बाइबल व्याख्या

यशायाह 1:15

बाइबल
यह वचन Christian fellowship द्वारा समर्पित है

पाठ

उठे हुए हाथ, फैली हुई हथेलियाँ, मंदिर के आँगन में प्रार्थना की जानी-पहचानी मुद्रा। और परमेश्वर कहते हैं: मैं आँखें फेर लूँगा। यशायाह 1:15 में यहोवा अपने ही लोगों की उपासना के बीच खड़े होकर घोषणा करते हैं कि वे उनकी प्रार्थना नहीं सुनेंगे, चाहे वे कितनी ही देर, कितनी ही बार, कितनी ही ऊँची आवाज़ में पुकारें। कारण एक ही वाक्य में दिया गया है, और वह वाक्य किसी धार्मिक चूक की ओर नहीं, बल्कि उन्हीं उठे हुए हाथों की ओर उँगली उठाता है: "क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं।" जो हाथ आराधना में ऊपर उठे हैं, वही हाथ नीचे समाज में अनाथ और विधवा का हक़ छीन रहे हैं। परमेश्वर उन हाथों को देख रहे हैं, न कि उनकी मुद्रा को।

मर्म

यहाँ जो बात सबसे अधिक खटकती है, वह यह है कि परमेश्वर धर्म से थके नहीं, पाखंड से थके हैं। पिछली आयतों में वे बलिदानों, नये चाँदों और सभाओं को "बोझ" कहते हैं; अब वे प्रार्थना तक को ठुकरा देते हैं। यह उस परमेश्वर की तस्वीर है जो अपनी ही ठहराई हुई उपासना को अस्वीकार कर सकते हैं, यदि वह उपासना जीवन से कट गई हो। यहाँ धर्म एक परदा बन गया है, जिसके पीछे शोषण चलता रहता है, और परमेश्वर उस परदे को फाड़ देते हैं। इससे एक कठोर सत्य निकलता है: हमारी पहुँच परमेश्वर तक हमारी धार्मिक कार्यवाही से नहीं बनती। और साथ ही एक गहरी आशा भी, क्योंकि जो परमेश्वर खून से सने हाथों को देखकर मुँह फेरते हैं, वही आगे कहते हैं कि लाल रंग के पाप हिम के समान उजले हो सकते हैं। न्याय और अनुग्रह एक ही मुँह से बोलते हैं।

सूत्र

यह अध्याय आयत 15 पर रुकता नहीं। तुरंत बाद आदेश आता है, "अपने को धोकर पवित्र करो," और फिर वह अविश्वसनीय प्रस्ताव, कि लाल पाप हिम के समान उजले हो जाएँगे। पर कौन अपने ही खून से सने हाथ धो सकता है? यशायाह की पूरी पुस्तक इसी खाली जगह की ओर बढ़ती है, जब तक वह सेवक सामने नहीं आता जो दूसरों के अधर्म को अपने ऊपर उठा लेता है। यहीं मसीह खड़े हैं। क्रूस पर भी दो हाथ फैले हुए हैं, पर उन पर किसी शोषित का खून नहीं, उनका अपना खून है। और यह अकेली प्रार्थना है जिससे परमेश्वर ने मुँह नहीं फेरा। यशायाह 1:15 बताता है कि हमारी उपासना कहाँ टूट जाती है; गुड फ्राइडे बताता है कि परमेश्वर ने उसे कैसे जोड़ा।

दर्पण

यह आयत उस डर को छूती है जिसे हम धार्मिक व्यस्तता से ढाँपते हैं: कि कहीं परमेश्वर वाकई सुन न रहे हों। पर यशायाह कारण कहीं और रखता है, और वह कारण असुविधाजनक रूप से ठोस है। वह ठेकेदार जिसका भुगतान आपने महीनों टाल रखा है। वह कर्मचारी जिसकी शिकायत आपने दबा दी क्योंकि सुनना महँगा पड़ता। वह रिश्तेदार जिसकी ज़मीन के काग़ज़ आपके पास हैं और जिसका फ़ोन आप नहीं उठाते। रविवार को उठे हुए हाथ इन बातों को रद्द नहीं करते; परमेश्वर के लिए वे उन्हीं हाथों को और साफ़ दिखा देते हैं। आज ही अपनी हथेलियाँ खोलकर देखिए और उस एक नाम को काग़ज़ पर लिखिए जिसका हक़ आपके हाथ में अटका है, फिर उसे अभी संदेश भेजकर तारीख़ बताइए कि आप कब चुकाएँगे।

