निर्गमन 3:11
पाठ
परमेश्वर ने जलती हुई झाड़ी में से अपना परिचय दिया, अपने लोगों की चिल्लाहट सुनने की बात कही, और फिर आज्ञा दी: "इसलिए आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए।" इसी पुकार के ठीक बाद मूसा का उत्तर आता है, और वह उत्तर कोई स्तुति नहीं, कोई "जी हाँ प्रभु" नहीं, बल्कि एक प्रश्न है जो उसके भीतर से निकलता है: "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?" अस्सी वर्ष का एक भगोड़ा चरवाहा, जो दूसरे की भेड़-बकरियाँ चराता है, साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली सिंहासन के सामने खड़े होने के बुलावे को सुनकर अपनी ही पहचान पर ठोकर खाता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए कि मूसा का प्रश्न गलत नहीं है, बस अधूरा है। वह सचमुच कोई नहीं है: मिस्र में हत्यारा, मिद्यान में परदेशी, इस्राएल में भुला दिया गया। पर परमेश्वर उसके प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं देते। वे यह नहीं कहते, "तू तो राजकुमार रहा है, तुझमें क्षमता है।" वे मूसा की योग्यता की सूची नहीं गिनाते, बल्कि विषय ही बदल देते हैं: "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" यहाँ उद्धार का पूरा व्याकरण खुल जाता है। छुड़ाने वाला मूसा नहीं, परमेश्वर हैं; मूसा केवल भेजा हुआ है। "मैं कौन हूँ" का उत्तर सदा "मैं जो हूँ सो हूँ" में छिपा होता है। जहाँ हम अपनी अपर्याप्तता को बहाना बनाते हैं, वहाँ परमेश्वर उसे अपनी सामर्थ्य दिखाने का स्थान बनाते हैं, क्योंकि मुक्ति कभी मनुष्य की क्षमता पर टिकी नहीं रही।
मुक्ति की धारा
मूसा का "मैं कौन हूँ" और परमेश्वर का "मैं तेरे संग रहूँगा" एक ऐसा ढाँचा बनाते हैं जो पूरे बाइबल में दोहराया जाता है, और अंत में मसीह में टूट जाता है। क्योंकि जब पिता अपने पुत्र को भेजते हैं, तो पुत्र यह प्रश्न नहीं पूछते। मूसा डरता हुआ भेजा जाता है; यीशु जानते हुए आते हैं कि वे कौन हैं। मूसा को यह आश्वासन चाहिए कि परमेश्वर उसके संग रहेंगे; यीशु स्वयं इम्मानुएल हैं, परमेश्वर हमारे संग। और जो नाम झाड़ी में से सुनाई दिया, "मैं जो हूँ सो हूँ," वही नाम यूहन्ना के सुसमाचार में यीशु के मुँह से निकलता है। मूसा इस्राएल को फ़िरौन के हाथ से निकालता है; मसीह अपने लोगों को पाप और मृत्यु के उससे भी गहरे बंधन से निकालते हैं। मूसा छुड़ाने वाले की छाया है, मुक्तिदाता नहीं; छाया सदा असली शरीर की ओर इशारा करती है।
दर्पण
यह प्रश्न आपके भीतर भी बैठा है, और वह धार्मिक भाषा में छिपकर रहता है। जब आपसे कहा जाता है कि उस सहकर्मी से सच बोलिए जिसकी नौकरी आपके हाथ में है, या अपने किशोर बेटे से माफ़ी माँगिए, या उस दुखी पड़ोसी के घर जाइए जहाँ आपके पास कोई उत्तर नहीं, तब भीतर से वही आवाज़ उठती है: मैं कौन हूँ? सुनने में यह विनम्रता लगती है, पर अक्सर यह डर है, और कभी-कभी यह अभिमान भी है, क्योंकि इसका छिपा अर्थ है कि सब कुछ मेरी योग्यता पर टिका है। परमेश्वर उस गणित को तोड़ते हैं। आपकी अयोग्यता उनकी योजना के लिए कोई समाचार नहीं है। आज एक काम कीजिए: जिस एक काम को आप "मैं इसके लायक नहीं" कहकर टालते रहे हैं, उसका नाम कागज़ पर लिखिए, और उसके नीचे लिखिए "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा," और वह कागज़ वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।
