यूहन्ना 12
पाठ
फसह से छह दिन पहले यीशु बैतनिय्याह में हैं, उस लाज़र के घर, जिसे उन्होंने कब्र से बुलाया था। मरियम बहुमूल्य इत्र उनके पाँवों पर उलट देती है, यहूदा उसका हिसाब लगाता है, और यीशु उस इत्र को अपने गाड़े जाने से जोड़ देते हैं। अगले दिन भीड़ खजूर की डालियाँ लेकर "होशाना" पुकारती है, यूनानी लोग उनसे भेंट करना चाहते हैं, और इसी क्षण यीशु गेहूँ के दाने की बात करते हैं जो मरकर फल लाता है। अध्याय का अंत उजली भीड़ पर नहीं, बल्कि अविश्वास की गहरी पहेली पर होता है।
मूल बात
यीशु "महिमा" शब्द को हमारे हाथ से छीन लेते हैं। जब यूनानी उन्हें देखना चाहते हैं, तब जगत के सामने प्रकट होने का ठीक वही क्षण होता जिसकी कोई भी धार्मिक आंदोलन प्रतीक्षा करता है। पर उनका उत्तर है: "वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र कि महिमा हो", और तुरंत ही, "जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है।" महिमा यहाँ मंच नहीं, मिट्टी है। परमेश्वर की महानता उस बिंदु पर सबसे स्पष्ट दिखती है जहाँ वह अपने आप को खर्च कर देती है। और यह केवल यीशु का विशेषाधिकार नहीं रहता; वचन 25 इसे शिष्य के जीवन का नियम बना देता है। जो प्राण को कसकर पकड़ता है, वह उसे खो देता है।
सूत्र-धारा
यह अध्याय अकारण नहीं कहता कि यह फसह से छह दिन पहले की बात है। मिस्र से निकलने की उस रात मेमने का लहू घरों को बचाता था; अब वह मेमना यरूशलेम की ओर चल पड़ा है। खजूर की डालियाँ और भजन 118 का "होशाना", यानी "अब बचा ले", तीर्थयात्रियों का पुराना गीत था जिससे वे मंदिर में राजा का स्वागत करते थे। भीड़ ठीक शब्द बोलती है पर गलत उम्मीद के साथ; वे रोमी शासन से मुक्ति चाहते हैं, और यीशु गदहे के बच्चे पर चढ़कर जकर्याह की उस भविष्यवाणी को पूरा करते हैं जिसमें राजा हथियार लेकर नहीं, नम्रता से आता है। पूरे पुराने नियम की धारा यहाँ एक संकरे रास्ते में सिमटकर क्रूस की ओर मुड़ जाती है।
दर्पण
वचन 43 सबसे चुभने वाला वाक्य है: "मनुष्यों की प्रशंसा उनको परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती थी।" ये सरदार अविश्वासी नहीं थे, विश्वास करने वाले थे, पर चुपचाप। यह हमारी सबसे सभ्य किस्म की कायरता है। दफ्तर की उस बैठक में जहाँ किसी की बदनामी हो रही है और आप मुस्कुराकर चुप रह जाते हैं। परिवार के उस भोज में जहाँ आपका विश्वास बस निजी मामला बनकर रह जाता है। और यहूदा भी हमारे भीतर बैठा है, वह हिसाब लगाने वाला स्वर जो उदारता को हमेशा मूर्खता कहता है: तीन सौ दीनार, लगभग एक साल की मजदूरी, एक शाम में बहा दी गई। मरियम का प्रेम बजट में फिट नहीं होता, और यही उसकी सच्चाई का प्रमाण है।
प्रश्न
वचन 40 को कोई भी ईमानदार पाठक हल्के में नहीं ले सकता: "उसने उनकी आँखें अंधी, और उनका मन कठोर किया है।" यूहन्ना यहाँ यशायाह 6 को उठाकर अविश्वास का दोष परमेश्वर की ओर मोड़ता दिखता है। और तीन वचन बाद वही यूहन्ना कहता है कि बहुतों ने विश्वास किया, पर भय के कारण छिपाया, यानी वे जिम्मेदार हैं। और यीशु स्वयं कहते हैं, "मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ।" इन दोनों को मैं तर्क से जोड़ नहीं सकता। बाइबल यहाँ हमें एक सुलझी हुई व्यवस्था नहीं, एक गंभीर चेतावनी देती है: बार-बार ठुकराई गई ज्योति अंत में आँखों को असमर्थ बना देती है। "जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है, ज्योति पर विश्वास करो" इसीलिए एक समय-सीमा वाला निमंत्रण है, न कि ठंडी सूचना।
