बाइबल व्याख्या

मत्ती 15:22

बाइबल

पाठ

सूर और सीदोन की सीमा पर, इस्राएल की धार्मिक दुनिया के बाहर, एक स्त्री यीशु के पीछे दौड़ती हुई निकलती है। मत्ती उसे "कनानी" कहता है, और वह चिल्लाकर कहती है, "हे प्रभु! दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर, मेरी बेटी को दुष्टात्मा बहुत सता रहा है।" एक ही वाक्य में तीन बातें हैं: एक उपाधि जो उसके मुँह में होनी ही नहीं चाहिए थी, एक विनती जो भिखारी की तरह दया माँगती है, और एक माँ का दर्द जो अपनी बेटी की पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर सामने रखता है। वह अपने लिए कुछ नहीं माँगती; "मुझ पर दया कर" कहती है, पर बीमार बेटी की ओर इशारा करती है। यही पूरा वचन है, और यही पूरा नाटक भी।

मर्म

जिस भूमि के पुराने निवासियों को इस्राएल ने खदेड़ा था, उसी वंश की एक स्त्री यीशु को "दाऊद की सन्तान" पुकारती है। यह संयोग नहीं, मत्ती की सोची-समझी चोट है। जो उपाधि यहूदी राजत्व और वाचा की अपेक्षाओं से भरी है, वह पहली बार इतनी स्पष्टता से एक बाहरी व्यक्ति के मुँह से निकलती है, जबकि कुछ ही पद पहले यरूशलेम से आए शास्त्री और फरीसी उसी यीशु को हाथ धोने के नियम पर कठघरे में खड़ा कर रहे थे। मत्ती दिखाता है कि पवित्रता का असली प्रश्न वंश या रस्म नहीं, मन है: "जो कुछ मुँह से निकलता है, वह मन से निकलता है।" इस स्त्री के मुँह से विश्वास निकलता है। परमेश्वर का राज्य वहीं पहचाना जाता है जहाँ उसे पहचानने का कोई अधिकार नहीं था, और यही अनुग्रह का स्वभाव है: वह योग्यता की सीमा पर नहीं रुकता, उसे लाँघता है।

मूल धारा

मत्ती ने अपनी पुस्तक की शुरुआत ही एक वंशावली से की थी जिसमें राहाब और रूत जैसे नाम खड़े हैं: एक कनानी वेश्या और एक मोआबी विधवा, दोनों दाऊद की परदादियाँ। यानी जिस "दाऊद की सन्तान" को यह स्त्री पुकार रही है, उसकी अपनी रगों में बाहरी लोगों का लहू पहले से बह रहा है। परमेश्वर की वाचा कभी बंद दीवार नहीं थी; इब्राहीम को दिया गया वचन ही यह था कि उसके द्वारा सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। इसलिए सूर और सीदोन की सीमा पर यह दृश्य कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस धारा का उभार है जो पूरे पुराने नियम में नीचे-नीचे बहती रही। मसीह में वह धारा सतह पर आती है, और पुनरुत्थान के बाद यही यीशु अपने चेलों को सब जातियों के पास भेज देंगे। यह स्त्री उस आज्ञा का पूर्वाभास है।

दर्पण

यह स्त्री वह सब कुछ करती है जो हमें असहज करता है: वह चिल्लाती है, पीछा करती है, शिष्टाचार तोड़ती है। हममें से अधिकांश लोग प्रार्थना में भी शालीन रहना चाहते हैं, क्योंकि गहरे में हम मानते हैं कि माँगने का हक कमाना पड़ता है। आपने शायद कभी यह सोचा हो कि आपका अतीत, आपकी नाकामी, आपके परिवार की गंदगी आपको उस मेज़ से बाहर कर देती है जहाँ दूसरे बैठे हैं। यह स्त्री उस हिसाब को नहीं मानती। वह अपनी बेटी की पीड़ा को इतनी गंभीरता से लेती है कि अपनी इज़्ज़त को रास्ते में छोड़ आती है। आज एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति की पीड़ा आपको रोज़ दिखती है पर जिसके लिए आपने कभी ज़ोर से प्रार्थना नहीं की, उसका नाम कागज़ पर लिखिए और उसी नाम के साथ ऊँची आवाज़ में कहिए, "प्रभु, मुझ पर दया कर।"

