भजन संहिता 102:17
पाठ
श्लोक 17 एक अदालती दृश्य जैसा है जिसमें राजा अपना सिंहासन छोड़कर सबसे गरीब याचिकाकर्ता की ओर मुड़ जाता है: "वह लाचार की प्रार्थना की ओर मुँह करता है, और उनकी प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानता।" ध्यान दीजिए, यह वाक्य उस बड़े दृश्य के ठीक बाद आता है जहाँ यहोवा सिय्योन को फिर बसाते हैं और राष्ट्र तथा राजा उनके प्रताप से काँपते हैं। महिमा के उसी क्षण में भजनकार यह जोड़ता है कि परमेश्वर का मुँह किसकी ओर मुड़ा हुआ है: उस टूटे हुए, निर्वस्त्र, खंडहरों में बैठे व्यक्ति की ओर जिसके पास प्रार्थना के सिवा कुछ नहीं बचा। दो नकारात्मक शब्द भी सुनिए, "तुच्छ नहीं जानता", मानो किसी को यह डर हो कि उसकी दुहाई रद्दी की टोकरी में चली गई।
मर्म
यहाँ परमेश्वर के बारे में जो कहा जा रहा है, वह भावुक सांत्वना नहीं, बल्कि उनके चरित्र का दावा है। इब्रानी शब्द जो "लाचार" के पीछे है, अरअर, का अर्थ है नंगा किया हुआ, उजाड़ा हुआ, वह पेड़ जिसकी सारी पत्तियाँ झड़ चुकी हों। यह वही स्थिति है जो श्लोक 6 और 7 में कवि अपने बारे में कहता है: जंगल का धनेश, छत पर अकेली गौरैया। यानी प्रार्थना सुनने की शर्त योग्यता नहीं, रिक्तता है। यह मिस्र से निकलने की कहानी की वही धुन है, जहाँ परमेश्वर दासों का कराहना सुनकर उतर आते हैं; और वही धुन मरियम के गीत में लौटती है, जहाँ दीन लोग ऊँचे किए जाते हैं। इसीलिए यह वचन केवल दुखियों के लिए दिलासा नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए चुनौती है जो अपनी प्रार्थना को अपनी स्थिति से वज़नदार बनाना चाहता है।
सूत्र
इस भजन की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इब्रानियों की पत्री इसके अंतिम शब्दों को परमेश्वर के पुत्र पर लागू करती है। श्लोक 25 से 27 तक जो कहा गया है, "आदि में तूने पृथ्वी की नींव डाली… परन्तु तू वहीं है, और तेरे वर्षों का अन्त न होगा", वह नए नियम में मसीह के बारे में पढ़ा जाता है। इसका अर्थ यह है कि जिस भजन में एक आदमी राख खाता है और आँसू मिलाकर पानी पीता है, उसी भजन का सृष्टिकर्ता-परमेश्वर देहधारी होकर उसी राख में उतर आया। जो "लाचार की प्रार्थना की ओर मुँह" करते हैं, वे स्वयं गतसमनी में लाचार होकर प्रार्थना करने वाले बने। श्लोक 20 का वादा, "बन्दियों का कराहना सुने", यीशु ने नासरत की सभा में अपने ऊपर लागू किया। सूत्र टूटता नहीं: सिय्योन का पुनर्निर्माण एक खाली कब्र से होकर गुजरता है।
दर्पण
हम में से अधिकांश यह मानकर जीते हैं कि प्रार्थना की गुणवत्ता उसे वज़न देती है। इसलिए जब नौकरी छूट जाती है, जब रिपोर्ट में वह शब्द लिखा होता है जिसे आप पढ़ना नहीं चाहते थे, जब बच्चा महीनों से बात नहीं कर रहा, तब हमारी प्रार्थना टूटी-फूटी हो जाती है और हमें लगता है कि अब यह गिनती में नहीं आएगी। श्लोक 17 ठीक इसी डर पर हाथ रखता है। परमेश्वर उस प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानते जो व्याकरण से नहीं, खालीपन से निकली है। इसका दूसरा पहलू कड़वा है: अगर परमेश्वर का मुँह उजड़े हुए की ओर है, तो मेरी सुसज्जित, आत्मविश्वास से भरी, सब कुछ नियंत्रण में दिखाने वाली प्रार्थनाएँ शायद उनसे सबसे दूर खड़ी हैं। आज वह एक वाक्य लिखिए जिसे आप शर्म के मारे प्रार्थना में कहने से बचते आए हैं, और उसे अकेले में ज़ोर से बोलकर पढ़िए।
