निर्गमन 2:23
पाठ
वर्षों बीत गए। मूसा मिद्यान में चरवाहा बना बैठा है, और मिस्र में वह फ़िरौन मर जाता है जिसने इस्राएल की पीठ पर बोझ लादा था। पर राजा के मरने से गुलामी नहीं मरती; ईंट के साँचे वैसे ही भरे जाते हैं, कोड़े वैसे ही चलते हैं। और तब, उस लम्बी थकान के भीतर से, एक आवाज़ उठती है: "इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी-लम्बी साँस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे।" यह सुगठित प्रार्थना नहीं है, यह कराह है, वह साँस जो दर्द से टूटकर निकलती है। और पद का अंतिम वाक्य सब कुछ पलट देता है: "उनकी दुहाई जो कठिन सेवा के कारण हुई वह परमेश्वर तक पहुँची।"
मूल
ध्यान दीजिए, यहाँ यह नहीं लिखा कि उन्होंने परमेश्वर को पुकारा। नाम नहीं लिया गया, पता नहीं लिखा गया। यह बिना दिशा की चीख थी, जैसे कोई अँधेरे कमरे में दर्द से चिल्लाए। फिर भी वह चीख रास्ता पा गई। यही इस पद का धड़कता हुआ हृदय है: परमेश्वर सुनने के लिए हमारी प्रार्थना के सही होने की प्रतीक्षा नहीं करते। वे कराहने की भाषा समझते हैं। इब्रानी शब्द ज़आकाह, यानी वह चीख जो अन्याय सहने वाला निकालता है, पूरे पुराने नियम में परमेश्वर के कान की ओर उठती है और कभी खाली नहीं लौटती। और इसका मतलब यह भी है कि चार सौ साल की चुप्पी अनुपस्थिति नहीं थी। परमेश्वर देर से जागे नहीं; वे हमेशा से उस कराह के भीतर खड़े थे, प्रतीक्षा करते हुए कि उनका समय पूरा हो।
सूत्र
पद 24 बताता है कि परमेश्वर ने उस कराह को सुनकर "अपनी वाचा को, जो उसने अब्राहम, और इसहाक, और याकूब के साथ बाँधी थी, स्मरण किया।" यह वाक्य पूरी बाइबल की रीढ़ है। इस्राएल की चीख ने परमेश्वर को कुछ नया करने पर मजबूर नहीं किया; उसने एक पुराने वचन को सक्रिय कर दिया। परमेश्वर बचाते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत पहले कहा था कि वे बचाएँगे। यही पैटर्न गुड फ्राइडे तक चलता है: सलीब पर यीशु मसीह भी शब्दों में नहीं, एक ऊँची चीख में प्राण छोड़ते हैं, और वह चीख परमेश्वर तक पहुँचती है, और तीसरे दिन उत्तर आता है। जो परमेश्वर मिस्र में कराह सुनते थे, वे गोलगोथा पर कराह के भीतर स्वयं उतर आए। छुटकारा हमेशा उसी दरवाज़े से आता है जहाँ दर्द की आवाज़ सबसे कच्ची होती है।
दर्पण
आप शायद वह व्यक्ति हैं जो प्रार्थना में भी शिष्टाचार नहीं छोड़ते। पहले धन्यवाद, फिर अंगीकार, फिर सावधानी से तोली हुई माँग। और भीतर, कहीं गहरे, एक ऐसा वाक्य पड़ा है जिसे आपने कभी परमेश्वर के सामने नहीं बोला, क्योंकि वह बहुत कड़वा लगता है: यह नौकरी मुझे चूस रही है, यह बीमारी ख़त्म नहीं हो रही, यह रिश्ता वर्षों से मुर्दा है, और आप चुप क्यों हैं। इस्राएल ने सुंदर प्रार्थना नहीं की। उन्होंने "लम्बी-लम्बी साँस" ली और चिल्लाए, और वही स्वर्ग तक पहुँचा। परमेश्वर आपकी सजी हुई भाषा के भूखे नहीं हैं; वे आपके सच के भूखे हैं। जो दर्द आप उनके सामने नहीं रखते, वह आपके और उनके बीच दीवार बन जाता है, जबकि वही दर्द दरवाज़ा बन सकता था। आज, अकेले कमरे में, वह एक वाक्य ज़ोर से बोलिए जो आपने अब तक प्रार्थना में कभी नहीं कहा। बिना सँवारे, बिना माफ़ी माँगे। बस कह दीजिए।
अंतर्पाठ
