लूका 17:15
पाठ
दस कोढ़ी दूर खड़े होकर चिल्लाए थे, और यीशु ने उन्हें बस चलते रहने को कहा। रास्ते में, चलते-चलते, उनका शरीर साफ हो गया। उनमें से एक ने यह देखा, ठिठका, और मुड़ गया; वही ऊँचा शब्द जो पहले दया की भीख माँग रहा था, अब परमेश्वर की बड़ाई में फूट पड़ा, और वह उसी रास्ते पर पीछे लौटा जिस पर वह अभी-अभी आगे बढ़ा था। बाकी नौ चलते रहे, आज्ञा का पालन करते हुए, याजकों की ओर, ठीक वैसे ही जैसा कहा गया था। यह पद उस एक मोड़ का वर्णन है, उस क्षण का जब चंगाई देखी गई और देखने ने पाँव घुमा दिए।
मूल
ध्यान दीजिए कि लूका यह नहीं कहता कि उसने अपने आप को चंगा पाया, बल्कि यह कि उसने "देखकर" ऐसा किया। दसों के शरीर एक जैसे साफ हुए; दया सब पर बरसी, बिना छँटनी के। अंतर वरदान में नहीं, दृष्टि में है। नौ को एक वरदान मिला, एक ने वरदान के पीछे खड़े व्यक्ति को पहचान लिया। यहीं पर परमेश्वर के बारे में कुछ खुलता है जो असहज करता है और सांत्वना भी देता है: वे उन पर भी अनुग्रह उँडेलते हैं जो लौटकर नहीं आते। कृतज्ञता चंगाई की कीमत नहीं थी। पर कृतज्ञता ही वह जगह है जहाँ चंगाई उससे बड़ी किसी चीज़ में खुलती है, जहाँ शरीर का साफ होना परमेश्वर के साथ रिश्ते में बदल जाता है। क्या हम वरदान लेकर आगे बढ़ जाते हैं, या देने वाले की ओर मुड़ते हैं?
जोड़ने वाला सूत्र
यह लौटना केवल शिष्टाचार नहीं है, यह दिशा का उलट जाना है। पूरे शास्त्र में परमेश्वर की ओर "फिरना" ही तो पश्चात्ताप का असली शब्द है, और यहाँ वह एक शारीरिक क्रिया बन जाता है: पाँव घूमते हैं, रास्ता उलटा नापा जाता है। नौ याजकों की ओर बढ़ते हैं, जैसा व्यवस्था कहती थी, और वे गलत नहीं कर रहे। पर एक व्यक्ति उस दिशा में चल पड़ता है जहाँ चंगाई असल में हुई थी। मंदिर की ओर जाने के बजाय वह उस व्यक्ति के पास लौटता है जिसके शब्द ने उसे साफ किया। यही तो पूरी कहानी का मोड़ है: वह स्थान जहाँ परमेश्वर से मिला जाता है, अब एक पता नहीं, एक व्यक्ति है। कुछ ही पदों बाद यीशु कहेंगे, "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है।" यह सामरी उस वाक्य को पहले ही जी चुका है।
दर्पण
हमारी ज़िंदगी छोटी-छोटी चंगाइयों से भरी है जिन्हें हम चलते-चलते जेब में डाल लेते हैं। बायोप्सी की रिपोर्ट साफ आती है और तीन दिन बाद हम फिर वही पुरानी चिंता कर रहे होते हैं। नौकरी बच जाती है, बेटी की परीक्षा निकल जाती है, टूटा रिश्ता किसी तरह जुड़ जाता है, और हम "शुक्र है" कहकर अगले काम पर लग जाते हैं। कृतज्ञता का न होना नास्तिकता नहीं होती, वह आमतौर पर जल्दबाज़ी होती है। हम रुकते नहीं। और जो रुकता नहीं, वह देख नहीं पाता; और जो देखता नहीं, वह लौटता नहीं। सबसे बड़ा ख़तरा यह नहीं कि हम वरदान अस्वीकार कर दें, बल्कि यह कि हम वरदान लेकर देने वाले की ओर पीठ किए चलते रहें, संतुष्ट और अकेले। आज, अपना काम रोककर, ऊँचे स्वर में, सुनाई देने वाली आवाज़ में, पिछले एक साल की एक ठोस चंगाई का नाम लेकर परमेश्वर का धन्यवाद कीजिए, मन में नहीं, होंठों से।
