भजन संहिता 40:2
पाठ
भजनकार एक ही साँस में अपनी पूरी कहानी कह देता है: "उसने मुझे सत्यानाश के गड्ढे और दलदल की कीच में से उबारा, और मुझ को चट्टान पर खड़ा करके मेरे पैरों को दृढ़ किया है।" दो जगहें हैं इस वाक्य में, और उनके बीच कोई पुल नहीं, केवल परमेश्वर का हाथ। पहली जगह: एक गड्ढा जहाँ पैर के नीचे कुछ ठोस नहीं, जहाँ हर हरकत आदमी को और गहरे धँसा देती है। दूसरी जगह: चट्टान, जहाँ खड़ा होना सम्भव है। ध्यान दीजिए कि यहाँ चढ़ने का, संघर्ष करने का, हाथ-पैर मारने का कोई वर्णन नहीं है। केवल यह कि किसी ने उसे ऊपर उठाया, कहीं रखा, और फिर उसके पाँव थाम दिए। पिछले पद में वह कहता है कि वह "धीरज से" प्रतीक्षा करता रहा। तो बीच का समय कितना लम्बा था, वह हमें नहीं बताता।
मूल बात
इस पद के सारे क्रिया-शब्दों का कर्ता एक ही है: परमेश्वर। उबारा, खड़ा किया, दृढ़ किया। भजनकार कुछ नहीं करता, वह केवल वह है जिसके साथ कुछ किया जाता है। यही इस छोटे से वाक्य का धर्मशास्त्र है, और यह असुविधाजनक है, क्योंकि हम सब अपने उद्धार की कहानी में कम से कम एक सहायक भूमिका चाहते हैं। पर दलदल की कीच का स्वभाव ही यही है कि वहाँ अपने प्रयास से निकलना असम्भव है; जितना ज़ोर लगाओ, उतना धँसो। और "सत्यानाश का गड्ढा" मूल भाषा में उस गड्ढे के लिए है जो शोर करता है, गरजता है, जहाँ मृत्यु की आवाज़ सुनाई देती है। यह केवल मुसीबत नहीं, यह विनाश की दहलीज़ है। जो परमेश्वर यहाँ तक झुककर पहुँचते हैं, वे हमें सुधारने नहीं, बचाने आते हैं। और फिर भी पद यह नहीं कहता कि चट्टान पर खड़े होने के बाद जीवन आसान हो गया। केवल यह कि पाँव अब फिसलते नहीं। क्या यह काफ़ी है? भजनकार के लिए था।
जोड़ने वाला सूत्र
यह भजन अपने ही बीचोंबीच कहीं मुड़ जाता है। जो आदमी गड्ढे से निकाला गया, वह कुछ पदों बाद कहता है: "देख, मैं आया हूँ; क्योंकि पुस्तक में मेरे विषय ऐसा ही लिखा हुआ है।" इब्रानियों की पत्री ने इन्हीं शब्दों को यीशु मसीह के मुँह में रखा, और उसके बाद इस भजन को पढ़ना पहले जैसा नहीं रह जाता। क्योंकि अब दो आवाज़ें एक साथ सुनाई देती हैं: वह जो उबारा गया, और वह जो उबारने के लिए स्वयं नीचे उतरा। मसीह ने गड्ढे को बाहर से नहीं देखा; वे उसमें गए, कीच तक, मृत्यु तक, और वहाँ उन्हें कोई हाथ ऊपर उठाने नहीं आया, कम से कम तीसरे दिन तक नहीं। चट्टान पर खड़े होने की हमारी कहानी किसी और के धँसने से शुरू होती है। यह अलंकार नहीं है, यह सुसमाचार का ढाँचा है।
आईना
आप जानते हैं वह जगह कौन-सी है। हो सकता है वह एक नौकरी हो जिसमें हर सुबह थोड़ा और मर जाना पड़ता है, या एक रिश्ता जो सालों से उसी एक झगड़े पर अटका है, या शरीर में कोई रिपोर्ट जो बदलती नहीं। और कीच का सबसे क्रूर हिस्सा यह नहीं कि आप फँसे हैं, बल्कि यह कि आपकी हर कोशिश आपको और नीचे ले जाती है। भजनकार हमें एक बात सिखाता है जो हमारा अहंकार सुनना नहीं चाहता: वहाँ से निकलने का रास्ता आपके भीतर नहीं है। यह निष्क्रियता का उपदेश नहीं, सच्चाई है। आज एक काम कीजिए: काग़ज़ पर वह एक बात लिखिए जिसमें आप धँसे हुए हैं, और उसके नीचे लिखिए, "यहोवा, मेरे पाँव आप ही दृढ़ कर सकते हैं," फिर वह काग़ज़ ज़ोर से पढ़कर अपनी जेब या बटुए में रख लीजिए।
