बाइबल व्याख्या

अय्यूब 12

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

अय्यूब का पहला वाक्य व्यंग्य है, और कड़वा व्यंग्य: "निःसन्देह मनुष्य तो तुम ही हो और जब तुम मरोगे तब बुद्धि भी जाती रहेगी।" तीन मित्रों ने उसे परमेश्वर के न्याय पर उपदेश दिया है, और अय्यूब कहता है कि यह ज्ञान तो पशु-पक्षी भी जानते हैं। फिर वह अपने अनुभव की चुभती सच्चाई रखता है: डाकुओं के डेरे कुशल से हैं, और वह जो कभी प्रार्थना करता था और सुना जाता था, अब हँसी का कारण बन गया है। इसके बाद अध्याय एक लंबे स्तवन में बदल जाता है, पर यह अजीब सा स्तवन है: परमेश्वर की सामर्थ्य का वर्णन, जिसमें वे राजाओं, याजकों, न्यायियों और पुरनियों को उलट देते हैं।

मर्म

यह अध्याय परमेश्वर की सर्वसामर्थ्य को नकारता नहीं, उसे और ऊँचा उठाता है, पर एक ऐसे स्वर में जो सांत्वना नहीं देता। मित्रों की धर्मविद्या साफ-सुथरी है: परमेश्वर भले को आशीष देते हैं, बुरे को दंड। अय्यूब कहता है, तुम्हारा गणित सही है पर संसार उससे मेल नहीं खाता। और वह इसका समाधान परमेश्वर को छोटा करके नहीं, बल्कि उन्हें अपनी व्यवस्था से बड़ा मानकर निकालता है। "परमेश्वर में पूरी बुद्धि और पराक्रम पाए जाते हैं; युक्ति और समझ उसी में हैं।" यह वाक्य आराम भी है और आतंक भी। जो हाथ थामे रखता है, वही ढा भी देता है। पवित्रता का अर्थ यही है: परमेश्वर हमारे नैतिक समीकरणों में बंधे नहीं, वे उनसे ऊपर, अलग, और स्वतंत्र हैं।

सूत्र

अय्यूब जिस परमेश्वर का चित्र खींचता है, वही परमेश्वर बाद में मरियम के मुख से गाए जाएँगे: शक्तिशाली सिंहासनों से गिराए गए, दीन ऊँचे किए गए। पद 17 से 21 में मंत्री, राजा, याजक, विश्वासयोग्य पुरुष, पुरनिये, सब गिराए जाते हैं। यह राज्य की भाषा है, और यह वही उलटफेर है जो क्रूस पर चरम पर पहुँचता है। वहाँ याजक और राज्यपाल मिलकर न्याय करते हैं और सबसे बड़ी मूर्खता कर बैठते हैं। मसीह में परमेश्वर की वह "युक्ति और समझ" प्रकट होती है जिसे अय्यूब केवल दूर से देख पाता है: एक दुःखी, अपमानित, हँसी का कारण बना हुआ धर्मी पुरुष, जिसके भीतर से ही उद्धार आता है। अय्यूब की पीड़ा उस आकृति की परछाईं है।

दर्पण

पद 5 सबसे निर्दयी सच बोलता है: "दुःखी लोग तो सुखी लोगों की समझ में तुच्छ जाने जाते हैं।" यह हमारे चर्चों में भी सच है। जिसकी नौकरी छूट गई, जिसकी शादी टूट गई, जिसका बच्चा भटक गया, उसके सामने हम सलाह की एक फुर्तीली दुकान खोल लेते हैं, क्योंकि उसका दुःख हमारे अपने सुरक्षित जीवन पर प्रश्नचिह्न लगाता है। हम उसे समझाते नहीं, हम खुद को समझाते हैं। और दूसरी ओर, यदि आप ही वह गिरा हुआ व्यक्ति हैं, तो अय्यूब आपको यह छूट देता है कि आप परमेश्वर के सामने रोष के साथ खड़े हों, उन्हें छोड़े बिना। धर्मपरायणता का अर्थ यह नहीं कि आप अपनी उलझन को शालीन शब्दों में छिपा दें।

