बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 27:12

बाइबल
यह वचन Masagram Elohim Gospel Church and Follow up of the World Mission द्वारा समर्पित है

पाठ

दाऊद की प्रार्थना अचानक अदालत के कठघरे जैसी हो जाती है। वह कहता है: मुझे मेरे सतानेवालों की मर्ज़ी के हवाले मत कर दीजिए, मुझे उनके हाथ में सौंपकर पीछे मत हट जाइए, क्योंकि मेरे विरुद्ध झूठे गवाह खड़े हो चुके हैं, और वे केवल झूठ बोलकर संतुष्ट नहीं होते, उनकी साँस में ही हिंसा की धुन है। यह वही व्यक्ति है जिसने कुछ ही पंक्तियाँ पहले कहा था कि सेना छावनी डाले तो भी वह नहीं डरेगा। अब वह सेना से नहीं, जीभ से घिरा है, और वही निडर आवाज़ काँपती हुई विनती में बदल जाती है। यह पद स्तोत्र 27 का सबसे नंगा, सबसे असुरक्षित क्षण है: एक आदमी जिसके पास अपने बचाव में कहने को कुछ बचा नहीं, केवल परमेश्वर का नाम पुकारने के।

मर्म

यहाँ परमेश्वर की एक ऐसी भूमिका सामने आती है जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं: वे न्यायी हैं, और उनका न्याय केवल भविष्य की कोई घटना नहीं, बल्कि वाचा की सुरक्षा है। इस्राएल की व्यवस्था में झूठी गवाही केवल एक व्यक्तिगत पाप नहीं थी, वह पूरे समाज की नींव पर प्रहार था, क्योंकि गवाहों के शब्दों पर ही किसी का जीवन या मृत्यु टिकती थी। इसलिए दाऊद बदला नहीं माँगता; वह माँगता है कि परमेश्वर उसे "छोड़" न दें, उसे उनकी इच्छा के हवाले न कर दें। यह अनुग्रह की भाषा है, योग्यता की नहीं। वह यह नहीं कहता कि मैं निर्दोष हूँ इसलिए मुझे बचाइए, बल्कि यह कि आप मेरे उद्धार करनेवाले परमेश्वर हैं, इसलिए मुझे मत छोड़िए। धर्मी होने का अर्थ यहाँ अपने बल पर खड़ा होना नहीं, बल्कि परमेश्वर की वाचा-निष्ठा के भरोसे पर टिक जाना है। और यही मसीही विश्वास का केंद्र है: हमारा बचाव हमारे तर्कों में नहीं, परमेश्वर के चरित्र में है।

सूत्र

इस पद को पढ़ते समय एक और अदालत की छाया पड़ती है। सुसमाचारों में यीशु मसीह के मुकदमे का विवरण लगभग इसी शब्दावली में लिखा गया है: महासभा झूठे गवाह ढूँढ़ती रही, और जो खड़े हुए उनकी गवाही आपस में मेल नहीं खाती थी। अंतर यह है कि दाऊद जो प्रार्थना करता है, वह यीशु के लिए पूरी नहीं हुई। दाऊद कहता है, मुझे सतानेवालों के हवाले न कीजिए; और पिता ने अपने पुत्र को ठीक उसी तरह सौंप दिया, झूठे गवाहों की इच्छा पर, पीलातुस की कायरता पर, भीड़ की चीख पर। यह वाचा का टूटना नहीं था, बल्कि वाचा का चरम पालन: एक निर्दोष ने वह जगह ली जहाँ हम खड़े होने के योग्य थे। इसीलिए हम आज यह प्रार्थना उम्मीद के साथ कर सकते हैं, क्योंकि एक बार किसी ने इसका उत्तर "नहीं" में सुना, ताकि हमें "हाँ" मिल सके।

दर्पण

झूठी गवाही आज तलवार लेकर नहीं आती। वह दफ़्तर की उस मीटिंग में आती है जहाँ आपकी अनुपस्थिति में आपके इरादों की व्याख्या कोई और करता है। वह उस व्हाट्सऐप ग्रुप में आती है जहाँ आधा सच आधे मिनट में पूरा हो जाता है। वह परिवार में आती है, जब बरसों पुराना कोई किस्सा इस तरह दोहराया जाता है कि आप हमेशा के लिए उसी किस्से के आदमी बनकर रह जाते हैं। और सबसे कठिन बात यह है कि आप सब कुछ स्पष्ट नहीं कर सकते। हर सफ़ाई अगली शंका पैदा करती है। यहाँ दाऊद हमें सिखाता है कि अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना और अपनी आत्मा की रक्षा करना दो अलग काम हैं, और दूसरा काम हम परमेश्वर के हाथ में रख सकते हैं। आज ही एक कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसने आपके बारे में गलत बोला, और उस नाम के ऊपर ज़ोर से यह वाक्य कहिए: "मुझ को मेरे सतानेवालों की इच्छा पर न छोड़।" फिर कागज़ मोड़कर रख दीजिए, और आज उस व्यक्ति को कोई सफ़ाई का संदेश मत भेजिए।

