बाइबल व्याख्या

मत्ती 6

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

यीशु तीन धार्मिक आदतों को उठाते हैं, जिन पर उस समय कोई बहस नहीं थी: दान, प्रार्थना और उपवास। हर बार वही ढाँचा: ऐसा न करो जैसे लोग देखें, वैसा करो जैसे पिता देखें। बीच में वे प्रार्थना का एक नमूना देते हैं, जिसमें रोटी, क्षमा और परीक्षा एक ही साँस में आती हैं। फिर बात पैसे पर मुड़ती है: धन कहाँ जमा हो, आँख किस पर टिकी हो, कौन मालिक है। और अंत में चिंता पर: पक्षी, सोसन के फूल, और एक आदेश जो सुनने में आसान और जीने में कठिन है, "पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो"।

मर्म

इस अध्याय का धुरी-शब्द "गुप्त" है। चार बार यीशु कहते हैं कि पिता गुप्त में देखते हैं। यह रहस्यवाद नहीं, नैतिक क्रांति है। जिस क्षण आप मान लेते हैं कि परमेश्वर आपकी सबसे छिपी हुई प्रेरणा देख रहे हैं, उसी क्षण दर्शकों की भीड़ अपना अधिकार खो देती है। यीशु यह नहीं कहते कि दान, प्रार्थना और उपवास बंद करो; वे कहते हैं कि इनका दर्शक बदलो। और यहीं मसीही नैतिकता का जन्म होता है: अच्छा काम इसलिए अच्छा नहीं कि वह दिखता है, बल्कि इसलिए कि उसमें एक जीवित पिता के साथ का रिश्ता साँस लेता है। इसीलिए यीशु का सबसे कठोर शब्द "कपटी" है, यानी मुखौटा पहनकर मंच पर खड़ा अभिनेता। पाप यहाँ बुरा काम नहीं, बल्कि अच्छे काम का गलत ईंधन है।

सूत्र

पुराने नियम में परमेश्वर बार-बार अपने लोगों की धार्मिक कार्यकुशलता को अस्वीकार करते हैं जब हृदय पीछे रह जाता है; भविष्यवक्ता बलिदानों से नहीं, बलिदान चढ़ानेवालों से लड़ते थे। यीशु उसी धारा में खड़े हैं, पर एक कदम आगे: वे परमेश्वर को "हे हमारे पिता" कहकर पुकारना सिखाते हैं। यह इस्राएल के लिए अनसुना नहीं था, पर इतना सहज, इतना अपना, इतना रोज़ का, यह नया था। और यह अधिकार वे ही दे सकते हैं जो स्वयं पुत्र हैं। सारे उपदेश का केंद्र "तेरा राज्य आए" है, और वह राज्य क्रूस और पुनरुत्थान से ही धरती पर उतरता है। इसलिए यह अध्याय नैतिक सुधार की सूची नहीं, राज्य के नागरिकों की जीवनशैली है, जो राजा के आने से पहले ही उसके ढंग से जीने लगते हैं।

दर्पण

यहाँ बहुत कुछ चुभता है। आपने कलीसिया में जो सेवा दी, क्या उसका ज़िक्र आपने बातचीत में सहजता से घुसा दिया? आपने वह दान किया, पर बैंक ट्रांसफर के नोट में अपना नाम छोड़ा? आपने उपवास किया और थकान का चेहरा घर में दिखाया, ताकि किसी को पता चले? यीशु कहते हैं, "वे अपना प्रतिफल पा चुके"। यह श्राप नहीं, हिसाब है: तालियाँ मिल गईं, बात खत्म। पैसे के भाग में तो कैंची और तेज़ चलती है। "जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा" का मतलब है कि आपका बैंक स्टेटमेंट आपकी डायरी से ज़्यादा सच बोलता है। और चिंता? यीशु उसे कमज़ोरी नहीं, अविश्वास कहते हैं, "हे अल्पविश्वासियों"। आपकी रातों की जागी हुई गिनती, बीमा, करियर की सुरक्षा, बच्चों का भविष्य: इनमें से कितना सोच है और कितना दूसरे मालिक की सेवा?

