बाइबल व्याख्या

मत्ती 5:4

बाइबल

पाठ

यीशु पहाड़ पर बैठ गए हैं, चेले पास आ गए हैं, और उनका पहला उपदेश किसी नैतिक आदेश से नहीं, बल्कि एक सूची से शुरू होता है कि परमेश्वर किन्हें धन्य कहते हैं। दूसरे वचन में वे कहते हैं: "धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।" यानी जो लोग रो रहे हैं, जिनके भीतर कुछ टूटा पड़ा है, जो किसी नुकसान या किसी अन्याय या अपने ही पाप के बोझ तले झुके हुए हैं, उन्हें यीशु अभागा नहीं, धन्य कहते हैं। कारण भविष्य में है, वर्तमान में नहीं: उन्हें शान्ति मिलेगी। कौन देगा, यह वाक्य नहीं बताता, पर हर सुननेवाला समझ गया कि देनेवाले परमेश्वर ही हैं।

मूल

यह वचन दुःख का महिमामंडन नहीं करता। यीशु यह नहीं कह रहे कि रोना अपने आप में पवित्र है। वे यह कह रहे हैं कि परमेश्वर के राज्य में वह व्यक्ति सुरक्षित स्थान पर खड़ा है जो संसार की टूट-फूट को टूट-फूट कहने से इनकार नहीं करता। शोक करना एक ईमानदार कार्य है: यह स्वीकारना कि चीज़ें वैसी नहीं हैं जैसी होनी चाहिए, न मेरे घर में, न मेरे देश में, न मेरे अपने हृदय में। जो इस सच्चाई को सुन्न कर देता है, वह शान्ति की ज़रूरत भी मिटा देता है, और इसलिए शान्ति पा भी नहीं सकता। यहाँ परमेश्वर सांत्वना देनेवाले के रूप में प्रकट होते हैं, न कि दुःख हटाने के लिए जल्दबाज़ी करनेवाले के रूप में। यही राज्य का उलटा गणित है: खालीपन ही वह जगह है जहाँ अनुग्रह भरा जाता है।

सूत्र

इस्राएल की भाषा में "शोक" का एक बड़ा इतिहास है। बेबीलोन में बैठे लोग सिय्योन के लिए रोए, और भविष्यद्वक्ता यशायाह ने उन्हीं रोनेवालों से वादा किया कि परमेश्वर उन्हें राख के बदले सुन्दर मुकुट देंगे, विलाप के बदले आनन्द (यशायाह 61)। यीशु उसी अध्याय को अपने सेवाकाल का घोषणापत्र बनाते हैं, और यहाँ पहाड़ पर उसी वादे को एक वाक्य में समेट देते हैं। ध्यान दीजिए, "वे शान्ति पाएँगे" कर्मवाच्य में है: पानेवाला कोई और नहीं, देनेवाला परमेश्वर है। और यह धागा बाइबल के अन्त तक जाता है, जहाँ परमेश्वर स्वयं आँखों से आँसू पोंछते हैं (प्रकाशितवाक्य 21:4)। बीच में क्रूस खड़ा है: वही जो शोक करनेवालों को धन्य कहता है, स्वयं शोक की गहराई में उतरता है, ताकि सांत्वना केवल एक शब्द न रह जाए।

आइना

हम शोक से नहीं डरते, हम उसकी असुविधा से डरते हैं। इसलिए हमने उसे टालने के हज़ार रास्ते बना लिए हैं: दफ़्तर में और घंटे, शाम को स्क्रीन, खरीदारी, व्यंग्य, या वह धार्मिक जल्दबाज़ी जो हर दुःख पर तुरन्त "परमेश्वर भला है" चिपका देती है। जब परिवार में कोई खोया जाता है, हम तीन दिन बाद बात बदल देते हैं। जब कोई मित्र बताता है कि उसका विवाह टूट रहा है, हम सुनने के बजाय सलाह देने लगते हैं, क्योंकि सलाह देना कम दर्द देता है। और अपने पाप पर भी हम शोक नहीं करते; हम उसे "सुधार की योजना" बना लेते हैं, जिसमें आँसू की जगह नहीं होती। यीशु इस पूरी व्यवस्था पर हाथ रखते हैं और कहते हैं: जो रोने से इनकार करता है, वह सांत्वना से भी इनकार कर रहा है।

आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसका दुःख आपने हाल में टाल दिया, और उसे एक ही वाक्य का संदेश भेजिए जिसमें कोई सलाह न हो, केवल यह कि आपको उसका दुःख याद है।

मुख्य पात्र

यीशु यहाँ आदेश नहीं देते, वे घोषणा करते हैं। और यह घोषणा करने का अधिकार केवल उसका है जो जानता है कि परमेश्वर के हिसाब में कौन कहाँ खड़ा है। "वह अपना मुँह खोलकर उन्हें यह उपदेश देने लगा" वाला यह गुरु किसी सुरक्षित मंच से नहीं बोल रहा; वह गलील की धूल में उन लोगों के बीच बैठा है जिनके शव उन्होंने गाड़े हैं, जिनके बच्चे बीमारी में मरे हैं, जिनकी ज़मीन कर्ज़ में गई है। यीशु का चेहरा यहाँ कठोर नहीं, बल्कि विचित्र रूप से शान्त है: वे दुःख को नकारते नहीं और उससे घबराते भी नहीं। यही उनकी सबसे गहरी विशेषता है, कि वे टूटी चीज़ों के सामने खड़े रह सकते हैं बिना नज़र फेरे और बिना झूठा दिलासा दिए।

श्रोता

पहाड़ पर बैठे लोग रोमी शासन के नीचे जी रहे थे: कर, सैनिक, बेगार, और यह लगातार अपमान कि अपने ही देश में वे मालिक नहीं हैं। उनमें कुछ ऐसे थे जो व्रत रखकर सिय्योन के लिए विलाप करते थे, परमेश्वर के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में। उनके कानों में "धन्य" शब्द भजन संहिता की परिचित शैली थी, पर वहाँ धन्य वह कहलाता था जिसका खलिहान भरा हो और जिसके बच्चे जीवित हों। यीशु उस मुहावरे को उलट देते हैं। जो अपने आँसुओं को परमेश्वर के दण्ड का प्रमाण समझ रहे थे, उन्होंने सुना कि उनके आँसू उन्हें राज्य से बाहर नहीं, बल्कि उसके ठीक केन्द्र में रखते हैं। यह उनके लिए राहत से ज़्यादा एक झटका था।

प्रसंग

यह गलील है, यीशु के सेवाकाल का आरम्भिक दौर। पिछले अध्याय में वे गाँव-गाँव जाकर बीमारों को चंगा कर रहे थे, और भीड़ बढ़ती चली गई। अब वे पहाड़ पर चढ़कर बैठ जाते हैं, ठीक उस मुद्रा में जिसमें एक गुरु शिक्षा देता था, और चेले पास आ जाते हैं जबकि भीड़ पीछे सुनती रहती है। पहाड़ और शिक्षा का यह मेल मूसा और सीनै की याद दिलाता है, पर यहाँ पत्थर की पटियाएँ नहीं, आठ घोषणाएँ हैं। यह जानना ज़रूरी है कि ये वचन राज्य में प्रवेश की शर्तें नहीं हैं, बल्कि उस राज्य के नागरिकों की पहचान हैं जिसे यीशु लेकर आए। इसीलिए चौथा वचन कर्तव्य नहीं थमाता, वह एक स्थिति पर परमेश्वर की मुहर लगाता है।

चिंतन

पिछले महीने में किस दुःख को आपने महसूस करने से पहले ही व्यस्तता, मनोरंजन या धार्मिक शब्दों से ढक दिया?

यदि सांत्वना केवल शोक करनेवालों को दी जाती है, तो आपके जीवन में कौन सी बात है जिसके लिए आपको अभी तक ईमानदारी से रोना बाकी है?

पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें

आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

संत अगस्तीन

अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।

उद्देश्य भरा जीवन

उद्देश्य भरा जीवन

रिक वॉरेन

चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास

भाई लॉरेन्स

रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।

जंगल का छिपने का स्थान

जंगल का छिपने का स्थान

कोरी टेन बूम

नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।

जीसस कॉलिंग

जीसस कॉलिंग

सारा यंग

प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।

एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Matthew 5:4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 5:4 का क्या अर्थ है?
यीशु पहाड़ पर बैठ गए हैं, चेले पास आ गए हैं, और उनका पहला उपदेश किसी नैतिक आदेश से नहीं, बल्कि एक सूची से शुरू होता है कि परमेश्वर किन्हें धन्य कहते हैं। दूसरे वचन में वे कहते हैं: "धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे।" यानी जो लोग रो रहे हैं, जिनके भीतर कुछ टूटा पड़ा है, जो किसी नुकसान या किसी अन्याय या अपने ही पाप के बोझ तले झुके हुए हैं, उन्हें यीशु अभागा नहीं, धन्य कहते हैं। कारण भविष्य में है, वर्तमान में नहीं: उन्हें शान्ति मिलेगी। कौन देगा, यह वाक्य नहीं बताता, पर हर सुननेवाला समझ गया कि देनेवाले परमेश्वर ही हैं।
मत्ती 5:4 किस विषय में है?
इस्राएल की भाषा में "शोक" का एक बड़ा इतिहास है। बेबीलोन में बैठे लोग सिय्योन के लिए रोए, और भविष्यद्वक्ता यशायाह ने उन्हीं रोनेवालों से वादा किया कि परमेश्वर उन्हें राख के बदले सुन्दर मुकुट देंगे, विलाप के बदले आनन्द (यशायाह 61)। यीशु उसी अध्याय को अपने सेवाकाल का घोषणापत्र बनाते हैं, और यहाँ पहाड़ पर उसी वादे को एक वाक्य में समेट देते हैं। ध्यान दीजिए, "वे शान्ति पाएँगे" कर्मवाच्य में है: पानेवाला कोई और नहीं, देनेवाला परमेश्वर है। और यह धागा बाइबल के अन्त तक जाता है, जहाँ परमेश्वर स्वयं आँखों से आँसू पोंछते हैं (प्रकाशितवाक्य 21:4)। बीच में क्रूस खड़ा है: वही जो शोक करनेवालों को धन्य कहता है, स्वयं शोक की गहराई में उतरता है, ताकि सांत्वना केवल एक शब्द न रह जाए।
मत्ती 5:4 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसका दुःख आपने हाल में टाल दिया, और उसे एक ही वाक्य का संदेश भेजिए जिसमें कोई सलाह न हो, केवल यह कि आपको उसका दुःख याद है।
मत्ती 5:4 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहाड़ पर बैठे लोग रोमी शासन के नीचे जी रहे थे: कर, सैनिक, बेगार, और यह लगातार अपमान कि अपने ही देश में वे मालिक नहीं हैं। उनमें कुछ ऐसे थे जो व्रत रखकर सिय्योन के लिए विलाप करते थे, परमेश्वर के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में। उनके कानों में "धन्य" शब्द भजन संहिता की परिचित शैली थी, पर वहाँ धन्य वह कहलाता था जिसका खलिहान भरा हो और जिसके बच्चे जीवित हों। यीशु उस मुहावरे को उलट देते हैं। जो अपने आँसुओं को परमेश्वर के दण्ड का प्रमाण समझ रहे थे, उन्होंने सुना कि उनके आँसू उन्हें राज्य से बाहर नहीं, बल्कि उसके ठीक केन्द्र में रखते हैं। यह उनके लिए राहत से ज़्यादा एक झटका था।
मत्ती 5:4 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले महीने में किस दुःख को आपने महसूस करने से पहले ही व्यस्तता, मनोरंजन या धार्मिक शब्दों से ढक दिया?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय

What strikes me most about the Sermon on the Mount is not the content but the listeners. No rabbis, no scribes, just fishermen and beggars and the sick. Jesus gave his deepest teaching to people nobody took seriously. That comforts me whenever I feel too small for the Kingdom again.

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 39

यीशु कहते हैं, "जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।" दाहिने गाल पर थप्पड़ उल्टे हाथ से पड़ता है, उसमें चोट कम और अपमान ज़्यादा होता है। यीशु तुझसे कह रहे हैं कि अपमान करनेवाला यह तय न करे कि तू कौन बनेगा। बदला लौटाना आसान है, पर उस पल में शांत खड़े रहना असली ताक़त है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए न टलेगा।" सोचो, यीशु सबसे छोटी बिन्दु की भी चिंता करते हैं। जो परमेश्वर एक मात्रा को नहीं भूलता, क्या वह तेरी उस छोटी सी प्रार्थना को भूल जाएगा, जो तूने आँसुओं में फुसफुसाई थी? उसका वचन टलता नहीं, और न उसका प्रेम।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

कंपनी?