बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 135

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

भजन 135 मन्दिर में खड़े सेवकों को पुकारता है: स्तुति करो, क्योंकि यहोवा भला है और उसका नाम मनोहर है। फिर कवि गिनती करने लगता है कि यह परमेश्वर कौन है: वह जिसने याकूब को अपना निज धन चुना, जो बादल उठाता और पवन को भण्डार से निकालता है, जिसने मिस्र के पहिलौठों को मारा और सीहोन, ओग और कनान के राजाओं को गिराया, और जिसने वह देश अपनी प्रजा को बाँट दिया। अन्त में मूर्तियों की चुप्पी का ठट्ठा और फिर इस्राएल, हारून, लेवी, और सब डरवैयों को बुलावा: यहोवा को धन्य कहो।

मर्म

पद 18 इस भजन की नस है: "जैसी वे हैं वैसे ही उनके बनानेवाले भी हैं; और उन पर सब भरोसा रखनेवाले भी वैसे ही हो जाएँगे!" उपासना कभी निष्क्रिय नहीं होती; वह ढालती है। जो चीज़ बोल नहीं सकती, देख नहीं सकती, जिसमें साँस नहीं चलती, उसकी सेवा करनेवाला भी धीरे-धीरे बहरा और बेजान हो जाता है। इसके ठीक विपरीत वह परमेश्वर है जो चाहता है और करता है (पद 6), जो पुकार सुनता है और तरस खाता है (पद 14)। यहाँ अनुग्रह, सृष्टि और वाचा एक ही धारा में बहते हैं: जिसने आकाश और गहरे स्थानों पर अपनी इच्छा चलाई, उसी ने एक छोटे से गुलाम-राष्ट्र को "अपना निज धन" कहा। सर्वसामर्थ्य और चुनाव अलग-अलग विषय नहीं, एक ही करुणा के दो चेहरे हैं।

सूत्र

ध्यान दें कि भजनकार सृष्टि से सीधे इतिहास में उतर जाता है। बिजली और वर्षा बनानेवाला वही है जो मिस्र में चिन्ह करता है और राजाओं को गिराता है। इस्राएल का परमेश्वर प्रकृति का देवता नहीं, वह इतिहास में हस्तक्षेप करनेवाला उद्धारकर्ता है। और यहीं छुटकारे की बड़ी कहानी का सूत्र दिखता है: निर्गमन का पहिलौठा-न्याय, मेमने का लहू, और अन्त में वह पहिलौठा जो स्वयं दिया गया। पद 14 का वादा, "अपने दासों की दुर्दशा देखकर तरस खाएगा", व्यवस्थाविवरण 32:36 से लिया गया है, जहाँ यह प्रजा की असहायता की घड़ी में बोला जाता है। परमेश्वर का न्याय चुकाना उसकी करुणा का ही रूप है। मसीह के क्रूस में यह दोनों एक बिन्दु पर मिलते हैं: वहाँ न्याय हुआ, और वहाँ तरस खाया गया।

आईना

हमारी मूर्तियाँ सोना-चाँदी की नहीं, फिर भी वे बनाई हुई हैं। वह पदोन्नति जिसके लिए आप परिवार की मेज़ पर अनुपस्थित रहते हैं। वह बचत खाता जो नींद को सुरक्षा देता है। वह छवि जिसे आप ऑनलाइन गढ़ते हैं। इनमें से कोई भी आपके नाम से आपको नहीं पुकारेगा। और भजन की चेतावनी क्रूर रूप से सटीक है: आप वैसे ही हो जाएँगे। जो पैसे की उपासना करता है, वह लोगों को गिनने लगता है। जो प्रतिष्ठा की उपासना करता है, वह आलोचना पर बहरा हो जाता है। बेजान चीज़ों की सेवा करते-करते हृदय में साँस कम होने लगती है। आज ही एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसके छिन जाने से आपकी नींद उड़ जाती, और उसके नीचे पद 4 के शब्द लिखिए, "अपना निज धन", और ऊँची आवाज़ में यह वाक्य कहिए कि मेरी सुरक्षा वही है जो मुझे चुनता है।

