बाइबल व्याख्या

लूका 5:26

बाइबल
यह वचन GCF MISSION INDIA FOUNDATION द्वारा समर्पित है

पाठ

छत से मिट्टी अब भी गिर रही है, टूटी खपरैल के बीच से धूप की एक पट्टी भीतर आ रही है, और जो आदमी थोड़ी देर पहले खाट पर पड़ा हुआ नीचे उतारा गया था, वह अपनी खाट कंधे पर उठाए दरवाज़े से बाहर निकल जाता है, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ। कमरे में बैठे लोग, फरीसी, शास्त्री, गाँव के उत्सुक पड़ोसी, एक पल के लिए साँस रोक लेते हैं। फिर वह वाक्य फूटता है जो लूका हमें सुनाता है: “तब सब चकित हुए और परमेश्वर की बड़ाई करने लगे, और बहुत डरकर कहने लगे, ‘आज हमने अनोखी बातें देखी हैं।’” चकित होना, बड़ाई करना और डरना, तीनों एक ही साँस में। यही इस आयत का पूरा भार है।

मर्म

ध्यान दीजिए कि भीड़ किस बात पर चकित हुई। चंगाई तो उन्होंने पहले भी देखी थी; कोढ़ी शुद्ध हुआ था, बीमार अच्छे हुए थे। पर यहाँ यीशु ने पहले पाप क्षमा किए, और फिर चलने की आज्ञा दी, ताकि दिखाई न देने वाली बात दिखाई देने वाली बात से सिद्ध हो जाए। शास्त्रियों का प्रश्न सही था: “परमेश्वर को छोड़ कौन पापों की क्षमा कर सकता है?” उत्तर गलत नहीं, बस अधूरा था। जो अधिकार केवल स्वर्ग का था, वह अब एक मनुष्य के मुँह से, कफरनहूम के एक भरे हुए कमरे में, बोला जा रहा है। इसीलिए लोगों का डर अंधविश्वास नहीं है, बल्कि सही पहचान है: वे समझ गए कि परमेश्वर उनके बहुत पास आ गए हैं, और पास आया परमेश्वर आरामदेह नहीं होता। अनुग्रह पहले हिलाता है, फिर चंगा करता है।

सूत्र

जो शब्द भीड़ के मुँह से निकला, “आज हमने अनोखी बातें देखी हैं,” वह केवल एक दिन की रिपोर्ट नहीं है, वह पूरे उद्धार-इतिहास का एक मोड़ है। इस्राएल जानता था कि पाप की क्षमा कहाँ मिलती है: मन्दिर में, याजक के हाथों, लहू और बलिदान के साथ। और यीशु इस पूरी व्यवस्था को एक भीड़ भरे घर में, बिना वेदी के, बिना याजक के, एक वाक्य से पूरा कर देते हैं। दानिय्येल ने “मनुष्य के पुत्र” को देखा था जिसे स्वर्ग से राज्य और अधिकार दिया जाता है; यीशु ठीक यही पद चुनकर कहते हैं कि वह अधिकार अब “पृथ्वी पर” काम कर रहा है। जिस खाट पर वह आदमी लाया गया था, उसे वह स्वयं उठाकर ले जाता है, क्योंकि क्षमा देने वाला आगे चलकर स्वयं एक लकड़ी उठाएगा।

दर्पण

ईमानदारी से पूछिए: यदि आप उस खाट पर होते, तो आप किस वाक्य की प्रतीक्षा कर रहे होते? हममें से अधिकांश को वह दूसरा वाक्य चाहिए, “उठ और चल फिर।” रिपोर्ट सामान्य आ जाए, नौकरी बची रहे, बेटे का मन बदल जाए, पीठ का दर्द रुक जाए। यीशु पहले वह देते हैं जो हमने माँगा ही नहीं था, और यही हमें चुभता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि हमारी सबसे गहरी समस्या वह नहीं है जिसकी हम सूची बनाकर प्रार्थना करते हैं। आपके भीतर भी शायद एक बात है जिसे आप वर्षों से ढोते हैं और जिसे आप किसी से नहीं कहते; आप उसके साथ जीना सीख गए हैं, जैसे कोई लकवे के साथ जीना सीख जाता है। आज एक कागज़ पर वह एक बात बिलकुल साफ़ शब्दों में लिखिए, उसके नीचे आयत 20 के शब्द लिखिए, “हे मनुष्य, तेरे पाप क्षमा हुए,” उन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़िए, और फिर वह कागज़ फाड़ दीजिए।