श्रोता

पहले सुननेवालों के लिए यह पद अमूर्त नहीं था। इस्राएल में न पुलिस थी, न फ़ोरेंसिक जाँच। नगर के फाटक पर बुज़ुर्ग बैठते थे और गवाहों के मुँह से निकले शब्द ही प्रमाण थे। दो या तीन गवाह मिल जाएँ, तो आदमी का जीवन समाप्त। इसीलिए व्यवस्था में झूठे गवाह के लिए वही दंड रखा गया जो वह दूसरे पर लाना चाहता था। और इसीलिए जब कोई निर्दोष फँस जाता था, तो वह मंदिर की ओर भागता था, परमेश्वर के तम्बू में शरण लेने, जहाँ परमेश्वर स्वयं अंतिम न्यायी माने जाते थे। पद 4 और 5 में दाऊद की वह तड़प, कि वह यहोवा के भवन में रहने पाए, इसी पृष्ठभूमि में पढ़िए: यह किसी शांत भक्ति की इच्छा नहीं, यह अभियुक्त की शरणस्थली है।

संदर्भ

स्तोत्र 27 का दूसरा आधा भाग किसी राजसी दरबार की सुरक्षित छत के नीचे नहीं लिखा गया। दाऊद का जीवन दो तरह के खतरों से भरा था: युद्धभूमि और दरबार। युद्धभूमि में शत्रु दिखता है; दरबार में वह मुस्कुराता है। शाऊल के समय दाऊद पर राजद्रोह का आरोप लगा, और ऐसे लोग मिल गए जिन्होंने उस आरोप को सच कहकर पुष्ट किया। बाद में अपने ही बेटे के विद्रोह में भी सबसे घातक हथियार अफ़वाह थी। प्राचीन पूर्व में सम्मान और लज्जा ही सामाजिक मुद्रा थी; नाम गया तो सब गया, क्योंकि नाम के साथ परिवार, ज़मीन, गठबंधन, सब जुड़े थे। इसलिए पद 10 में माता-पिता के छोड़ देने की बात और पद 12 में गवाहों का उठ खड़ा होना एक ही डर के दो चेहरे हैं: पूरी तरह अकेला छूट जाना।

बारीकी

"मेरे सतानेवालों की इच्छा" में जो इब्रानी शब्द है, वह है नेफेश, जिसका मूल अर्थ गला या भूख है, और जो बाद में प्राण या इच्छा के लिए प्रयुक्त होता है। यानी दाऊद कह रहा है: मुझे मेरे शत्रुओं के गले के हवाले मत कीजिए, उनकी भूख को मत सौंपिए। यह अनुवाद की बारीकी नहीं, चित्र की बारीकी है, और यह सीधे पद 2 से जुड़ जाता है, जहाँ कुकर्मी "मुझे खा डालने के लिये" चढ़ाई करते हैं। झूठ यहाँ केवल गलत जानकारी नहीं है; वह एक खुला मुँह है। और इसके ठीक सामने पद 5 खड़ा है: परमेश्वर का मण्डप, जहाँ वे अपने भक्त को छिपा लेते हैं। एक ओर निगल जानेवाला गला, दूसरी ओर ढाँप लेनेवाला तम्बू। पूरा स्तोत्र इन्हीं दो जगहों के बीच की दौड़ है।

चिंतन के प्रश्न

जब आपकी प्रतिष्ठा पर आँच आती है, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया सफ़ाई देना होती है या प्रार्थना करना, और यह क्रम आपके बारे में क्या बताता है?

यीशु मसीह ने वह "सौंपा जाना" स्वीकार किया जिससे दाऊद बचने की विनती करता है; क्या इससे आपके अपने अनसुने लगनेवाले प्रार्थनाओं को देखने का नज़रिया बदलता है?

