बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 27

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

चारों ओर छावनी डाले सेना, झूठे गवाह, और अपने ही माता-पिता का छोड़ जाना; और इन सबके बीच एक आदमी परमेश्वर से सिर्फ़ एक चीज़ माँगता है: उनके भवन में रहना और उनकी मनोहरता को निहारना। भजन का पहला हिस्सा ऊँचे स्वर में भरोसे की घोषणा है, "यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूँ?" फिर अचानक स्वर टूटता है और वही आवाज़ गिड़गिड़ाने लगती है, "अपना मुख मुझसे न छिपा।" अंत में कवि किसी और से नहीं, अपने ही मन से कहता है: "यहोवा की बाट जोहता रह।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि वह क्या नहीं माँगता। शत्रुओं का नाश नहीं, सेहत नहीं, सुरक्षा भी नहीं। "एक वर मैंने यहोवा से माँगा है" और वह वर है उपस्थिति। जिस शब्द का अनुवाद "मनोहरता" हुआ है, वह इब्रानी में नोअम है, यानी सुखदता, मधुरता, वह सौंदर्य जिसे देखकर मन शांत होता है। यह आदमी उत्तर नहीं, चेहरा चाहता है। और यहीं यह भजन हमें असहज करता है, क्योंकि वह भरोसे और घबराहट को सुलझाता नहीं, दोनों को साथ खड़ा रहने देता है। पद 1 का निडर आदमी और पद 9 का काँपता हुआ याचक एक ही व्यक्ति है। विश्वास यहाँ डर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि डर के बीच दृष्टि की दिशा है।

सूत्र

दाऊद जीवन भर उस तम्बू में रहना चाहता था जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति बसती थी, पर वह वहाँ रह नहीं सकता था; वह याजक नहीं था, और तम्बू का गुप्त स्थान उसके लिए बंद था। यह इच्छा सदियों तक अधूरी लटकी रही, जब तक यूहन्ना ने लिखा कि वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच डेरा खड़ा किया। जिस मण्डप में छिपने की बात पद 5 करता है, वह अब एक व्यक्ति है। और मसीह का छोड़ा जाना इसे और गहरा करता है: क्रूस पर वही मुख छिप गया, वही परित्याग हुआ जिससे बचने की प्रार्थना यह भजन करता है, ताकि पद 9 की गुहार हमारे लिए कभी अनसुनी न रहे।

दर्पण

"मेरे माता-पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है" पद पढ़ने में भावुक लगता है, जीने में क्रूर है। शायद आपके लिए यह वह फ़ोन कॉल है जो कभी नहीं आती, वह घर जहाँ लौटने का मन नहीं करता, या वह दफ़्तर जहाँ कोई आपके बारे में ऐसी बात फैला रहा है जो सच नहीं है और आप सफ़ाई भी नहीं दे सकते। भजन इन चीज़ों को छोटा नहीं बनाता। वह सिर्फ़ इच्छाओं का क्रम बदलता है। ज़्यादातर समय हम परमेश्वर से परिस्थिति माँगते हैं; यह आदमी परमेश्वर को माँगता है और परिस्थिति को उनके हाथ में रहने देता है। आज एक कागज़ पर लिखिए, "एक वर मैं यहोवा से माँगता हूँ", और उसके नीचे ईमानदारी से वह एक चीज़ लिखिए जो सचमुच आपका मन माँग रहा है। फिर उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने पढ़िए और चुप रहिए।

अन्य वचनों की प्रतिध्वनि

भजन 23 इसी इच्छा पर समाप्त होता है, कि मैं सदा यहोवा के भवन में वास करूँगा, पर वहाँ स्वर शांत है, हरी चरागाहों वाला। यहाँ वही इच्छा युद्ध के शोर में दोहराई जाती है, और इसीलिए ज़्यादा भारी लगती है; शांति में परमेश्वर को चाहना आसान है, घेराबंदी में नहीं। दूसरी ओर भजन 73 का कवि तब तक उलझा रहता है जब तक वह परमेश्वर के पवित्रस्थान में नहीं जाता, और तब उसकी समझ बदल जाती है। दोनों भजन एक ही बात कहते हैं: कुछ चीज़ें दूर से समझ में नहीं आतीं, उपस्थिति के भीतर आकर ही साफ़ होती हैं।

पृष्ठभूमि

यह भजन दाऊद के नाम से जुड़ा है, और इसकी दुनिया मंदिर से पहले की है, जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति एक तम्बू में थी। प्राचीन पूर्व में अभयारण्य वह जगह थी जहाँ भागा हुआ आदमी शरण पा सकता था, इसलिए "अपने तम्बू के गुप्त स्थान में वह मुझे छिपा लेगा" कोई काव्यात्मक अलंकार नहीं, बल्कि एक कानूनी और वास्तविक तस्वीर है। "झूठे साक्षी" वाली शिकायत भी ठोस है: नगर के फाटक पर होने वाली सुनवाई में गवाही ही सब कुछ थी, और दो झूठे गवाह किसी की जान ले सकते थे। "मेरा सिर ऊँचा होगा" सम्मान और लज्जा वाली संस्कृति की भाषा है, जहाँ इज़्ज़त खोना मरने जैसा था।