मुख्य पात्र

इस भजन का मुख्य पात्र यहोवा है, और उसका चित्र जानबूझकर असुविधाजनक है। वह "सब देवताओं से ऊँचा" है, पर ऊँचाई उसे दूर नहीं करती; वह भण्डार से पवन निकालता है जैसे कोई घर का मालिक अपनी अलमारी से। उसकी इच्छा और उसका कार्य एक हैं: "जो कुछ यहोवा ने चाहा उसे उसने… किया है।" यही परमेश्वर पहिलौठों को मारता है और राजाओं को घात करता है। भजनकार इसे छिपाता नहीं, गाता है। क्यों? क्योंकि जिस प्रजा के लिए वह गाया जा रहा है, वह जानती है कि उसकी आज़ादी किसी की हार से आई। परमेश्वर की भलाई भावुक नहीं है; उसमें दाँत हैं। उसका नाम "सदा स्थिर" है, पीढ़ी-पीढ़ी वही, और यही उसकी विश्वसनीयता है: वह जो कल था, वही आपकी दुर्दशा में भी है।

पहले सुननेवाले

कल्पना कीजिए मन्दिर के आँगन में खड़े उन लोगों की, जो निर्वासन से लौटे हैं, फारसी साम्राज्य के अधीन, कर देते हुए, बिना अपने राजा के। उनके चारों ओर के मन्दिर उनके अपने मन्दिर से बड़े और अमीर थे। मूर्तियों का यह ठट्ठा उनके लिए बौद्धिक तर्क नहीं, जीने की ज़रूरत था: जो शक्तियाँ हम पर राज करती हैं, वे साँस भी नहीं लेतीं। सीहोन और ओग के नाम गिनना पुरानी यादें नहीं, गवाही थी कि सामर्थी राजा गिर सकते हैं। और "हे लेवी के घराने" जैसा बुलावा दिखाता है कि यह गीत सामूहिक था; अकेले विश्वास टिकता नहीं, इसलिए पूरा घराना एक साथ बोलता है।

कठिन प्रश्न

पद 8 को धीरे पढ़िए: "क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहिलौठों को मार डाला!" और यह स्तुति के गीत का हिस्सा है। इसे मीठा करने की कोशिश बेईमानी होगी। मिस्री माताओं का शोक भी परमेश्वर के सामने वास्तविक था। भजन हमें यह बताता है कि परमेश्वर का अनुग्रह इतिहास के भीतर काम करता है, और इतिहास में उद्धार अकसर किसी व्यवस्था के टूटने से होकर आता है; गुलामों की रिहाई गुलाम बनानेवालों के लिए मुफ़्त नहीं होती। पर सवाल पूरा हल नहीं होता, और भजनकार उसे हल करने की कोशिश भी नहीं करता। जो हम कह सकते हैं वह यह है: वही परमेश्वर आगे चलकर न्याय अपने ऊपर लेता है। यह उत्तर नहीं, दिशा है, और इस बीच हम पद 14 के भरोसे पर खड़े रहते हैं।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन-सी बेजान चीज़ है जिसकी सेवा में आपकी साँस कम हो रही है, और आप यह कैसे पहचानेंगे?

पद 14 कहता है कि परमेश्वर अपने दासों की दुर्दशा देखकर तरस खाएगा। आप अपनी किस दुर्दशा को अब तक उसकी नज़र से छिपाए बैठे हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Songs of Jesus

Timothy Keller

A year of daily devotions through every psalm, ideal alongside your reading.

Psalms 1-72

Derek Kidner

Kidner's crisp notes have helped generations pray the psalms.

Psalms 73-150

Derek Kidner

The second half of the psalter with the same loved precision.

Reflections on the Psalms

C.S. Lewis

Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.

Psalms Volume 1

Gerald Wilson

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.

यह व्याख्या साझा करें

सुसमाचार फैलाने में मदद करें। यह व्याख्या किसी ऐसे व्यक्ति को भेजें जिसे इससे प्रोत्साहन मिल सके।