श्रोता

जिन्होंने यह पहली बार सुना, वे मंदिर से बेदखल लोग नहीं थे, वे मंदिर के नियमित ग्राहक थे। उनके लिए बलिदान कोई भावुक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परमेश्वर तक पहुँचने की स्वीकृत व्यवस्था थी, वही व्यवस्था जो व्यवस्था की पुस्तक में परमेश्वर ने स्वयं दी थी। अब वही परमेश्वर कहते हैं कि यह सब उन्हें बोझ लगता है। और "खून से भरे हाथ" सुनकर उनके मन में शायद कोई चाकू नहीं, बल्कि नगर द्वार की अदालत आई होगी, जहाँ घूस लेकर फ़ैसले बिकते थे और विधवा का मुक़दमा भीतर तक पहुँचने ही नहीं दिया जाता था। यशायाह उन्हें आयत 10 में सदोम और गमोरा कह चुका है। मंदिर में खड़े धर्मपरायण लोगों के लिए इससे बड़ा अपमान संभव नहीं था।

पृष्ठभूमि

यह उज्जियाह से हिजकिय्याह तक के लंबे दौर की आवाज़ है, यानी उस समय की जब यहूदा पहले समृद्ध हुआ और फिर अश्शूर के दबाव में कुचला गया। आयत 7 में देश उजड़ा पड़ा है, नगर भस्म हैं, परदेशी आँखों के सामने खेत निगल रहे हैं, और यरूशलेम ककड़ी के खेत की मचान जैसा अकेला खड़ा है। ऐसे संकट में उपासना घटती नहीं, बढ़ती है; लोग और अधिक बलिदान चढ़ाते हैं, और अधिक पर्व मनाते हैं, मानो परमेश्वर को मनाया जा सकता हो। ऊपर से समाज वही रहता है: हाकिम हठीले, चोरों के साथी, घूस के लालची। यशायाह इसी विरोधाभास के बीच बोलता है, बाहरी संकट और भीतरी सड़न के बीच।

अन्य वचनों की गूँज

नीतिवचन 1:28 में बुद्धि उन लोगों के विषय में यही कहती है कि वे पुकारेंगे पर उत्तर नहीं पाएँगे, क्योंकि उन्होंने तब नहीं सुना जब सुनने का समय था। मीका 3:4, यशायाह के ही समकालीन नबी की आवाज़, ठीक उन्हीं हाकिमों से कहती है कि परमेश्वर उनसे मुँह छिपा लेंगे, क्योंकि उन्होंने बुरे काम किए हैं। तीनों जगह एक ही तर्क है: अनसुनी प्रार्थना परमेश्वर की उदासीनता नहीं, उनका न्याय है। और तीनों के आर-पार वही रास्ता खुलता है जो इसी अध्याय की आयत 18 में खुलता है, जहाँ परमेश्वर मुँह फेरने के बाद भी बहस के लिए बुलाते हैं, और खुद ही धोने का वादा करते हैं।

चिंतन

आपकी प्रार्थना और आपके बटुए, आपके अनुबंधों, आपके फ़ैसलों के बीच कौन सा एक विरोधाभास है जिसे आप अब तक "आध्यात्मिक संघर्ष" कहकर टालते रहे हैं?

यदि मसीह के हाथ ही वह प्रार्थना हैं जिसे परमेश्वर सुनते हैं, तो यह आपके अपने हाथों के काम को इस सप्ताह कैसे बदलेगा?

