यशायाह 58:1
यह पाठ
परमेश्वर भविष्यद्वक्ता से कहते हैं कि वह चुप न रहे: "गला खोलकर पुकार, कुछ न रख छोड़, नरसिंगे का सा ऊँचा शब्द कर।" यह फुसफुसाहट नहीं, यह कोई नम्र सुझाव नहीं, बल्कि युद्ध के तुरही जैसी चेतावनी है। और जो सुनाना है वह अभिवादन नहीं, आरोप है: "मेरी प्रजा को उसका अपराध अर्थात् याकूब के घराने को उसका पाप जता दे।" ध्यान दीजिए कि यह संदेश किसी विदेशी राष्ट्र के लिए नहीं है। यह उन लोगों के लिए है जो मंदिर में आते हैं, उपवास रखते हैं, और परमेश्वर की व्यवस्था पूछते हैं। जो सबसे धार्मिक दिखते हैं, उन्हीं के सामने तुरही बजाई जाती है। पूरा अध्याय इसी एक वाक्य से खुलता है, और यही इसकी धार है।
मूल बात
इस आयत में दो शब्द एक साथ खड़े हैं जिन्हें हम आमतौर पर अलग रखना चाहते हैं: "मेरी प्रजा" और "उसका पाप।" परमेश्वर उन्हें छोड़ नहीं रहे, इसलिए वे उन्हें छोड़ भी नहीं रहे। आरोप यहाँ संबंध-विच्छेद का ऐलान नहीं, बल्कि वाचा के भीतर से उठी हुई आवाज़ है। जिस परिवार में कोई परवाह नहीं करता, वहाँ कोई चिल्लाता भी नहीं; चुप्पी उदासीनता की निशानी है, तुरही प्रेम की।
यहाँ मनुष्य के बारे में एक कड़वी सच्चाई भी खुलती है: हम धार्मिकता के ढाँचे में पाप को इतनी सफाई से छिपा सकते हैं कि वह हमें स्वयं दिखाई न दे। इसीलिए पाप को "जता देना" पड़ता है, मानो वह लोगों की अपनी आँखों से ओझल हो। अनुग्रह की पहली कार्रवाई अक्सर यही होती है: नाम रखना। जिसका नाम नहीं लिया जाता, वह चंगा भी नहीं होता। परमेश्वर चोट पर पट्टी बाँधने से पहले उसे उघाड़ते हैं।
सूत्र
यशायाह को जो आवाज़ बनना है, वह आगे चलकर देह धारण करती है। जब यीशु मसीह नासरत की सभा में खड़े होकर यशायाह की पुस्तक से पढ़ते हैं कि वे बंधुओं को छुड़ाने और कुचले हुओं को स्वतंत्र करने भेजे गए हैं (लूका 4:18,19), तो वे ठीक उसी उपवास की घोषणा करते हैं जिसका वर्णन इसी अध्याय की छठी आयत में है: "अन्याय से बनाए हुए दासों… का जूआ तोड़कर उनको छुड़ा लेना।" यशायाह 58 की तुरही और मसीह की सेवा एक ही स्वर में बजती हैं।
पर सूत्र इससे गहरा है। जो तुरही यहाँ पाप को उघाड़ती है, वही अंत में उस व्यक्ति की ओर इशारा करती है जो उघाड़े गए पाप को अपने ऊपर उठा लेता है। परमेश्वर नाम इसलिए रखते हैं कि क्षमा दे सकें। यही कारण है कि वही यशायाह, कुछ ही अध्याय पहले, उस सेवक का चित्र खींचता है जो हमारे अपराधों के कारण घायल किया गया। आरोप क्रूस की ओर जाने वाली सड़क का पहला मील का पत्थर है।
दर्पण
यह आयत उस जगह चुभती है जहाँ हम सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं: हमारी धार्मिक नियमितता में। आप सुबह बाइबल पढ़ते हैं, रविवार को नहीं चूकते, शायद समूह की अगुवाई भी करते हैं। और ठीक इसी ढाँचे के भीतर वह बात पल सकती है जिसे आप देखना नहीं चाहते: वह कर्मचारी जिसका वेतन आप टालते हैं, वह रिश्तेदार जिसका फ़ोन आप नहीं उठाते, वह कटु टिप्पणी जो आप घर में इतनी आसानी से कर देते हैं कि अब सुनाई भी नहीं देती। परमेश्वर की शिकायत उन लोगों से नहीं थी जो दूर थे, बल्कि उनसे जो रोज़ पास आते थे।