अंतर्पाठ
यूहन्ना दो यशायाह-वचनों को जान-बूझकर साथ रखता है। पहला, यशायाह 53 का आरंभ: "हे प्रभु, हमारे समाचार पर किसने विश्वास किया है?" यह दुःखी दास का गीत है, ठुकराए गए, कुचले गए सेवक का। दूसरा, यशायाह 6 का मंदिर-दर्शन, जहाँ भविष्यद्वक्ता ने प्रभु की महिमा देखी थी। यूहन्ना कहता है, "उसने उसकी महिमा देखी"; अर्थात सिंहासन पर विराजमान वह महिमा और क्रूस पर लटका वह दास एक ही व्यक्ति हैं। इसी कारण "ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा" के दो अर्थ हैं: क्रूस पर उठाया जाना और सिंहासन पर ऊँचा किया जाना। भीड़ इसीलिए उलझ जाती है, क्योंकि दानिय्येल 7 का मनुष्य का पुत्र सर्वदा राज्य करता है; मरता नहीं। उत्तर यह है कि वह मरकर ही राज्य करता है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का यीशु शांत संत नहीं है। "अब मेरा जी व्याकुल हो रहा है। इसलिए अब मैं क्या कहूँ?" यूहन्ना गतसमनी का दृश्य नहीं लिखता, पर यह वाक्य वही घड़ी है, बीच सड़क पर, लोगों के सामने। वे प्रार्थना के दो रूप हमारे सामने रखते हैं और पहले को अस्वीकार करते हैं: बचाव की प्रार्थना और पिता के नाम की महिमा की प्रार्थना। यह भय का अभाव नहीं, भय के भीतर आज्ञाकारिता है। और तुरंत बाद वे कहते हैं कि आकाश से आया स्वर उनके लिए नहीं, सुननेवालों के लिए था। जो व्यक्ति स्वयं टूटने के कगार पर है, वह भी दूसरों की ओर मुड़ा हुआ है। यह उस दाने का चरित्र है जो अपने लिए बचा नहीं रहता।
चिंतन
आपके जीवन में कौन-सा विश्वास ऐसा है जिसे आप मानते हैं पर "फरीसियों के कारण" प्रकट नहीं करते, और उस चुप्पी की असली कीमत क्या है?
मरियम का इत्र या यहूदा का हिसाब: पिछले महीने आपकी उदारता किस स्वर के अधिक निकट थी, और क्यों?
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John 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
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यूहन्ना 12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे मन में भी वही चाह है जो उन लोगों के मन में थी, कि मैं यीशु को देख पाऊँ। भीड़ और शोर के बीच कभी तेरा चेहरा धुंधला लगता है। मुझे ऐसी आँखें दे जो तुझे पहचान सकें, और ऐसा दिल जो तेरे पास आने से न डरे।
अब इस जगत का न्याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया जाएगा।" यीशु यह क्रूस पर चढ़ने से ठीक पहले कहते हैं। जहाँ सब हार दिख रही थी, वहीं असली अदालत लग रही थी। जो आवाज़ तुझ पर अब तक हक जताती आई है, वह क्रूस पर पहले ही बेदखल हो चुकी है। आज उसे अपने दिल में फिर से कुर्सी मत दे।
पिता, धन्यवाद कि जहाँ लोग "विश्वास न कर सके," वहाँ आपने मेरी आँखें खोलीं और मेरे कठोर मन को नरम किया। धन्यवाद कि अविश्वास भी आपकी योजना को नहीं रोक सका, और यशायाह के कहे वचन आज भी सच्चे ठहरते हैं। यह विश्वास मेरी उपलब्धि नहीं, आपका अनुग्रह है।
खजूर की डालियाँ काटना आसान था। रास्ते में बिछाना, ऊँची आवाज़ में पुकारना, "हे इस्राएल के राजा!" यह सब मुफ़्त था। पर उसी हफ़्ते वही सड़कें खाली हो गईं, और वही राजा अकेला क्रूस तक चला।
अपने आप से पूछ: मैं यीशु की जय बोल रहा हूँ, या उस यीशु की जो मेरी उम्मीदों के हिसाब से चले? भीड़ में गाना सस्ता है। पीछे चलना महँगा।
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