संदर्भ

यीशु अभी-अभी यरूशलेम से आए शास्त्रियों के साथ शुद्धता के नियमों पर टकराकर निकले हैं, और सीधे वहाँ चले जाते हैं जहाँ हर चीज़ नियमतः अशुद्ध है: "सोर और सीदोन के देशों की ओर।" ये फीनीके के बंदरगाह-नगर थे, धनी, मूर्तिपूजक, और गलील के किसानों के लिए आर्थिक रूप से दबंग; उनका अनाज अक्सर गलील के खेतों से जाता था। यानी यह सिर्फ़ धार्मिक नहीं, सामाजिक सीमा भी है। उस दुनिया में एक अकेली स्त्री का किसी यहूदी रब्बी के पीछे सार्वजनिक रूप से चिल्लाते हुए दौड़ना लगभग अशोभनीय था। चेलों की झुँझलाहट, "इसे विदा कर", इसी असहजता से निकलती है। वह जानती है कि वह कहाँ खड़ी है, और फिर भी आती है।

एक बारीकी

"कनानी" शब्द पर रुकिए। यीशु के ज़माने में यह राष्ट्रीयता मौजूद नहीं थी; मरकुस उसे यूनानी-सुरुफिनिकी कहता है, जो व्यावहारिक और सही वर्णन है। मत्ती जानबूझकर एक पुरातन, बोझिल नाम चुनता है, वही नाम जो यहोशू की पुस्तक के पन्नों से उठता है: वह जाति जिसे भूमि से निकाला जाना था, जिसके साथ विवाह मना था, जिसकी वेदियाँ तोड़ी जानी थीं। एक यहूदी पाठक के कान में यह शब्द युद्ध की धूल लेकर आता है। और उसी शब्द के ठीक बाद मत्ती उसके मुँह में इस्राएल की सबसे पवित्र राजकीय उपाधि रख देता है। यह दो शब्दों की टक्कर है: इतिहास का सबसे पुराना शत्रु, और वाचा की सबसे गहरी आशा, एक ही वाक्य में।

मुख्य पात्र

इस स्त्री के बारे में हम कुछ नहीं जानते: न नाम, न पति, न यह कि उसने यीशु के बारे में सुना कहाँ से। हम केवल उसका धर्मशास्त्र जानते हैं, और वह चौंकाने वाला है। वह यीशु को "प्रभु" कहती है, "दाऊद की सन्तान" कहती है, और दया माँगती है, न कि सौदा करती है। यह भिखारी की भाषा है, और भजनों की भी। उसका भीतरी नक्शा साफ़ है: उसके पास देने को कुछ नहीं, पाने को सब कुछ। माँ होना उसे निडर बनाता है, पर उसका साहस भावुकता से नहीं, एक पहचान से आता है, कि यह आदमी वाकई राजा है। जब आगे यीशु उसे "हे स्त्री, तेरा विश्वास बड़ा है" कहते हैं, तो वे उसकी ज़िद की नहीं, उसकी इसी दृष्टि की तारीफ़ कर रहे हैं।

अंतर्पाठ

तीन प्रतिध्वनियाँ सुनिए। पहली, राहाब: यरीहो की कनानी स्त्री जिसने इस्राएल के परमेश्वर को पहचाना जबकि उसका पूरा नगर अंधा था, और जो मत्ती की वंशावली में यीशु की पूर्वज बनकर खड़ी है। दूसरी, एलिय्याह: अकाल के दिनों में परमेश्वर ने उसे इस्राएल की किसी विधवा के पास नहीं, बल्कि सीदोन की एक विधवा के पास भेजा, जिसका मरा हुआ बेटा जीवित हुआ। यीशु उसी क्षेत्र में हैं, और यहाँ भी एक गैर-यहूदी माँ की बेटी बचाई जाती है। तीसरी, मत्ती के भीतर ही: इस सुसमाचार में "दाऊद की सन्तान, हम पर दया कर" पुकारने वाले और कौन हैं? अंधे। जिनकी आँखें नहीं हैं वे देख लेते हैं, और जो शास्त्र पढ़ते हैं उनके बारे में यीशु ने अभी-अभी कहा था, "वे अंधे मार्ग दिखानेवाले हैं।" यह विडंबना मत्ती की अपनी बुनाई है।

