बाइबल व्याख्या

मत्ती 15

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

यरूशलेम से आए फरीसी और शास्त्री यीशु पर एक शिकायत लेकर आते हैं: उनके चेले बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं। यीशु सवाल को उलट देते हैं और दिखाते हैं कि वे लोग अपनी परम्परा के सहारे माता-पिता के आदर की आज्ञा को चतुराई से रद्द कर चुके हैं; अशुद्धता मुँह में जाने वाली चीज़ से नहीं, मन से निकलने वाली बातों से आती है। इसके बाद वे अन्यजातियों के इलाके में जाते हैं, जहाँ एक कनानी स्त्री के आग्रह के आगे झुककर उसकी बेटी को चंगा करते हैं, और फिर तीन दिन से भूखी भीड़ को सात रोटियों से तृप्त करते हैं।

मूल बात

यह अध्याय एक ही चोट करता है: धर्म का इस्तेमाल परमेश्वर की आज्ञा से बचने के लिए किया जा सकता है। "जो कुछ तुझे मुझसे लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाया जा चुका" यह वाक्य पवित्र लगता है और असल में एक बूढ़े माँ-बाप को खाली हाथ छोड़ देता है। यीशु इसे कपट कहते हैं, और यशायाह के शब्द उन पर रख देते हैं: "ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझसे दूर रहता है।" फिर वे शुद्धता की पूरी परिभाषा हिला देते हैं। अशुद्ध वह नहीं जो थाली में है, अशुद्ध वह है जो मन में पकता है और मुँह से बाहर आता है: बुरे विचार, झूठी गवाही, निन्दा। परमेश्वर हाथों का नहीं, मन का निरीक्षण करते हैं।

बड़ी कहानी का सूत्र

यशायाह का उद्धरण संयोग नहीं है। भविष्यद्वक्ताओं ने सदियों तक एक ही बात दोहराई: बलिदान चलते रहे, मन दूर खिसकता गया, और परमेश्वर ने नए मन का वादा किया। यीशु उस वादे के भीतर खड़े होकर बोलते हैं, और अध्याय का दूसरा आधा भाग दिखाता है कि नया मन कैसा दिखता है। जिस अध्याय की शुरुआत भोजन की शुद्धता के झगड़े से होती है, उसका अन्त एक ऐसी मेज़ पर होता है जहाँ लोग ज़मीन पर बैठते हैं और सब तृप्त होते हैं, और सात टोकरे बच जाते हैं। पहले "बच्चों की रोटी" का सवाल, फिर मेज़ से गिरे चूर-चार का आग्रह, और अन्त में इतनी रोटी कि किसी को बचा हुआ माँगने की ज़रूरत न रहे। मसीह स्वयं वह रोटी हैं जो शुद्ध करती है।

आईना

गौर कीजिए कि कुरबान की चालाकी आज भी उतनी ही सुगम है। "मैं कलीसिया की सेवा में बहुत व्यस्त हूँ" कहकर हम उस फोन कॉल को टाल देते हैं जिसकी प्रतीक्षा माँ चार दिन से कर रही है। बजट में दान की पंक्ति है, पर बूढ़े पिता की दवा की पंक्ति कोई और भरेगा, यह मान लिया जाता है। हम आत्मिक भाषा में अपनी सुविधा को कपड़े पहना देते हैं, और यीशु उस कपड़े को खींच लेते हैं। दूसरा आईना मुँह है। रविवार को उपासना के बाद गाड़ी में बैठते ही किसी के बारे में जो वाक्य निकलता है, वही बताता है कि मन में क्या है; "निन्दा मन ही से निकलती है" कोई अतिशयोक्ति नहीं, निदान है।

आज ही अपने माता-पिता को, या परिवार के उस बुज़ुर्ग को, जिसे आप महीनों से टाल रहे हैं, फोन कीजिए और एक ही प्रश्न पूछिए: "इस हफ्ते आपको किसी चीज़ की ज़रूरत है?" फिर जो उत्तर मिले, उसे लिख लीजिए।

