बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 126

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सिय्योन के बन्दी लौटे, और लौटनेवालों को लगा जैसे वे जाग नहीं रहे, सपना देख रहे हों। हँसी मुँह में भर गई, जयजयकार गले में, और आस-पास की जातियाँ तक कह उठीं कि इस जाति के परमेश्वर ने कुछ असाधारण किया है। फिर, ठीक उसी साँस में, भजन एक प्रार्थना में बदल जाता है: "हे यहोवा, दक्षिण देश के नालों के समान, हमारे बन्दियों को लौटा ले आ!" जो हो चुका है, वही फिर से माँगा जा रहा है। और अन्त में एक वचन, जो किसान की भाषा में बोला गया है: आँसुओं के साथ बोया गया बीज पूलियों के साथ लौटता है। रोना अन्तिम शब्द नहीं है, फसल है।

मर्म

यह भजन परमेश्वर के बारे में एक बात इतनी साफ़ कहता है कि हम उसे अनदेखा कर देते हैं: उद्धार मनुष्य की उपलब्धि नहीं, परमेश्वर का कार्य है। इस्राएल ने अपने आप को बाबेल से मुक्त नहीं किया; "यहोवा ने, इनके साथ बड़े-बड़े काम किए हैं" यह गवाही जातियों के मुँह से निकलती है, इस्राएल के अपने बड़बोलेपन से नहीं। यही अनुग्रह है: इतना अप्रत्याशित कि पाने वाला खुद को स्वप्न देखनेवाला समझे। पर भजन वहाँ रुकता नहीं। वचन 4 में वही समुदाय फिर याचना करता है, क्योंकि लौटना अधूरा था, नगर खण्डहर था, वाचा का पूरा फल अभी आना बाकी था। परमेश्वर के काम की स्मृति यहाँ सन्तोष नहीं, नई भूख पैदा करती है। और वचन 5-6 इस भूख को धीरज देते हैं: राज्य आँसुओं से होकर आता है, पर निश्चय आता है।

सूत्र

इस भजन का आकार मसीह के आने के आकार जैसा है। बाबेल से लौटना एक उद्धार था, पर अधूरा उद्धार; और अधूरा उद्धार हमेशा किसी बड़े की ओर उँगली उठाता है। जो लोग खण्डहर हुए यरूशलेम में खड़े थे, उन्हें समझ आया कि वाचा का सच्चा फल किसी और तरह से आएगा। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि यीशु ने पहाड़ पर बैठकर उन्हें धन्य कहा जो अब रोते हैं, क्योंकि वे हँसेंगे (लूका 6:21)। वे इसी भजन की भाषा बोल रहे थे, पर अब अपने ही व्यक्ति में। वे स्वयं वह बोनेवाला बने जो रोता हुआ बीज लेकर गया, गतसमनी और क्रूस तक, और तीसरे दिन पूलियाँ लेकर लौटा। पुनरुत्थान इस भजन के वचन 6 का पूरा होना है।

दर्पण

वचन 3 और 4 के बीच जो दरार है, वही अक्सर हमारे जीवन की दरार है। आपने परमेश्वर को काम करते देखा है, शायद उस बीमारी में, उस नौकरी में, उस रिश्ते में जो टूटने से बच गया। और अब आप उसी परमेश्वर से बार-बार वही माँग रहे हैं, और आकाश चुप लगता है। पिछले उत्तर की स्मृति कड़वी भी हो सकती है: अगर उन्होंने तब किया, तो अब क्यों नहीं? यह भजन उस कड़वाहट को झिड़कता नहीं, वह उसे प्रार्थना में बदल देता है। और वह आपके आँसुओं को व्यर्थ भी नहीं कहता; वह उन्हें बीज कहता है। आज एक काग़ज़ पर लिखिए: ऊपर वह एक बड़ा काम जो परमेश्वर ने आपके साथ किया, और नीचे वह एक माँग जो अभी अधूरी है। फिर दोनों को ज़ोर से बोलकर प्रार्थना कीजिए।

अन्तर्पाठ

बीज और आँसू की यह जोड़ी बाइबल में और गहरी होती है। यीशु ने कहा था कि गेहूँ का दाना जब तक भूमि में पड़कर मर न जाए, अकेला रहता है, पर मरने के बाद बहुत फल लाता है (यूहन्ना 12:24)। भजन 126 खेती की एक आम सच्चाई बताता है, यीशु उसी सच्चाई को अपनी मृत्यु की व्याख्या बना देते हैं। दोनों जगह तर्क एक ही है: फल हानि के रास्ते आता है, और हानि को फल से अलग करके देखना अधूरा देखना है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर दुःख स्वयं उपजाऊ है; अर्थ यह है कि परमेश्वर के हाथ में दिया हुआ दुःख बाँझ नहीं रहता। यह भजन शहीदों, प्रचारकों और थके हुए माता-पिताओं की सबसे पुरानी दिलासा है।

पृष्ठभूमि

यह भजन उन "आरोहण के गीतों" में से एक है जो यात्री यरूशलेम की चढ़ाई करते हुए गाते थे। इसकी पृष्ठभूमि फ़ारसी राजा कुस्रू की आज्ञा के बाद का समय है, जब बन्दी लौटे और पाया कि लौटना ही अन्त नहीं था: शहरपनाह गिरी हुई, मन्दिर अधूरा, पड़ोसी शत्रु, फसल कमज़ोर। "दक्षिण देश के नालों" का चित्र नेगेव के सूखे नालों का है, जो महीनों धूल भरे पड़े रहते हैं और एक बरसात में अचानक पानी से भर जाते हैं। यही उनकी प्रार्थना का ढंग है: हे परमेश्वर, अचानक, बहुतायत से, सूखे को तोड़ते हुए आइए। और बोनेवाले का रोना कवि की कल्पना नहीं था; कम बीज, अनिश्चित वर्षा, और भूखा परिवार, यह उनकी रोज़ की गणित थी।