प्रश्न

पद 6 को हल्के में मत पढ़िए: "डाकुओं के डेरे कुशल क्षेम से रहते हैं… अर्थात् उनका ईश्वर उनकी मुट्ठी में रहता हैं।" अय्यूब कह रहा है कि जो लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं वे सुरक्षित हैं, और परमेश्वर इसकी अनुमति देते हैं। यहाँ कोई सफाई नहीं दी जाती, न इस अध्याय में, न पूरी पुस्तक में। परमेश्वर अंत में अय्यूब को उत्तर देते हैं, पर उसके प्रश्न का उत्तर नहीं देते; वे स्वयं को प्रकट करते हैं। शायद यही सबसे ईमानदार बात है जो कही जा सकती है: बाइबल दुःख की व्याख्या नहीं देती, वह एक व्यक्ति देती है। यह कम लगता है, जब तक आप स्वयं अंधेरे में टटोलते हुए न चलें; तब पता चलता है कि व्याख्या से हाथ ज़्यादा काम आता है।

अन्तर्पाठ

पद 9 के साथ हिंदी बाइबल रोमियों 1:20 का संकेत देती है, और यह जोड़ ठीक बैठता है। पौलुस कहता है कि सृष्टि परमेश्वर की सामर्थ्य की गवाही देती है, और अय्यूब वही कह रहा है: पशुओं से पूछो, वे तुम्हें सिखाएँगे। पर ध्यान दीजिए, अय्यूब यह सृष्टि-साक्ष्य आराम के लिए नहीं, तर्क तोड़ने के लिए इस्तेमाल करता है। सृष्टि यह बताती है कि परमेश्वर सामर्थी हैं, यह नहीं कि वे मेरे साथ न्याय कर रहे हैं। दूसरी गूँज पद 14 पर है, जहाँ प्रकाशितवाक्य 3:7 का उल्लेख है: जो खोलता है और कोई बंद नहीं कर सकता। अय्यूब के लिए यह बंद दरवाज़ा है; यूहन्ना के लिए वही अधिकार मसीह के हाथ में खुला दरवाज़ा बन जाता है।

बारीकी

पद 22 इस पूरे अंधकारमय भजन में एक चमकती दरार है: "वह अंधियारे की गहरी बातें प्रगट करता, और मृत्यु की छाया को भी प्रकाश में ले आता है।" संदर्भ में यह भी न्याय का ही चित्र है, परमेश्वर छिपे षड्यंत्र उजागर करते हैं। पर शब्दों का बोझ इससे बड़ा है। मृत्यु की छाया, इब्रानी में सलमावेत, वह जगह है जहाँ से कोई खबर नहीं आती। और यही वह परमेश्वर हैं जो वहाँ भी उजाला ले जाते हैं। अध्याय पद 25 पर अंधेरे में टटोलते लोगों के साथ समाप्त होता है, पर पद 22 पहले ही कह चुका है कि अंधकार परमेश्वर के लिए सीमा नहीं। अय्यूब खुद नहीं जानता कि उसने कितनी बड़ी बात कह दी है।

चिंतन

आपके जीवन में किसका दुःख आपको असहज करता है, इतना कि आप सलाह देकर उससे बच निकलते हैं?

यदि परमेश्वर की सामर्थ्य आपको सिर्फ़ आराम नहीं, थोड़ा भय भी देती है, तो क्या यह विश्वास की कमी है या उसकी शुरुआत?

Job में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Job: The Wisdom of the Cross

Christopher Ash

The most pastoral full length walk through suffering and the God who answers.

The Message of Job

David Atkinson

A compact companion for the hardest questions Job raises.

