मरकुस 16:17
पाठ
जी उठे प्रभु यीशु अपने उन ग्यारह चेलों के सामने खड़े हैं जिन्हें उन्होंने अभी-अभी उनके अविश्वास और कठोर मन के लिए डाँटा था, और उन्हीं हिचकिचाते लोगों को वे सारी सृष्टि के पास भेज देते हैं। उसी भेजने के साथ वे एक वचन जोड़ते हैं: "और विश्वास करनेवालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे; नई-नई भाषा बोलेंगे।" यानी जो सुसमाचार पर भरोसा करके निकलेंगे, उनके जीवन में कुछ ऐसा घटेगा जो उनका अपना नहीं होगा: अंधकार की शक्तियाँ उनके सामने हटेंगी, और उनकी जबान पर ऐसी बोली आएगी जो पहले उनकी नहीं थी। ध्यान दीजिए, यह आज्ञा नहीं है कि "ऐसा करो", बल्कि घोषणा है कि "ऐसा होगा", और वह भी प्रभु के नाम से, न कि विश्वासी की क्षमता से।
मर्म
यह वचन विश्वास को एक निजी, भीतरी भावना से खींचकर खुले मैदान में ले आता है। मरकुस के अनुसार विश्वास का प्रमाण यह नहीं कि आपके भीतर कितनी शांति है, बल्कि यह कि आपके होने से आसपास क्या बदलता है। दुष्टात्माओं का निकाला जाना इस बात का ऐलान है कि क्रूस और खाली कब्र ने सत्ता का समीकरण बदल दिया है; जो शक्तियाँ मनुष्य को बाँधती और तोड़ती हैं, वे अब अंतिम नहीं रहीं। और "नई-नई भाषा" का अर्थ कम से कम यह है कि छुटकारा जबान तक पहुँचता है, उस अंग तक जिससे हम सबसे अधिक चोट पहुँचाते हैं। परमेश्वर केवल पाप क्षमा नहीं करते, वे बोलने का ढंग भी बदल देते हैं। यहीं इस वचन की धार है: जिस घर या दफ्तर में आपकी भाषा वही पुरानी, कटु, व्यंग्य से भरी बनी हुई है, वहाँ यह आयत चुपचाप सवाल पूछती है कि क्या सचमुच कुछ नया हुआ है।
सूत्र
बाइबल की पूरी कहानी में परमेश्वर अपने लोगों को कभी खाली हाथ नहीं भेजते। मूसा को जलती झाड़ी से भेजा गया तो साथ में लाठी दी गई, भविष्यद्वक्ताओं को भेजा गया तो मुँह में वचन रखा गया। यहाँ जी उठे प्रभु अपने चेलों को भेजते हैं और साथ में चिन्ह देते हैं, पर ध्यान दीजिए कि चिन्ह उनका सामान नहीं, उनके साथ चलनेवाले प्रभु की उपस्थिति का पदचिह्न हैं। मरकुस इसे अंत में स्पष्ट कर देता है: "प्रभु उनके साथ काम करता रहा।" यही वह धागा है जो उत्पत्ति से प्रकाशितवाक्य तक चलता है, कि उद्धार परमेश्वर का काम है और मनुष्य उसमें साथी है, मालिक नहीं। और दुष्टात्माओं का हटना उस राज्य की पहली किरण है जिसकी घोषणा यीशु ने गलील में की थी: अंधकार का कब्ज़ा समाप्त हो रहा है।
दर्पण
अब इसे अपने हफ्ते पर रखिए। आपके दफ्तर में एक व्यवस्था है जो लोगों को छोटा बनाती है, डर से काम कराती है, और सब कहते हैं कि "ऐसा ही चलता है"। आपके परिवार में एक पुराना ताना है जो हर त्योहार पर लौट आता है। आपके मन में पैसे को लेकर एक ऐसी पकड़ है जिसे आप समझदारी कहते हैं पर जो सचमुच डर है। मरकुस का यह वचन इन सबको "दुष्टात्माओं" की श्रेणी में घसीटता नहीं, पर यह ज़रूर कहता है कि जहाँ मसीह का नाम लिया जाता है वहाँ बाँधनेवाली शक्तियाँ टिकती नहीं। और सबसे पहले वह आपकी जबान को छूता है, क्योंकि नई भाषा सबसे सस्ता और सबसे कठिन चमत्कार है। आज शाम से पहले उस एक व्यक्ति का नाम ज़ोर से बोलिए जिसके बारे में आप पीठ पीछे सबसे कटु बोलते हैं, और फिर उसे एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें केवल एक सच्ची भली बात हो, बिना किसी शर्त और बिना किसी व्यंग्य के।