प्रश्न

पद 14 और 15 को मिठास में लपेटना असंभव है: "यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा।" क्या यह अनुग्रह का खंडन नहीं? नहीं, पर यह अनुग्रह को सुविधा बनने से रोकता है। यीशु शर्त नहीं, लक्षण बता रहे हैं: जो हृदय क्षमा को सचमुच पी चुका है, वह उसे रोक नहीं सकता; और जो रोकता है, वह दिखा रहा है कि उसने अभी उसे चखा ही नहीं। फिर भी यह वाक्य आराम नहीं देता, और नहीं देना चाहिए। जिसने बचपन में विश्वासघात सहा है, उसे बताना कि "क्षमा कर दो, वरना…" क्रूर लगता है। यहाँ मैं ईमानदारी से कहूँगा: क्षमा एक निर्णय से शुरू होती है पर एक प्रक्रिया में चलती है, और यह प्रार्थना रोज़ दोहराने के लिए दी गई है, एक बार निपटाने के लिए नहीं।

श्रोताओं का चेहरा

पहाड़ पर बैठे लोग गलील के गाँववाले थे, जिनमें से बहुतों के पास सचमुच "दिन भर की रोटी" का सवाल था। रोमी कर, मंदिर का कर, ज़मींदार का हिस्सा; कल की चिंता उनके लिए विलासिता नहीं, हकीकत थी। जब यीशु कहते हैं कि पक्षियों को पिता खिलाते हैं, तो वे सुरक्षित मध्यवर्ग को नहीं, कर्ज़ में डूबे किसानों को कह रहे हैं। और "आराधनालयों और गलियों में" ढिंढोरा पीटनेवाले उनके गाँव के प्रतिष्ठित लोग थे, जिनके दान से कुएँ खुदते थे। यीशु उस सामाजिक सीढ़ी पर कुल्हाड़ी मारते हैं जहाँ धार्मिकता इज़्ज़त का सिक्का बन गई थी। उनके लिए "अपनी कोठरी में जा" का अर्थ भी अलग था: छोटे घरों में एकांत दुर्लभ था, इसलिए यह आदेश एक जान-बूझकर की गई कोशिश थी, आरामदेह आदत नहीं।

अन्य वचनों की गूँज

यशायाह 58 में परमेश्वर उपवास करनेवालों से कहते हैं कि उनका उपवास झगड़े और अन्याय के साथ चलता है, और सच्चा उपवास भूखे को रोटी देना है। मत्ती 6 उसी बात का भीतरी पक्ष है: पहले प्रेरणा साफ करो, फिर हाथ काम करेंगे। दूसरी ओर मत्ती 5:16 में यीशु कहते हैं कि तुम्हारा उजियाला लोगों के सामने चमके। विरोधाभास नहीं: वहाँ प्रश्न है कि प्रकाश किसकी महिमा तक पहुँचाता है, यहाँ प्रश्न है कि प्रकाश किसके लिए जलाया गया। एक ही काम, दो प्रेरणाएँ, दो पूरी तरह अलग जीवन। इसलिए यह अध्याय हमें अपने कामों को छिपाने का नहीं, अपने हृदय को जाँचने का पाठ देता है।

चिंतन

पिछले महीने आपने जो एक भी भला काम किया, वह अगर किसी को कभी पता न चलता, तो क्या आप उसे फिर भी करते?

आपका पैसा जहाँ जा रहा है, वह आपके मन के बारे में क्या बता रहा है, और आप उसमें अगला एक ठोस बदलाव क्या करेंगे?

Matthew में और गहराई से जानें

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Matthew For Everyone, Part 1

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The Message of Matthew

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The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.