Job: An Introduction and Commentary

Francis Andersen

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Job

John Walton

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Job 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 12 का क्या अर्थ है?
अय्यूब का पहला वाक्य व्यंग्य है, और कड़वा व्यंग्य: "निःसन्देह मनुष्य तो तुम ही हो और जब तुम मरोगे तब बुद्धि भी जाती रहेगी।" तीन मित्रों ने उसे परमेश्वर के न्याय पर उपदेश दिया है, और अय्यूब कहता है कि यह ज्ञान तो पशु-पक्षी भी जानते हैं। फिर वह अपने अनुभव की चुभती सच्चाई रखता है: डाकुओं के डेरे कुशल से हैं, और वह जो कभी प्रार्थना करता था और सुना जाता था, अब हँसी का कारण बन गया है। इसके बाद अध्याय एक लंबे स्तवन में बदल जाता है, पर यह अजीब सा स्तवन है: परमेश्वर की सामर्थ्य का वर्णन, जिसमें वे राजाओं, याजकों, न्यायियों और पुरनियों को उलट देते हैं।
अय्यूब 12 किस विषय में है?
अय्यूब जिस परमेश्वर का चित्र खींचता है, वही परमेश्वर बाद में मरियम के मुख से गाए जाएँगे: शक्तिशाली सिंहासनों से गिराए गए, दीन ऊँचे किए गए। पद 17 से 21 में मंत्री, राजा, याजक, विश्वासयोग्य पुरुष, पुरनिये, सब गिराए जाते हैं। यह राज्य की भाषा है, और यह वही उलटफेर है जो क्रूस पर चरम पर पहुँचता है। वहाँ याजक और राज्यपाल मिलकर न्याय करते हैं और सबसे बड़ी मूर्खता कर बैठते हैं। मसीह में परमेश्वर की वह "युक्ति और समझ" प्रकट होती है जिसे अय्यूब केवल दूर से देख पाता है: एक दुःखी, अपमानित, हँसी का कारण बना हुआ धर्मी पुरुष, जिसके भीतर से ही उद्धार आता है। अय्यूब की पीड़ा उस आकृति की परछाईं है।
अय्यूब 12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 6 को हल्के में मत पढ़िए: "डाकुओं के डेरे कुशल क्षेम से रहते हैं... अर्थात् उनका ईश्वर उनकी मुट्ठी में रहता हैं।" अय्यूब कह रहा है कि जो लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं वे सुरक्षित हैं, और परमेश्वर इसकी अनुमति देते हैं। यहाँ कोई सफाई नहीं दी जाती, न इस अध्याय में, न पूरी पुस्तक में। परमेश्वर अंत में अय्यूब को उत्तर देते हैं, पर उसके प्रश्न का उत्तर नहीं देते; वे स्वयं को प्रकट करते हैं। शायद यही सबसे ईमानदार बात है जो कही जा सकती है: बाइबल दुःख की व्याख्या नहीं देती, वह एक व्यक्ति देती है। यह कम लगता है, जब तक आप स्वयं अंधेरे में टटोलते हुए न चलें; तब पता चलता है कि व्याख्या से हाथ ज़्यादा काम आता है।
अय्यूब 12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 22 इस पूरे अंधकारमय भजन में एक चमकती दरार है: "वह अंधियारे की गहरी बातें प्रगट करता, और मृत्यु की छाया को भी प्रकाश में ले आता है।" संदर्भ में यह भी न्याय का ही चित्र है, परमेश्वर छिपे षड्यंत्र उजागर करते हैं। पर शब्दों का बोझ इससे बड़ा है। मृत्यु की छाया, इब्रानी में सलमावेत, वह जगह है जहाँ से कोई खबर नहीं आती। और यही वह परमेश्वर हैं जो वहाँ भी उजाला ले जाते हैं। अध्याय पद 25 पर अंधेरे में टटोलते लोगों के साथ समाप्त होता है, पर पद 22 पहले ही कह चुका है कि अंधकार परमेश्वर के लिए सीमा नहीं। अय्यूब खुद नहीं जानता कि उसने कितनी बड़ी बात कह दी है।
अय्यूब 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर की सामर्थ्य आपको सिर्फ़ आराम नहीं, थोड़ा भय भी देती है, तो क्या यह विश्वास की कमी है या उसकी शुरुआत?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Job 12 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

अय्यूब अपने मित्रों के बीच बैठा है, जो उसे समझे बिना उसका न्याय कर रहे थे, और वह कहता है, "बल और खरी बुद्धि उसी के हैं; धोखा देनेवाला और धोखा खानेवाला दोनों उसी के वश में हैं।" जिसने तुझे ठगा, वह भी परमेश्वर के हाथ से बाहर नहीं। यह बात डराती भी है और चैन भी देती है। तुझे बदला लेने की ज़रूरत नहीं, हिसाब उसके पास सुरक्षित है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

अय्यूब अपने दोस्तों को याद दिला रहा है कि परमेश्वर की सामर्थ्य उसके लिए कोई नई खबर नहीं है: "जब वह जल को रोक रखता है, तब सब कुछ सूख जाता है; फिर जब उसे छोड़ देता है, तब उससे पृथ्वी उलट जाती है।"

सोच, वही हाथ सूखा भी देता है और बाढ़ भी। तेरे जीवन का सूखा मौसम किसी और के वश में नहीं है। जो रोक रखता है, वही सही समय पर खोल भी सकता है।

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