अन्तःपाठ
यिर्मयाह को सचमुच एक गड्ढे में डाला गया था, जहाँ पानी नहीं, कीच थी, और वह उसमें धँस गया; उसे रस्सियों और पुराने चिथड़ों के सहारे खींचकर निकाला गया। भजन 40 का चित्र उसी दुनिया से आता है, जहाँ सूखा कुआँ जेल भी था और कब्र भी। इसीलिए इब्री पाठक के लिए "गड्ढा" कोई काव्य नहीं, एक जानी-पहचानी जगह थी। और दूसरी ओर, इसी भजन का तीसरा पद कहता है कि परमेश्वर ने "एक नया गीत" सिखाया; प्रकाशितवाक्य में वही नया गीत उन लोगों के मुँह में है जो मेम्ने के लहू से मोल लिए गए। उबारे जाने और गाने के बीच का यह सम्बन्ध पूरी बाइबल में चलता रहता है: छुड़ाया हुआ आदमी चुप नहीं रह सकता।
श्रोता
यह भजन मन्दिर में गाया जाता था, अकेले कमरे में नहीं। पद 9 और 10 में भजनकार "बड़ी सभा" की बात करता है, और यही उसका संदर्भ है। कल्पना कीजिए: एक आदमी जो किसी भारी संकट से बचकर लौटा है, बलि चढ़ाने आता है, और भरी सभा के सामने यह गाता है। उसके आसपास खड़े लोग अपने-अपने गड्ढों में अभी भी हैं, और वे यह साक्षी इसलिए सुनते हैं ताकि "यहोवा पर भरोसा रखेंगे।" प्राचीन इस्राएल में व्यक्तिगत उद्धार कभी निजी सम्पत्ति नहीं था; वह समुदाय की पूँजी था। हम इस पद को अकेले पढ़कर आत्मिक आराम पा लेते हैं, पर पहले श्रोताओं ने इसे किसी जीवित आदमी के मुँह से, उसके काँपते स्वर में सुना था। वह फ़र्क़ छोटा नहीं है।
प्रश्न
और वे जो उबारे नहीं गए? यह भजन उनके बारे में चुप है, और यह चुप्पी खटकती है। हम सबने प्रार्थना की है और दलदल में ही रह गए हैं; हमने उन्हें जानते हैं जो गड्ढे में ही मर गए। पद 1 का "धीरज से बाट जोहता रहा" इसी असुविधा को छिपाए रखता है: हमें नहीं बताया जाता कि कितने महीने, कितने साल। और भजन के अन्त में वही आदमी फिर कहता है, "हे मेरे परमेश्वर विलम्ब न कर," मानो चट्टान पर खड़े होने के बाद भी प्रतीक्षा ख़त्म नहीं हुई। शायद यही इस भजन की ईमानदारी है। वह उद्धार की गारंटी नहीं देता, वह एक गवाही देता है, और गवाही हमेशा किसी और की होती है जब तक वह आपकी न हो जाए। इस बीच में क्या करें? भजनकार ने प्रतीक्षा की। हमें इससे बेहतर कुछ नहीं दिया गया, और शायद हमें इससे बेहतर कुछ चाहिए भी नहीं।
चिन्तन
आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप अब तक अपनी ही कोशिशों से निकलने का प्रयास कर रहे हैं, और उस प्रयास को छोड़ देना आपको किस बात से डराता है?
जिस "चट्टान" पर परमेश्वर ने आपको कभी खड़ा किया था, क्या आपने उसकी कहानी किसी ऐसे व्यक्ति को सुनाई है जो अभी कीच में है, या वह गवाही आपके भीतर ही बन्द रह गई?
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Psalms 40:2 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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भजन संहिता 40:2 का क्या अर्थ है?
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भजन संहिता 40:2 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 40:2 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 40 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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