पहले श्रोता

मत्ती के पहले पाठक मुख्यतः यहूदी पृष्ठभूमि के मसीही थे, जो अपनी ही आराधनालयों से कटते जा रहे थे और साथ ही इस सवाल से जूझ रहे थे कि गैर-यहूदी विश्वासियों को कलीसिया में कैसे गिनें। उनके कानों में "कनानी" शब्द वह सब लेकर आता था जो उनकी माताओं ने उन्हें सिखाया था: दूरी बनाकर रखो। और फिर वे पढ़ते हैं कि यीशु ने उसकी विनती पूरी की, बिना उससे यहूदी बनने की माँग किए। यह उनके लिए सांत्वना भी थी और चुनौती भी। सांत्वना, क्योंकि इसका अर्थ था कि उनके बीच बैठे यूनानी भाई-बहन सचमुच मेज़ पर हैं। चुनौती, क्योंकि इसका अर्थ था कि पहचान की वे दीवारें, जिन पर उनकी पूरी दुनिया टिकी थी, मसीह के सामने गिर जाती हैं।

कठिन प्रश्न

फिर भी एक काँटा बचा रहता है, और उसे निकालना नहीं चाहिए: यीशु पहले उसे उत्तर ही नहीं देते, और जब देते हैं तो कहते हैं, "इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों को छोड़ मैं किसी के पास नहीं भेजा गया।" यह चुप्पी क्रूर लगती है, और बाद का "कुत्तों" वाला वाक्य और भी ज़्यादा। समझाने की जल्दबाज़ी में हम कह देते हैं कि यीशु उसे परख रहे थे, मानो यह कोई खेल हो। पर पाठ इतना साफ़ नहीं है। शायद यहाँ मुक्ति के इतिहास का क्रम दिख रहा है: पहले इस्राएल, फिर जातियाँ, और वह क्रम सचमुच किसी को इंतज़ार करवाता है। इंतज़ार करना अन्याय जैसा महसूस होता है। इस स्त्री ने भी यही महसूस किया होगा, और फिर भी वह गई नहीं। कभी-कभी विश्वास यही होता है: उस दरवाज़े पर खड़े रहना जो अभी खुला नहीं है, क्योंकि आप जानते हैं कि भीतर कौन है।

चिंतन के प्रश्न

किस आधार पर आप मानते हैं कि आपको परमेश्वर से माँगने का हक है, और यदि वह आधार कल ढह जाए, तो क्या आप फिर भी पुकारेंगे?

आपकी ज़िंदगी में वह "कनानी" कौन है, जिसे आप धार्मिक रूप से बाहर मानकर चलते हैं, और अगर वही व्यक्ति मसीह को आपसे ज़्यादा स्पष्ट देख पाए तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी?

जब परमेश्वर चुप रहते हैं, तो आपकी पहली प्रवृत्ति लौट जाने की होती है या वहीं टिके रहने की, और वह प्रवृत्ति आपके बारे में क्या बताती है?

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Matthew For Everyone, Part 1

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Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Matthew 15:22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 15:22 का क्या अर्थ है?
सूर और सीदोन की सीमा पर, इस्राएल की धार्मिक दुनिया के बाहर, एक स्त्री यीशु के पीछे दौड़ती हुई निकलती है। मत्ती उसे "कनानी" कहता है, और वह चिल्लाकर कहती है, "हे प्रभु! दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर, मेरी बेटी को दुष्टात्मा बहुत सता रहा है।" एक ही वाक्य में तीन बातें हैं: एक उपाधि जो उसके मुँह में होनी ही नहीं चाहिए थी, एक विनती जो भिखारी की तरह दया माँगती है, और एक माँ का दर्द जो अपनी बेटी की पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर सामने रखता है। वह अपने लिए कुछ नहीं माँगती; "मुझ पर दया कर" कहती है, पर बीमार बेटी की ओर इशारा करती है। यही पूरा वचन है, और यही पूरा नाटक भी।
मत्ती 15:22 किस विषय में है?
यह स्त्री वह सब कुछ करती है जो हमें असहज करता है: वह चिल्लाती है, पीछा करती है, शिष्टाचार तोड़ती है। हममें से अधिकांश लोग प्रार्थना में भी शालीन रहना चाहते हैं, क्योंकि गहरे में हम मानते हैं कि माँगने का हक कमाना पड़ता है। आपने शायद कभी यह सोचा हो कि आपका अतीत, आपकी नाकामी, आपके परिवार की गंदगी आपको उस मेज़ से बाहर कर देती है जहाँ दूसरे बैठे हैं। यह स्त्री उस हिसाब को नहीं मानती। वह अपनी बेटी की पीड़ा को इतनी गंभीरता से लेती है कि अपनी इज़्ज़त को रास्ते में छोड़ आती है। आज एक काम कीजिए: जिस व्यक्ति की पीड़ा आपको रोज़ दिखती है पर जिसके लिए आपने कभी ज़ोर से प्रार्थना नहीं की, उसका नाम कागज़ पर लिखिए और उसी नाम के साथ ऊँची आवाज़ में कहिए, "प्रभु, मुझ पर दया कर।"
मत्ती 15:22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस स्त्री के बारे में हम कुछ नहीं जानते: न नाम, न पति, न यह कि उसने यीशु के बारे में सुना कहाँ से। हम केवल उसका धर्मशास्त्र जानते हैं, और वह चौंकाने वाला है। वह यीशु को "प्रभु" कहती है, "दाऊद की सन्तान" कहती है, और दया माँगती है, न कि सौदा करती है। यह भिखारी की भाषा है, और भजनों की भी। उसका भीतरी नक्शा साफ़ है: उसके पास देने को कुछ नहीं, पाने को सब कुछ। माँ होना उसे निडर बनाता है, पर उसका साहस भावुकता से नहीं, एक पहचान से आता है, कि यह आदमी वाकई राजा है। जब आगे यीशु उसे "हे स्त्री, तेरा विश्वास बड़ा है" कहते हैं, तो वे उसकी ज़िद की नहीं, उसकी इसी दृष्टि की तारीफ़ कर रहे हैं।
मत्ती 15:22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
फिर भी एक काँटा बचा रहता है, और उसे निकालना नहीं चाहिए: यीशु पहले उसे उत्तर ही नहीं देते, और जब देते हैं तो कहते हैं, "इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों को छोड़ मैं किसी के पास नहीं भेजा गया।" यह चुप्पी क्रूर लगती है, और बाद का "कुत्तों" वाला वाक्य और भी ज़्यादा। समझाने की जल्दबाज़ी में हम कह देते हैं कि यीशु उसे परख रहे थे, मानो यह कोई खेल हो। पर पाठ इतना साफ़ नहीं है। शायद यहाँ मुक्ति के इतिहास का क्रम दिख रहा है: पहले इस्राएल, फिर जातियाँ, और वह क्रम सचमुच किसी को इंतज़ार करवाता है। इंतज़ार करना अन्याय जैसा महसूस होता है। इस स्त्री ने भी यही महसूस किया होगा, और फिर भी वह गई नहीं। कभी-कभी विश्वास यही होता है: उस दरवाज़े पर खड़े रहना जो अभी खुला नहीं है, क्योंकि आप जानते हैं कि भीतर कौन है।
मत्ती 15:22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जब परमेश्वर चुप रहते हैं, तो आपकी पहली प्रवृत्ति लौट जाने की होती है या वहीं टिके रहने की, और वह प्रवृत्ति आपके बारे में क्या बताती है?
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Matthew 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 23

पिता, धन्यवाद कि आपकी चुप्पी इनकार नहीं है। जब यीशु ने उस स्त्री को "कुछ उत्तर न दिया", तब भी वह सुन रहे थे। धन्यवाद कि चेलों के "इसे विदा कर" कहने पर भी आपने उसे नहीं लौटाया। मेरी बिन जवाब वाली पुकारें भी आपके सामने खुली हैं, यह जानकर मन शांत होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

पर जो कुछ मुँह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।" फरीसी हाथ धोने पर अटके थे, और यीशु ने मन की ओर उँगली उठाई। जो शब्द तुझसे गुस्से में निकल जाता है, वह अचानक नहीं आया, वह भीतर कहीं पल रहा था। इसलिए जीभ पर पहरा लगाने से पहले, अपने मन को परमेश्वर के सामने खोल दे।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, कई बार मैं भी सवाल और शिकायतें लेकर तेरे पास आता हूँ, दूसरों की गलतियाँ ढूँढ़ता हुआ। मेरी नज़र बदल दे। मैं नियमों से ज़्यादा तेरे दिल को जानना चाहता हूँ, और खाली दिखावे से नहीं, सच्चाई से तेरे सामने खड़ा होना चाहता हूँ।

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