पृष्ठभूमि

हाथ धोने का यह नियम मूसा की व्यवस्था में आम इस्राएली के लिए नहीं था; यह याजकों की मन्दिर-शुद्धता को रोज़मर्रा के भोजन तक फैलाने वाली मौखिक परम्परा थी, "प्राचीनों की परम्परा"। यरूशलेम से जाँच-दल आना मामूली बात नहीं, यह राजधानी का दबाव है जो गलील के एक देहाती रब्बी पर डाला जा रहा है। कुरबान की मन्नत क़ानूनी रूप से बाध्यकारी मानी जाती थी, इसलिए घोषित कर देना ही काफ़ी था कि सम्पत्ति मन्दिर के लिए अलग है; माता-पिता कुछ नहीं कर सकते थे। इसके बाद यीशु सोर और सीदोन की ओर जाते हैं, अन्यजातियों की भूमि पर। और जो स्त्री आती है, उसे मत्ती जानबूझकर "कनानी" कहते हैं, उस पुरानी शत्रु जाति का नाम, जिसे इस्राएल की स्मृति ने कभी माफ़ नहीं किया।

शास्त्र की गूँज

यशायाह 29 में यह भर्त्सना उस पीढ़ी पर थी जिसकी उपासना बेदाग़ थी और जिसका भरोसा राजनीति पर था; यीशु उसी पद को उठाकर दिखाते हैं कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। दूसरी गूँज आगे की है: यहाँ पतरस कहता है, "यह दृष्टान्त हमें समझा दे," और वर्षों बाद प्रेरितों के काम 10 में उसी पतरस को छत पर चादर का दर्शन मिलता है, जिसमें अशुद्ध पशु परोसे जाते हैं और आवाज़ कहती है कि जिसे परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है उसे अशुद्ध न कह। जो शिक्षा यहाँ उसके सिर के ऊपर से गुज़र गई थी, वही उसे एक अन्यजाति के घर की दहलीज़ पर समझ आई।

पहले सुननेवाले

मत्ती का सुसमाचार उन यहूदी विश्वासियों के लिए लिखा गया जो अब अन्यजाति भाइयों के साथ एक ही मेज़ पर बैठ रहे थे, और यह उनके लिए सैद्धान्तिक प्रश्न नहीं था, रोज़ का तनाव था: किसके घर खाना है, किसका बरतन इस्तेमाल करना है, रिश्तेदार क्या कहेंगे। उन्होंने इस अध्याय में दो चीज़ें सुनीं। पहली, स्वतंत्रता: उनके प्रभु ने स्वयं थाली की शुद्धता को मन की शुद्धता के अधीन कर दिया। दूसरी, शर्म: वे चेले जो कहते हैं "इसे विदा कर" उनकी ही तस्वीर थे, और जिस स्त्री का विश्वास "बड़ा" कहा गया, वह बाहरवाली थी। अन्यजातियों के इलाके की भीड़ ने "इस्राएल के परमेश्वर की बड़ाई की", और यह वाक्य उन्हें चुभा भी होगा और भला भी लगा होगा।

चिंतन के प्रश्न

मेरे जीवन में कौन सा आत्मिक या व्यस्तता का तर्क है, जिसके पीछे मैं किसी ठोस ज़िम्मेदारी से बच रहा हूँ?

पिछले सात दिनों में मेरे मुँह से निकली कौन सी बात मेरे मन की असली हालत बता रही है, और मैं उसे परमेश्वर के सामने कब रखूँगा?

Matthew में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Matthew For Everyone, Part 1

N.T. Wright

Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.

