बाइबल व्याख्या

लूका 10:38

बाइबल
यह वचन Hallelujah Village Church Trust द्वारा समर्पित है

पाठ

यीशु यरूशलेम की ओर जाते हुए रास्ते में एक गाँव में पहुँचते हैं, और वहाँ मार्था नाम की एक स्त्री उन्हें अपने घर में स्वागत करती है। एक वाक्य, और उसमें एक पूरा निर्णय छिपा है: दरवाज़ा खुलता है, एक यात्री भीतर आता है, और वह यात्री प्रभु हैं। लूका हमें न मार्था की उम्र बताता है, न उसका पद, न यह कि घर में कौन-कौन था। बस इतना कि घर उसका था और स्वागत उसने किया।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यह वचन कहाँ खड़ा है। ठीक पहले यीशु ने कहा था, "जा, तू भी ऐसा ही कर" — जाकर घायल आदमी को अपने ख़र्च पर सराय में ठहरा। और अगला ही दृश्य यह है कि एक स्त्री अपने घर का दरवाज़ा खोलती है। सामरी का करुणा-भरा काम और मार्था का स्वागत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: राज्य वहाँ आता है जहाँ कोई अपनी जगह, अपना समय और अपनी रसोई किसी और के लिए खाली करता है। यहाँ परमेश्वर का बेटा मेज़बान नहीं, मेहमान है। वे माँगते हैं, वे निर्भर होते हैं, वे किसी के घर की दया पर टिकते हैं। यही अनुग्रह की उलटी चाल है: जो सब कुछ देते हैं, वे पहले लेना स्वीकार करते हैं, और इस तरह हमारे घर को अपने राज्य का ठिकाना बना देते हैं।

सूत्र

लूका इस यात्रा को बड़े इरादे से लिखता है। यीशु यरूशलेम की ओर बढ़ रहे हैं, और रास्ते में उनके पास न बटुआ है, न झोली, न ठिकाना; जो शर्त उन्होंने सत्तर चेलों पर रखी थी, "न बटुआ, न झोली, न जूते लो", वही वे स्वयं जी रहे हैं। इसलिए हर घर जो खुलता है, वह इस यात्रा का एक पड़ाव है, और हर बंद दरवाज़ा एक इनकार। यह क्रम बाइबल में चलता रहता है: परमेश्वर बार-बार अजनबी के रूप में आते हैं और लोग उन्हें पहचानते नहीं। और यह क्रम पूरा होता है इसी सुसमाचार के अंत में, इम्माऊस के रास्ते पर, जहाँ मेहमान मेज़ पर बैठकर रोटी तोड़ता है और अचानक मेज़बान निकलता है। मार्था का दरवाज़ा खोलना उसी कहानी की एक कड़ी है: जो मसीह को भीतर लेता है, वह पाता है कि अब घर उसका नहीं रहा।

दर्पण

अपने घर के बारे में सोचिए, सचमुच के घर के बारे में। ज़्यादातर लोग मेहमान इसलिए नहीं बुलाते कि घर बिखरा है, बर्तन जमा हैं, बच्चा चिड़चिड़ा है, या इसलिए कि मेज़बानी एक प्रदर्शन बन गई है जिसमें हार का डर है। हम स्वागत को तब तक टालते हैं जब तक हालात "ठीक" न हो जाएँ, और वे कभी ठीक नहीं होते। इसके पीछे उदारता की कमी नहीं, अक्सर शर्म होती है। मार्था के स्वागत में यह हिसाब नहीं दिखता; दरवाज़ा पहले खुलता है, इंतज़ाम बाद में। और स्वागत केवल भोजन नहीं है: यह समय है, कैलेंडर में जगह है, वह फ़ोन कॉल है जिसे आप छोटा करना चाहते थे। जो आदमी आपके ऑफ़िस में सबसे थकाऊ है, वह भी एक दरवाज़ा माँग रहा है।

आज ही एक व्यक्ति का नाम चुनिए और उसे संदेश भेजिए: इस हफ़्ते मेरे घर खाना खाइए, घर वैसा ही रहेगा जैसा है।