WhatsApp Email Facebook X / Twitter

Psalms 135 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 135 का क्या अर्थ है?
भजन 135 मन्दिर में खड़े सेवकों को पुकारता है: स्तुति करो, क्योंकि यहोवा भला है और उसका नाम मनोहर है। फिर कवि गिनती करने लगता है कि यह परमेश्वर कौन है: वह जिसने याकूब को अपना निज धन चुना, जो बादल उठाता और पवन को भण्डार से निकालता है, जिसने मिस्र के पहिलौठों को मारा और सीहोन, ओग और कनान के राजाओं को गिराया, और जिसने वह देश अपनी प्रजा को बाँट दिया। अन्त में मूर्तियों की चुप्पी का ठट्ठा और फिर इस्राएल, हारून, लेवी, और सब डरवैयों को बुलावा: यहोवा को धन्य कहो।
भजन संहिता 135 किस विषय में है?
ध्यान दें कि भजनकार सृष्टि से सीधे इतिहास में उतर जाता है। बिजली और वर्षा बनानेवाला वही है जो मिस्र में चिन्ह करता है और राजाओं को गिराता है। इस्राएल का परमेश्वर प्रकृति का देवता नहीं, वह इतिहास में हस्तक्षेप करनेवाला उद्धारकर्ता है। और यहीं छुटकारे की बड़ी कहानी का सूत्र दिखता है: निर्गमन का पहिलौठा-न्याय, मेमने का लहू, और अन्त में वह पहिलौठा जो स्वयं दिया गया। पद 14 का वादा, "अपने दासों की दुर्दशा देखकर तरस खाएगा", व्यवस्थाविवरण 32:36 से लिया गया है, जहाँ यह प्रजा की असहायता की घड़ी में बोला जाता है। परमेश्वर का न्याय चुकाना उसकी करुणा का ही रूप है। मसीह के क्रूस में यह दोनों एक बिन्दु पर मिलते हैं: वहाँ न्याय हुआ, और वहाँ तरस खाया गया।
भजन संहिता 135 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इस भजन का मुख्य पात्र यहोवा है, और उसका चित्र जानबूझकर असुविधाजनक है। वह "सब देवताओं से ऊँचा" है, पर ऊँचाई उसे दूर नहीं करती; वह भण्डार से पवन निकालता है जैसे कोई घर का मालिक अपनी अलमारी से। उसकी इच्छा और उसका कार्य एक हैं: "जो कुछ यहोवा ने चाहा उसे उसने... किया है।" यही परमेश्वर पहिलौठों को मारता है और राजाओं को घात करता है। भजनकार इसे छिपाता नहीं, गाता है। क्यों?
भजन संहिता 135 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 8 को धीरे पढ़िए: "क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहिलौठों को मार डाला!" और यह स्तुति के गीत का हिस्सा है। इसे मीठा करने की कोशिश बेईमानी होगी। मिस्री माताओं का शोक भी परमेश्वर के सामने वास्तविक था। भजन हमें यह बताता है कि परमेश्वर का अनुग्रह इतिहास के भीतर काम करता है, और इतिहास में उद्धार अकसर किसी व्यवस्था के टूटने से होकर आता है; गुलामों की रिहाई गुलाम बनानेवालों के लिए मुफ़्त नहीं होती। पर सवाल पूरा हल नहीं होता, और भजनकार उसे हल करने की कोशिश भी नहीं करता। जो हम कह सकते हैं वह यह है: वही परमेश्वर आगे चलकर न्याय अपने ऊपर लेता है। यह उत्तर नहीं, दिशा है, और इस बीच हम पद 14 के भरोसे पर खड़े रहते हैं।
भजन संहिता 135 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पद 14 कहता है कि परमेश्वर अपने दासों की दुर्दशा देखकर तरस खाएगा। आप अपनी किस दुर्दशा को अब तक उसकी नज़र से छिपाए बैठे हैं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Psalms 135 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 17

पिता, मैं अक्सर ऐसी चीज़ों पर भरोसा कर बैठता हूँ जो न सुन सकती हैं, न जवाब दे सकती हैं। पर तू जीवित है, तेरे कान मेरी हर फुसफुसाहट पर लगे हैं। मेरा मन उन खोखली आशाओं से हटाकर अपनी ओर मोड़ ले, क्योंकि जीवन की साँस सिर्फ़ तुझमें है।

इस अंश को किसी और स्तर पर देखें

शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।

अध्ययन टूल में खोलें

अस्वीकरण: Faith.network बाइबल की व्याख्याएँ तैयार करने के लिए स्वचालित भाषा मॉडल का उपयोग करता है। हम धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सही रहने का पूरा प्रयास करते हैं, फिर भी यह सॉफ़्टवेयर त्रुटि कर सकता है। इस साधन को अपने निजी बाइबल अध्ययन और कलीसिया के संगति जीवन का स्थान लेने वाला न समझें, बल्कि उनके सहायक के रूप में प्रयोग करें।

© 2026 Faith.Network. सर्वाधिकार सुरक्षित।

Faith.network एक सेवकाई है Faith.network · KvK 84972599 · connect@faith.network

कंपनी?