संदर्भ
यह दृश्य यरूशलेम में, पुनरुत्थान के दिन के बाद, एक बंद कमरे में घटता है। ग्यारह लोग भोजन पर बैठे हैं, डरे हुए, अपमानित, और एक-दूसरे की गवाही तक पर भरोसा न करते हुए। उनका नेता रोमी सलीब पर मारा गया था, जो उस समय का सबसे अपमानजनक दंड था, और वे सब भाग गए थे। समाज की नज़र में ये हारे हुए आदमी थे, जिनके पास न पद था, न शिक्षा, न सुरक्षा। उसी कमरे में से उन्हें "सारे जगत" में भेजा जाता है, यानी उस रोमी दुनिया में जहाँ हर शहर के अपने देवता थे, हर बाज़ार में झाड़-फूँक करनेवाले थे, और हर भाषा एक दीवार थी। चिन्हों का वादा इसी असुरक्षा के बीच दिया गया है, डींग के रूप में नहीं, सहारे के रूप में।
एक बारीकी
"मेरे नाम से" इस आयत का असली केंद्र है, और यही वह जगह है जहाँ अधिकतर पाठक जल्दी से फिसल जाते हैं। उस संसार में नाम केवल पहचान नहीं, अधिकार था; किसी के नाम से बोलना उसके प्रतिनिधि के रूप में खड़े होना था। जादू-टोने की दुनिया में नामों को शक्ति-सूत्र की तरह इस्तेमाल किया जाता था, मानो सही उच्चारण से शक्ति हाथ में आ जाए। यीशु इसी को उलट देते हैं। उनका नाम कोई मंत्र नहीं जिसे आप अपनी इच्छा पर चलाएँ, बल्कि एक सम्बन्ध है जिसमें आप समर्पित होते हैं। इसका नैतिक परिणाम सीधा है: जो व्यक्ति उनके नाम से काम करता है, वह अपने नतीजों का श्रेय नहीं ले सकता, और अपने तरीकों में उनके चरित्र से मुक्त भी नहीं हो सकता।
मुख्य पात्र
इस आयत में बोलनेवाला वही है जिसने अभी-अभी डाँटा था। यही मसीह का असाधारण चेहरा है: उलाहना और नियुक्ति एक ही साँस में। वे अविश्वास को हल्का नहीं करते, कठोर मन को "स्वाभाविक" कहकर क्षमा नहीं करते, पर उसी कठोर मन वाले समूह को वे अपना काम सौंप देते हैं। बहुत से नेता पहले भरोसा जीतते हैं, फिर ज़िम्मेदारी देते हैं। प्रभु उल्टा करते हैं; वे ज़िम्मेदारी देकर भरोसा पैदा करते हैं। इससे उनके बारे में एक बात खुलती है जो पूरे मरकुस में बार-बार दिखती है: वे लोगों को उनकी असफलता के साथ नहीं, उनकी असफलता के बावजूद देखते हैं। इसीलिए स्वर्गदूत ने कब्र पर विशेष रूप से कहा था, "उसके चेलों और पतरस से कहो"। जिसने तीन बार इनकार किया, उसी का नाम अलग से लिया गया।
शास्त्र की गूँज
दो जगहें इस वचन को रोशनी देती हैं। पहली, प्रेरितों के काम का दूसरा अध्याय, जहाँ पिन्तेकुस्त के दिन शिष्य दूसरी भाषाओं में बोलते हैं और परदेशी लोग अपनी-अपनी बोली में परमेश्वर के बड़े काम सुनते हैं। वहाँ नई भाषा का उद्देश्य साफ है: दीवार तोड़ना, ताकि सुसमाचार किसी एक संस्कृति की बपौती न रह जाए। दूसरी, मरकुस का नौवाँ अध्याय, जहाँ चेले एक लड़के में से दुष्टात्मा नहीं निकाल पाते और यीशु कहते हैं कि यह जाति प्रार्थना के बिना नहीं निकल सकती। यह तुलना ज़रूरी है, क्योंकि वही चेले अब ये चिन्ह पाएँगे। फर्क उनकी तकनीक में नहीं, उनके जुड़ाव में है। चिन्ह प्रार्थना से कटकर चलनेवाली मशीन नहीं हैं।