हाबिल की हत्या के बाद परमेश्वर कैन से कहते हैं कि उसके भाई का लहू भूमि से पुकार रहा है। वहाँ एक मरा हुआ आदमी चिल्लाता है और परमेश्वर सुनते हैं; यहाँ एक पूरी जाति चिल्लाती है और परमेश्वर सुनते हैं। बाइबल का परमेश्वर उस पीड़ा के प्रति बहरा नहीं जिसे इतिहास दर्ज करना भूल जाता है। और नए नियम में रोमियों 8 इस पद को हमारे भीतर तक ले आता है: पवित्र आत्मा हमारे भीतर ऐसी आहों से विनती करते हैं जो शब्दों में नहीं आतीं। यानी जो कराह मिस्र में छत से टकराकर लौटती दिखती थी, वह असल में अकेली नहीं थी; परमेश्वर का आत्मा उसे भीतर से उठा रहा था। आपकी बिना शब्दों की आह भी अनाथ नहीं है।
प्रश्न
फिर भी सवाल बचा रहता है, और उसे ढकना बेईमानी होगी: चार सौ साल क्यों? यदि कराह तुरंत पहुँचती है, तो पीढ़ियाँ क्यों ईंटों में खप गईं? जिन माताओं के बच्चे नील में डूबे, उन्हें छुटकारा देखने को नहीं मिला। पाठ कोई सफ़ाई नहीं देता। वह बस कहता है कि राजा मर गया, कराह पहुँची, वाचा याद की गई। बाइबल यहाँ देरी को समझाती नहीं, केवल दर्ज करती है। हमें इस असुविधा के साथ जीना सीखना है कि परमेश्वर का सुनना और परमेश्वर का हस्तक्षेप एक ही घड़ी में नहीं होते। जो हमें देर लगती है, वह उनके लिए पकना है; पर यह कहना आसान है जब आप साँचे में मिट्टी नहीं भर रहे। ईमानदार उत्तर यही है: वे सुनते हैं, यह निश्चित है। वे कब उठेंगे, यह हमारे हाथ में नहीं।
संदर्भ
यह पद किताब का मोड़ है। अब तक कहानी एक परिवार की थी, अब वह एक राष्ट्र की हो जाती है। मिस्र में इब्री लोग राजकीय मज़दूर थे, भंडार-नगर बनाने वाले बंधुआ श्रमिक, जिनकी संख्या सत्ता के लिए ख़तरा मानी जाती थी। फ़िरौन केवल राजा नहीं, देवता माना जाता था; उसकी मृत्यु राजनीतिक भूकंप थी और गुलामों के लिए आशा की एक झलक। पर नया फ़िरौन वही व्यवस्था चलाता रहा। उधर मूसा चालीस साल से मिद्यान में था, अपने ही शब्दों में "अन्य देश में परदेशी", एक भगोड़ा जो भेड़ें चराते हुए बूढ़ा हो रहा था। इस्राएल जानता भी नहीं था कि उनका छुड़ाने वाला जीवित है। दोनों ओर अँधेरा, और उसी अँधेरे में परमेश्वर काम कर रहे थे।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा दर्द इतना पुराना हो चुका है कि आपने उसे परमेश्वर के सामने लाना ही छोड़ दिया?
यदि परमेश्वर का सुनना और उनका हस्तक्षेप एक साथ नहीं होते, तो प्रतीक्षा के बीच आपका विश्वास किस चीज़ पर टिका रहेगा?
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किसने तुझे हम पर हाकिम और न्यायी ठहराया?" यह सवाल मूसा को चुभ गया, क्योंकि सच यही था। अभी परमेश्वर ने उसे भेजा नहीं था। उसने इधर उधर देखकर, छिपकर, अपने हाथ से छुड़ाना चाहा। चालीस साल बाद वही मूसा जलती झाड़ी के सामने बुलाया गया। तेरे भीतर का जोश गलत नहीं है। पर पूछ ले, यह काम तू कर रहा है या परमेश्वर तुझसे करवा रहा है?
पिता, जब मुझे किनारे धकेला जाता है और कोई पक्ष नहीं लेता, तब भी तू देखता है। तू ऐसे लोग भेजता है जो उठकर मेरी मदद करते हैं। मुझे भी वैसा ही साहस दे कि जहाँ किसी के साथ अन्याय हो, मैं चुप न रहूँ, बल्कि आगे बढ़कर हाथ बढ़ाऊँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने फ़िरौन की बेटी के मन में तरस डाल दिया, जब उसने रोते हुए बच्चे को देखा। धन्यवाद कि मूसा का वह छोटा सा रोना भी अनसुना न रहा, और आपने शत्रु के घर में ही उसके लिए सुरक्षा तैयार कर रखी थी। हमारे आँसुओं पर भी आपकी वही दयादृष्टि है।
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