एक बारीकी
लूका एक ही मुहावरा दो बार रखता है, और यही इस पद की कुंजी है। पद 13 में दसों ने "ऊँचे शब्द से" कहा, "हम पर दया कर!" पद 15 में वही एक व्यक्ति "ऊँचे शब्द से परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ" लौटता है। वही गला, वही ज़ोर, वही खुलापन; केवल विषय बदल गया। कोढ़ी को चिल्लाना पड़ता था, क्योंकि उसे दूर खड़े रहना था। अब भी वह चिल्लाता है, पर इस बार दूरी मिटाने के लिए नहीं, आभार उँडेलने के लिए। और ध्यान दीजिए कि यह आवाज़ उसे कहाँ ले जाती है: अगले ही पद में वह यीशु के पाँवों पर मुँह के बल गिरा है। जो दूरी कोढ़ ने बनाई थी, वह पूरी तरह ढह जाती है। प्रार्थना और स्तुति एक ही आवाज़ के दो रूप हैं, और दोनों हमें एक ही जगह ले जाते हैं।
शास्त्र की गूँज
लूका खुद पद 12 पर लैव्यव्यवस्था 13:46 की ओर इशारा करता है, वह नियम जो कोढ़ी को बस्ती के बाहर, अलग-थलग रहने को कहता था। इस पृष्ठभूमि के बिना यह लौटना समझ नहीं आता: यह आदमी वर्षों से लोगों की ओर बढ़ना भूल चुका था, उसका पूरा जीवन पीछे हटने में बीता था। पहली बार वह किसी की ओर बढ़ रहा है, और वह भी दौड़कर। दूसरी गूँज इसी अध्याय के भीतर है, पद 21 में: "परमेश्वर का राज्य तुम्हारे बीच में है।" फरीसी पूछेंगे कि राज्य कब आएगा; यह सामरी बिना पूछे उसके पाँवों पर पड़ा है। शास्त्र यहाँ खुद अपनी व्याख्या करता है: राज्य को पहचानना भविष्यवाणी की गणना नहीं, एक मोड़ है।
मुख्य पात्र
लूका उसकी पहचान सबसे अंत में खोलता है, पद 16 के आखिरी शब्दों में, मानो चौंकाने के लिए: "और वह सामरी था।" यह आदमी दोहरे निर्वासन में जीता था, कोढ़ से भी और जाति से भी। शायद उसके लौटने में एक कड़वी व्यावहारिकता भी थी: याजकों के पास उसके लिए वैसे भी कोई घर नहीं था। हम नहीं जानते। लूका उसके मन का हाल नहीं बताता, केवल उसका शरीर दिखाता है: मुड़ा हुआ, चिल्लाता हुआ, गिरा हुआ। और इस पूरे दृश्य में सबसे मार्मिक आवाज़ यीशु की है, जो गिनती करते हैं, "तो फिर वे नौ कहाँ हैं?" यह डाँट कम, चाह ज़्यादा लगती है। परमेश्वर को हमारे धन्यवाद की ज़रूरत नहीं, पर यह प्रश्न बताता है कि वे उसकी प्रतीक्षा करते हैं। चंगाई दसों को मिली; "तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है," यह केवल उसने सुना जो लौटा।
चिंतन के प्रश्न
पिछले साल की कौन-सी चंगाई मैंने ले तो ली, पर कभी रुककर देखी नहीं?
यदि यीशु आज मेरी ओर देखकर पूछें, "वे नौ कहाँ हैं?", तो मैं उन नौ में हूँ या उस एक में, और मुझे यह क्यों लगता है?
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Luke 17:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मुझे साहस दे कि जहाँ कुछ गलत हो रहा है वहाँ चुप न रहूँ, पर मेरी बात में कड़वाहट नहीं, प्यार हो। और जब कोई लौटकर आए, तो मेरा दिल बंद न मिले। मुझे माफ करना उतना ही सहज लगे जितना मुझे तेरी माफी मिली है।
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