एक बारीकी

“अनोखी बातें” के लिए लूका जो यूनानी शब्द रखता है वह है पाराडॉक्सा, जिससे हमारा “विरोधाभास” शब्द बना है। इसका अर्थ केवल “अद्भुत” या “सुंदर” नहीं है; इसका अर्थ है: जो हमारी सोच के विरुद्ध है, जो हमारी अपेक्षा को तोड़ देता है। लोग यह नहीं कह रहे कि आज बड़ा अच्छा चमत्कार हुआ। वे कह रहे हैं कि आज जो हुआ वह हमारे ढाँचे में फिट ही नहीं बैठता। और यह बात इसी अध्याय के अंत से जुड़ जाती है, जहाँ यीशु कहते हैं कि नया दाखरस पुरानी मशकों में नहीं भरा जाता। परमेश्वर जब पास आते हैं तो हमारी धार्मिक समझ को साफ़-साफ़ फाड़ देते हैं, और अक्सर यही पहला प्रमाण होता है कि यह सचमुच वही हैं, न कि हमारी अपनी कल्पना।

पृष्ठभूमि

दृश्य कफरनहूम का है, गलील की झील के किनारे का एक छोटा शहर, जहाँ घरों की छतें मिट्टी, टहनियों और खपरैल की होती थीं और बाहर से सीढ़ी चढ़कर उन पर जाया जाता था। पर कमरे में जो बैठे थे, वे साधारण पड़ोसी नहीं थे: लूका बताता है कि फरीसी और व्यवस्थापक “गलील और यहूदिया के हर एक गाँव से, और यरूशलेम से” आए थे। यह जाँच थी, निरीक्षण था; राजधानी ने गाँव के इस शिक्षक पर नज़र रखने के लिए लोग भेजे थे। और लकवे का रोगी इस समाज में केवल बीमार नहीं था, वह दूसरों पर निर्भर था, कमाने में असमर्थ, और बहुतों की नज़र में संदिग्ध, क्योंकि लोग मानते थे कि ऐसी दशा के पीछे कोई पाप होगा। उस कमरे में सबसे शक्तिहीन व्यक्ति को यीशु सबसे पहले संबोधित करते हैं।

कठिन प्रश्न

उस दिन सबने परमेश्वर की बड़ाई की, सब चकित हुए, सब डरे। और फिर? ये वही शास्त्री और फरीसी हैं जो कुछ ही पंक्तियों बाद लेवी के भोज पर कुड़कुड़ा रहे हैं, और आगे चलकर यीशु के विरुद्ध खड़े हो जाएँगे। इसका अर्थ यह है कि आश्चर्य और विश्वास एक चीज़ नहीं हैं। कोई आदमी सचमुच परमेश्वर का काम देख सकता है, सच्चे मन से उनकी बड़ाई भी कर सकता है, और फिर भी अपने भीतर कुछ भी बदलने न दे। यह असहज है, क्योंकि हम अपने धार्मिक अनुभवों को प्रमाण मानकर चलते हैं। लूका हमें यह नहीं बताता कि उस दिन कौन-कौन टिका रहा। वह बस दरवाज़ा खुला छोड़ देता है, और हमें अपने ही आश्चर्य के साथ अकेला। चकित होना शुरुआत है, मंज़िल नहीं।

चिंतन के प्रश्न

जिस चीज़ के लिए आप सबसे ज़्यादा प्रार्थना कर रहे हैं, क्या वह वही है जिसे यीशु आपकी सबसे गहरी ज़रूरत कहेंगे? यदि नहीं, तो आप इस अंतर को कैसे सँभालेंगे?

पिछली बार कब आपने परमेश्वर के किसी काम पर सचमुच आश्चर्य किया था, और उस आश्चर्य ने आपके जीवन में व्यावहारिक रूप से क्या बदला?