तुरही का काम सुख देना नहीं, जगाना है। और जागना दर्द देता है।
आज ही, दस मिनट में: एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसे आप अपनी धार्मिक आदतों के पीछे छिपाते आए हैं, और उसे ज़ोर से, अपने शब्दों में, परमेश्वर के सामने बोलकर कहिए। नाम लिए बिना चंगाई शुरू नहीं होती।
कठिन प्रश्न
अगर परमेश्वर प्रेम करते हैं, तो वे चिल्लाते क्यों हैं? क्या नम्र फुसफुसाहट काफ़ी न होती? यह प्रश्न टालने लायक नहीं। हमें वह परमेश्वर अधिक भाता है जो समझता है, न कि वह जो तुरही बजवाता है।
पर इस आयत का तर्क यही है कि कुछ बहरेपन सिर्फ़ ऊँची आवाज़ से टूटते हैं। जो लोग "परमेश्वर के निकट आने से प्रसन्न" थे, वे अपनी ही धार्मिकता की आवाज़ में इतने डूबे थे कि कोमल शब्द उन तक पहुँचता ही नहीं। फिर भी रहस्य बना रहता है: परमेश्वर इतनी देर तक चेतावनी क्यों देते हैं और फिर भी हृदय नहीं बदलते? यशायाह पूरी ज़िंदगी चिल्लाता रहा, और अधिकांश श्रोता नहीं बदले। कृपा ज़बरदस्ती नहीं करती, और यही उसकी सबसे पीड़ादायक गरिमा है।
शास्त्र की गूँज
यीशु मसीह ने पहाड़ी उपदेश में उन लोगों के बारे में कहा जो उपवास के समय अपना मुँह उदास बना लेते हैं (मत्ती 6:16), और इसी अध्याय का पाँचवाँ पद पहले ही पूछ चुका था: "क्या सिर को झाऊ के समान झुकाना… ही को तुम उपवास और यहोवा को प्रसन्न करने का दिन कहते हो?" आठ सौ साल के अंतर पर दो आवाज़ें, एक ही निदान।
इसके विपरीत खड़ा है वह दृश्य जो आगे आता है: जहाँ पाप का नाम लिया जाता है, वहाँ वादा भी है। "तब तू पुकारेगा और यहोवा उत्तर देगा; तू दुहाई देगा और वह कहेगा, 'मैं यहाँ हूँ।'" तुरही और यह कोमल उत्तर एक ही मुँह से निकलते हैं। यही इस अध्याय की सबसे बड़ी गवाही है।
पृष्ठभूमि
यह भाग संभवतः निर्वासन के बाद के समुदाय से बोलता है: लोग लौट आए हैं, मंदिर की सेवा किसी तरह चल रही है, उपवास के दिन नियम से मनाए जाते हैं। पर अर्थव्यवस्था टूटी है, और टूटी अर्थव्यवस्था में ताक़तवर लोग कर्ज़ और श्रम के ज़रिए कमज़ोरों को दबा लेते हैं। इसीलिए परमेश्वर की शिकायत सेवकों से कठिन काम कराने, झगड़े और "जूए" की भाषा में आती है।
उस संस्कृति में उपवास सार्वजनिक धर्मपरायणता का सबसे दिखने वाला चिह्न था; टाट और राख सबके सामने थे, और कर्मचारी का शोषण किसी को दिखाई नहीं देता था। भविष्यद्वक्ता को इस सम्मानित भीड़ के बीच खड़े होकर तुरही बजानी है। यह लोकप्रिय काम नहीं था, और वह इसे जानता था।
मनन के प्रश्न
मेरी किस धार्मिक आदत के पीछे ऐसा कुछ छिपा है जिसका नाम मैंने अब तक परमेश्वर के सामने नहीं लिया?
अगर मसीह आज मेरे घर या कार्यस्थल में यशायाह 58:6 पढ़कर सुनाएँ, तो किसका जूआ टूटना चाहिए, और उसमें मेरी भूमिका क्या है?
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