संदर्भ
यह भजन खंडहरों की गंध से भरा है। श्लोक 14 में दास यरूशलेम के "पत्थरों को चाहते हैं" और "खंडहरों की धूल पर तरस" खाते हैं, यानी मंदिर गिर चुका है, नगर जल चुका है, और बचे हुए लोग या तो निर्वासन में हैं या मलबे के बीच जी रहे हैं। जो जाति कभी अपने राजा और अपने भवन पर गर्व करती थी, वह अब साम्राज्य के किनारे पड़ा एक छोटा-सा, करदाता प्रांत है। इसी पृष्ठभूमि में व्यक्तिगत पीड़ा और राष्ट्रीय पतन एक-दूसरे में घुल जाते हैं: बीमार शरीर और ढहा हुआ नगर एक ही भाषा बोलते हैं। श्लोक 15 में "पृथ्वी के सब राजा" का उल्लेख संयोग नहीं है; जो लोग असली राजाओं के सामने कुछ भी नहीं थे, वे गा रहे हैं कि वे राजा एक दिन काँपेंगे।
प्रश्न
अगर परमेश्वर प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानते, तो श्लोक 10 का क्या करें: "तूने मुझे उठाया, और फिर फेंक दिया है"? और श्लोक 24 में वही आदमी अब भी डर रहा है कि वह आधी उम्र में उठा लिया जाएगा। जाहिर है, सुनी जाने और तुरंत बचाए जाने में फर्क है। यह भजन उस फर्क को छिपाता नहीं। इसका एकमात्र उत्तर श्लोक 18 में मिलता है: "यह बात आनेवाली पीढ़ी के लिये लिखी जाएगी।" यानी हो सकता है कि आपकी प्रार्थना का उत्तर आपके जीवनकाल में न दिखे, बल्कि उस पीढ़ी में दिखे जिसे आप कभी नहीं देखेंगे। यह सस्ती राहत नहीं है। यह एक कठोर, धैर्य माँगने वाली आशा है, जिसमें आदमी अपनी प्रार्थना को अपने से बड़ी किसी कहानी के हवाले कर देता है।
श्रोता
कल्पना कीजिए उन लोगों की जो यह गीत मलबे के बीच गाते थे। उनकी दुनिया में साधारण आदमी की अर्ज़ी राजा तक नहीं पहुँचती थी; उसके लिए भेंट चाहिए थी, सिफ़ारिश करने वाला चाहिए था, दरबार में जगह चाहिए थी। गरीब की याचिका का सामान्य अंजाम यही था कि वह अनदेखी रह जाए। ऐसे श्रोताओं के कानों में "उनकी प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानता" कोई कोमल वाक्य नहीं था, बल्कि एक क्रांतिकारी दावा था कि स्वर्ग का दरबार दलालों के बिना चलता है। और श्लोक 19 यह जोड़ता है कि यहोवा ने "अपने ऊँचे और पवित्रस्थान से दृष्टि की"। ऊँचाई उन्हें दूर नहीं करती; ऊँचाई ही उन्हें सबसे नीचे तक देख पाने में सक्षम बनाती है।
चिंतन
आपकी कौन-सी प्रार्थना ऐसी है जिसे आपने स्वयं ही "तुच्छ" मानकर छोड़ दिया है, और श्लोक 17 उसके बारे में क्या कहता है?
अगर आपके कुछ प्रश्नों के उत्तर आपकी नहीं, बल्कि आनेवाली पीढ़ी के जीवन में दिखेंगे, तो क्या आप फिर भी प्रार्थना करते रहेंगे?
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