पहले सुननेवाले
मरकुस के पहले पाठक संभवतः रोम में रहनेवाले वे मसीही थे जिनके लिए विश्वास महँगा पड़ चुका था। उन्होंने पड़ोसियों की नफरत देखी थी, शायद अपने लोगों को गिरफ्तार होते भी। उनके कानों में यह आयत विजय-घोष से ज़्यादा जीने का आश्वासन थी: जिस दुनिया में तुम्हें शक्तिहीन समझा जाता है, वहाँ तुम्हारे बीच से शक्तियाँ पीछे हटेंगी। और "नई-नई भाषा" उनके लिए बहुत ठोस बात थी, क्योंकि उनकी कलीसिया में यूनानी, लतीनी, यहूदी और दास सब मिले हुए थे। जिस साम्राज्य में भाषा वर्ग और हैसियत बताती थी, वहाँ एक ऐसी मण्डली का होना अपने आप में चिन्ह था जहाँ लोग एक-दूसरे की बोली सीखने को तैयार थे। आज भी यह चिन्ह उतना ही दुर्लभ है।
कठिन प्रश्न
तो फिर ये चिन्ह हमारे बीच इतने कम क्यों दिखते हैं? ईमानदारी से कहें तो इसका कोई साफ-सुथरा उत्तर नहीं है, और जो उत्तर जल्दी मिलते हैं वे अक्सर दो तरह के होते हैं, दोनों सस्ते। एक कहता है कि ये चिन्ह केवल पहली सदी के लिए थे, और इस तरह वचन को इतिहास के संग्रहालय में बंद कर देता है। दूसरा कहता है कि चिन्ह न दिखें तो दोष आपके विश्वास का है, और इस तरह बीमारों और संघर्ष करनेवालों पर एक और बोझ लाद देता है। मरकुस खुद न तो गारंटी देता है, न सूत्र। वह केवल इतना कहता है कि प्रभु साथ काम करते रहे। शायद सही प्रश्न यह नहीं कि चिन्ह कहाँ गए, बल्कि यह कि हम उन जगहों तक जाते ही नहीं जहाँ चिन्हों की ज़रूरत पड़े।
चिंतन के प्रश्न
पिछले सप्ताह आपकी भाषा में ऐसा क्या था जो किसी नए जीवन की नहीं, पुराने स्वभाव की गवाही देता था?
आपके जीवन में कौन सी बाँधनेवाली शक्ति है जिसे आपने "मेरा स्वभाव" कहकर स्वीकार कर लिया है, और क्या आपने उसे कभी मसीह के नाम के सामने रखा है?
आप अपने हफ्ते में कहाँ ऐसी जगह जा सकते हैं जहाँ आपकी अपनी ताकत काम न आए और परमेश्वर के साथ काम करने की गुंजाइश बने?
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Mark 16:17 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 16:17 का क्या अर्थ है?
मरकुस 16:17 किस विषय में है?
मरकुस 16:17 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 16:17 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 16:17 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 16 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि स्वर्गदूत ने कहा, "उसके चेलों और पतरस से कहो।" जिसने तीन बार इनकार किया, उसका नाम आपने अलग से लिया। यही आपका प्रेम है जो गिरे हुओं को छोड़ता नहीं, बुलाकर फिर अपने पास ले आता है। मेरी असफलताओं के बाद भी आप मुझे नाम लेकर पुकारते हैं, इसके लिए मेरा हृदय आभारी है।
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