श्रोता

पहले श्रोता वे लोग थे जिनके लिए निर्वासन केवल राजनीतिक हार नहीं, परमेश्वर का न्याय था। वाचा तोड़ने का परिणाम। इसलिए लौटना उनके कानों में क्षमा जैसा बजता था: परमेश्वर ने हमें फिर अपना लिया। और यह कि जातियाँ स्वयं कह रही थीं कि यहोवा ने बड़े काम किए हैं, उस संस्कृति में जहाँ मान और अपमान सब कुछ था, यह लज्जा के उलट जाने की घोषणा थी। पर वे भावुक नहीं थे। वे उसी गीत में माँग सकते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि परमेश्वर की एक कृपा को चुकाकर बैठ जाना उनका धर्म नहीं है। हम इस भजन को अक्सर आशा का गीत पढ़ते हैं; वे इसे आशा और शिकायत दोनों के साथ गाते थे, और परमेश्वर ने वही गीत अपनी पुस्तक में रख लिया।

चिंतन

परमेश्वर का कौन सा "बड़ा काम" आपकी स्मृति में है, और वह स्मृति आज आपको सन्तोष दे रही है या नई प्रार्थना की भूख?

आपके जीवन में कौन सा आँसुओं से बोया गया बीज है जिसकी फसल आपने अभी तक नहीं देखी, और आप उस प्रतीक्षा में परमेश्वर के साथ कैसे बात कर रहे हैं?

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Psalms 126 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 126 का क्या अर्थ है?
सिय्योन के बन्दी लौटे, और लौटनेवालों को लगा जैसे वे जाग नहीं रहे, सपना देख रहे हों। हँसी मुँह में भर गई, जयजयकार गले में, और आस-पास की जातियाँ तक कह उठीं कि इस जाति के परमेश्वर ने कुछ असाधारण किया है। फिर, ठीक उसी साँस में, भजन एक प्रार्थना में बदल जाता है: "हे यहोवा, दक्षिण देश के नालों के समान, हमारे बन्दियों को लौटा ले आ!
भजन संहिता 126 किस विषय में है?
इस भजन का आकार मसीह के आने के आकार जैसा है। बाबेल से लौटना एक उद्धार था, पर अधूरा उद्धार; और अधूरा उद्धार हमेशा किसी बड़े की ओर उँगली उठाता है। जो लोग खण्डहर हुए यरूशलेम में खड़े थे, उन्हें समझ आया कि वाचा का सच्चा फल किसी और तरह से आएगा। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि यीशु ने पहाड़ पर बैठकर उन्हें धन्य कहा जो अब रोते हैं, क्योंकि वे हँसेंगे (लूका 6:21)। वे इसी भजन की भाषा बोल रहे थे, पर अब अपने ही व्यक्ति में। वे स्वयं वह बोनेवाला बने जो रोता हुआ बीज लेकर गया, गतसमनी और क्रूस तक, और तीसरे दिन पूलियाँ लेकर लौटा। पुनरुत्थान इस भजन के वचन 6 का पूरा होना है।
भजन संहिता 126 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
बीज और आँसू की यह जोड़ी बाइबल में और गहरी होती है। यीशु ने कहा था कि गेहूँ का दाना जब तक भूमि में पड़कर मर न जाए, अकेला रहता है, पर मरने के बाद बहुत फल लाता है (यूहन्ना 12:24)। भजन 126 खेती की एक आम सच्चाई बताता है, यीशु उसी सच्चाई को अपनी मृत्यु की व्याख्या बना देते हैं। दोनों जगह तर्क एक ही है: फल हानि के रास्ते आता है, और हानि को फल से अलग करके देखना अधूरा देखना है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर दुःख स्वयं उपजाऊ है; अर्थ यह है कि परमेश्वर के हाथ में दिया हुआ दुःख बाँझ नहीं रहता। यह भजन शहीदों, प्रचारकों और थके हुए माता-पिताओं की सबसे पुरानी दिलासा है।
भजन संहिता 126 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पहले श्रोता वे लोग थे जिनके लिए निर्वासन केवल राजनीतिक हार नहीं, परमेश्वर का न्याय था। वाचा तोड़ने का परिणाम। इसलिए लौटना उनके कानों में क्षमा जैसा बजता था: परमेश्वर ने हमें फिर अपना लिया। और यह कि जातियाँ स्वयं कह रही थीं कि यहोवा ने बड़े काम किए हैं, उस संस्कृति में जहाँ मान और अपमान सब कुछ था, यह लज्जा के उलट जाने की घोषणा थी। पर वे भावुक नहीं थे। वे उसी गीत में माँग सकते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि परमेश्वर की एक कृपा को चुकाकर बैठ जाना उनका धर्म नहीं है। हम इस भजन को अक्सर आशा का गीत पढ़ते हैं; वे इसे आशा और शिकायत दोनों के साथ गाते थे, और परमेश्वर ने वही गीत अपनी पुस्तक में रख लिया।
भजन संहिता 126 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में कौन सा आँसुओं से बोया गया बीज है जिसकी फसल आपने अभी तक नहीं देखी, और आप उस प्रतीक्षा में परमेश्वर के साथ कैसे बात कर रहे हैं?

Psalms 126 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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