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Psalms 27:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 27:12 का क्या अर्थ है?
दाऊद की प्रार्थना अचानक अदालत के कठघरे जैसी हो जाती है। वह कहता है: मुझे मेरे सतानेवालों की मर्ज़ी के हवाले मत कर दीजिए, मुझे उनके हाथ में सौंपकर पीछे मत हट जाइए, क्योंकि मेरे विरुद्ध झूठे गवाह खड़े हो चुके हैं, और वे केवल झूठ बोलकर संतुष्ट नहीं होते, उनकी साँस में ही हिंसा की धुन है। यह वही व्यक्ति है जिसने कुछ ही पंक्तियाँ पहले कहा था कि सेना छावनी डाले तो भी वह नहीं डरेगा। अब वह सेना से नहीं, जीभ से घिरा है, और वही निडर आवाज़ काँपती हुई विनती में बदल जाती है। यह पद स्तोत्र 27 का सबसे नंगा, सबसे असुरक्षित क्षण है: एक आदमी जिसके पास अपने बचाव में कहने को कुछ बचा नहीं, केवल परमेश्वर का नाम पुकारने के।
भजन संहिता 27:12 किस विषय में है?
इस पद को पढ़ते समय एक और अदालत की छाया पड़ती है। सुसमाचारों में यीशु मसीह के मुकदमे का विवरण लगभग इसी शब्दावली में लिखा गया है: महासभा झूठे गवाह ढूँढ़ती रही, और जो खड़े हुए उनकी गवाही आपस में मेल नहीं खाती थी। अंतर यह है कि दाऊद जो प्रार्थना करता है, वह यीशु के लिए पूरी नहीं हुई। दाऊद कहता है, मुझे सतानेवालों के हवाले न कीजिए; और पिता ने अपने पुत्र को ठीक उसी तरह सौंप दिया, झूठे गवाहों की इच्छा पर, पीलातुस की कायरता पर, भीड़ की चीख पर। यह वाचा का टूटना नहीं था, बल्कि वाचा का चरम पालन: एक निर्दोष ने वह जगह ली जहाँ हम खड़े होने के योग्य थे। इसीलिए हम आज यह प्रार्थना उम्मीद के साथ कर सकते हैं, क्योंकि एक बार किसी ने इसका उत्तर "नहीं" में सुना, ताकि हमें "हाँ" मिल सके।
भजन संहिता 27:12 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पहले सुननेवालों के लिए यह पद अमूर्त नहीं था। इस्राएल में न पुलिस थी, न फ़ोरेंसिक जाँच। नगर के फाटक पर बुज़ुर्ग बैठते थे और गवाहों के मुँह से निकले शब्द ही प्रमाण थे। दो या तीन गवाह मिल जाएँ, तो आदमी का जीवन समाप्त। इसीलिए व्यवस्था में झूठे गवाह के लिए वही दंड रखा गया जो वह दूसरे पर लाना चाहता था। और इसीलिए जब कोई निर्दोष फँस जाता था, तो वह मंदिर की ओर भागता था, परमेश्वर के तम्बू में शरण लेने, जहाँ परमेश्वर स्वयं अंतिम न्यायी माने जाते थे। पद 4 और 5 में दाऊद की वह तड़प, कि वह यहोवा के भवन में रहने पाए, इसी पृष्ठभूमि में पढ़िए: यह किसी शांत भक्ति की इच्छा नहीं, यह अभियुक्त की शरणस्थली है।
भजन संहिता 27:12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"मेरे सतानेवालों की इच्छा" में जो इब्रानी शब्द है, वह है नेफेश, जिसका मूल अर्थ गला या भूख है, और जो बाद में प्राण या इच्छा के लिए प्रयुक्त होता है। यानी दाऊद कह रहा है: मुझे मेरे शत्रुओं के गले के हवाले मत कीजिए, उनकी भूख को मत सौंपिए। यह अनुवाद की बारीकी नहीं, चित्र की बारीकी है, और यह सीधे पद 2 से जुड़ जाता है, जहाँ कुकर्मी "मुझे खा डालने के लिये" चढ़ाई करते हैं। झूठ यहाँ केवल गलत जानकारी नहीं है; वह एक खुला मुँह है। और इसके ठीक सामने पद 5 खड़ा है: परमेश्वर का मण्डप, जहाँ वे अपने भक्त को छिपा लेते हैं। एक ओर निगल जानेवाला गला, दूसरी ओर ढाँप लेनेवाला तम्बू। पूरा स्तोत्र इन्हीं दो जगहों के बीच की दौड़ है।
भजन संहिता 27:12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यीशु मसीह ने वह "सौंपा जाना" स्वीकार किया जिससे दाऊद बचने की विनती करता है; क्या इससे आपके अपने अनसुने लगनेवाले प्रार्थनाओं को देखने का नज़रिया बदलता है?

Psalms 27 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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