पहले श्रोता

जो लोग इसे गाते थे, उनके लिए "यहोवा के भवन में रहना" एक भावना नहीं, एक यात्रा थी। साल में कुछ बार वे पर्व पर जाते, और कहा जाता था कि वे परमेश्वर का मुख देखने जा रहे हैं। इसलिए "अपना मुख मुझसे न छिपा" उनके कानों में उस याजकीय आशीर्वाद की उलटी छाया थी, जिसमें प्रार्थना की जाती है कि यहोवा अपना मुख चमकाएँ। और निर्वासन के बाद, जब मंदिर दूर या नष्ट था, यह भजन और चुभता था: हम उस उपस्थिति को माँग रहे हैं जो अब हमारी पहुँच में नहीं। शायद इसीलिए भजन उत्तर पर नहीं, प्रतीक्षा पर खत्म होता है, दो बार दोहराई गई प्रतीक्षा पर।

चिंतन के प्रश्न

अगर आपको आज परमेश्वर से केवल एक वर माँगना हो, तो क्या आप ईमानदारी से वही माँगेंगे जो दाऊद ने माँगा, और अगर नहीं, तो यह आपके बारे में क्या कहता है?

भजन "प्रतीक्षा करता रह" कहकर चुप हो जाता है, हल बताए बिना। आप अपने जीवन के किस हिस्से में उत्तर की जगह केवल उपस्थिति के साथ जीना सीख रहे हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

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The Songs of Jesus

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Psalms 1-72

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Psalms 73-150

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Psalms 27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 27 का क्या अर्थ है?
चारों ओर छावनी डाले सेना, झूठे गवाह, और अपने ही माता-पिता का छोड़ जाना; और इन सबके बीच एक आदमी परमेश्वर से सिर्फ़ एक चीज़ माँगता है: उनके भवन में रहना और उनकी मनोहरता को निहारना। भजन का पहला हिस्सा ऊँचे स्वर में भरोसे की घोषणा है, "यहोवा मेरी ज्योति और मेरा उद्धार है; मैं किस से डरूँ?
भजन संहिता 27 किस विषय में है?
दाऊद जीवन भर उस तम्बू में रहना चाहता था जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति बसती थी, पर वह वहाँ रह नहीं सकता था; वह याजक नहीं था, और तम्बू का गुप्त स्थान उसके लिए बंद था। यह इच्छा सदियों तक अधूरी लटकी रही, जब तक यूहन्ना ने लिखा कि वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच डेरा खड़ा किया। जिस मण्डप में छिपने की बात पद 5 करता है, वह अब एक व्यक्ति है। और मसीह का छोड़ा जाना इसे और गहरा करता है: क्रूस पर वही मुख छिप गया, वही परित्याग हुआ जिससे बचने की प्रार्थना यह भजन करता है, ताकि पद 9 की गुहार हमारे लिए कभी अनसुनी न रहे।
भजन संहिता 27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन 23 इसी इच्छा पर समाप्त होता है, कि मैं सदा यहोवा के भवन में वास करूँगा, पर वहाँ स्वर शांत है, हरी चरागाहों वाला। यहाँ वही इच्छा युद्ध के शोर में दोहराई जाती है, और इसीलिए ज़्यादा भारी लगती है; शांति में परमेश्वर को चाहना आसान है, घेराबंदी में नहीं। दूसरी ओर भजन 73 का कवि तब तक उलझा रहता है जब तक वह परमेश्वर के पवित्रस्थान में नहीं जाता, और तब उसकी समझ बदल जाती है। दोनों भजन एक ही बात कहते हैं: कुछ चीज़ें दूर से समझ में नहीं आतीं, उपस्थिति के भीतर आकर ही साफ़ होती हैं।
भजन संहिता 27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जो लोग इसे गाते थे, उनके लिए "यहोवा के भवन में रहना" एक भावना नहीं, एक यात्रा थी। साल में कुछ बार वे पर्व पर जाते, और कहा जाता था कि वे परमेश्वर का मुख देखने जा रहे हैं। इसलिए "अपना मुख मुझसे न छिपा" उनके कानों में उस याजकीय आशीर्वाद की उलटी छाया थी, जिसमें प्रार्थना की जाती है कि यहोवा अपना मुख चमकाएँ। और निर्वासन के बाद, जब मंदिर दूर या नष्ट था, यह भजन और चुभता था: हम उस उपस्थिति को माँग रहे हैं जो अब हमारी पहुँच में नहीं। शायद इसीलिए भजन उत्तर पर नहीं, प्रतीक्षा पर खत्म होता है, दो बार दोहराई गई प्रतीक्षा पर।
भजन संहिता 27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
भजन "प्रतीक्षा करता रह" कहकर चुप हो जाता है, हल बताए बिना। आप अपने जीवन के किस हिस्से में उत्तर की जगह केवल उपस्थिति के साथ जीना सीख रहे हैं?

Psalms 27 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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