याकूब 1:5
पाठ
याकूब अभी-अभी कह चुका है कि परीक्षाएँ धीरज पैदा करती हैं और धीरज हमें ऐसा बनाता है कि "किसी बात की घटी न रहे।" और ठीक उसी साँस में वह स्वीकार करता है कि एक घटी तो रह ही जाती है: "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो।" इसका उत्तर कोई कोर्स नहीं, कोई अनुभव नहीं, बल्कि माँगना है। परमेश्वर से माँगो, वे जो सब को उदारता से देते हैं और माँगने वाले को ताना नहीं मारते, झिड़कते नहीं, पुराना हिसाब नहीं खोलते। और वचन बिना शर्त के समाप्त होता है: "और उसको दी जाएगी।"
मूल बात
यह पद परमेश्वर के चरित्र के बारे में एक साहसी दावा करता है। दो शब्द इसका बोझ उठाते हैं: उदारता और बिना उलाहना। ग्रीक में जिस शब्द का अनुवाद "उलाहना" हुआ है (ऑनेइदिज़ो), उसका अर्थ है किसी को शर्मिंदा करना, उसकी कमी उसके मुँह पर मारना। हम में से अधिकांश लोग ऐसे ही देते हैं, थोड़ा हिसाब रखते हुए, थोड़ी याद दिलाते हुए कि पिछली बार भी तुम्हीं आए थे। परमेश्वर ऐसे नहीं देते। यहाँ बुद्धि का अर्थ बुद्धिमत्ता या जानकारी नहीं, बल्कि यह जानना है कि दुख के बीच में कैसे जीना है, कैसे चलना है, क्या कहना है। और ध्यान दीजिए: यह वही परमेश्वर हैं जो सुलैमान को बुद्धि देते समय भी नहीं झिझके थे। घटी को स्वीकार करना ही यहाँ विश्वास का पहला रूप है।
सामान्य सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में बुद्धि हमेशा एक दी हुई चीज़ है, छीनी हुई नहीं। अदन में पहली गलती यही थी कि बुद्धि परमेश्वर के हाथ से लेने के बजाय फल तोड़कर हासिल करने की कोशिश हुई। सुलैमान ने उल्टा रास्ता लिया: उसने माँगा, और मिला। नीतिवचन में बुद्धि गली में खड़ी होकर पुकारती है, बिकती नहीं, बुलाती है। और फिर वह बिंदु आता है जहाँ पौलुस कहता है कि मसीह हमारे लिए परमेश्वर की ओर से बुद्धि ठहरे। यानी जिस बुद्धि की याकूब बात कर रहा है, वह अंततः कोई सिद्धांत नहीं, एक व्यक्ति है, और वह व्यक्ति क्रूस पर गया। इसलिए जो बुद्धि परमेश्वर देते हैं, वह अक्सर चतुराई जैसी नहीं दिखती। वह धीरज जैसी दिखती है।
दर्पण
घटी स्वीकार करना अपमान जैसा लगता है। आप चालीस के हैं, आप समूह चलाते हैं, लोग आपसे सलाह लेते हैं, और आपको पता नहीं कि बीमार माँ को घर पर रखें या नहीं, कि बेटे से इस बार सख्ती से बोलें या चुप रहें, कि यह नौकरी छोड़ना विश्वास है या भागना। हम अक्सर इसलिए नहीं माँगते क्योंकि माँगना यह मान लेना है कि हम फँसे हुए हैं। और गहरे में एक डर बैठा है: कहीं परमेश्वर यह न कहें कि इतने साल बाद भी तुम्हें यह नहीं आया? याकूब ठीक उसी डर पर हाथ रखता है और कहता है, वे ताना नहीं देते। आज, अगले दस मिनट में, उस एक स्थिति का नाम ज़ोर से बोलिए जिसमें आप नहीं जानते कि क्या करें, और उसी साँस में कहिए: "मुझे बुद्धि चाहिए, मुझे नहीं मालूम।"
अंतर्पाठ
यह वचन यीशु की अपनी बात की गूँज है: माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा। याकूब प्रभु का भाई था, और यहाँ वह लगभग उन्हीं शब्दों में बोलता है, बिना यह बताए कि वह किसे उद्धृत कर रहा है। दूसरी ओर एक तीखा विरोधाभास है: अय्यूब के मित्र। वे बुद्धि बाँटने आए थे और उन्होंने पूरी किताब भर उलाहना दिया, हर दुख के पीछे कोई छिपा पाप खोजते रहे। याकूब कहता है, परमेश्वर वैसे नहीं हैं। पर तनाव बना रहता है, और उसे छिपाना बेईमानी होगी: अय्यूब ने उत्तर माँगा और उसे उत्तर नहीं, प्रश्नों का तूफ़ान मिला। और याकूब खुद अगले ही वचन में शर्त जोड़ देता है, "पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे।" खुला हाथ है, पर डोलती हुई हथेली में कुछ टिकता नहीं।
