निर्गमन 2:4
पाठ
नील नदी के किनारे कांसों की झाड़ी में एक टोकरी तैरती है, और उससे कुछ दूरी पर एक लड़की खड़ी है। वह भागी नहीं, छिपी नहीं, पास भी नहीं आई; वह बस उतनी दूर खड़ी रही जितनी दूर से देखा जा सके पर पहचाना न जाए। पाठ उसका नाम तक नहीं बताता, केवल रिश्ता बताता है: "उस बालक की बहन।" और उसके खड़े रहने का कारण एक ही वाक्य में दर्ज है, "कि देखे उसका क्या हाल होगा।" माँ बच्चे को छोड़ आई, पर परिवार ने उसे पूरी तरह नहीं छोड़ा। एक आँख अब भी टोकरी पर टिकी है, चुपचाप, बिना किसी शक्ति के, बिना किसी योजना के जिसे वह लागू कर सके। यही पूरा पद है: एक बच्ची, एक फासला, और एक इंतज़ार।
मर्म
इस पद में परमेश्वर का नाम नहीं आता। निर्गमन के पहले दो अध्यायों में यह चुप्पी जानबूझकर रखी गई लगती है; परमेश्वर अध्याय के अंत तक बोलते नहीं, केवल "स्मरण" करते हैं। और ठीक इसी चुप्पी के बीच में यह लड़की खड़ी है। यहाँ धर्मशास्त्र का एक कठोर पर सच्चा सूत्र छिपा है: उद्धार अक्सर वहाँ से शुरू होता है जहाँ मनुष्य के पास करने को कुछ नहीं बचता, केवल देखते रहना बचता है। फ़िरौन के पास सेना है, आदेश है, नदी है; इस्राएल के पास एक टोकरी और एक बहन की निगाह है। परमेश्वर अपने बड़े काम के लिए ताकतवर हथियार नहीं चुनते, वे उस चीज़ को चुनते हैं जिसे मिस्र गिनती में भी नहीं लेता। एक निगरानी करती बच्ची इतिहास का मोड़ बन जाती है, और वह खुद यह नहीं जानती।
सूत्र
निर्गमन की पूरी कहानी यहाँ बीज रूप में पड़ी है। एक क्रूर राजा बच्चों को मारना चाहता है, एक बच्चा पानी में से बचाया जाता है, और वही बच्चा बाद में पूरी जाति को पानी में से पार निकालेगा। मूसा का नाम ही इस बात की गवाही देगा: "मैंने इसको जल से निकाला था।" पर ध्यान दीजिए कि यह उद्धार किन हाथों से होकर आता है: एक माँ की चालाकी, एक बहन की निगाह, एक विदेशी राजकुमारी की दया। कोई तलवार नहीं, कोई चमत्कार नहीं। यही तरीका परमेश्वर बार-बार दोहराते हैं। मत्ती 2 में फिर एक राजा बच्चों को मारता है और फिर एक बच्चा मिस्र की ओर बचकर निकलता है; क्योंकि परमेश्वर का उद्धारकर्ता हमेशा पहले खुद खतरे में पड़े शिशु के रूप में आता है, और उसे बचाने वाले हमेशा वे लोग होते हैं जिन्हें कोई गिनता नहीं।
दर्पण
आप शायद उस लड़की की जगह अच्छी तरह जानते हैं। वह जगह जहाँ आप किसी को बचा नहीं सकते, केवल देख सकते हैं। बेटा जो अपने फैसले खुद ले रहा है और आपकी बात नहीं सुनता। पति या पत्नी जिसकी जाँच रिपोर्ट आनी बाकी है। भाई जिसका फोन महीनों से नहीं आया। हम इस बेबसी से नफरत करते हैं, इसलिए या तो हम दखल देकर सब बिगाड़ देते हैं, या दूसरी तरफ भागकर खुद को व्यस्त कर लेते हैं। मरियम तीसरा रास्ता चुनती है: वह दूर खड़ी रहती है, पर आँख नहीं हटाती। यह निष्क्रियता नहीं है, यह तैयारी है; क्योंकि जब मौका आया, वह वहीं थी। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज़ पर लिखिए जिसके लिए आप कुछ नहीं कर सकते, और वह कागज़ हाथ में पकड़कर पाँच मिनट चुपचाप परमेश्वर के सामने खड़े रहिए।
पृष्ठभूमि
मिस्र में इब्री लोग गुलाम हैं, और फ़िरौन का आदेश है कि हर नवजात लड़का नील में फेंक दिया जाए; लड़कियाँ जीवित रहने दी जाएँ, क्योंकि लड़कियाँ खतरा नहीं मानी जातीं। यही अंधापन कहानी का मोड़ बन जाता है। नील मिस्र के लिए सिर्फ नदी नहीं, देवता है, जीवन और मृत्यु दोनों का स्रोत; उसके किनारे कीचड़, मगरमच्छ, धोबी, पानी भरती दासियाँ, और कांसों की ऊँची झाड़ियाँ। सुबह का समय है, राजकुमारी अपनी सखियों के साथ नहाने आने वाली है, और वहाँ एक गुलाम जाति की बच्ची का यों खड़े रहना खुद में जोखिम है। पकड़ी जाती तो पूछताछ होती। वह उसी जगह खड़ी है जहाँ साम्राज्य की ताकत रोज़ पानी छूने आती है।
शास्त्र की गूँज
इसी अध्याय के अंत में वही क्रिया लौटती है जो पद 4 में लड़की के लिए इस्तेमाल हुई: "परमेश्वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया।" बहन देखती है, और परमेश्वर देखते हैं। लेखक जानबूझकर छोटी मानवी निगाह को उस बड़ी दिव्य निगाह के सामने रखता है, ताकि हम समझें कि टोकरी पर टिकी वह आँख अकेली नहीं थी। और फिर निर्गमन 15 में, समुद्र पार करने के बाद, यही मरियम नाम की स्त्री डफ लेकर गाती हुई निकलती है। जो लड़की कभी पानी के किनारे चुप खड़ी थी, वही स्त्री पानी के दूसरे किनारे पर पहला जयगीत गाती है। परमेश्वर उन लोगों को नहीं भूलते जो चुपचाप पहरा देते हैं।
मुख्य पात्र
बहन का नाम यहाँ नहीं है, पर उसका चरित्र साफ है। वह डरी हुई है, वरना पास खड़ी होती; और वह हार नहीं मानी है, वरना घर लौट जाती। यह मिश्रण, डर और वफादारी एक साथ, बाइबल के सबसे सच्चे मानवीय चित्रों में से एक है। उसके पास शक्ति नहीं, बस समय और ध्यान है, और वह दोनों अपने भाई पर खर्च कर देती है। जब राजकुमारी टोकरी खोलती है, तब यह बच्ची तुरंत आगे बढ़कर बोलती है, "क्या मैं जाकर इब्री स्त्रियों में से किसी धाई को तेरे पास बुला ले आऊँ।" एक गुलाम बच्ची फ़िरौन की बेटी से मोलभाव कर रही है। वह साहस कहीं से अचानक नहीं आया; वह उन घंटों में पका जब वह चुपचाप देखती रही।
चिंतन
आपके जीवन में वह टोकरी कौन सी है जिसे आपने पानी में छोड़ दिया है, और क्या आप अब भी उसे दूर से देख रहे हैं या मुँह फेर चुके हैं?
जब परमेश्वर चुप हैं, तब क्या आप उन्हें उन साधारण लोगों और मौकों में पहचान पाते हैं जिन्हें दुनिया गिनती में नहीं लेती?
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किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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