शास्त्र की गूँज
यही दृश्य यिर्मयाह में लौटता है, जहाँ युवा नबी कहता है कि वह बोलना नहीं जानता, और गिदोन में, जो कहता है कि उसका घराना सबसे छोटा है। हर बार उत्तर वही रहता है: मैं तेरे संग हूँ। पर सबसे तीखी गूँज तब सुनाई देती है जब यीशु सदूकियों से बहस करते हुए इसी झाड़ी की ओर लौटते हैं, और निर्गमन 3:6 के शब्द, "मैं तेरे पिता का परमेश्वर, और अब्राहम का परमेश्वर," पुनरुत्थान का प्रमाण बना देते हैं। यानी झाड़ी के पास जो परमेश्वर मूसा से मिले, वे मरे हुओं के नहीं, जीवितों के परमेश्वर हैं। वही परमेश्वर जो मूसा की अयोग्यता से नहीं रुके, कब्र से भी नहीं रुकेंगे।
पृष्ठभूमि
यह घटना मिस्र से लगभग चार सौ मील दूर, सीनै के वीरान पहाड़ों में घटती है, और मूसा की उम्र उसे सेवानिवृत्ति के पार ले जा चुकी है। वह अब राजकुमार नहीं, बल्कि अपने ससुर यित्रो की भेड़ें चराता है, यानी उसके पास अपनी कोई संपत्ति भी नहीं। प्राचीन पूर्व में चरवाहे का काम सम्मानित नहीं था, और मिस्रियों की दृष्टि में तो घृणित था। दूसरी ओर फ़िरौन केवल राजा नहीं, देवता माना जाता था; उसके सामने एक निर्वासित, तुतलाता हुआ भेड़ चराने वाला खड़ा हो, यह कल्पना ही हास्यास्पद थी। मूसा का प्रश्न इसलिए कायरता नहीं, बल्कि यथार्थ का सीधा आकलन है। परमेश्वर उसे जिस काम में भेज रहे हैं, वह राजनीतिक रूप से असंभव और व्यक्तिगत रूप से आत्मघाती है।
मुख्य पात्र
मूसा के भीतर दो आदमी लड़ रहे हैं। एक वह जवान है जिसने चालीस साल पहले अपने हाथ से न्याय करने की कोशिश की थी और भाग खड़ा हुआ था; दूसरा वह बूढ़ा है जिसने सीख लिया है कि वह कुछ नहीं कर सकता। पहला अति-आत्मविश्वासी था, दूसरा टूटा हुआ है, और परमेश्वर दोनों को नहीं चाहते। वे किसी तीसरे मूसा को गढ़ रहे हैं: वह जो जानता है कि वह कुछ नहीं है, और फिर भी जाता है, क्योंकि भेजने वाला कोई है। यह आदमी चालीस साल की नाकामी के बाद भी झाड़ी की ओर मुड़ा, और यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है। जिज्ञासा ने उसे बुलाहट तक पहुँचाया। परमेश्वर अक्सर उन्हीं से बात करते हैं जो ठहरकर देखने को तैयार हैं।
चिंतन
आप अपनी किस कमज़ोरी को विनम्रता कहकर परमेश्वर की बुलाहट से बचने के लिए इस्तेमाल करते हैं?
यदि "मैं तेरे संग रहूँगा" सचमुच पर्याप्त उत्तर है, तो आपके जीवन में इस सप्ताह क्या बदलना चाहिए?
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मूसा ने पूछा, "मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ," और परमेश्वर ने उसकी पहचान पर बात ही नहीं की। उत्तर मिला, "निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा।" और जो चिन्ह दिया गया वह आगे चलकर, इसी पहाड़ पर उपासना करते समय दिखेगा। यानी पक्का सबूत बाद में मिलेगा, पहले चलना होगा। तेरा सवाल भी शायद यही है, और उसका उत्तर भी वही एक है।
तब वे तेरी सुनेंगे," परमेश्वर मूसा से यह बात तब कहते हैं जब मूसा ने अभी एक शब्द भी नहीं बोला। सुनवाई का वादा बोलने से पहले मिल गया।
और ध्यान दे, मूसा को अकेले नहीं भेजा गया। पुरनियों को साथ लेकर जाना था। जिस बुलाहट से तू घबरा रहा है, उसमें परमेश्वर तेरे साथ लोग भी देता है और नतीजा भी अपने हाथ में रखता है।
तू बस कहने की हिम्मत जुटा।
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