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Luke For Everyone

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Luke 5:26 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 5:26 का क्या अर्थ है?
छत से मिट्टी अब भी गिर रही है, टूटी खपरैल के बीच से धूप की एक पट्टी भीतर आ रही है, और जो आदमी थोड़ी देर पहले खाट पर पड़ा हुआ नीचे उतारा गया था, वह अपनी खाट कंधे पर उठाए दरवाज़े से बाहर निकल जाता है, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ। कमरे में बैठे लोग, फरीसी, शास्त्री, गाँव के उत्सुक पड़ोसी, एक पल के लिए साँस रोक लेते हैं। फिर वह वाक्य फूटता है जो लूका हमें सुनाता है: “तब सब चकित हुए और परमेश्वर की बड़ाई करने लगे, और बहुत डरकर कहने लगे, ‘आज हमने अनोखी बातें देखी हैं।’” चकित होना, बड़ाई करना और डरना, तीनों एक ही साँस में। यही इस आयत का पूरा भार है।
लूका 5:26 किस विषय में है?
जो शब्द भीड़ के मुँह से निकला, “आज हमने अनोखी बातें देखी हैं,” वह केवल एक दिन की रिपोर्ट नहीं है, वह पूरे उद्धार-इतिहास का एक मोड़ है। इस्राएल जानता था कि पाप की क्षमा कहाँ मिलती है: मन्दिर में, याजक के हाथों, लहू और बलिदान के साथ। और यीशु इस पूरी व्यवस्था को एक भीड़ भरे घर में, बिना वेदी के, बिना याजक के, एक वाक्य से पूरा कर देते हैं। दानिय्येल ने “मनुष्य के पुत्र” को देखा था जिसे स्वर्ग से राज्य और अधिकार दिया जाता है; यीशु ठीक यही पद चुनकर कहते हैं कि वह अधिकार अब “पृथ्वी पर” काम कर रहा है। जिस खाट पर वह आदमी लाया गया था, उसे वह स्वयं उठाकर ले जाता है, क्योंकि क्षमा देने वाला आगे चलकर स्वयं एक लकड़ी उठाएगा।
लूका 5:26 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
“अनोखी बातें” के लिए लूका जो यूनानी शब्द रखता है वह है पाराडॉक्सा, जिससे हमारा “विरोधाभास” शब्द बना है। इसका अर्थ केवल “अद्भुत” या “सुंदर” नहीं है; इसका अर्थ है: जो हमारी सोच के विरुद्ध है, जो हमारी अपेक्षा को तोड़ देता है। लोग यह नहीं कह रहे कि आज बड़ा अच्छा चमत्कार हुआ। वे कह रहे हैं कि आज जो हुआ वह हमारे ढाँचे में फिट ही नहीं बैठता। और यह बात इसी अध्याय के अंत से जुड़ जाती है, जहाँ यीशु कहते हैं कि नया दाखरस पुरानी मशकों में नहीं भरा जाता। परमेश्वर जब पास आते हैं तो हमारी धार्मिक समझ को साफ़-साफ़ फाड़ देते हैं, और अक्सर यही पहला प्रमाण होता है कि यह सचमुच वही हैं, न कि हमारी अपनी कल्पना।
लूका 5:26 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
उस दिन सबने परमेश्वर की बड़ाई की, सब चकित हुए, सब डरे। और फिर? ये वही शास्त्री और फरीसी हैं जो कुछ ही पंक्तियों बाद लेवी के भोज पर कुड़कुड़ा रहे हैं, और आगे चलकर यीशु के विरुद्ध खड़े हो जाएँगे। इसका अर्थ यह है कि आश्चर्य और विश्वास एक चीज़ नहीं हैं। कोई आदमी सचमुच परमेश्वर का काम देख सकता है, सच्चे मन से उनकी बड़ाई भी कर सकता है, और फिर भी अपने भीतर कुछ भी बदलने न दे। यह असहज है, क्योंकि हम अपने धार्मिक अनुभवों को प्रमाण मानकर चलते हैं। लूका हमें यह नहीं बताता कि उस दिन कौन-कौन टिका रहा। वह बस दरवाज़ा खुला छोड़ देता है, और हमें अपने ही आश्चर्य के साथ अकेला। चकित होना शुरुआत है, मंज़िल नहीं।
लूका 5:26 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछली बार कब आपने परमेश्वर के किसी काम पर सचमुच आश्चर्य किया था, और उस आश्चर्य ने आपके जीवन में व्यावहारिक रूप से क्या बदला?
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Luke 5 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

जो खाट सालों तक उसे उठाए फिरती थी, अब वह उसे उठाकर चल पड़ा। "वह तुरन्त उनके सामने उठा, और जिस पर वह पड़ा था उसे उठाकर, परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ अपने घर चला गया।" यीशु ने पहले पाप क्षमा किए, फिर पाँव मजबूत किए। तेरी वह कमज़ोरी जो तुझे दबाए रखती है, क्या तू उसे मसीह के सामने रखेगा? और घर लौटते हुए क्या तेरे होंठों पर उसकी बड़ाई होगी?

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