मत्ती 7:7
मूल पाठ
तीन क्रियाएँ, तीन वादे, और हर बार एक ही दिशा: यीशु कहते हैं कि माँगने पर दिया जाएगा, ढूँढ़ने पर मिलेगा, और खटखटाने पर द्वार खुलेगा। पहाड़ी उपदेश के इस मोड़ पर, जहाँ अभी-अभी दोष लगाने और कपट की चीरफाड़ हुई है, वहाँ अचानक एक खुला निमंत्रण रखा जाता है। शिष्य को न कोई शर्त बताई जाती है, न कोई योग्यता, न कोई सही शब्दों का सूत्र; केवल यह कि वह खाली हाथ आगे बढ़े। और ध्यान दीजिए, तीनों वादों में देनेवाले का नाम लिया ही नहीं गया। वाक्य अधूरे-से लगते हैं, मानो सुननेवाला खुद जानता हो कि द्वार के उस पार कौन खड़ा है। अगले पदों में यीशु उस चुप्पी को तोड़ते हैं और उन्हें "तुम्हारा स्वर्गीय पिता" कहकर पुकारते हैं।
मर्म
"दिया जाएगा", "खोला जाएगा": यह भाषा जानबूझकर परमेश्वर का नाम छिपाकर उन्हीं की ओर इशारा करती है, और यही इस पद का धार्मिक हृदय है। प्रार्थना यहाँ कोई तकनीक नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच के सही संबंध की स्वीकृति है। माँगनेवाला मान लेता है कि उसके पास अपने आप में कुछ नहीं, और यही अनुग्रह का व्याकरण है। ध्यान दीजिए कि यीशु यह वादा उन्हीं लोगों से करते हैं जिन्हें उन्होंने अभी-अभी "हे कपटी" कहा था और जिनकी आँख में लट्ठा पाया था। यानी द्वार पात्र लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए खुलता है जो जानते हैं कि वे अपात्र हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था यही है: परमेश्वर देने में कंजूस नहीं, वे देने के लिए ही परमेश्वर हैं, और उनका पिता होना कोई भावुक उपमा नहीं बल्कि वाचा की सच्चाई है।
जोड़नेवाला सूत्र
माँगना, ढूँढ़ना, खटखटाना: ये तीनों क्रियाएँ इस्राएल की कहानी से उठी हुई हैं। यिर्मयाह के द्वारा परमेश्वर ने बाबेल में बैठे बन्दियों से कहा था कि यदि वे उन्हें पूरे मन से ढूँढ़ेंगे तो उन्हें पा लेंगे; यानी ढूँढ़ना निर्वासित लोगों की भाषा है, उन लोगों की जो मन्दिर से दूर हैं और जिनके पास चढ़ाने के लिए कुछ नहीं। यीशु उस वाचा-भाषा को उठाकर एक पहाड़ पर बैठी भीड़ के हाथ में रख देते हैं। और कुछ ही पदों बाद वे उसी द्वार-चित्र को दोहराते हैं: "संकरा है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है।" खटखटाना और संकरे फाटक से भीतर जाना एक ही गति के दो नाम हैं। जो द्वार यीशु खुलवाते हैं, वह अन्त में वे स्वयं हैं; गतसमनी में उन्होंने माँगा और आकाश बन्द रहा, ताकि हमारे लिए वह खुला रह सके।
दर्पण
यह पद उन जगहों पर उँगली रखता है जहाँ हमने माँगना छोड़ दिया है। शायद आप वर्षों से किसी बीमारी के लिए, किसी बिगड़े रिश्ते के लिए, किसी बच्चे के लिए प्रार्थना करते रहे और थक गए; अब आप दूसरों के लिए प्रार्थना करते हैं, अपने लिए नहीं, और इसे परिपक्वता कहते हैं। कभी-कभी वह परिपक्वता नहीं, चोट से बचने की चालाकी होती है: जो माँगता ही नहीं, वह निराश भी नहीं होता। दूसरी ओर वह घमंड है जो कहता है कि मैं सम्भाल लूँगा, नौकरी, पैसा, समय, सब मैनेज कर लूँगा। यीशु उस दोनों को खाली हाथ में बदलना चाहते हैं। आज ही एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसके लिए आपने माँगना बन्द कर दिया है, और उसे ऊँची आवाज़ में, एक वाक्य में, परमेश्वर से माँग लीजिए।
संदर्भ