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Isaiah 1:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 1:15 का क्या अर्थ है?
उठे हुए हाथ, फैली हुई हथेलियाँ, मंदिर के आँगन में प्रार्थना की जानी-पहचानी मुद्रा। और परमेश्वर कहते हैं: मैं आँखें फेर लूँगा। यशायाह 1:15 में यहोवा अपने ही लोगों की उपासना के बीच खड़े होकर घोषणा करते हैं कि वे उनकी प्रार्थना नहीं सुनेंगे, चाहे वे कितनी ही देर, कितनी ही बार, कितनी ही ऊँची आवाज़ में पुकारें। कारण एक ही वाक्य में दिया गया है, और वह वाक्य किसी धार्मिक चूक की ओर नहीं, बल्कि उन्हीं उठे हुए हाथों की ओर उँगली उठाता है: "क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं।" जो हाथ आराधना में ऊपर उठे हैं, वही हाथ नीचे समाज में अनाथ और विधवा का हक़ छीन रहे हैं। परमेश्वर उन हाथों को देख रहे हैं, न कि उनकी मुद्रा को।
यशायाह 1:15 किस विषय में है?
यह अध्याय आयत 15 पर रुकता नहीं। तुरंत बाद आदेश आता है, "अपने को धोकर पवित्र करो," और फिर वह अविश्वसनीय प्रस्ताव, कि लाल पाप हिम के समान उजले हो जाएँगे। पर कौन अपने ही खून से सने हाथ धो सकता है? यशायाह की पूरी पुस्तक इसी खाली जगह की ओर बढ़ती है, जब तक वह सेवक सामने नहीं आता जो दूसरों के अधर्म को अपने ऊपर उठा लेता है। यहीं मसीह खड़े हैं। क्रूस पर भी दो हाथ फैले हुए हैं, पर उन पर किसी शोषित का खून नहीं, उनका अपना खून है। और यह अकेली प्रार्थना है जिससे परमेश्वर ने मुँह नहीं फेरा। यशायाह 1:15 बताता है कि हमारी उपासना कहाँ टूट जाती है; गुड फ्राइडे बताता है कि परमेश्वर ने उसे कैसे जोड़ा।
यशायाह 1:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
जिन्होंने यह पहली बार सुना, वे मंदिर से बेदखल लोग नहीं थे, वे मंदिर के नियमित ग्राहक थे। उनके लिए बलिदान कोई भावुक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परमेश्वर तक पहुँचने की स्वीकृत व्यवस्था थी, वही व्यवस्था जो व्यवस्था की पुस्तक में परमेश्वर ने स्वयं दी थी। अब वही परमेश्वर कहते हैं कि यह सब उन्हें बोझ लगता है। और "खून से भरे हाथ" सुनकर उनके मन में शायद कोई चाकू नहीं, बल्कि नगर द्वार की अदालत आई होगी, जहाँ घूस लेकर फ़ैसले बिकते थे और विधवा का मुक़दमा भीतर तक पहुँचने ही नहीं दिया जाता था। यशायाह उन्हें आयत 10 में सदोम और गमोरा कह चुका है। मंदिर में खड़े धर्मपरायण लोगों के लिए इससे बड़ा अपमान संभव नहीं था।
यशायाह 1:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
नीतिवचन 1:28 में बुद्धि उन लोगों के विषय में यही कहती है कि वे पुकारेंगे पर उत्तर नहीं पाएँगे, क्योंकि उन्होंने तब नहीं सुना जब सुनने का समय था। मीका 3:4, यशायाह के ही समकालीन नबी की आवाज़, ठीक उन्हीं हाकिमों से कहती है कि परमेश्वर उनसे मुँह छिपा लेंगे, क्योंकि उन्होंने बुरे काम किए हैं। तीनों जगह एक ही तर्क है: अनसुनी प्रार्थना परमेश्वर की उदासीनता नहीं, उनका न्याय है। और तीनों के आर-पार वही रास्ता खुलता है जो इसी अध्याय की आयत 18 में खुलता है, जहाँ परमेश्वर मुँह फेरने के बाद भी बहस के लिए बुलाते हैं, और खुद ही धोने का वादा करते हैं।
यशायाह 1:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि मसीह के हाथ ही वह प्रार्थना हैं जिसे परमेश्वर सुनते हैं, तो यह आपके अपने हाथों के काम को इस सप्ताह कैसे बदलेगा?
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Isaiah 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

भला करना सीखो" परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि भला करना याद रखो, बल्कि सीखो। जैसे कोई बच्चा चलना सीखता है, गिरता है, फिर उठता है। यरूशलेम के लोग बलिदान चढ़ाना जानते थे, पर विधवा का मुकद्दमा लड़ना भूल गए थे। आज अपने आप से पूछ, मेरी भक्ति किसके आँसू पोंछती है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 24

सुन, मैं अपने बैरियों से बदला लूँगा और अपने शत्रुओं से पलटा लूँगा।" चौंकाने वाली बात यह है कि ये बैरी कोई पराई जाति नहीं, यह उसकी अपनी यरूशलेम है। जिन्हें उसने बेटे कहकर पाला, वही उसके विरोधी बन गए। पर अगली आयत बताती है कि वह मैल जलाने आता है, बच्चे को मिटाने नहीं। परमेश्वर का क्रोध भी शुद्ध करने के लिए है। कहीं तू उस आग से भाग रहा है जो तुझे साफ करने आई है?

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