बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 27:13

बाइबल
यह वचन YGC PENTECOSTAL CHURCH OF GOD द्वारा समर्पित है

पाठ

दाऊद एक ऐसा वाक्य बोलता है जो बीच में ही टूट जाता है: "यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता।" यह कोई विजय-घोष नहीं है, बल्कि एक आदमी का अपने ही पाँवों की ओर देखना और यह पहचानना कि वह अब तक गिरा क्यों नहीं। झूठे गवाह उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं (पद 12), माता-पिता ने छोड़ दिया है (पद 10), और वह परमेश्वर से विनती कर रहा है कि अपना मुख न छिपाएँ। इस अँधेरे के बीचोंबीच वह एक ही बात कहता है: मुझे विश्वास था कि मैं परमेश्वर की भलाई देखूँगा, यहीं, इसी जीवन में, मरने के बाद नहीं। और उसी विश्वास ने उसे खड़ा रखा।

मूल बात

ध्यान दीजिए कि दाऊद यह नहीं कहता कि उसका विश्वास उसे मजबूत बनाता है; वह कहता है कि विश्वास न होता तो वह ढह जाता। यह घमंड की नहीं, कगार पर खड़े आदमी की भाषा है। और जिस बात पर वह टिका है वह कोई सिद्धांत नहीं, एक अपेक्षा है: "यहोवा की भलाई को देखूँगा"। देखना, यानी अपनी आँखों से, अपने ही जीवनकाल में, उसी धरती पर जहाँ उसके शत्रु अब भी जीवित घूम रहे हैं। बाइबल यहाँ हमें स्वर्ग की ओर टालकर चुप नहीं कराती। वह कहती है कि परमेश्वर की भलाई इतिहास के भीतर, अस्पताल के कमरे में, अदालत की तारीखों में, बेरोजगारी के महीनों में प्रकट होने वाली चीज़ है। पर कब, यह पद नहीं बताता। और शायद यही इस विश्वास की सबसे कठिन परीक्षा है: भरोसा करना कि भलाई आएगी, बिना यह जाने कि वह किस रूप में और किस दिन आएगी।

सूत्र

"जीवितों की पृथ्वी" पर परमेश्वर की भलाई देखने की यह आशा पूरी बाइबल में एक धागे की तरह चलती है, और वह धागा कहीं टूटता नहीं। इस्राएल को एक देश का वादा मिला, कोई परलोक नहीं; भविष्यद्वक्ताओं ने ऐसे दिन की बात की जब न्याय नदी की तरह बहेगा, इसी मिट्टी पर। और फिर परमेश्वर स्वयं इस मिट्टी पर आ गए। मसीह के देह धारण करने का अर्थ ही यह है कि परमेश्वर की भलाई दूर के आकाश में नहीं, बल्कि गाँव की गलियों में, रोटी और मछली में, कुष्ठ रोगी की चमड़ी पर छूने वाले हाथ में दिखाई दी। पर वही मसीह क्रूस पर उस भलाई को माँगते हुए चिल्लाए और चुप्पी मिली। दाऊद का "यदि मुझे विश्वास न होता" और मसीह का "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" एक ही अँधेरे कमरे की दो दीवारें हैं। पुनरुत्थान वह उत्तर है जो दाऊद को उसके जीवनकाल में पूरा नहीं मिला था।

दर्पण

आप जानते हैं वह क्षण, जब कोई रिपोर्ट आती है, या एक फोन, या दफ्तर में वह बैठक जिसके बाद सब बदल जाता है, और शरीर सचमुच लड़खड़ाता है। दाऊद के शब्द "मूर्छित हो जाता" कोई अलंकार नहीं; वह शारीरिक ढहने की बात कर रहा है। हम अक्सर विश्वास को एक सजावट समझते हैं, रविवार का एक सुंदर विचार, जबकि यह पद कहता है कि विश्वास वह ढाँचा है जिसके बिना छत गिर पड़ती है। और यहाँ एक कठिन सवाल भी छिपा है: क्या हम परमेश्वर से उनकी भलाई चाहते हैं, या केवल समस्या के समाधान का अपना बनाया हुआ नक्शा? दाऊद ने कोई नक्शा नहीं माँगा। उसने बस देखने की आशा रखी। आज, दिन खत्म होने से पहले, एक कागज़ पर तीन बातें लिखिए जो पिछले वर्ष में आपने परमेश्वर की भलाई के रूप में अपनी आँखों से देखीं, और उस कागज़ को वहाँ रखिए जहाँ कल सुबह आपकी नज़र पड़े।

पृष्ठभूमि

यह भजन उस दुनिया से आता है जहाँ न्याय मुख्यतः गवाहों पर टिका था। पद 12 में "झूठे साक्षी" कोई मामूली शिकायत नहीं; उस समाज में दो लोगों की झूठी गवाही किसी की जान ले सकती थी, उसकी ज़मीन छीन सकती थी, उसके परिवार को समाज से काट सकती थी। दाऊद के जीवन में ऐसे दौर बार-बार आए, चाहे शाऊल के दरबार में, चाहे अबशालोम के विद्रोह में, जब सत्ता के गलियारों में उसके विरुद्ध कहानियाँ गढ़ी गईं और उसके पास अपना बचाव करने का कोई साधन न रहा। पद 10 का "मेरे माता-पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है" उस संस्कृति में और भी भारी था, जहाँ कुल ही आपकी सुरक्षा, पहचान और भविष्य था। कुल से कटा आदमी सचमुच अकेला था। इसी अकेलेपन के बीच पद 13 बोला गया है।

मुख्य पात्र

इस पद में दाऊद हमें अपनी सबसे कमज़ोर हालत में दिखता है, और यही उसकी सबसे बड़ी ईमानदारी है। वही आदमी जिसने पद 3 में कहा था कि सेना छावनी डाले तो भी वह न डरेगा, अब स्वीकार करता है कि वह गिरने के कितने करीब था। क्या वह पहले डींग मार रहा था? मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है कि भजन हमें एक आत्मा की असली गति दिखाते हैं, जो साहस और घबराहट के बीच डोलती रहती है, और परमेश्वर इन दोनों को एक ही प्रार्थना में रहने देते हैं। दाऊद अपनी दुर्बलता को छिपाता नहीं और अपने विश्वास को बढ़ा-चढ़ाकर भी नहीं कहता। वह बस इतना जानता है कि कोई चीज़ थी जिसने उसे थामे रखा, और वह चीज़ उसके भीतर से नहीं आई थी।

एक बारीकी

"जीवितों की पृथ्वी" यह मुहावरा दो शब्दों में एक पूरा धर्मशास्त्र समेटे हुए है। इब्रानी में इसका उलटा भाव है शिओल, मृतकों का लोक, जहाँ भजनकार के अनुसार कोई परमेश्वर की स्तुति नहीं करता। इसलिए दाऊद जब कहता है कि वह जीवितों की पृथ्वी पर भलाई देखेगा, तो वह मृत्यु से पहले की माँग कर रहा है, और यह माँग निर्लज्ज नहीं बल्कि विश्वास से भरी है। वह परमेश्वर से कह रहा है: मैं चाहता हूँ कि आपकी भलाई वहाँ दिखे जहाँ मैं अब भी साँस ले रहा हूँ। हम बहुत जल्दी दुःख को परलोक के हवाले कर देते हैं। यह पद हमें वहीं रोक देता है, और चुपचाप पूछता है: क्या आपने आज, इसी धरती पर, देखने की हिम्मत छोड़ दी है?

मनन

वह कौन सी परिस्थिति है जिसमें आपने परमेश्वर की भलाई देखने की उम्मीद चुपचाप छोड़ दी है, और आपने वह उम्मीद कब छोड़ी थी?

अगर परमेश्वर की भलाई उस रूप में आए जिसकी आपने कल्पना नहीं की थी, तो क्या आप उसे पहचान पाएँगे, या आप अपने ही बनाए नक्शे को देखते रह जाएँगे?

Psalms में और गहराई से जानें

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The Songs of Jesus

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Psalms 27:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 27:13 का क्या अर्थ है?
दाऊद एक ऐसा वाक्य बोलता है जो बीच में ही टूट जाता है: "यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता।" यह कोई विजय-घोष नहीं है, बल्कि एक आदमी का अपने ही पाँवों की ओर देखना और यह पहचानना कि वह अब तक गिरा क्यों नहीं। झूठे गवाह उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं (पद 12), माता-पिता ने छोड़ दिया है (पद 10), और वह परमेश्वर से विनती कर रहा है कि अपना मुख न छिपाएँ। इस अँधेरे के बीचोंबीच वह एक ही बात कहता है: मुझे विश्वास था कि मैं परमेश्वर की भलाई देखूँगा, यहीं, इसी जीवन में, मरने के बाद नहीं। और उसी विश्वास ने उसे खड़ा रखा।
भजन संहिता 27:13 किस विषय में है?
"जीवितों की पृथ्वी" पर परमेश्वर की भलाई देखने की यह आशा पूरी बाइबल में एक धागे की तरह चलती है, और वह धागा कहीं टूटता नहीं। इस्राएल को एक देश का वादा मिला, कोई परलोक नहीं; भविष्यद्वक्ताओं ने ऐसे दिन की बात की जब न्याय नदी की तरह बहेगा, इसी मिट्टी पर। और फिर परमेश्वर स्वयं इस मिट्टी पर आ गए। मसीह के देह धारण करने का अर्थ ही यह है कि परमेश्वर की भलाई दूर के आकाश में नहीं, बल्कि गाँव की गलियों में, रोटी और मछली में, कुष्ठ रोगी की चमड़ी पर छूने वाले हाथ में दिखाई दी। पर वही मसीह क्रूस पर उस भलाई को माँगते हुए चिल्लाए और चुप्पी मिली। दाऊद का "यदि मुझे विश्वास न होता" और मसीह का "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" एक ही अँधेरे कमरे की दो दीवारें हैं। पुनरुत्थान वह उत्तर है जो दाऊद को उसके जीवनकाल में पूरा नहीं मिला था।
भजन संहिता 27:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह भजन उस दुनिया से आता है जहाँ न्याय मुख्यतः गवाहों पर टिका था। पद 12 में "झूठे साक्षी" कोई मामूली शिकायत नहीं; उस समाज में दो लोगों की झूठी गवाही किसी की जान ले सकती थी, उसकी ज़मीन छीन सकती थी, उसके परिवार को समाज से काट सकती थी। दाऊद के जीवन में ऐसे दौर बार-बार आए, चाहे शाऊल के दरबार में, चाहे अबशालोम के विद्रोह में, जब सत्ता के गलियारों में उसके विरुद्ध कहानियाँ गढ़ी गईं और उसके पास अपना बचाव करने का कोई साधन न रहा। पद 10 का "मेरे माता-पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है" उस संस्कृति में और भी भारी था, जहाँ कुल ही आपकी सुरक्षा, पहचान और भविष्य था। कुल से कटा आदमी सचमुच अकेला था। इसी अकेलेपन के बीच पद 13 बोला गया है।
भजन संहिता 27:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"जीवितों की पृथ्वी" यह मुहावरा दो शब्दों में एक पूरा धर्मशास्त्र समेटे हुए है। इब्रानी में इसका उलटा भाव है शिओल, मृतकों का लोक, जहाँ भजनकार के अनुसार कोई परमेश्वर की स्तुति नहीं करता। इसलिए दाऊद जब कहता है कि वह जीवितों की पृथ्वी पर भलाई देखेगा, तो वह मृत्यु से पहले की माँग कर रहा है, और यह माँग निर्लज्ज नहीं बल्कि विश्वास से भरी है। वह परमेश्वर से कह रहा है: मैं चाहता हूँ कि आपकी भलाई वहाँ दिखे जहाँ मैं अ
भजन संहिता 27:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
अगर परमेश्वर की भलाई उस रूप में आए जिसकी आपने कल्पना नहीं की थी, तो क्या आप उसे पहचान पाएँगे, या आप अपने ही बनाए नक्शे को देखते रह जाएँगे?

Psalms 27 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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