श्रोता

पहले पाठकों के कानों में दो बातें तुरंत खटकी होंगी। पहली, घर मार्था का है। वह पिता का, पति का या भाई का नहीं कहा गया; एक स्त्री मेज़बान है और निर्णय लेती है कि कौन भीतर आएगा। उस समाज में यह असामान्य था और लूका इसे बिना टिप्पणी के दर्ज करता है, जैसे राज्य में यह स्वाभाविक हो। दूसरी, मेहमान अकेला नहीं है। "जब वे जा रहे थे" का मतलब है एक टोली, और गाँव के छोटे घर के लिए यह भारी बोझ था: आटा, तेल, जगह, रात का इंतज़ाम। तीसरी बात, जिसे हम भूल जाते हैं: इस शिक्षक को घर में बिठाना राजनीतिक जोखिम था। गाँव देखता है कि किसका आतिथ्य किसे मिला। मार्था ने केवल दरवाज़ा नहीं खोला, उसने पक्ष चुना।

बारीकी

हिन्दी का "स्वागत किया" यहाँ जिस यूनानी शब्द का अनुवाद है, वह है हुपेदेक्सातो, यानी किसी को अपने अधीन, अपनी छत के नीचे मेहमान की तरह ले लेना। यह वही क्रिया-परिवार है जो इसी अध्याय में चलता है, जहाँ यीशु कहते हैं कि कुछ नगर चेलों को "उतारेंगे" और कुछ "ग्रहण न करेंगे"। और उसी सूची के अंत में वह वाक्य खड़ा है: "जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है।" इसका अर्थ यह है कि मार्था का स्वागत सिर्फ़ शिष्टाचार नहीं, विश्वास का कार्य है। दरवाज़ा खोलना यहाँ वही है जो कहीं और घुटने टेकना है। जो आपके घर में जगह पाता है, उसी को आपने अपने जीवन पर अधिकार दिया है, चाहे आपने यह शब्दों में कभी न कहा हो।

प्रश्न

तो फिर परेशानी यह है: यदि स्वागत इतना सही था, तो चार वचन बाद यीशु मार्था को क्यों टोकते हैं? क्या मेज़बानी एक जाल है? पाठ यह नहीं कहता। यीशु सेवा को रद्द नहीं करते, वे "बहुत बातों" की चिन्ता को नाम देते हैं। और यहीं ईमानदारी ज़रूरी है: हमें पहले से पता नहीं चलता कि किस पल हमारी सेवा प्रेम से हटकर बेचैनी बन गई। वह रेखा साफ़ नहीं दिखती; वह अक्सर बाद में दिखती है, जब हम अपने ही मेहमान से चिढ़ने लगते हैं। इसका कोई साफ़ फ़ॉर्मूला यीशु नहीं देते। वे सिर्फ़ नाम दो बार पुकारते हैं, "मार्था, हे मार्था", और यही शायद एकमात्र उपाय है: कोई ऐसा हो जो आपको बीच काम में रोककर आपका नाम ले सके।

चिंतन

आपके घर का दरवाज़ा पिछली बार किसके लिए खुला था, और किसके लिए आपने उसे चुपचाप बंद रखा है?

अगर मसीह आज आपके घर में मेहमान की तरह आते, तो आप सबसे पहले क्या छिपाना चाहते, और वही चीज़ आपके बारे में क्या कहती है?

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Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