The Message of Matthew

Michael Green

The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

R.T. France

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Matthew

Michael Wilkins

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Matthew 15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 15 का क्या अर्थ है?
यरूशलेम से आए फरीसी और शास्त्री यीशु पर एक शिकायत लेकर आते हैं: उनके चेले बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं। यीशु सवाल को उलट देते हैं और दिखाते हैं कि वे लोग अपनी परम्परा के सहारे माता-पिता के आदर की आज्ञा को चतुराई से रद्द कर चुके हैं; अशुद्धता मुँह में जाने वाली चीज़ से नहीं, मन से निकलने वाली बातों से आती है। इसके बाद वे अन्यजातियों के इलाके में जाते हैं, जहाँ एक कनानी स्त्री के आग्रह के आगे झुककर उसकी बेटी को चंगा करते हैं, और फिर तीन दिन से भूखी भीड़ को सात रोटियों से तृप्त करते हैं।
मत्ती 15 किस विषय में है?
यशायाह का उद्धरण संयोग नहीं है। भविष्यद्वक्ताओं ने सदियों तक एक ही बात दोहराई: बलिदान चलते रहे, मन दूर खिसकता गया, और परमेश्वर ने नए मन का वादा किया। यीशु उस वादे के भीतर खड़े होकर बोलते हैं, और अध्याय का दूसरा आधा भाग दिखाता है कि नया मन कैसा दिखता है। जिस अध्याय की शुरुआत भोजन की शुद्धता के झगड़े से होती है, उसका अन्त एक ऐसी मेज़ पर होता है जहाँ लोग ज़मीन पर बैठते हैं और सब तृप्त होते हैं, और सात टोकरे बच जाते हैं। पहले "बच्चों की रोटी" का सवाल, फिर मेज़ से गिरे चूर-चार का आग्रह, और अन्त में इतनी रोटी कि किसी को बचा हुआ माँगने की ज़रूरत न रहे। मसीह स्वयं वह रोटी हैं जो शुद्ध करती है।
मत्ती 15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही अपने माता-पिता को, या परिवार के उस बुज़ुर्ग को, जिसे आप महीनों से टाल रहे हैं, फोन कीजिए और एक ही प्रश्न पूछिए: "इस हफ्ते आपको किसी चीज़ की ज़रूरत है?" फिर जो उत्तर मिले, उसे लिख लीजिए।
मत्ती 15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 29 में यह भर्त्सना उस पीढ़ी पर थी जिसकी उपासना बेदाग़ थी और जिसका भरोसा राजनीति पर था; यीशु उसी पद को उठाकर दिखाते हैं कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। दूसरी गूँज आगे की है: यहाँ पतरस कहता है, "यह दृष्टान्त हमें समझा दे," और वर्षों बाद प्रेरितों के काम 10 में उसी पतरस को छत पर चादर का दर्शन मिलता है, जिसमें अशुद्ध पशु परोसे जाते हैं और आवाज़ कहती है कि जिसे परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है उसे अशुद्ध न कह। जो शिक्षा यहाँ उसके सिर के ऊपर से गुज़र गई थी, वही उसे एक अन्यजाति के घर की दहलीज़ पर समझ आई।
मत्ती 15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
मेरे जीवन में कौन सा आत्मिक या व्यस्तता का तर्क है, जिसके पीछे मैं किसी ठोस ज़िम्मेदारी से बच रहा हूँ?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Matthew 15 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 12

चेलों ने यह नहीं पूछा कि यीशु ने जो कहा वह सही था या नहीं। उन्होंने बस इतना कहा, "क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई?" उनकी चिंता सच्चाई नहीं, लोगों की नाराज़गी थी। कई बार हम भी यही करते हैं। सवाल यह नहीं रह जाता कि परमेश्वर क्या कहता है, बल्कि यह कि लोग क्या सोचेंगे। आज तुम्हारे मन में किसका चेहरा बड़ा है?

धन्यवाद संपादकीय पर पद 23

पिता, धन्यवाद कि आपकी चुप्पी इनकार नहीं है। जब यीशु ने उस स्त्री को "कुछ उत्तर न दिया", तब भी वह सुन रहे थे। धन्यवाद कि चेलों के "इसे विदा कर" कहने पर भी आपने उसे नहीं लौटाया। मेरी बिन जवाब वाली पुकारें भी आपके सामने खुली हैं, यह जानकर मन शांत होता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

पर जो कुछ मुँह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।" फरीसी हाथ धोने पर अटके थे, और यीशु ने मन की ओर उँगली उठाई। जो शब्द तुझसे गुस्से में निकल जाता है, वह अचानक नहीं आया, वह भीतर कहीं पल रहा था। इसलिए जीभ पर पहरा लगाने से पहले, अपने मन को परमेश्वर के सामने खोल दे।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 1

पिता, कई बार मैं भी सवाल और शिकायतें लेकर तेरे पास आता हूँ, दूसरों की गलतियाँ ढूँढ़ता हुआ। मेरी नज़र बदल दे। मैं नियमों से ज़्यादा तेरे दिल को जानना चाहता हूँ, और खाली दिखावे से नहीं, सच्चाई से तेरे सामने खड़ा होना चाहता हूँ।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें