" उसने बस पानी भरा, और बहुत भरा। वहाँ कोई इस्राएली देखने वाला नहीं था, कोई फ़िरौन प्रभावित होने वाला नहीं था, कोई इनाम नहीं था। यही वह जगह है जहाँ चरित्र बनता है: जहाँ कोई आपका असली नाम नहीं जानता और फिर भी आप वही करते हैं जो सही है। आज किसी एक व्यक्ति के लिए, घर में या काम पर, चुपचाप पानी का गिलास भरकर उसके सामने रख दीजिए, बिना यह बताए कि आपने क्यों किया।
प्रश्न
अगर परमेश्वर ने मूसा को जल से निकाला था, तो उसे चालीस साल तक मिद्यान की धूल में क्यों छोड़ा? आयत 22 में वह अपने बेटे का नाम गेर्शोम रखता है, "मैं अन्य देश में परदेशी हूँ"। यह किसी विजेता की नहीं, एक हारे हुए आदमी की आवाज़ है। जिसने अपने भाइयों के दुःख पर दृष्टि की थी, वह अब भेड़ चराता है और दूसरे की ज़मीन पर सोता है। पाठ कोई सफ़ाई नहीं देता। यह नहीं कहता कि यह प्रशिक्षण था या शुद्धिकरण। यह बस बताता है कि जब मूसा मिद्यान में था, इस्राएल कराह रहा था और परमेश्वर सुन रहे थे। कभी-कभी देर का कारण हमें नहीं बताया जाता; हमें केवल यह बताया जाता है कि कोई सुन रहा है।
अंतर्पाठ
स्तिफ़नुस प्रेरितों 7 में इसी कहानी को दोहराता है और एक तीखा निष्कर्ष निकालता है: इस्राएल ने अपने छुड़ाने वाले को पहचाना नहीं। आयत 14 में वे पूछते हैं, "किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" और आयत 19 में मिद्यानी लड़कियाँ उसे मिस्री कह देती हैं। दोनों तरफ़ से ग़लत पहचान। यह नमूना यहाँ ख़त्म नहीं होता: वह जो अपने घर आया और अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया, जिसे लोगों ने बढ़ई का बेटा कहकर टाल दिया, वही अंततः छुड़ाने वाला निकला। बाइबल बार-बार यही करती है: उद्धारक को भीड़ पहचान नहीं पाती, पर उसका काम उसे ज़ाहिर कर देता है। लड़कियों ने नाम ग़लत बताया, पर क्रिया सही: "छुड़ाया"।
श्रोता-चित्र
जिन लोगों ने यह कहानी पहली बार सुनी, वे उन्हीं की संतान थे जिन्हें मिस्र से निकाला गया था। उनके लिए "मिस्री" कोई तटस्थ शब्द नहीं था; वह उस कोड़े का नाम था जो उनकी पीठ पर पड़ा था, उस ईंट का जो उन्होंने बनाई थी। और अब वे सुनते हैं कि उनके महान नेता को, उनके मुक्तिदाता को, एक विदेशी लड़की ने उसी नाम से पुकारा। यह उनके कानों में चुभा होगा। पर इसी में सांत्वना भी थी: परमेश्वर ने अपना आदमी दुश्मन के महल में पाला, दुश्मन की भाषा और रौब के साथ, और फिर उसी को उनके पास भेजा। जो तुम्हारे विरुद्ध बना था, परमेश्वर ने उसे तुम्हारे लिए इस्तेमाल किया।
मनन
लोग आपको जिस नाम से पुकारते हैं और परमेश्वर आपको जिस नाम से जानते हैं, उनके बीच का फ़ासला आप कैसे सहते हैं?
आपके जीवन का वह "मिद्यान" कौन-सा है, जहाँ आपको लगता है कि कुछ नहीं हो रहा, और क्या वहाँ भी कोई कुआँ है जिस पर आप पानी भर सकते हैं?
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किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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