The Message of Luke

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Luke 10:38 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 10:38 का क्या अर्थ है?
यीशु यरूशलेम की ओर जाते हुए रास्ते में एक गाँव में पहुँचते हैं, और वहाँ मार्था नाम की एक स्त्री उन्हें अपने घर में स्वागत करती है। एक वाक्य, और उसमें एक पूरा निर्णय छिपा है: दरवाज़ा खुलता है, एक यात्री भीतर आता है, और वह यात्री प्रभु हैं। लूका हमें न मार्था की उम्र बताता है, न उसका पद, न यह कि घर में कौन-कौन था। बस इतना कि घर उसका था और स्वागत उसने किया।
लूका 10:38 किस विषय में है?
लूका इस यात्रा को बड़े इरादे से लिखता है। यीशु यरूशलेम की ओर बढ़ रहे हैं, और रास्ते में उनके पास न बटुआ है, न झोली, न ठिकाना; जो शर्त उन्होंने सत्तर चेलों पर रखी थी, "न बटुआ, न झोली, न जूते लो", वही वे स्वयं जी रहे हैं। इसलिए हर घर जो खुलता है, वह इस यात्रा का एक पड़ाव है, और हर बंद दरवाज़ा एक इनकार। यह क्रम बाइबल में चलता रहता है: परमेश्वर बार-बार अजनबी के रूप में आते हैं और लोग उन्हें पहचानते नहीं। और यह क्रम पूरा होता है इसी सुसमाचार के अंत में, इम्माऊस के रास्ते पर, जहाँ मेहमान मेज़ पर बैठकर रोटी तोड़ता है और अचानक मेज़बान निकलता है। मार्था का दरवाज़ा खोलना उसी कहानी की एक कड़ी है: जो मसीह को भीतर लेता है, वह पाता है कि अब घर उसका नहीं रहा।
लूका 10:38 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही एक व्यक्ति का नाम चुनिए और उसे संदेश भेजिए: इस हफ़्ते मेरे घर खाना खाइए, घर वैसा ही रहेगा जैसा है।
लूका 10:38 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
हिन्दी का "स्वागत किया" यहाँ जिस यूनानी शब्द का अनुवाद है, वह है हुपेदेक्सातो, यानी किसी को अपने अधीन, अपनी छत के नीचे मेहमान की तरह ले लेना। यह वही क्रिया-परिवार है जो इसी अध्याय में चलता है, जहाँ यीशु कहते हैं कि कुछ नगर चेलों को "उतारेंगे" और कुछ "ग्रहण न करेंगे"। और उसी सूची के अंत में वह वाक्य खड़ा है: "जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है।" इसका अर्थ यह है कि मार्था का स्वागत सिर्फ़ शिष्टाचार नहीं, विश्वास का कार्य है। दरवाज़ा खोलना यहाँ वही है जो कहीं और घुटने टेकना है। जो आपके घर में जगह पाता है, उसी को आपने अपने जीवन पर अधिकार दिया है, चाहे आपने यह शब्दों में कभी न कहा हो।
लूका 10:38 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके घर का दरवाज़ा पिछली बार किसके लिए खुला था, और किसके लिए आपने उसे चुपचाप बंद रखा है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Luke 10 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 26

शास्त्री ने परखने के लिए सवाल पूछा, और यीशु ने जवाब देने के बजाय पलटकर पूछा, "व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?" उसे नई जानकारी की ज़रूरत नहीं थी, वचन तो उसे याद था। कमी पढ़ने के ढंग में थी। आज भी सवाल यही है। तू बाइबल पढ़ता तो है, पर कैसे पढ़ता है? बहस जीतने के लिए, या जीने के लिए?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

यीशु ने क्रम बताया: पहले चंगा करो, फिर कहो। "वहाँ के बीमारों को चंगा करो और उनसे कहो, 'परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुँचा है।'" राज्य पहले छुआ गया, फिर सुनाया गया। आपके पड़ोसी के लिए वह राज्य उतना ही निकट है, जितना आप उसके दुःख के पास बैठने को तैयार हैं। शब्द बाद में भी मिल जाएँगे।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 33

याजक और लेवी ने भी उसे देखा था। फर्क आँखों में नहीं, दिल में था। "परन्तु एक सामरी यात्री वहाँ आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया।" उस सामरी को भी कहीं पहुँचना था, पर उसने अपनी यात्रा रोक दी। आज कौन सा घायल व्यक्ति तेरे रास्ते में पड़ा है, जिसे तू देख तो रहा है, पर रुक नहीं रहा?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 27

पिता, धन्यवाद कि आपने प्रेम को इतना साफ कर दिया: "तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।" धन्यवाद कि आपने पहले हमसे प्रेम किया, इसलिए हमारे पास देने को प्रेम है। और धन्यवाद उस पड़ोसी के लिए जिसे आपने आज हमारे पास रखा।

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