संदर्भ
याकूब "उन बारहों गोत्रों को जो तितर-बितर होकर रहते हैं" लिखता है, यानी बिखरे हुए, उखड़े हुए लोगों को। ये यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे जो यरूशलेम से बाहर, भूमध्य सागर के शहरों में, अल्पसंख्यक की तरह जी रहे थे। पत्र की बाद की बातें माहौल खोल देती हैं: मज़दूरी रोके जाने की शिकायत, अदालतों में घसीटे जाना, कलीसिया में अमीर का ऊँचा आसन और गरीब का कोना। इसी पत्र में धनवान "घास के फूल की तरह मिट जाएगा।" यानी "नाना प्रकार की परीक्षाएँ" कोई भीतरी उदासी नहीं थीं, वे रोटी, काम और इज़्ज़त से जुड़ी थीं। ऐसे हालात में सबसे बड़ी ज़रूरत यह जानना थी कि कल सुबह क्या करना है। इसीलिए बुद्धि।
व्यक्तिचित्र
उस दुनिया में माँगना कभी मुफ़्त नहीं होता था। आप किसी संरक्षक के पास जाते, वह देता, और उसके बाद आप जीवन भर उसके कर्ज़दार रहते; हर मिलन में वह याद दिलाता कि किसने किसे उठाया था। देना वहाँ शक्ति का खेल था और माँगना इज़्ज़त गँवाना था। जो लोग पहले ही अपनी ज़मीन, अपना शहर, अपनी हैसियत खो चुके थे, उनके कानों में "बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है" किसी क्रांति जैसा गूँजा होगा। एक देने वाला जो देने के बाद आपको छोटा नहीं करता। और "सब को" का मतलब उनके लिए यह भी था कि गरीब भाई को भी, जिसे मंडली में पीछे बैठाया जाता था।
चिंतन
आप किस बात में फँसे हैं, जिसे आपने अभी तक प्रार्थना में नहीं, बल्कि सिर्फ़ चिंता में रखा है?
आप किसे देते हैं, और क्या आपके देने में कहीं कोई हल्का-सा उलाहना छिपा रहता है?
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James 1:5 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
याकूब 1:5 का क्या अर्थ है?
याकूब 1:5 किस विषय में है?
याकूब 1:5 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
याकूब 1:5 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
याकूब 1:5 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
James 1 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पर धनवान अपनी नीच दशा पर घमण्ड करे, क्योंकि वह घास के फूल के समान जाता रहेगा।" याकूब कहता है, अपनी कमज़ोरी पर घमण्ड कर। क्योंकि जिस दिन तेरा बैंक बैलेंस, तेरा पद, तेरी इज़्ज़त तुझसे छिन जाती है, उसी दिन तू सच में देखता है कि तुझे थामे कौन है। फूल मुरझाता है, पर जिसकी जड़ मसीह में है, वह नहीं। आज तू किस चीज़ के सहारे खड़ा है?
पिता, धन्यवाद कि आपने परीक्षाओं को भी आनंद की बात कहा है। जिन कठिनाइयों से मैं गुज़रा, उनमें आपने मुझे अकेला नहीं छोड़ा, बल्कि थामे रखा। धन्यवाद कि आपके हाथ में मेरे आँसू भी व्यर्थ नहीं जाते, हर परीक्षा में आप कुछ भला गढ़ रहे हैं।
उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया।" रुककर सोच, तेरे नए जन्म के पीछे तेरी योग्यता नहीं, परमेश्वर की इच्छा थी। तूने उसे नहीं चुना, उसने तुझे चाहा। और जिस दिन तू खुद से निराश हो, याद रखना कि जो इच्छा तुझे जन्म देने के लिए काफी थी, वही तुझे थामे रखने के लिए भी काफी है।
सूरज हर दिन जगह बदलता है, इसलिए छाया भी सरकती रहती है। सुबह जहाँ उजाला था, दोपहर तक वहाँ अँधेरा हो जाता है। पर याकूब लिखता है कि परमेश्वर "ज्योतियों के पिता" हैं, "जिसमें न कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल-बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।" तेरे हालात बदल गए, इसका मतलब यह नहीं कि उसका मन तेरी ओर बदल गया।
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