यीशु गलील की एक पहाड़ी ढलान पर बैठे हैं, और सुननेवाले अधिकतर किसान, मछुआरे और मज़दूर हैं, जिनके लिए रोटी और मछली रोज़ की चिन्ता थी, उपमा नहीं। उस समाज में कुछ माँगना सरल काम नहीं था: बड़े आदमी के दरवाज़े तक पहुँचने के लिए बिचौलिए चाहिए थे, और जो मिलता था वह एहसान बन जाता था जिसे चुकाना पड़ता था। मन्दिर की व्यवस्था में भी परमेश्वर तक पहुँचने के लिए याजक, बलि और शुद्धता की शर्तें थीं। इसी दुनिया में यीशु बिना बिचौलिए, बिना शर्त, बिना कर्ज़ के एक द्वार दिखा देते हैं। भीड़ का चकित होना समझ में आता है: अध्याय के अन्त में लिखा है कि वे "उसके उपदेश से चकित हुई", क्योंकि वे शास्त्रियों की तरह नहीं, अधिकारी की तरह बोलते थे।
मुख्य पात्र
इस पद में मुख्य पात्र वह है जिसका नाम नहीं लिया गया: द्वार के भीतर खड़ा परमेश्वर। कर्मवाच्य क्रियाएँ उन्हें छिपाती नहीं, उन्हें और गहरा दिखाती हैं, क्योंकि सारी क्रिया उन्हीं की ओर से आती है। और यीशु जिस परमेश्वर का परिचय देते हैं, वे किसी सौदेबाज़ राजा जैसे नहीं हैं जो देने से पहले तौलता है, बल्कि पिता जैसे हैं जो रोटी माँगने पर पत्थर देने की कल्पना भी नहीं कर सकते। साथ ही यह वही परमेश्वर हैं जो पद 6 में "पवित्र वस्तु" की रक्षा करते हैं और पद 23 में कुकर्म करनेवालों से मुँह फेर लेते हैं। उनकी उदारता ढीलापन नहीं; वे पवित्र हैं और उदार हैं, और दोनों एक ही हृदय से निकलते हैं।
एक बारीकी
"खटखटाओ" शब्द पर ठहरिए। खटखटाने का अर्थ है कि द्वार बन्द है, और यह भी कि घर आपका नहीं है। कोई अपने ही दरवाज़े पर दस्तक नहीं देता। यहाँ बन्द द्वार अस्वीकार का चिह्न नहीं, बल्कि इस सच्चाई का चिह्न है कि भीतर कोई और रहता है, और उसका घर उसकी शर्तों पर खुलता है। यीशु यह नहीं कहते कि दीवार तोड़ो या खिड़की से चढ़ो; वे कहते हैं दस्तक दो, यानी प्रतीक्षा करने की नम्रता सीखो। और वे यह भी नहीं कहते कि द्वार कब खुलेगा, केवल यह कि खोला जाएगा। विश्वास इस बीच के अंतराल में ही पकता है, हाथ उठाए हुए, कान लगाए हुए, इस भरोसे पर टिका हुआ कि भीतरवाला बहरा नहीं है।
मनन
आपने किस विषय में माँगना छोड़ दिया है, और उस चुप्पी के पीछे थकान है, कड़वाहट है, या आत्मनिर्भरता का घमंड?
यदि परमेश्वर वही पिता हैं जो रोटी माँगने पर पत्थर नहीं देते, तो आपकी अनुत्तरित प्रार्थनाओं को आप उनके चरित्र के प्रकाश में कैसे पढ़ेंगे?
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Matthew 7:7 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 7:7 का क्या अर्थ है?
मत्ती 7:7 किस विषय में है?
मत्ती 7:7 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 7:7 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 7:7 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु ने प्रार्थना सिखाते हुए हमें "बुरे" कहा, और उसी साँस में याद दिलाया कि बुरे होकर भी तुम अपने बच्चे को पत्थर नहीं, रोटी देते हो। "तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?" सोच, तेरा अधूरा, थका हुआ प्रेम भी बच्चे को भूखा नहीं रहने देता। फिर पिता का प्रेम तुझे कैसे भूल सकता है? आज माँगने से मत डर।
या तू अपने भाई से कैसे कह सकता है कि ला मैं तेरी आँख से तिनका निकाल दूँ और देख तेरी ही आँख में लट्ठा है?" ज़रा सोच, आँख में लट्ठा लिए कोई दूसरे की आँख के पास जाए तो वह मदद नहीं, चोट पहुँचाएगा। जिसे तू सुधारना चाहता है, कहीं तू उसे घायल तो नहीं कर रहा? पहले अपनी आँख साफ़ कर, फिर तेरा हाथ कोमल हो जाएगा।
पिता, धन्यवाद कि आप मुझे मेरी अपनी आँख का लट्ठा दिखाते हैं, न कि केवल भाई की आँख का तिनका। आपकी यह खरी बात मुझे शर्मिंदा नहीं, स्वतंत्र करती है। धन्यवाद कि आप मुझे दूसरों को आँकने से हटाकर अपनी दया के सामने झुकना सिखाते हैं।
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