Matthew: An Introduction and Commentary

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Matthew

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Matthew 6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मत्ती 6 का क्या अर्थ है?
यीशु तीन धार्मिक आदतों को उठाते हैं, जिन पर उस समय कोई बहस नहीं थी: दान, प्रार्थना और उपवास। हर बार वही ढाँचा: ऐसा न करो जैसे लोग देखें, वैसा करो जैसे पिता देखें। बीच में वे प्रार्थना का एक नमूना देते हैं, जिसमें रोटी, क्षमा और परीक्षा एक ही साँस में आती हैं। फिर बात पैसे पर मुड़ती है: धन कहाँ जमा हो, आँख किस पर टिकी हो, कौन मालिक है। और अंत में चिंता पर: पक्षी, सोसन के फूल, और एक आदेश जो सुनने में आसान और जीने में कठिन है, "पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो"।
मत्ती 6 किस विषय में है?
पुराने नियम में परमेश्वर बार-बार अपने लोगों की धार्मिक कार्यकुशलता को अस्वीकार करते हैं जब हृदय पीछे रह जाता है; भविष्यवक्ता बलिदानों से नहीं, बलिदान चढ़ानेवालों से लड़ते थे। यीशु उसी धारा में खड़े हैं, पर एक कदम आगे: वे परमेश्वर को "हे हमारे पिता" कहकर पुकारना सिखाते हैं। यह इस्राएल के लिए अनसुना नहीं था, पर इतना सहज, इतना अपना, इतना रोज़ का, यह नया था। और यह अधिकार वे ही दे सकते हैं जो स्वयं पुत्र हैं। सारे उपदेश का केंद्र "तेरा राज्य आए" है, और वह राज्य क्रूस और पुनरुत्थान से ही धरती पर उतरता है। इसलिए यह अध्याय नैतिक सुधार की सूची नहीं, राज्य के नागरिकों की जीवनशैली है, जो राजा के आने से पहले ही उसके ढंग से जीने लगते हैं।
मत्ती 6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 14 और 15 को मिठास में लपेटना असंभव है: "यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा।" क्या यह अनुग्रह का खंडन नहीं?
मत्ती 6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 58 में परमेश्वर उपवास करनेवालों से कहते हैं कि उनका उपवास झगड़े और अन्याय के साथ चलता है, और सच्चा उपवास भूखे को रोटी देना है। मत्ती 6 उसी बात का भीतरी पक्ष है: पहले प्रेरणा साफ करो, फिर हाथ काम करेंगे। दूसरी ओर मत्ती 5:16 में यीशु कहते हैं कि तुम्हारा उजियाला लोगों के सामने चमके। विरोधाभास नहीं: वहाँ प्रश्न है कि प्रकाश किसकी महिमा तक पहुँचाता है, यहाँ प्रश्न है कि प्रकाश किसके लिए जलाया गया। एक ही काम, दो प्रेरणाएँ, दो पूरी तरह अलग जीवन। इसलिए यह अध्याय हमें अपने कामों को छिपाने का नहीं, अपने हृदय को जाँचने का पाठ देता है।
मत्ती 6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपका पैसा जहाँ जा रहा है, वह आपके मन के बारे में क्या बता रहा है, और आप उसमें अगला एक ठोस बदलाव क्या करेंगे?
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Matthew 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

यीशु ने कहा, "जब तुम उपवास करो, तो कपटियों के समान तुम्हारे मुँह पर उदासी न छाई रहे।" ध्यान दे, समस्या उपवास नहीं, चेहरा बनाना है। जब दुख भी दिखावे का औज़ार बन जाए, तो परमेश्वर की जगह दर्शक ले लेते हैं। और "वे अपना प्रतिफल पा चुके" यानी तालियाँ ही पूरी मज़दूरी थी, हिसाब चुकता। तू किसकी नज़र के लिए भूखा रहता है?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 22

शरीर का दीपक आँख है: इसलिए यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा।" यीशु ने यह बात धन की चर्चा के बीच में कही। आँख का निर्मल होना यानी लालच से मुक्त, उदार दृष्टि। जिस चीज़ को तू देर तक देखता है, वही तेरे भीतर उतरती है। आज तेरी आँखें किस पर टिकी हैं?

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