अय्यूब 39
पाठ
परमेश्वर अय्यूब से प्रश्न पूछते चले जाते हैं, पर एक भी प्रश्न अय्यूब के दुःख के बारे में नहीं है। सारा अध्याय जानवरों की एक परेड है: पहाड़ी बकरियाँ जो बिना किसी दाई के बच्चे जनती हैं, जंगली गदहा जो नगर के कोलाहल पर हँसता है, जंगली साँड़ जो किसी हल में नहीं जुतता, शुतुर्मुर्गी जो अपने अंडे धूल में छोड़ देती है, युद्ध का घोड़ा जो नरसिंगे की आवाज़ सूँघ लेता है, और उकाब जो लोथ के ऊपर मँडराता है। हर प्राणी के साथ एक ही चुभता हुआ प्रश्न लौटता है: क्या तू जानता है? क्या तूने दिया? क्या वह तेरा काम करेगा?
मर्म
यह अध्याय परमेश्वर की सृष्टि का एक ऐसा चित्र है जिसमें मनुष्य केंद्र में नहीं है। यहाँ कोई भी प्राणी अय्यूब के लिए उपयोगी नहीं है। जंगली साँड़ खलिहान में अनाज नहीं लाएगा, गदहे को कोई हाँक नहीं सकता, उकाब आज्ञा से ऊपर नहीं चढ़ता। परमेश्वर अपनी रचना को उसकी स्वतंत्रता में दिखाते हैं, और यही धर्मशास्त्र का मर्म है: सृष्टि परमेश्वर की महिमा के लिए है, हमारी सुविधा के लिए नहीं। अय्यूब के मित्र एक ऐसे ब्रह्मांड में जीते थे जो मनुष्य के नैतिक हिसाब-किताब से चलता है, जहाँ पाप और दंड सीधी रेखा में बैठते हैं। परमेश्वर उसी सुव्यवस्थित ब्रह्मांड को तोड़ते हैं। वे कहते नहीं कि "तेरा दुःख अनुचित है"; वे कहते हैं कि तेरा नक्शा मेरी दुनिया से बहुत छोटा है। यह पवित्रता का ही एक रूप है: परमेश्वर की अलगता, जो हमारे तर्कों में समा नहीं सकती।
सूत्र
छुटकारे की पूरी कहानी में यह अध्याय एक ज़रूरी कड़ी है। बाइबल का परमेश्वर पहले सृष्टिकर्ता है, फिर उद्धारकर्ता; वाचा उसी हाथ से बँधती है जिसने बकरी के बियाने का महीना ठहराया। जो परमेश्वर निर्जल देश में गदहे के लिए घर बनाते हैं, वही मिस्र से एक जाति को निकालकर जंगल में खिलाते हैं। और यही धारा मसीह तक जाती है: वह जो जंगल के फूलों और आकाश के पक्षियों की ओर उँगली उठाकर चिंतित लोगों से कहता है कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन्हें पालता है। अय्यूब 39 में यह देखभाल छिपी हुई, बेपरवाह, लगभग जंगली लगती है; क्रूस पर वही देखभाल एक शरीर धारण करके हमारे बीच खड़ी हो जाती है। परमेश्वर उत्तर नहीं देते, वे स्वयं आते हैं; अय्यूब को बवंडर में, हमें एक मनुष्य में।
दर्पण
आप शायद इसलिए यहाँ आए हैं क्योंकि कुछ ऐसा हुआ है जिसका हिसाब नहीं बैठता। नौकरी गई और वह भी तब जब आप ईमानदार रहे। बच्चा वह रास्ता चुन रहा है जिसके लिए आपने कभी प्रार्थना नहीं की। जाँच की रिपोर्ट आई और डॉक्टर की आवाज़ बदल गई। और भीतर एक माँग उठती है: मुझे कारण बताइए। यह अध्याय उस माँग को नकारता नहीं, पर उसे उसकी जगह दिखाता है। जिस परमेश्वर ने घोड़े की गर्दन में वे घने बाल जमाए, उनसे आप हिसाब माँग रहे हैं। यह अपमान नहीं, राहत है। क्योंकि जिस दुनिया को मैं पूरी तरह समझ सकता हूँ, वह दुनिया मुझे बचा भी नहीं सकती। नियंत्रण छोड़ना हार नहीं है; वह उस हाथ में गिरना है जो निर्जल भूमि में भी घर ठहराता है।
अंतर्पाठ
भजन 104 इसी दृश्य को स्तुति में बदल देता है: वहाँ जवान सिंह परमेश्वर से अपना अहेर माँगते हैं, और समुद्र का विशाल जीव उनके खेलने के लिए बनाया गया है। यानी वही जंगलीपन, जो अय्यूब को डराता है, भजनकार के लिए गीत का कारण बनता है। दूसरी ओर, मत्ती 6 में यीशु आकाश के पक्षियों को दिखाकर चिंता का इलाज करते हैं, पर ध्यान दीजिए कि वे तर्क नहीं देते, दृष्टि बदलते हैं। अय्यूब 39 और यीशु के वचन एक ही औषधि देते हैं: सिर उठाकर देखो, तुम इस दुनिया के प्रबंधक नहीं हो, तुम इसमें पाले जा रहे हो। स्वयं पाठ के अंत में उकाब और लोथ का चित्र सुसमाचारों में लौटता है, जहाँ यीशु न्याय की अनिवार्यता के लिए उसी छवि का उपयोग करते हैं।
एक बारीकी
सत्रहवीं आयत पर रुकिए: "क्योंकि परमेश्वर ने उसको बुद्धिरहित बनाया, और उसे समझने की शक्ति नहीं दी।" यह वाक्य असहज है। परमेश्वर अपनी ही रचना की मूर्खता को स्वीकार करते हैं, बिना सफ़ाई दिए, बिना क्षमा माँगे। शुतुर्मुर्गी अपने अंडे धूल में छोड़ देती है, उसका कष्ट व्यर्थ जाता है, और फिर भी वह पंख फैलाकर घोड़े और सवार पर हँसती है। यहाँ एक गहरा धर्मशास्त्रीय झटका है: परमेश्वर की सृष्टि हर जगह कुशल और समझदार नहीं है, फिर भी वह उनकी है। जो ईश्वर एक बेपरवाह पक्षी को अपनी सूची में गर्व से गिनाते हैं, वे शायद हमारी नाकामियों को भी उतनी घबराहट से नहीं देखते जितनी हम देखते हैं। यह अनुग्रह की छाया है, जो अभी शब्द नहीं बनी।
पहला श्रोता
अय्यूब की पुस्तक उन लोगों के बीच पढ़ी गई जो खेती और पशुपालन से जीते थे। साँड़ को जोतना, अनाज खलिहान तक लाना, घोड़े को पालना, यह उनके जीवन का रोज़मर्रा था। इसलिए ये प्रश्न उनके कानों में सैद्धांतिक नहीं, बल्कि बहुत ठोस लगे: तुम्हारी सारी कृषि-कुशलता उस सीमा तक ही चलती है जहाँ जंगल शुरू होता है। आसपास की जातियाँ ऐसे देवता पूजती थीं जो फ़सल और वर्षा के सौदे में बँधे थे, लेने-देने के देवता। यहाँ एक ऐसा परमेश्वर बोलते हैं जो किसी सौदे में नहीं आते, जिनकी दुनिया मनुष्य की बाड़ से बहुत आगे तक फैली है। पहले श्रोताओं ने इसमें हार नहीं, बल्कि एक विचित्र सुरक्षा सुनी होगी: यह राजा किसी के काबू में नहीं, इसलिए किसी और के काबू में भी नहीं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा इस समय "जंगली साँड़" जैसा है, जिसे आप जोतना चाहते हैं पर वह जुतता नहीं, और परमेश्वर से आप वहाँ वास्तव में क्या माँग रहे हैं: नियंत्रण या भरोसा?
यदि परमेश्वर उस शुतुर्मुर्गी को भी अपनी सृष्टि में गर्व से गिनाते हैं, तो आपके भीतर की कौन-सी "व्यर्थ" या असफल लगने वाली बात आप उनके सामने रखने से अब तक बचते रहे हैं?
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Job 39 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 39 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 39 किस विषय में है?
अय्यूब 39 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 39 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 39 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 39 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
परमेश्वर अय्यूब से पूछते हैं, "क्या तू जानता है कि पहाड़ पर की जंगली बकरियाँ कब बच्चे देती हैं? या जब हरिणियाँ बियाती हैं, तब क्या तू देखता रहता है?"
सोचो, ऊँचे पहाड़ों पर, जहाँ किसी इंसान की नज़र नहीं पहुँचती, वहाँ भी परमेश्वर हर बकरी के बच्चे के जन्म को देखते हैं। तेरे जीवन का वह कोना भी उनसे छुपा नहीं है जिसे तू सबसे अकेला समझता है। जहाँ कोई नहीं देखता, वहाँ भी वे देख रहे हैं।
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